रविवार, 23 फ़रवरी 2014

रोज बिकती हैं औरतें और मासूम भी

सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता नीरू सिंह ज्ञानी। 
 भ गवान ने इंसान को इंसान बनाते समय कोई भेदभाव नहीं बरता। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि का दुरुपयोग करते हुए आदमी-आदमी के बीच भेदभाव की तमाम दीवारें खड़ी कर दीं। किसी को जाति के आधार पर बांट दिया। किसी को काले-गोरे के भेद में रंग दिया। किसी को धन-दौलत के तराजू में तौल दिया। खुद इंसान ने इंसान को इंसान नहीं रहने दिया। अपनी दुष्ट बुद्धि के उपयोग से उसने इंसानों के साथ जानवरों-सा बर्ताव किया और कर रहा है। पैसे और रसूख के जोर पर कमजोर आदमी को अपना गुलाम बनाया। उसे अपनी जागीर समझा। उससे कोहलू तक चलवाया और दो वक्त का खाना तक नसीब नहीं होने दिया। इंसानों के द्वारा ही इंसानों की खरीद-फरोख्त का धंधा चलाया जा रहा है। यह देख मानवता के रचियता को भी रोना आता होगा। 
       अपने निहित स्वार्थों के चलते इंसान ने कई काले टीके अपने माथे पर लगा रखे हैं। मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) इंसानों की दुनिया का विद्रूप सत्य है। यह एक तरह से इंसानों की मण्डी है। जहां इंसानों की खरीद-फरोख्त होती है। इसमें सबसे अधिक औरतें और मासूम बेटियां बेची जाती हैं। ह्यूमन ट्रैफिकिंग के जरिए सबसे अधिक महिलाओं और बच्चों का शोषण, उनके साथ दुराचार और अनैतिक व्यवहार किया जाता है। दुनिया ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या से जूझ रही है। भारत में भी यह गंदा धंधा संगठित रूप से चल रहा है। पड़ोसी मुल्कों के अलावा उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सहित भारत के अन्य राज्यों से महानगरों में लाकर महिलाओं को अनैतिक तरीके से देह व्यापार में इस्तेमाल किया जाता और बच्चों को बंधुआ मजदूर की तरह रखा जाता है। दिल्ली, बैंगलूरू, गोवा, मुंबई और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों में रसूखदार और तथाकथित ऊंचे तबके के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए मासूम बच्चों और लड़कियों की खरीद-फरोख्त करते हैं। उन्हें अपने घर में बंधक बनाकर रखते हैं। जानवरों की तरह काम कराते हैं। बर्ताव भी घोर आपत्तीजनक रहता है। छोटे बच्चों से जोखिम भरे काम कराए जाते हैं। खाने को बचा-खुचा दिया जाता है। लड़कियों से देह व्यापार कराया जाता है। उन्हें नर्क की ऐसी आग में झौंक दिया जाता है कि वे वर्षों तक उसमें झुलसती रहती हैं। हालांकि भारत में भी सरकार ने मानव तस्करी के खिलाफ कानून बना रखा है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-१९५६ किसी भी प्रकार से इंसान को अनैतिक व्यापार में लगाने का सख्ती से विरोध करता है। इसके बावजूद भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग रुकने का नाम नहीं ले रही। 
समाज से ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे भद्दे दाग को हटाने के लिए सरकार के साथ-साथ तमाम एनजीओ भी अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। दुनिया में ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या खत्म हो, इसके लिए एमटीवी एक्जिट (एण्ड एक्सप्लोएशन एण्ड ट्रैफिकिंग) अपने स्तर पर कार्य कर रही है। खासकर इस समस्या को लेकर जनजागृति लाने की दिशा में उनके प्रयास को सार्थक कहा जा सकता है। ट्रैफिकिंग की समस्या को लेकर २८ फरवरी से एमटीवी पर आधे-आधे घंटे की पांच शॉर्ट डाक्युमेंट्री का प्रसारण किया जाएगा। सोशल मीडिया पर इसके प्रोमो आने लगे हैं। लीक से हटकर फिल्में बनाने के लिए ख्यात बॉलीवुड के डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने इन फिल्मों का निर्देशन किया है। ग्वालियर की समाजसेवी नीरू सिंह ज्ञानी और उनकी प्रतिभाशाली बेटी प्रांजुल एक-एक फिल्म में दिखेंगी। प्रांजुल ने पांचों फिल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया है। नीरू सिंह एक फिल्म में समाजसेवी की भूमिका में दिखेंगी। दिल्ली का एक परिवार है, जहां एक मासूम को अवैध रूप से खरीदकर रखा गया है। वह परिवार उस मासूम से घर के सभी काम कराता है। समाजसेवी रागिनी (नीरू सिंह ज्ञानी) उस मासूम को मुक्त कराती हैं। उसके पुनर्वास की व्यवस्था करती हैं। यह तो फिल्म की बात हुई। असल जिन्दगी में भी नीरू सिंह ज्ञानी अपने स्तर पर समाजसेवा के काम करती रही हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी ऐसी ही है। श्रीमती सिंह के श्वसुर ने ग्वालियर के नजदीक रायरू में बेशकीमती जमीन पर गांव के