सर्वव्यापी-सर्वस्पर्शी कार्य : संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में समाज का सहयोग और सहभागिता ने स्वयंसेवकों का बढ़ाया उत्साह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष पर कोई बड़ा उत्सव आयोजित न करके छोटे-छोटे स्थानों (मंडल/बस्ती) पर कार्यक्रमों का आयोजन किया, ताकि संघ कार्य का व्याप बढ़े। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने मुख्य रूप से दो प्रकार के कार्यक्रमों की व्यापक योजना बनाई है। इनमें पहला उद्देश्य संगठन का विस्तार करना है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज की सज्जन शक्ति को सद्भाव और समरसता के सूत्र में पिरोकर राष्ट्र निर्माण के लिए संगठित करना है। इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित संघ के कार्यक्रमों में समाज का जो अभूतपूर्व और भरपूर साथ मिल रहा है, वह संगठन की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कहना होगा कि कई कार्यक्रमों का नेतृत्व तो समाज ने ही किया, संघ की शक्ति तो उनकी सहयोगी बनी। विशेष रूप से हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन समाज की सज्जनशक्ति ने आगे रहकर किया।
विजयादशमी उत्सव ने बनाया उत्साहजनक वातावरण :
शताब्दी वर्ष का सबसे पहला कार्यक्रम विजयदशमी उत्सव एवं पथ संचलन था, जिसमें स्वयंसेवकों ने ही नहीं अपितु समाज के लोगों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। इन पथ संचलनों में शीर्ष स्तर के चिकित्सक, प्राध्यापक, व्यवसायी, समाजसेवी और अन्य क्षेत्र के बंधु संघ की पूर्ण गणवेश पहनकर शामिल हुए। देशभर में लगभग 62 हजार 555 स्थानों पर विजयादशमी के उत्सव आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 32 लाख 45 हजार 141 स्वयंसेवकों ने सहभागिता की। इसी तरह पथ संचलन लगभग 22 हजार 656 स्थानों पर निकाले गए, जिनमें 25 लाख 45 हजार 818 स्वयंसेवक गणवेश पहनकर शामिल हुए। समाज की ओर से इन पथ संचलनों का जमकर स्वागत किया गया।
घर-घर तक पहुँचा संघ का विचार :
विजयादशमी उत्सव से बने उत्साहपूर्ण वातावरण में संघ के विचार को प्रत्येक घर तक पहुँचाने के उद्देश्य से ‘व्यापक गृह संपर्क अभियान’ चलाया गया। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में रखे गए वृत्त के अनुसार अब तक 46 में से 37 प्रांतों के आंकड़े एकत्र हुए हैं, जिनके अनुसार 10 करोड़ से अधिक घरों तक स्वयंसेवक संघ का विचार लेकर पहुँचे हैं। इस अभियान के दौरान स्वयंसेवकों के द्वारा तीन लाख नब्बे हजार गांवों तक संपर्क किया जा चुका है। जब स्वयंसेवक घरों में पहुँचे तो कुछ राष्ट्रीय साहित्य भी साथ लेकर गए। लगभग 84 लाख 13 हजार 552 पुस्तकें लोगों तक पहुँची हैं, जिनमें संघ की सौ वर्षों की विकास यात्रा को बताने वाली पुस्तक भी शामिल है। व्यापक गृह संपर्क अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि स्वयंसेवकों ने बिना किसी पूर्वाग्रह के हर दरवाजे पर दस्तक दी और संघ के विचारों पर आत्मीय संवाद किया। इसका सबसे जीवंत और सकारात्मक उदाहरण केरल राज्य में देखने को मिला, जहां 55 हजार से अधिक मुस्लिम घरों और 54 हजार से अधिक ईसाई परिवारों से संपर्क किया गया। इन सभी अल्पसंख्यक परिवारों ने न केवल स्वयंसेवकों का गर्मजोशी से स्वागत किया, बल्कि संघ के विचारों को जानने में गहरी रुचि भी दिखाई।
हिन्दू सम्मेलनों में स्वाभिमान की अभिव्यक्ति :
समाज जागरण के इस क्रम में देशभर (37 प्रांतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार) में अब तक 37 हजार से अधिक स्थानों पर हिन्दू सम्मेलनों का सफल आयोजन हो चुका है, जिनमें लगभग साढ़े तीन करोड़ लोगों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों तक आयोजित इन सम्मेलनों ने समाज को एक सूत्र में बांधने का काम किया है। अरुणाचल प्रदेश के एक अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में हुए हिन्दू सम्मेलन का वह प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां स्थानीय लोगों ने भावुक होकर कहा कि वे जीवन में पहली बार इस स्तर की आत्मीयता और जुड़ाव का अनुभव कर रहे हैं।
प्रमुखजन गोष्ठी में ‘पंच परिवर्तन’ का संदेश :
संघ शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की शृंखला में सज्जन शक्ति को संगठित करने की दृष्टि से ‘प्रमुख जन संगोष्ठियां’ आयोजित की गईं। स्वयं सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने देशभर में समाज के प्रमुखजनों के साथ सीधा संवाद किया। सरसंघचालक जी ने केवल चार महानगरों में आयोजित कार्यक्रमों में नागरिकों के साथ संवाद करते हुए एक हजार से अधिक प्रश्नों के उत्तर दिए तथा इस प्रश्नोत्तर में 20 घंटे से अधिक का समय लगा। इन प्रमुख जन संगोष्ठियों के माध्यम से संघ समाज में ‘पंच परिवर्तन’ का व्यापक और महत्वाकांक्षी आह्वान कर रहा है। इन पांच परिवर्तनों में सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व बोध, कुटुंब प्रबोधन और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता शामिल हैं। संघ का दृढ़ मत है कि पंच परिवर्तन के माध्यम से देश और समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
संघ की शाखाओं में उत्साहजनक वृद्धि :
शताब्दी वर्ष पर संगठनात्मक कार्य में भी उत्साहजनक वृद्धि हुई है। पिछले एक वर्ष में शाखाओं की संख्या में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। प्रतिनिध सभा में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार, जहां पिछले वर्ष 51, 740 स्थानों पर 83,129 शाखाएं संचालित हो रही थीं। अब यह संख्या बढ़कर 55,683 स्थानों पर 88,949 शाखाओं तक पहुंच गई है। मात्र एक वर्ष की अल्पावधि में 3943 नए स्थानों का जुड़ना और शाखाओं की संख्या में 5820 की वृद्धि होना, यह स्पष्ट रूप से उद्घोष कर रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ के संकल्प को सम्पूर्ण भारतीय समाज का असीम स्नेह और पूर्ण समर्थन प्राप्त हो रहा है।
शताब्दी वर्ष से आगे :
संघ शताब्दी वर्ष के अभी कुछ कार्यक्रम शेष हैं, जिनमें सामाजिक सद्भाव बैठकें एवं अधिकतम स्थानों पर शाखा लगाने का उपक्रम शामिल है। दो कार्यक्रम 46 प्रांतों ने अपने-अपने प्रांत की योजना से तय किए हैं। अर्थात् अभी संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ की विभिन्न गतिविधियां अक्टूबर-2026 तक जारी रहेंगी। अभी तक सामने आई जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि संघ के मार्ग में अब बड़ी बाधा नहीं है क्योंकि समाज की नेतृत्वकारी सज्जन शक्ति इस राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बन रही है। संघ अब और तेज गति से समाज की सज्जनशक्ति को एकत्र कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में आगे बढ़ेगा।
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| संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 15 मार्च, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ |




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