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मंगलवार, 26 जून 2018

आपातकाल : जब 'भारत माता की जय' कहना भी अपराध था

- लोकेन्द्र सिंह
सामाजिक कार्यकर्ता एवं सेवानिवृत्त शिक्षक श्री सुरेश चित्रांशी के हाथों में पुस्तक "हम असहिष्णु लोग"
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है। आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता का हनन ही नहीं किया गया, अपितु वैचारिक प्रतिद्वंदी एवं जनसामान्य पर अमानवीय अत्याचार भी किए गए। आपातकाल के विरुद्ध आवाज उठाने वाले लोगों को पकड़ कर कठोर यातनाएं दी गईं। ब्रिटिश सरकार भी जिस प्रकार की यातनाएं स्वतंत्रता सेनानियों नहीं देती थी, उससे अधिक क्रूरता स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के सेनानियों के साथ बरती गई। आपातकाल पर लिखी गई किताबों और प्रसंगों को पढ़कर उस कालखंड की भयावहता को समझा जा सकता है। आपातकाल का दर्द भोगने वाले लोकतंत्र के सच्चे सिपाही आज भी उन दिनों की कहानियों को सुनाने के लिए हमारे बीच में मौजूद हैं। जब यह साहसी लोग उन दिनों के अत्याचार को सुनाते हैं तब अन्याय के खिलाफ लडऩे से उन्हें जो गौरव की अनुभूति हुई थी, उसकी चमक उनकी आंखों में स्पष्ट नजर आती है। इस चमक के सामने यातनाओं का दर्द धूमिल हो जाता है। उन यातनाओं एवं संघर्ष का प्रतिफल लोकतंत्र की बहाली के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ। इसलिए उस समय भोगा हुआ कष्ट उनके लिए गौण हो गया। आपातकाल की 43वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या अर्थात 24 जून 2018 को अपने सामाजिक गुरु श्रद्धेय श्री सुरेश चित्रांशी के सानिध्य में बैठा हुआ था। प्रसंगवश उन्हें आपातकाल का अपना संघर्ष याद आ गया। उन्होंने लगभग डेढ़ घंटे तक आपातकाल की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं का वर्णन किया। उस जीवंत वर्णन को सुनकर आपातकाल के कठिन समय की अनुभूति मैं स्वयं भी कर सका।