बच्चों के पढऩे के लिए स्कूल शुरू किया। वे हमेशा स्थानीय लोगों के लिए मददगार के रूप में मौजूद रहते थे। अब उनके बेटे-बहू उनकी सोच और काम को आगे बढ़ा रहे हैं। नीरू सिंह ज्ञानी अपने एनजीओ प्रांजुल आटर््स के जरिए सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनके प्रयास प्रसंशनीय हैं। सार्थक हैं। उनकी सोच सकारात्मक है। समाजसेवा के उनके प्रयास तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जबकि वे सक्रिय राजनीति से जुड़ी हैं। उनका अधिकतम समय महिलाओं और गांवों में भाजपा संगठन को मजबूत करने में जाता है। राजनीति कोयले की कोठरी है। इसमें सब काले ही काले लोग हैं। साफ-सुथरे लोग भी इसमें आकर काले हो जाते हैं। सब अपने लोभ-स्वार्थ को लेकर राजनीति में आते हैं। अब वो दौर नहीं रहा जब राजनीति को समाजसेवा का जरिया माना जाता था। अब तो राजनीति शुद्ध रूप से करियर हो गई है। ऐसा करियर जिसमें अकूत धन-दौलत कमाने का मौका मिलता है, बेईमान होकर। उम्दा और क्रियेटिव लोगों की यहां कमी है। भारतीय राजनीति और राजनेताओं के बारे में अमूमन हम यह सब सुनते रहते हैं। नीरू सिंह ज्ञानी जैसे लोगों से मिलकर यह मिथक टूटता-सा महसूस होता है। राजनीति में सब बुरे हैं, यह पूरा सच नहीं है। सच तो यह है कि बहुत से लोग भाजपा सहित अन्य पार्टियों में भी ऐसे हैं, जो निहायत ईमानदार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। बिना किसी शोर-शराबे के अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कुछ क्रियेटिव वर्क। कुछ नया गढ़ रहे हैं। कुछ नई राहें बना रहे हैं। 
       ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में नीरू सिंह बताती हैं कि मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के साथ यह भेदभाव किसी एक देश में नहीं अपितु पूरी दुनिया में हुआ। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का अंश मानने वाली परम्परा का देश भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। दुनिया में रोज कई औरतें और बेटियां खरीदी-बेची जा रही हैं। स्त्री के मान का मर्दन किया जा रहा है। दुनिया इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर गई है। पारदर्शिता का जमाना आ गया है। दुनियाभर में जनजाग्रति के अभियान चलाए जा रहे हैं। मनुष्य खुलकर, अपने हिसाब से, स्वस्थ वातावरण में जी सके इसके लिए दुनियाभर में तमाम कानून बन गए हैं। १० दिसम्बर १९४८ को संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा हो चुकी है। तब से अब तक मानवाधिकारों पर लम्बी-लम्बी सार्थक बहस हो चुकी हैं, ठोस कदम उठाए जा चुके हैं। इस सबके बावजूद आज भी मनुष्य अपनी दुष्टतई से बाज नहीं आ रहा। किसी व्यक्ति से, चाहे वो पुरुष हो, महिला हो या फिर छोटा बच्चा, उसकी मर्जी के खिलाफ  या उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर, उनका शोषण करना, उन पर अत्याचार करना, उन्हें बंधुआ मजदूरों की तरह रखना, अनैतिक काम में लगाना, मानवाधिकारों का सीधा-सीधा उल्लंघन है। दरअसल, कुछ पैसे वाले लोग, रसूखदार, सफेदपोश और तथाकथित सभ्य समाज के लोग ह्यूमन ट्रैफिकिंग को बढ़ावा देते हैं। मनुष्य होकर मनुष्यों के साथ दुराचार करते हैं। मानव सभ्यता को लज्जित करते हैं। किसी की गरीबी का फायदा उठाकर मासूम बच्चों के साथ अनाचार करते हैं। ये ही पढ़े-लिखे रईस लोग सार्वजनिक मंचों से समानता की बात करते हैं और घर में किसी को गुलाम बनाकर रखते हैं। यह समाज का असली चेहरा है। यह समाज का घिनौना चेहरा है। वे बताती हैं कि अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी के कारण ही बहुत से लोग इंसानों की मण्डी में अपनों को बेचते हैं। मानव तस्करी रोकने के लिए समाज जागरण के साथ ही सरकारी स्तर पर बहुत से प्रयास होने जरूरी हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढऩे से काफी हद तक ह्यूमन ट्रैफिकिंग को रोका जा सकता है। 
      ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आधारित पांचों शॉर्ट फिल्मस् सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। इनमें पहली फिल्म सेक्सुल ट्रैफिकिंग है। इसके अलावा डोमेस्टिक सर्विट्यूट, बांडेड लेबर और चाइल्ड लेबर में भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग का स्याह चेहरा दिखाया गया है। इन फिल्मों की ज्यादातर शूटिंग बनारस, मुंबई, गोवा और दिल्ली में हुई है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर जनजागृति लाने में ये फिल्में मील का पत्थर साबित हों, इसी उम्मीद के साथ। 

