मंगलवार, 17 जुलाई 2018

हामिद अंसारी का शरीयत और जिन्ना प्रेम

- लोकेन्द्र सिंह 
पूर्व उपराष्ट्रपति और कांग्रेस के मुस्लिम नेता हामिद अंसारी एक बार फिर अपनी संकीर्ण सोच के कारण विवादों में हैं। कबीलाई समय के शरीयत कानून और भारत विभाजन के गुनहगार मोहम्मद अली जिन्ना के संदर्भ में उनके विचार आश्चर्यजनक हैं। यह भरोसा करना मुश्किल हो जाता है कि हामिद अंसारी कभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के उपराष्ट्रपति रहे हैं। किंतु, यह सच है। समय-समय पर उनके विचार जान कर यह सच ही प्रतीत होता है कि पूर्व उपराष्ट्रपति को भारत के संविधान और कानून व्यवस्था में भरोसा नहीं है। वह मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने की जगह उनके लिए आधुनिक समय में आदम युग का कानून चाहते हैं। वह देश के प्रत्येक जिले में ऐसी शरिया अदालतों की स्थापना के पक्षधर हैं, जिनमें महिलाओं के लिए न्याय की कोई व्यवस्था नहीं है। शरिया अदालतों पर हामिद अंसारी के वक्तव्य से यह क्यों नहीं समझा जाए कि उन्हें भारत के आम मुसलमानों के मन में भारत की न्याय व्यवस्था के प्रति संदेह उत्पन्न करना चाहते हैं। शरिया कानून के साथ ही मोहम्मद अली जिन्ना के प्रति प्रेम भी संविधान के प्रति हामिद अंसारी की निष्ठा को संदिग्ध बनाता है।

रविवार, 15 जुलाई 2018

कांग्रेस से छूट नहीं पा रही हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति


- लोकेन्द्र सिंह 
कोई भी व्यक्ति या संगठन बनावटी व्यवहार अधिक दिन तक नहीं कर सकता है। क्योंकि, उसका डीएनए इसकी अनुमति नहीं देता है। यदि स्वभाव के विपरीत चलने का प्रयास किया जाए तो अंतर्मन में बनावटी एवं वास्तविक आचरण में एक प्रकार का संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। कांग्रेस के साथ भी यही हो रहा है। अपने कथित सेकुलर (मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदुओं की उपेक्षा) के कारण ही कांग्रेस कथित 'सॉफ्ट हिंदुत्व' (सुविधाजनक हिंदू समर्थन) की राह पर चलने में असहज है। कांग्रेस के शीर्ष नेता अकसर ऐसे बयान दे देते हैं, जिससे सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर साध-साध कर रखे जा रहे उसके कदम डगमगा जाते हैं। या यह कहना उचित होगा कि कांग्रेस के नेता सुनियोजित ढंग से समय-समय पर अपने परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि उसका 'सॉफ्ट हिंदुत्व' सिर्फ भ्रम है, वास्तविकता में कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण पर ही दृढ़ता से टिकी हुई है। मुस्लिम समुदाय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं से खिन्न न हो जाए, इसलिए उसे भरोसे में बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने पी. चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, सैफुद्दीन सोज, सुशील कुमार शिंदे, सलमान खुर्शीद और पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी को यह जिम्मेदारी दे रखी है। अब इस सूची में शशि थरूर का नया नाम और जुड़ गया है।

