रविवार, 15 जुलाई 2018

कठघरे में चर्च से संचालित संस्थाएं


- लोकेन्द्र सिंह 
भारत में ईसाई मिशनरीज संस्थाएं सेवा की आड़ में किस खेल में लगी हैं, अब यह स्पष्ट रूप से सामने आ गया है। वेटिकन सिटी से संत की उपाधि प्राप्त 'मदर टेरेसा' द्वारा कोलकाता में स्थापित 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' की संलिप्तता मानव तस्करी में पाई गई है। बच्चे चोरी करना और उन्हें बाहर बेचने जैसे अपराध में ये संस्थाएं घिनौने स्तर तक गिर चुकी हैं। दुष्कर्म पीडि़त युवतियों की कोख को भी ईसाई कार्यकर्ताओं/ननों ने बेचा है। यह अमानवीयता है। ईसाई मिशनरीज के अपराधों का पहली बार खुलासा नहीं हुआ है। सेवा की आड़ में सुदूर वनवासी क्षेत्रों से लेकर शहरों में सक्रिय ईसाई संस्थाओं पर धर्मांतरण और चर्च में महिलाओं के उत्पीडऩ के आरोप पहले भी सिद्ध होते रहे हैं। अभी हाल ही में केरल और अन्य राज्यों से समाचार आये हैं कि वहां के चर्च में पादरियों ने महिला कार्यकर्ताओं का शारीरिक शोषण किया है। झारखंड के खूंटी जिले में समाज जागरण के लिए नुक्कड़ नाटक करने वाले समूह की पांच युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना में भी चर्च की भूमिका सामने आई है। खूंटी सामूहिक बलात्कार प्रकरण नक्सली-माओवादी और चर्च के खतरनाक गठजोड़ को भी उजागर करता है।
          मानव तस्करी के आरोप भी मिशनरीज संस्थाओं पर लगे हैं। मासूम बच्चों की चोरी और उन्हें बेचने के आरोप में पकड़े गए ईसाई संत टेरेसा द्वारा स्थापित संस्थाओं के लोगों ने अपना अपराध स्वीकार भी कर लिया है। किंतु, दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अब तक इस पर बड़ा सामाजिक विमर्श खड़ा नहीं हो सका है। न तो चर्च में पादरियों द्वारा किये गए दुष्कर्म के मामले मीडिया एवं बुद्धिजीवियों के विमर्श का हिस्सा बने और न ही देश के मासूम बच्चों को बेचने के अक्षम्य अपराध पर चर्च की भूमिका को कठघरे में खड़ा किया गया। मीडिया और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का यह दोहरा आचरण समाज के लिए खतरनाक है। मीडिया के इस रवैये से पत्रकारिता की साख तो खतरे में आती ही है, अपितु देश के बहुसंख्यक समाज में यह भावना बलवती होती है कि मीडिया और कथित बुद्धिजीवी हिन्दू समाज के विरुद्ध है। 
          मासूम बच्चों से जुड़े अपराध पर मानवाधिकार और बाल संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों की चुप्पी आश्चर्यजनक है। यह चुप्पियां कहीं न कहीं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि मानवाधिकारों और बाल अधिकारों के प्रति हमारी संवेदनाएं एवं सजगता केवल दिखावटी है। गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) भी सिर्फ अपनी दुकान चलाने के लिए इन विषयों पर काम कर रहे हैं। अभी जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे पूर्ववर्ती सरकारों की भूमिका भी संदिग्ध है। ध्यान दें कि खुफिया विभाग पूर्व की सरकारों को ईसाई संस्थाओं की संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी देता रहा है। लेकिन, सरकारों ने खुफिया विभाग की सूचनाओं पर कभी कार्यवाही नहीं की। इसका एक अर्थ यही निकलता है कि पूर्व की सरकारों ने ईसाई संस्थाओं के अपराधों को एक तरह से अनदेखा किया था, अपितु उनको भरपूर सहयोग प्रदान किया गया। 
          यह उचित समय है कि केंद्र सरकार अविलंब चर्च द्वारा संचालित संस्थाओं की जांच कराए और उनकी गतिविधियों पर निरन्तर निगरानी रखने की कोई व्यवस्था बनाए। चूंकि बच्चे चोरी करना-बेचना बहुत संगीन अपराध है इसलिए सरकार को इसमें शामिल संस्थाओं को तत्काल प्रतिबंधित कर देना चाहिए। यह अच्छी बात है कि झारखंड की सरकार ने राज्य में ईसाई संस्थाओं द्वारा संचालित गतिविधियों की जांच कराने का निर्णय लिया है। किंतु, चर्च से संचालित संस्थाएं सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है, पूरे देश में यह फैली हुई हैं। इसलिए किसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी या समिति से देश के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय चर्च प्रेरित संस्थाओं की जांच करानी चाहिए।

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