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

पैदा हो सकते हैं अभिमन्यु

 भा रत की लोक कथाओं में जो ज्ञान समाहित है, उसे आधुनिक विज्ञान आधार देता नजर आ रहा है। रामायण-महाभारत काल और उससे जुड़ी कथाओं को खयाली पुलाव मानने वालों को समय-समय पर वैज्ञानिक खोजों और शोधों से जवाब मिलता रहता है लेकिन बावजूद इसके वे अपने दिमाग पर पड़ी धूल को हटाने के लिए तैयार नहीं होते हैं। मैकाले शिक्षा व्यवस्था से शिक्षित ज्यादातर बुद्धिजीवी पता नहीं यह मानने को क्यों तैयार नहीं होते कि भारत में विज्ञान, कला, व्यापार और राजनीति उन्नत शिखर पर थी, भारत विश्वगुरु था, भारत सोने की चिडिय़ा था। भारत आगे-आगे है और दुनिया पीछे-पीछे। जिस वैज्ञानिक सोच और प्रमाणों की बात वे करते हैं कम से कम उसी वैज्ञानिक सोच के माध्यमों से जो सच सामने आ रहा है उसे तो स्वीकार कर ही लेना चाहिए।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

मीडिया पर नहीं पूरा भरोसा

 स माचार-पत्र और न्यूज चैनल्स धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। लोगों को अब समाचार-पत्र में प्रकाशित होने वाली सामग्री पर पूरा-पूरा भरोसा नहीं रहा। अलग-अलग न्यूज चैनल्स पर आने वाले समाचारों को लेकर भी दर्शकों का मानना है कि सब सच नहीं है। एक ही खबर का लगभग पूरा सच जानने के लिए चार-छह अखबार पढऩे पड़ते हैं। तब भी कुछ न कुछ सवाल बाकी रह जाते हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से चुनावी परिप्रेक्ष्य में लोक विमर्श का अध्ययन करने के लिए जब छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में जाना हुआ और लोगों से बातचीत हुई तो मीडिया को लेकर एक कड़वा सच सामने आया। हालांकि मीडिया से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है, इस सच से मैं पहले भी वाकिफ था। लेकिन बरसों-बरस पत्रकारों ने खुद को खपा-खपा कर विश्वसनीय पत्रकारिता की जो इमारत बुलंद की थी, वह कितनी तेजी से दरक रही है, यह जानकर अच्छा नहीं लगा। समाचार-पत्र और टेलीविजन से राजनीतिक मुद्दों पर आपको जो जानकारी मिलती है, उस पर आपका कितना विश्वास हैं? लगभग पूरा विश्वास करते हैं, उक्त सवाल का ऐसा जवाब देने वाला एक भी जागरूक पाठक और दर्शक नहीं मिला। हां, दस-पांच लोगों ने जरूर कहा कि अस्सी फीसदी तक विश्वास करते हैं। लेकिन, तीन सौ लोगों में दस-पांच ऐसे नामों की कोई गिनती नहीं की जा सकती। पत्रकारिता के भविष्य के लिए यह एक चुनौती है। मीडिया संस्थानों को अब चेत जाने की जरूरत है। अभी भी लोग अखबार और टेलीविजन पर आधा-आधा विश्वास कर रहे हैं लेकिन ऐसा ही चलता रहा तो यह आधा-आधा विश्वास भी जाता रहेगा। लोगों का मानना है कि पेड न्यूज की बीमारी की वजह से पत्रकारिता की विश्वसनीयता को सर्वाधिक क्षति हुई है। पेड न्यूज यानी नोट के बदले खबर छापना। वर्ष २००९ में लोकसभा के चुनाव के दौरान पेड न्यूज के कई मामले सामने आए थे। पहली बार पेड न्यूज एक बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई थी। अखबारों और न्यूज चैनल्स ने बकायदा राजनीतिक पार्टी और नेताओं की खबरें प्रकाशित/प्रसारित करने के लिए पैकेज लांच किए थे। यानी राजनीति से जुड़ी खबरें वास्तविक नहीं थीं। जिसने ज्यादा पैसे खर्च किए उस पार्टी/नेता के समर्थन में उतना बढिय़ा कवरेज। जिसने पैसा खर्च नहीं किया उसके लिए कोई जगह नहीं थी। इस दौरान कई राजनेताओं ने सबूत के साथ मीडिया पर आरोप लगाए कि उनके समर्थन में खबरें छापने के लिए पैसा वसूला गया है या वसूला जा रहा है। पेड न्यूज की खबरों से बड़े मीडिया घरानों की साख पर भी बट्टा लगा। नतीजा यह हुआ कि इन विधानसभा चुनाव में स्वयं को विश्वसनीय दिखाने के लिए कई बड़े समाचार-पत्रों और चैनल्स ने पेड न्यूज के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। सही मायने में कह सकते हैं कि खुद को पेड न्यूज के खिलाफ खड़ा दिखाया। समाचार-पत्रों ने तो 'नो पेड न्यूज' के लोगो तक प्रतिदिन प्रकाशित करना शुरू कर दिया। यानी हम विश्वसनीय अखबार हैं। हम नोट लेकर खबर नहीं छापते। लेकिन, पूर्व के कारनामे इतने बड़े हैं कि लोगों को 'नो पेड न्यूज' के मुखौटे पर आसानी के साथ विश्वास नहीं हो रहा है। वह तो खबरों से समाचार-पत्र और न्यूज चैनल की विश्वसनीयता को आंकता है। 
मध्यप्रदेश के जिले दतिया में चाय-नाश्ते की दुकान पर मैंने देखा कि एक व्यक्ति अखबार पढऩे में काफी रुचि ले रहा है। वह दो-तीन समाचार-पत्र पढ़ चुका था। अमूमन भागदौड़ भरे इस समय में आदमी एक अखबार भी ढंग से नहीं पढ़ता है। ऐसे में समाचार-पत्रों को इतनी रुचि लेकर पढऩे वाले सुधी पाठक से बात करना मैंने उचित समझा। 
'यहां, दतिया में कौन-से अखबारों की स्थिति अच्छी है।' मैं अपनी चाय का गिलास लेकर उसके नजदीक पहुंचा और उससे यह सवाल पूछा। उसने कहा- सब एक जैसे हैं। 'राजनीति के विषय में आपको समाचार-पत्रों से कितनी जानकारी प्राप्त होती है और आप उस पर कितना विश्वास करते हैं?' अखबार को मोड़ते हुए उसने मेरे इस सवाल का जवाब दिया- सब पैसा लेकर खबर छाप रहे हैं। ऐसे में सही जानकारी कहां मिल पा रही है। जो प्रत्याशी पैसा अखबार के दफ्तर पैसा पहुंचा देता है, अखबार के पन्नों पर उसकी वाहवाही और जीत दिखने लगती है। किसी एक अखबार की यह स्थिति नहीं है, सब के सब यही कर रहे हैं। अब अखबार और पत्रकार पहले जैसे नहीं रहे। यही कारण है कि अब अखबार में बड़ी-बड़ी खबरें प्रकाशित होने पर भी उनका कोई असर नहीं होता। 'आपको कैसे पता कि किस अखबार ने, कौन-सी खबर पैसा लेकर छापी है?' मेरे इस सवाल पर वह मुस्कुराया और बोला- स्थानीय आदमी को सब समझ में आता है साहब। अब अखबार वाले पैसा लेकर किसी बहुत ही कमजोर प्रत्याशी को जिताऊ प्रत्याशी बताएंगे तो स्थानीय लोगों को समझ नहीं आएगा क्या? यही कारण है कि लोग अब समाचार-पत्र की सभी खबरों पर पूरा भरोसा नहीं करते। मैं रोज तीन-चार अखबार पढ़ता हूं, क्योंकि तभी किसी खबर की पूरी जानकारी मिल पाती है। 
       उसने नाम लेकर कई प्रतिष्ठित अखबारों की नीति-रीति पर भी अंगुली उठाई। पैसा कमाने की भूख में सभी अखबार एक ही रंग में रंग गए हैं। उसने आगे कहा कि लोकतंत्र में मीडिया खुद को चौथा स्तम्भ मानता है। यह काफी हद तक सही भी है। लोकतंत्र को मजबूत करने में समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। समाचार-पत्र और टेलीविजन की खबरें पढ़/सुनकर आज भी कई लोग अपनी चुनावी राय बनाते हैं। मीडिया के माध्यम से ही अलग-अलग नेताओं और पार्टियों के बारे में लोगों की धारणा बनती-बिगड़ी है। ऐसे में मीडिया यदि गलत और पक्षपातपूर्ण खबरें प्रकाशित करेगा तो लोकतंत्र को भारी नुकसान होने वाला है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए मीडिया को भ्रष्टाचार से मुक्त रखना जरूरी है। उसकी भूमिका ठीक रहना जरूरी है। फिलहाल तो मीडिया जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह काफी खतरनाक है, मीडिया के लिए भी और लोकतंत्र के लिए भी। मीडिया पर लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है। यह चिंता का विषय है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले और राजस्थान के चित्तौडग़ढ़ में भी लगभग सभी लोगों का यही कहना था कि मीडिया में आ रही खबरें पूरी तरह सच नहीं है। सच के प्रहरी अब ताकत और धन लोलुपता के नशे में हैं। मार्केटिंग से जुड़े श्रीमान जाड़ावत ने बताया कि आम जनता के सरोकारों से अब मीडिया को उतना लेना-देना नहीं रहा है। सच यह है कि अब व्यावसायिक हित प्राथमिक हो गए हैं। चुनाव के समय में अखबार राजनीतिक विज्ञापनों की दर व्यावसायिक विज्ञापन से भी कहीं अधिक कर देते हैं। मीडिया की विश्वसनीयता की स्थिति क्या है, इसे समझने के लिए, ये महज उदाहरण नहीं हैं। बल्कि चेतावनी है कि मीडिया को लेकर बन रहे लोगों के इस मानस को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