कठघरे में चर्च से संचालित संस्थाएं


- लोकेन्द्र सिंह 
भारत में ईसाई मिशनरीज संस्थाएं सेवा की आड़ में किस खेल में लगी हैं, अब यह स्पष्ट रूप से सामने आ गया है। वेटिकन सिटी से संत की उपाधि प्राप्त 'मदर टेरेसा' द्वारा कोलकाता में स्थापित 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' की संलिप्तता मानव तस्करी में पाई गई है। बच्चे चोरी करना और उन्हें बाहर बेचने जैसे अपराध में ये संस्थाएं घिनौने स्तर तक गिर चुकी हैं। दुष्कर्म पीडि़त युवतियों की कोख को भी ईसाई कार्यकर्ताओं/ननों ने बेचा है। यह अमानवीयता है। ईसाई मिशनरीज के अपराधों का पहली बार खुलासा नहीं हुआ है। सेवा की आड़ में सुदूर वनवासी क्षेत्रों से लेकर शहरों में सक्रिय ईसाई संस्थाओं पर धर्मांतरण और चर्च में महिलाओं के उत्पीडऩ के आरोप पहले भी सिद्ध होते रहे हैं। अभी हाल ही में केरल और अन्य राज्यों से समाचार आये हैं कि वहां के चर्च में पादरियों ने महिला कार्यकर्ताओं का शारीरिक शोषण किया है। झारखंड के खूंटी जिले में समाज जागरण के लिए नुक्कड़ नाटक करने वाले समूह की पांच युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना में भी चर्च की भूमिका सामने आई है। खूंटी सामूहिक बलात्कार प्रकरण नक्सली-माओवादी और चर्च के खतरनाक गठजोड़ को भी उजागर करता है।

रविवार, 8 जुलाई 2018

पहली बारिश की सौंधी सुगंध-सी हैं 'रिश्तों की बूंदें'


- लोकेन्द्र सिंह 
कवि के कोमल अंतस् से निकलती हैं कविताएं। इसलिए कविताओं में यह शक्ति होती है कि वह पढऩे-सुनने वाले से हृदय में बिना अवरोध उतर जाती हैं। कवि के हृदय से पाठक-श्रोता के हृदय तक की यात्रा पूर्ण करना ही मेरी दृष्टि में श्रेष्ठ काव्य की पहचान है। युवा कवि सुदर्शन व्यास के प्रथम काव्य संग्रह 'रिश्तों की बूंदें' में ऐसी ही निर्मल एवं सरल कविताएं हैं। उनकी कविताओं में युवा हृदय की धड़कन है, रक्त में ज्वार है, भावनाओं में संवेदनाएं हैं। सुदर्शन की कविताओं में अपने समाज के प्रति चेतना है, सरोकार है और सकारात्मक दृष्टिकोण है। उनकी कविताओं में दायित्वबोध भी स्पष्ट दिखता है। उनकी तमाम कविताओं में रिश्तों की सौंधी सुगंध उसी तरह व्याप्त है, जैसे कि पहली बारिश की बूंदें धरती को छूती हैं, तब उठती है- सौंधी सुगंध। उनके इस काव्य संग्रह की प्रतिनिधि कविता 'रिश्तों की बूंदें' के साथ ही 'अनमोल रिश्ते' और 'मुंह बोले रिश्ते' सहित अन्य कविताओं में भी रिश्तों गर्माहट को महसूस किया जा सकता है। कुल जमा एक सौ साठ पन्नों में समृद्ध सुदर्शन का काव्य संग्रह चार हिस्सों में विभक्त है। पहले हिस्से में श्रृंगार से ओत-प्रोत कविताएं हैं, दूसरे हिस्से में सामाजिक संदेश देती कविताएं शामिल हैं। वहीं, तीसरे और चौथे हिस्से में गीत और गज़ल को शामिल किया गया है। काव्य के व्याकरण की कसौटी पर यह कविताएं कितनी खरी उतरती हैं, वह आलोचक तय करेंगे, लेकिन भाव की कसौटी पर कविताएं चौबीस कैरेट खरी हैं। कविताओं में भाव का प्रवाह ऐसा है कि पढऩे-सुनने वाला स्वत: ही उनके साथ बहता है। सुदर्शन की कविताओं पर किसी प्रकार की 'बन्दिशें' नहीं हैं। उन्होंने लिखा भी है- 'बन्दिशें भाषा की होती हैं/ एहसासों की नहीं। बन्दिशें होती हैं शब्दों में/ भावनाओं में नहीं।' उनकी पहली कृति में एहसास/भाव बिना किसी बन्दिश के अविरल बहे हैं, सदानीरा की तरह।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

