सोमवार, 30 जनवरी 2017

इतिहास को विकृत करने की जिद

 भारतीय  फिल्म उद्योग में जब भी किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्तित्व पर फिल्म बनाने का विचार प्रारंभ होता है, तब उसके साथ विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं। दरअसल, हमारे निर्देशकों में एक बड़ी बीमारी है कि वह इतिहास को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत न करके अपने ढंग से छेड़छाड़ करके प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। जहाँ मान्य सत्य के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया जाता है, वहीं विवाद खड़ा होता है। निर्देशक अपने चश्मे से इतिहास को देखने और दिखाने की जिद में समाज को आहत करने की गलती कर बैठते हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक-निर्माता संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने की घटना इसी आहत समाज के आक्रोश का प्रकटीकरण है। करणी सेना के लोगों ने जयपुर में 'पद्मावती' फिल्म के शूटिंग स्थल पर पहुंच कर विरोध किया और भंसाली को थप्पड़ मार दिया। करणी सेना के इस कृत्य की निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, जितनी निंदा करणी सेना की करना जरूरी है, उससे कहीं अधिक निंदा और आलोचना संजय लीला भंसाली की भी करना  आवश्यक है।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जायज है समान नागरिक संहिता की माँग

 प्र ख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने जयपुर साहित्य उत्सव (जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल) के मंच से एक महत्त्वपूर्ण बहस को हवा दी है। सदैव चर्चा में रहने वाली बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने साहित्य उत्सव में माँग की है कि देश में तुरंत समान नागरिक संहिता लागू की जाए। तसलीमा बेबाकी से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर अपनी बात रखने के लिए जानी जाती हैं। इस कारण वह मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर भी रहती हैं। समान नागरिक संहिता की माँग करते वक्त उन्होंने कहा भी कि जब वह हिंदुत्व का विरोध करती हैं तब किसी को कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन जब इस्लाम की आलोचना करती हैं या फिर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करती हैं, तब उन्हें जान से मारने की धमकी दी जाती है। उन्हें खत्म करने के लिए गैरकानूनी फतवा तक जारी कर दिया जाता है।

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

केरल में जंगलराज

 केरल  में बढ़ती हिंसा इस बात का सबूत है कि वामपंथ से बढ़कर हिंसक विचार दूसरा कोई और नहीं है। वामपंथी विचार घोर असहिष्णु है। असहिष्णुता इस कदर है कि वामपंथ को दूसरे विचार स्वीकार्य नहीं है, अपितु उसे अन्य विचारों का जीवत रहना भी बर्दाश्त नहीं है। इस विचारधारा के शीर्ष विचारकों ने अपने जीवनकाल में हजारों-लाखों निर्दोष लोगों का खून बहाकर उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जिस वामपंथी नेता ने विरोधियों का जितना रक्त बहाया, उसे उतना ही अधिक महत्त्व दिया गया है। दरअसल, वामपंथी विचारधारा के मूल में हिंसा है, जिसका प्रकटीकरण वामपंथ को मानने वालों के व्यवहार में होता है। तानाशाह प्रवृत्ति की इस विचारधारा ने भारत में मजबूरी में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया है। यही कारण है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में इनकी आस्था दिखाई नहीं देती है। भारत के जिस हिस्से में यह विचार ताकत में आया, वहाँ हिंसा और तानाशाही का नंगा नाच खेला। केरल के वर्तमान हालात इस बात के गवाह हैं।

सोमवार, 23 जनवरी 2017

सीमारेखा लांघते केजरीवाल

 देश  में रचनात्मक राजनीति का दावा करने वाले आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल निरंतर अमर्यादित राजनीति के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका राजनीतिक आचरण किसी भी प्रकार रचनात्मक और सकारात्मक दिखाई नहीं देता है। यह कहना अधिक उचित ही होगा कि कई अवसर पर उनका आचरण निंदनीय ही नहीं, अपितु आपत्तिजनक भी होता है। यह भी स्थापित हो चुका है कि केजरीवाल की राजनीति आरोपों से शुरू होकर आरोपों पर ही खत्म होती है। आरोप दागने की अपनी तोप के निशाने पर वह किसी को भी ले सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह भी गुमान है कि समूची भारतीय राजनीति में उनके अलावा कोई दूसरा नेता ईमानदार नहीं है। यहाँ तक कि वह संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ भी मुँह खोलने से पहले विचार नहीं करते हैं। चुनाव आयोग की फटकार से सबक सीखने की बजाय आयोग को ही न्यायालय में चुनौती देने का दंभ उनके इसी आचरण की बानगी है।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