युवा नायक स्वामी

 म हज ३९ साल की आयु में दुनिया का दिल जीतकर चले जाना आसान नहीं होता। निश्चिततौर पर ऐसा कोई असाधारण व्यक्ति ही कर सकता है। असाधारण होना नायक होने का पहला और नैसर्गिक गुण है। नायक प्रभावशाली होता है, वह लोगों की भीड़ को अपनी बातों से सम्मोहित कर सकता है। नायक अपने तेज से लोगों को अपनी ओर खींच सकता है। वह नई राह बनाता है लोगों के चलने के लिए। उसके पास समस्याएं नहीं बल्कि उनके हल होते हैं। नायक विचारवान, तर्कशील और तत्काल निर्णय लेने में सक्षम होता है। वह साहस, उत्साह और ऊर्जा से लबरेज रहता है। नायक कुशलता से लोगों का नेतृत्व करता है। इसके साथ ही तमाम दूसरे गुण कथनी-करनी में ईमानदार, आकर्षक व्यक्तित्व, न्याय प्रियता, निरपेक्षता, निर्लिप्तता, त्याग, संयम, शुचिता, वीरता, ओज, क्षमाभाव, प्रेम, समन्वयीकरण, प्रबंधन, परोपकार, परहित चिंता, दृढ़ता और इच्छाशक्ति भी नायक को औरों से अलग करते हैं। 
       स्वामी विवेकानंद ने 39 वर्ष की अल्पायु में नायक के इन सब गुणों का प्रगटीकरण किया। अब विचार करने की बात है कि स्वामी विवेकानंद नायक किसके? स्वामी विवेकानंद यूं तो सबके नायक साबित होते हैं। उनको लेकर कहीं कोई भेद नहीं है। न जाति के आधार पर उन्हें किसी ने बांटा है, न विचारधारा के नाम पर। लिंग और आयुवर्ग के आधार पर भी वे किसी एक के नायक नहीं है। वे तो सबकी बात करते हैं। फिर भी स्वामी विवेकानंद युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। दरअसल, स्वामी विवेकानंद के चिंतन में सदैव युवा केन्द्रीय बिन्दु रहा। स्वामी जी कहते थे कि मेरी आशा युवाओं में, इनमें से ही मेरे कार्यकर्ता आएंगे। स्वामी भली-भांति जानते थे कि भारत और हिन्दू धर्म के उत्थान में ओजस्वी और बलशाली युवाओं की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। युवा यदि देश और धर्म से विमुख होगा तो स्थितियां बदतर हो जाएंगी। इसलिए स्वामी जी अकसर युवाओं का आव्हान करते थी कि उठो और अपनी जिम्मेदारी संभालो। जागो युवा साथियो, अपनी कमर कसकर खड़े हो जाओ। भारत मां की सेवा के लिए सामथ्र्य जुटाओ।  
       स्वामी विवेकानंद बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी बातों में जादू था। तभी तो 11 सितंबर 1893 को शिकागो में उनका जादू सिर चढ़कर बोला था। महज कुछ पलों में अपनी बात रखने का मौका स्वामी विवेकानंद को मिला था। इन चंद पलों में ही भारत के विवेक ने अमेरिका और दुनियाभर से जमा लोगों की बीच आनंद की लहर पैदा कर दी। इसके बाद तो धर्मसभा के आयोजकों ने उनका बड़े रोचक तरीके से इस्तेमाल किया। जब किसी के भाषण से श्रोताओं का मन ऊबने लगता और वे जाने को होते तब बीच में मंच पर आकर आयोजक उद्घोषणा करते कि एक भाषण के बाद स्वामी विवेकानंद बोलेंगे, इतना सुनते ही भीड़ वहीं ठिठक जाती। यह जादू आज भी बरकरार है। रामकृष्ण मिशन और विवेकानंद केन्द्र सहित स्वामी जी के विचारों को लेकर काम कर रहे अलग-अलग संगठनों के मुताबिक आज भी स्वामीजी को पढऩे और समझने के लिए युवा लालायित रहते हैं। इन संगठनों से युवा बड़ी संख्या में जुड़कर काम भी कर रहे हैं। दरअसल, युवा स्वामी विवेकानंद को औरों की अपेक्षा अपने अधिक निकट पाते हैं। युवाओं के मन में स्वामीजी की युवा संन्यासी, देशभक्त युवक और क्रांतिकारी प्रणेता की छवि बसी हुई है। स्वामी विवेकानंद भी अकसर अपने भाषणों में आव्हान करते थे कि संसार को बस कुछ सौ साहसी युवतियों-युवकों की जरूरत है। स्वामी जी युवाओं में साहस भी असीम चाहते थे। समुद्र को पी जाने का साहस, समुद्र तल से मोती लेकर आने का साहस, मृत्यु का सामना कर सकने का साहस और पहाड़-सी चुनौतियों को स्वीकार कर सकने का साहस स्वामी जी युवाओं में चाहते थे। स्वामीजी हिन्दू संन्यासी होकर युवाओं से मंदिर में बैठकर माला जपने और देवता के आगे अगरबत्ती लगाने की बात नहीं कहते थे। वे हमेशा युवाओं के मन की बात करते थे, सिर्फ मन की नहीं असल में युवाओं के उत्थान की, राष्ट्र के विकास की और समाज के सुदृढि़करण की बात। उनका तो मानना था कि सबसे पहले हमारे तरुणों को मजबूत बनना चाहिए। धर्म इसके बाद की वस्तु है। युवा शक्तिशाली होगा, नशे-व्यसन से दूर होगा और कर्मशील होगा तो बाकी सब समस्याओं को दूर भगाना आसान होगा। स्वामी जी युवाओं को संबोधित करते हैं - 'मेरे मित्रो, शक्तिशाली बनो, मेरी तुम्हें यही सलाह है। तुम गीता के अध्याय की अपेक्षा फुटबाल के द्वारा ही स्वर्ग के अधिक समीप पहुंच सकोगे। ये कड़े शब्द हैं लेकिन मैं उन्हें कहना चाहता हूं क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करता हूं। तुम्हारे स्नायु और मांसपेशियां अधिक मजबूत होने पर तुम गीता अधिक अच्छी तरह समझ सकोगे। इसलिए जाओ मैदान में फुटबाल खेलो।' 