‘सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा’ की ओर बढ़ते कदम

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की पत्रिका 'योजना' के जुलाई-2018 के अंक में प्रकाशित

- जगदीश उपासने एवं लोकेन्द्र सिंह 

किसी भी राष्ट्र की पहचान उसके मानव संसाधन से बनती है। जबकि श्रेष्ठ मानव संसाधन शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। एक सामान्य किंतु महत्वपूर्ण बात सभी जानते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति वहाँ के नागरिकों पर निर्भर करती है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त किए हुए नागरिक ही अपने देश की प्रगति में सहयोग कर सकते हैं। शिक्षित नागरिक ही अपने देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाने में सक्षम होते हैं। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा के महत्व को समझाते हुए यहाँ तक कहा है कि 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' भारत में स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हुए जिन्होंने नागरिकों को शिक्षित बनाने पर सर्वाधिक जोर दिया। भारत जैसे विविधता सम्पन्न और विशाल देश में अब भी शिक्षा सब तक नहीं पहुँच सकी है। अनेक स्थानों पर शिक्षा के उपक्रम प्रारंभ तो हो गए किंतु उसमें गुणवत्ता नहीं है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टिकोण ही नदारद है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने अपने पहले साल से ही शिक्षा में गुणात्मक एवं भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार सुधार का शुभ संकल्प ले लिया था। सरकार के संकल्प 'सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा' की पूर्ति के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय योजनाबद्ध तरीके से निरंतर कार्य कर रहा है। पिछले चार वर्ष में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा में भी महत्वपूर्ण आवश्यक कदम सरकार ने उठाए हैं। शिक्षा के दोनों स्तर पर जितने भी प्रयास हुए हैं, सराहनीय हैं।

बुधवार, 27 जून 2018

खूंटी सामूहिक बलात्कार के पीछे चर्च और नक्सलियों का खतरनाक गठजोड़

- लोकेन्द्र सिंह
झारखंड के खूंटी जिले में पाँच महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं से सामूहिक बलात्कार और पुरुष कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट एवं उन्हें पेशाब पिलाने का अत्यंत घृणित कृत्य सामने आया है। यह बहुत दु:खद और डरावनी घटना है। पीडि़त महिलाएं एवं पुरुष अनुसूचित जाति-जनजाति समाज से हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के लोगों के साथ होने वाली मारपीट की घटनाओं एवं उनके शोषण पर जिस प्रकार आवाजें बुलंद होती हैं, उनसे एक उम्मीद जागती है कि वर्षों से शोषित इस समाज हो ताकत देने के लिए देशभर में एक वातावरण बन रहा है। सभी वर्गों के लोग पीडि़तों के साथ खड़े हैं। ऐसी स्थिति में खूंटी गैंगरेप और शोषण के मामले पर पसरा सन्नाटा खतरनाक लगता है। यह डराता है। देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और टीआरपी के लिए भूखे बैठे समाचार चैनल्स भी एक अजब-सी चुप्पी साधे हुए हैं। मानो हमारी संवेदनाओं पर भी अब राजनीति हावी हो गई है। अपराधी का धर्म देखकर अब विरोध के सुर का स्तर तय होता है। चूँकि इसमें शोषणकर्ता/आरोपी के वस्त्रों का रंग गेरुआ नहीं है, इसलिए रंगकर्मी भी 'शर्मिंदगी का बोर्ड' थाम कर फोटोसेशन नहीं करा रहे हैं। जबकि पाँचों लड़कियां और उनके साथी लड़के उनके कर्मक्षेत्र से ही आते हैं। पीडि़त रंगकर्मी हैं और वनवासी समाज को जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटक करते हैं। कथित प्रबुद्ध वर्ग की यह प्रवृत्ति सभ्य समाज के लिए दु:खद ही नहीं, अपितु खतरनाक ही है। चूँकि इस अपराध में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के प्रिय कम्युनिस्ट-नक्सली और चर्च शामिल है, इसलिए वह अपना मुंह नहीं खोल पा रहे हैं। त्रिशूल को कॉन्डम पहनाने जैसी सृजनशीलता भी नहीं दिखा पा रहे हैं। यह घटना खतरनाक इसलिए भी है, क्योंकि इसके पीछे जो विचार है, वह बहुत ही वहशी है। अपने विरोधी को डराने और उसे चुप कराने के लिए लोग मारपीट करते हैं, धमकाते हैं, अधिकतम उसकी हत्या कर देते हैं। किंतु, यहाँ अपने विरोधियों को डराने/चुप कराने के लिए उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया है। यानी लड़कियों के शरीर की नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की हत्या करने का दुस्साहस किया गया है। विचार प्रक्रिया के सबसे निचले स्तर पर जाकर ही अपने विरोधी के प्रति ऐसा बर्ताब करने का ख्याल आता है। इस अपराध का मुख्य आरोपी उग्रवादी संगठन पीएलएफआई का नेता एवं पत्थलगड़ी का समर्थक जॉर्ज जोनास किडो है और मुख्य सहयोगी आरसी मिशन चर्च द्वारा कोचांग में संचालित स्टॉपमन मेमोरियल मिडिल स्कूल के प्रभारी सह सचिव फादर अल्फोंस आइंद को बताया जा रहा है। पीडि़तों की शिकायत पर इनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। 