तस्वीर की जगह गांधी विचार पर बहस होनी चाहिए

 कैलेंडर  और डायरी पर महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर से उत्पन्न विवाद बेवजह है। यह इसलिए, क्योंकि भारत में इस बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि किसी कागज के टुकड़े पर चित्र प्रकाशित नहीं होने से गांधीजी के व्यक्तित्व पर पर्दा पड़ जाएगा। यह तर्क तो हास्यास्पद ही है कि गांधीजी के चित्र की जगह प्रधानमंत्री का चित्र इसलिए प्रकाशित किया गया है, ताकि गांधी की जगह मोदी ले सकें। गांधीजी की जगह वास्तव में कोई नहीं ले सकता। आश्चर्य की बात यह है कि गांधीजी के चित्र को लेकर सबसे अधिक चिंता उन लोगों को हो रही है, जिन्होंने 70 साल में गांधीजी के विचार को पूरी तरह से दरकिनार करके रखा हुआ था। सिर्फ राजनीति की दुकान चलाने के लिए ही यह लोग गांधी नाम की माला जपते रहे हैं। वास्तव में आज जरूरत इस बात की है कि गांधीजी के विचार पर बात की जाए। इस बहस में इस पहलू को भी शामिल किया जाए कि आखिर इस देश में गांधीजी के विचार को दरकिनार करने में किसकी भूमिका रही है? आखिर अपने ही देश में गांधीजी कैलेंडर, डायरी, नोट और दीवार पर टंगे चित्रों तक ही सीमित क्यों रह गए? उनके विचार को व्यवहार में लाने की सबसे पहले जिम्मेदारी किसके हिस्से में आई थी और उन्होंने क्या किया?

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सांप्रदायिक निर्णय के बाद भी कांग्रेस सेक्युलर!

 जुमे  की नमाज के लिए मुस्लिम कर्मचारियों को 90 मिनट का अवकाश देकर उत्तराखंड सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म का लबादा भर ओढ़ रखा है, असल में उससे बढ़ा सांप्रदायिक दल कोई और नहीं है। कांग्रेस के साथ-साथ उन तमाम बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के सेक्युलरिज्म की पोलपट्टी भी खुल गई है, जो भारतीय जनता पार्टी या किसी हिंदूवादी संगठन के किसी नेता की 'कोरी बयानबाजी' से आहत होकर 'भारत में सेक्युलरिज्म पर खतरे' का ढोल पीटने लगते हैं, लेकिन यहाँ राज्य सरकार के निर्णय पर अजीब खामोशी पसरी हुई है। उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के घोर सांप्रदायिक निर्णय के खिलाफ तथाकथित प्रगतिशील और बुद्धिजीवी समूहों से कोई आपत्ति नहीं आई है। सोचिए, यदि किसी भाजपा शासित राज्य में निर्णय हुआ होता कि सोमवार को भगवान शिव पर जल चढ़ाने के लिए हिंदू कर्मचारियों-अधिकारियों को 90 मिनट का अवकाश दिया जाएगा, तब देश में किस प्रकार का वातावरण बनाया जाता? सेक्युलरिज्म के नाम पर यह दोगलापन पहली बार उजागर नहीं हुआ है। यह विडम्बना है कि वर्षों से इस देश में वोटबैंक की राजनीति के कारण समाज को बाँटने का काम कांग्रेस और उसके प्रगतिशील साथियों ने किया है, लेकिन सांप्रदायिक दल होने की बदनामी समान नागरिक संहिता की माँग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के खाते में जबरन डाल दी गई है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

जनप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज के 11 वर्ष

 मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के यशस्वी कार्यकाल को 29 नवम्बर को 11 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। निश्चित ही उनकी यह यात्रा आगे भी जारी रहेगी। इंदौर में आयोजित 5वीं ग्लोबल इन्वेस्टर समिट-2016 के समापन समारोह में उन्होंने कहा भी है कि अगली इन्वेस्टर समिट 2019 में उनकी ही सरकार कराएगी। मुख्यमंत्री के इस बयान को कुछ लोग उनका आत्मविश्वास कह सकते हैं और कुछ लोग अति विश्वास भी कहने से नहीं चूकेंगे। वास्तव में यह जनता का भरोसा है, जिसके आधार पर शिवराज यह कह गए। अपनी इस यात्रा में शिवराज बड़ों को आदर देकर, छोटों को स्नेह देकर और समकक्षों को साथ लेकर लगातार आगे बढ़ रहे हैं। यह उनके नेतृत्व की कुशलता है। उनका व्यक्तित्व इतना सहज है कि जो भी उनके नजदीक आता है, उनका मुरीद हो जाता है। शिवराज के राजनीतिक विरोधी भी निजी जीवन में उनके व्यवहार के प्रशंसक हैं। सहजता, सरलता, सौम्यता और विनम्रता उनके व्यवहार की खासियत है। उनके यह गुण उन्हें राजनेता होकर भी राजनेता नहीं होने देते हैं। वह मुख्यमंत्री हैं, लेकिन जनता के मुख्यमंत्री हैं। 'जनता का मुख्यमंत्री' होना उनको औरों से अलग करता है। प्रदेश में पहली बार शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री निवास के द्वार समाज के लिए खोले। वह प्रदेश में गाँव-गाँव ही नहीं घूमे, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को मुख्यमंत्री निवास पर बुलाकर भी उनको सुना और समझा। अपने इस स्वभाव के कारण शिवराज सिंह चौहान 'जनप्रिय' हो गए हैं। मध्यप्रदेश में उनके मुकाबले लोकप्रियता किसी मुख्यमंत्री ने अर्जित नहीं की है।