      अपनी ओजस्वी वाणी और तर्क के आधार पर विश्व में भारत की आध्यात्मिक परंपरा का डंका बजाने वाले स्वामी विवेकानंद तरुणों में ही लोकप्रिय नहीं है, वे युवतियों के भी हीरो हैं। इस युवा संन्यासी ने भारत की स्त्री शक्ति की भी चिंता की। उनकी महत्ता प्रतिपादित की। स्त्रियों को उनका अस्तित्व याद दिलाया। फलत: अमेरिका सहित यूरोप की कई स्त्रियां उनकी अनुयायी बन गईं। स्वामीजी के मार्ग पर चल निकलीं। स्त्रियों के साथ उस समय हो रहे दोयम दर्जे के व्यवहार पर विवेकानंद ने रोष प्रकट किया और पुरुष सत्ता को संभलने की चेतावनी दी। स्वामीजी कहते थे कि स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुए बिना संसार के कल्याण की कोई संभावना नहीं है। एक पक्षी का केवल एक पंख के सहारे उड़ पाना संभव नहीं है। यहां स्पष्ट कर देना होगा कि स्वामीजी भारत में स्त्रियों की स्थिति को लेकर ही चिंतित नहीं थे वरन् उनकी चिंता दुनियाभर में स्त्रियों के साथ हो रहे अन्याय को लेकर थी। स्वामीजी सीधे स्त्रियों से भी अपेक्षा करते थे कि वे अपने काम स्वयं करें, पुरुषों के भरोसे रहे ही नहीं। उनका स्पष्ट मत था कि स्त्रियों में अवश्य ही यह क्षमता होनी चाहिए कि वे अपनी समस्याएं अपने ढंग से हल कर सकें। उनका यह कार्य न कोई दूसरा कर सकता है और न ही दूसरे को करना चाहिए। स्त्रियों को शिक्षित करने की दिशा में भी स्वामी जी की चिंता स्पष्ट दिखती है। वे जानते थे कि स्त्री शिक्षा के मायने क्या हैं। परिवार और समाज निर्माण की बुनियाद स्त्रियों के हाथ में पुरुषों की अपेक्षा कुछ अधिक रहती है। स्पष्ट है ऐसे में घर में मां और बहन का पढ़ा-लिखा होना कितना जरूरी है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी प्रिय शिष्या भगिनी निवेदिता (मार्गरेट नोबल) को भारत में नए सिरे से नारी शिक्षा की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से ही भगिनी निवेदिता ने सारदा बालिका विद्यालय की स्थापना की। साथ ही देशभर में नारी शिक्षा को मजबूत करने के लिए आंदोलन भी चलाया। 
       साहस, उत्साह और ऊर्जा के पुंज स्वामी विवेकानंद के क्रांतिकारी विचार उनके समय से अब तक युवाओं को आत्मविश्वास से भर देते हैं। विवेकानंद का नाम मस्तिष्क में आते ही हृदय स्फूर्ति और उत्साह से भर जाता है। स्वामीजी के ओजस्वी विचार आज भी युवाओं को प्रेरणा देते हैं। 'उठो जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल न प्राप्त हो जाए' स्वामी विवेकानंद का यह वाक्य आज भी दुनियाभर के युवाओं का मार्गदर्शन करने का काम करता है। विद्यार्थी जीवन में तो अधिकतर युवा इस वाक्य को सदैव अपने अध्ययन की मेज के सामने लिखकर ही रखते हैं। युवाओं को स्वामी विवेकानंद अपने नायक तो दिखते ही हैं, मित्र की तरह भी महसूस होते हैं। युवाओं में स्वामी विवेकानंद की लोकप्रियता का कारण है कि उनकी जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। हालांकि यह भी सच है कि वर्तमान युवा पीढ़ी उन्हें आदर्श जरूर मानती है लेकिन उनके विचारों और सिद्धांतों का पालन करने में बहुत पीछे है। जरूरत इस बात की है युवा आगे आएं और अपने नायक को अपने जीवन में उतारें। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत को फिर से विश्वगुरु कोई बना सकता है तो वह है भारत की युवाशक्ति। स्वामी विवेकानंद के स्वप्न को साकार करने की महती जिम्मेदारी भारत की युवा पीढ़ी पर है, वे ऐसा कर सकते हैं, बस उन्हें जरूरत है अपने हीरो विवेकानंद के बताए मार्ग पर आगे बढऩे की। भारत की युवा शक्ति को जागृत करने और नई सोच देने के लिए विवेकानंद बहुत कुछ कह गए हैं। आज के युवा उसे पढ़ें, समझें और तब तक नहीं रुकें, जब तक स्वामी जी के स्वप्न साकार नहीं हो जाएं। 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