मंगलवार, 26 जून 2018

आपातकाल : जब 'भारत माता की जय' कहना भी अपराध था

- लोकेन्द्र सिंह
सामाजिक कार्यकर्ता एवं सेवानिवृत्त शिक्षक श्री सुरेश चित्रांशी के हाथों में पुस्तक "हम असहिष्णु लोग"
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है। आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता का हनन ही नहीं किया गया, अपितु वैचारिक प्रतिद्वंदी एवं जनसामान्य पर अमानवीय अत्याचार भी किए गए। आपातकाल के विरुद्ध आवाज उठाने वाले लोगों को पकड़ कर कठोर यातनाएं दी गईं। ब्रिटिश सरकार भी जिस प्रकार की यातनाएं स्वतंत्रता सेनानियों नहीं देती थी, उससे अधिक क्रूरता स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के सेनानियों के साथ बरती गई। आपातकाल पर लिखी गई किताबों और प्रसंगों को पढ़कर उस कालखंड की भयावहता को समझा जा सकता है। आपातकाल का दर्द भोगने वाले लोकतंत्र के सच्चे सिपाही आज भी उन दिनों की कहानियों को सुनाने के लिए हमारे बीच में मौजूद हैं। जब यह साहसी लोग उन दिनों के अत्याचार को सुनाते हैं तब अन्याय के खिलाफ लडऩे से उन्हें जो गौरव की अनुभूति हुई थी, उसकी चमक उनकी आंखों में स्पष्ट नजर आती है। इस चमक के सामने यातनाओं का दर्द धूमिल हो जाता है। उन यातनाओं एवं संघर्ष का प्रतिफल लोकतंत्र की बहाली के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ। इसलिए उस समय भोगा हुआ कष्ट उनके लिए गौण हो गया। आपातकाल की 43वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या अर्थात 24 जून 2018 को अपने सामाजिक गुरु श्रद्धेय श्री सुरेश चित्रांशी के सानिध्य में बैठा हुआ था। प्रसंगवश उन्हें आपातकाल का अपना संघर्ष याद आ गया। उन्होंने लगभग डेढ़ घंटे तक आपातकाल की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं का वर्णन किया। उस जीवंत वर्णन को सुनकर आपातकाल के कठिन समय की अनुभूति मैं स्वयं भी कर सका।