खजुराहो के कंदारिया महादेव से भी विशाल है ककनमठ

 मं दिर, मठ या अन्य पूजा स्थल महज धार्मिक महत्व के स्थल नहीं होते हैं। ये अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था के गवाह होते हैं। अपने में एक इतिहास समेटकर खड़े रहते हैं। उनको समझने वाले लोगों से वे संवाद भी करते हैं। ग्वालियर से करीब ७० किलोमीटर दूर मुरैना जिले के सिहोनिया गांव में स्थित ककनमठ मंदिर इतिहास और वर्तमान के बीच ऐसी ही एक कड़ी है। मंदिर का निर्माण ११वीं शताब्दी में कछवाह (कच्छपघात) राजा कीर्तिराज ने कराया था। उनकी रानी का नाम था ककनावती। रानी ककनावती शिवभक्त थीं। उन्होंने राजा के समक्ष एक विशाल शिव मंदिर बनवाने की इच्छा जाहिर की। विशाल परिसर में शिव मंदिर का निर्माण किया गया। चूंकि शिव मंदिर को मठ भी कहा जाता है और रानी ककनावती के कहने पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया था, इसलिए मंदिर का नाम ककनमठ रखा गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् श्री जयंत तोमर बताते हैं कि सिहोनिया कभी सिंह-पानी नगर था। बाद में अपभ्रंश होकर यह सिहोनिया हो गया। यह ग्वालियर अंचल का प्राचीन और समृद्ध नगर था। यह नगर कछवाह वंश के राजाओं की राजधानी था। इसकी उन्नति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्वालियर अंचल के संग्रहालयों में संरक्षित अवशेष सबसे अधिक सिहोनिया से प्राप्त किए गए हैं। श्री तोमर बताते हैं कि तोमर वंश के राजा महिपाल ने ग्वालियर किले पर सहस्त्रबाहु मंदिर का निर्माण कराया था। सहस्त्रबाहु मंदिर के परिसर में लगाए गए शिलालेख में अंकित है कि सिंह-पानी नगर (अब सिहोनिया) अद्भुत है।

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

शिवराज को मिला जनआशीर्वाद

 म ध्यप्रदेश की जनता ने शिवराज सरकार में भरोसा दिखाया है। भारी बहुमत से जनता ने भाजपा को राज्य की कुर्सी सौंपी है। भाजपा को 165 सीटों पर विजय मिली है। पिछले चुनाव से 22 सीट अधिक। कांग्रेस 58 सीट पर सिमट गई। उसे इस चुनाव में फायदा होने की जगह पिछले चुनाव के मुकाबले 13 सीट का नुकसान हो गया। यह जीत चौंकाने वाली है, भाजपा के लिए भी और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी। दरअसल, 'महाराज' ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान सौंपकर कांग्रेस ने मुकाबला पेचीदा बना दिया था। बेहद कमजोर दिख रही कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जान फूंक दी थी। कांग्रेस पूरी ताकत के साथ भाजपा से मुकाबला करने खड़ी हो गई। माना जा रहा था कि कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी और भाजपा पूरी ताकत लगाने के बाद बमुश्किल 120 सीट जीत सकेगी। एक अनुमान यह भी था कि कांग्रेस भी सत्ता हासिल कर सकती है। दो बार से प्रदेश की राजगद्दी से नीचे खड़ी कांग्रेस एक बार फिर सरकार में वापसी करना चाहती थी, इसके लिए तमाम गुटों ने एकजुटता दिखाने की भी कोशिश की। 'युवराज' राहुल गांधी ने भी खास फोकस किया मध्यप्रदेश के चुनाव पर, टिकट वितरण पर भी। यानी कांग्रेस की सारी कवायद देखकर अचानक से यह लगा था कि भाजपा के लिए आसान दिख रहा मुकाबला काफी कड़ा होगा। नतीजा शिवराज सिंह चौहान सहित पूरा भाजपा संगठन जबर्दस्त प्रचार अभियान पर निकल लिया। आखिरकार 'फिर भाजपा-फिर शिवराज' का नारा लेकर चुनावी रण में उतरी भाजपा और शिवराज सिंह चौहान को जनआशीर्वाद मिल गया है। 
मौटेतौर पर देखा जाए तो मध्यप्रदेश में भाजपा की जीत शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रिय छवि की जीत है। सरकार की लोककल्याणकारी और लोक लुभावन योजनाओं की जीत है। भाजपा की विचारधारा की जीत है। नरेन्द्र मोदी फैक्टर का भी असर है। भाजपा इसे सुशासन की भी जीत मान रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कई सरकारी योजनाओं से लोगों के दिलों में घर कर लिया है। लाड़ली लक्ष्मी योजना, कन्यादान योजना और बेटी बचाओ अभियान से जहां उन्होंने महिला वर्ग में खुद का महिला हितैषी ब्रांड बनाया वहीं बुजुर्गों को मुफ्त में तीर्थदर्शन करवाकर उनके वोट अपनी झोली में डाल लिए। अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए शिवराज सिंह चौहान जनआशीर्वाद मांगने के लिए प्रदेश के शहर-शहर और गांव-गांव तक पहुंचे। इस दौरान उन्होंने स्वयं की और सरकार की जमकर ब्रांडिंग की। हालांकि सरकार की तरफ से जनता के बीच सब अच्छा-अच्छा था, ऐसा भी नहीं था। प्रदेश सरकार के बहुतेरे मंत्रियों और विधायकों को लेकर जनता में भारी आक्रोश था। यही कारण है कि जनआशीर्वाद यात्रा और चुनाव प्रचार के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने प्रत्याशी के लिए वोट न मांगकर अपने नाम पर मतदान करने की अपील जनता से की। चुनाव से पूर्व टिकट वितरण में भाजपा ने काफी हद तक सावधानी बरतकर इस जीत की राह बनाई थी। करीब ५० टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया गया। ज्यादातर नए चेहरे जीते हैं जबकि पांच-छह मंत्री, जिनके टिकट कट जाने चाहिए थे लेकिन किसी कारणवश कट नहीं सके, वे चुनाव हार गए। शिवराज सिंह चौहान ने इस चुनावी लड़ाई को आम आदमी बनाम महाराज भी बना दिया था। निश्चित यह तरकीब शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में काम कर गई। शिवराज समझ रहे थे कि लोगों को अब राजनीति में अपने बीच का नेता ही चाहिए, राजवंश या खास परिवार की राजनीति के दिन लद गए हैं। नतीजों में यह दिखा भी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने ही गढ़ में कांग्रेस को बहुत अधिक सीट नहीं जितवा सके। यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया का नया चेहरा, ईमानदार छवि और महाराज वाला असर कांग्रेस के किसी काम नहीं आया। हां, यह बात अलग है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को और पहले काम करने का मौका कांग्रेस ने दिया होता तो शायद कुछ संभावना बनती, कांग्रेस के मजबूत होने की। संभवत: कांग्रेस की रणनीति रही होगी कि नवमतदाता यानी यूथ वोटर को सिंधिया के ग्लैमर से आकर्षित कर लिया जाए। लेकिन, नवमतदाताओं में तो नरेन्द्र मोदी का असर था। केन्द्र के चुनाव के लिए मोदी की तैयारी को मजबूत करने के लिए भी युवाओं ने अभी भाजपा को वोट दिया। केन्द्र में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए भाजपा को मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत की दरकार थी। यही कारण था कि मोदी ने चारों राज्यों में अथक चुनाव प्रचार किया। कई सभाएं लीं। एक ही दिन में अलग-अलग राज्यों में जनता को संबोधित किया। नतीजों में इसका असर भी दिखा है। मध्यप्रदेश में भी जहां-जहां नरेन्द्र मोदी ने सभा को संबोधित किया किया, वहां-वहां भाजपा के हित में नतीजे आए। 
मध्यप्रदेश के विकास को भी शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव के दौरान बड़ा मुद्दा बनाया। शिवराज सिंह चौहान ने अपने भाषणों में जनता को दिग्विजय सिंह के शासन काल की याद दिलाई। कांग्रेस के ६० साल के विकास से अपने १० साल के विकास की तुलना कराई। उन्होंने जनता से वादा भी किया कि भाजपा को फिर सरकार में आई तो विकास की रफ्तार और तेज होगी। इस बात में कोई शंका नहीं कि पिछले १० साल में मध्यप्रदेश में काफी काम हुए हैं। यह जनता को दिख भी रहा था। यानी यह भी कहा जा सकता है कि सरकार ने विकास ने नाम पर जीत हासिल की है। अब देखना है कि भाजपा और उनके लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनता की भावनाओं को कैसे संभालकर रखते हैं। जनआशीर्वाद का कितना सम्मान करेंगे। जनादेश का कितना पालन करेंगे। इस बार शिवराज सिंह चौहान और भाजपा संगठन को इस बात पर सख्त होना पड़ेगा कि सरकार में भ्रष्टाचार न पनपे। साथ ही नेता जीत के बाद लापता न हो जाएं, जनता के बीच रहें, जनता के बीच दिखें, जनता के सुख-दु:ख में शामिल हों, जनता की समस्याएं सुनें और उनकी परेशानियों को दूर करने की दिशा में पहल करते दिखें। लगातार तीसरी बार जीत है, बड़ी जीत है, तो भाजपा गुरूर न करे। अदब से जनादेश को स्वीकार करें और विकास की पार्टी के रूप में बनी अपनी छवि को साबित करे।
इधर, भोपाल में शिवराज सिंह चौहान ने मीडिया से बात करते हुए भारी बहुमत के लिए जनता को धन्यवाद दिया। कार्यकर्ताओं की मेहनत को स्वीकार किया। प्रदेश से लेकर केन्द्रीय नेताओं का सहयोग के लिए आभार जताया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि जनता ने जिस उम्मीद और भरोसे के साथ भाजपा को फिर से सरकार बनाने का मौका दिया है, हम उस उम्मीद और भरोसे के लिए दिन-रात काम करेंगे। मध्यप्रदेश की जनता की सेवा के लिए रात-दिन एक कर देंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आम चुनाव में केन्द्र में सरकार बनाने के लिए मध्यप्रदेश अन्य राज्यों के अनुपात में अधिक सीटें देगा। बहरहाल, भाजपा के हौंसले बुलंद हैं, इस जीत से। दिल्ली में हुई प्रेसवार्ता में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश में तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेंगे। बड़ी जीत और तीसरी पारी से शिवराज सिंह चौहान की केन्द्र में स्थिति मजबूत होगी और भूमिका भी बढ़ेगी। 

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

पेड न्यूज बनाम विश्वसनीयता

 भा रत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है। लोकतांत्रिक सरकार के चुनाव में देश का प्रत्येक व्यक्ति हिस्सेदार होता है। इसमें मीडिया की भी अहम भूमिका होती है। अखबार और न्यूज चैनल्स लगातार सत्य और तथ्यात्मक खबरें प्रकाशित कर अपनी साख आम आदमी के बीच बनाते हैं। यही कारण है कि मीडिया की खबरों से पाठकों का मानस बनता और बदलता है। समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स लगातार सत्तारूढ़ दल और अन्य राजनीतिक दलों के संबंध में नीर-क्षीर रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं। मौके पर जनता अपने मताधिकार का उपयोग सही नेताओं और सरकार को चुनने में करे, इसके लिए एक तस्वीर मीडिया की इन खबरों से बनती है। लेकिन, कुछ वर्षों से पेड न्यूज का चलन बढ़ गया है। पेड न्यूज यानी ऐसी खबर जिसे प्रकाशित करने के लिए रुपए या अन्य किसी प्रकार का आर्थिक सौदा किया गया हो। पेड न्यूज यानी नोट के बदले खबर छापना। पेड न्यूज का ही असर है कि जिस सामग्री को विज्ञापन के रूप में प्रकाशित/प्रसारित होना चाहिए था वो समाचार के रूप में लोगों के पास पहुंच रही है। यानी पाठक/दर्शक को सीधे तौर पर भ्रमित किया जा रहा है। अखबार या न्यूज चैनल के प्रति जो पाठक/दर्शक का विश्वास है उसका मजाक बनाया जा रहा है। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान, जब मीडिया को तथ्यात्मक और निष्पक्ष समाचार प्रकाशित करने चाहिए थे, तब पेड न्यूज का बाजार गर्म है। महसूस होता है कि पेड न्यूज के सिन्ड्रोम में अब मीडिया का नीर-क्षीर वाला विवेक कहीं खो गया लगता है। वैसे भी जबसे पत्रकारिता के संस्थानों में कॉर्पोरेट कल्चर बढ़ा है, आर्थिक लाभ विश्वास की पूंजी कमाने से अधिक प्राथमिक हो गया है। 
वर्ष २००९ में लोकसभा के चुनाव के दौरान पेड न्यूज के कई मामले सामने आए थे। पहली बार पेड न्यूज एक बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई थी। अखबारों और न्यूज चैनल्स ने बकायदा राजनीतिक पार्टी और नेताओं की खबरें प्रकाशित/प्रसारित करने के लिए पैकेज लांच किए थे। यानी राजनीति से जुड़ी खबरें वास्तविक नहीं थीं। जिसने ज्यादा पैसे खर्च किए उस पार्टी/नेता के समर्थन में उतना बढिय़ा कवरेज। जिसने पैसा खर्च नहीं किया उसके लिए कोई जगह नहीं थी। इस दौरान कई राजनेताओं ने सबूत के साथ मीडिया पर आरोप लगाए कि उनके समर्थन में खबरें छापने के लिए पैसा वसूला गया है या वसूला जा रहा है। कई मीडिया संस्थान तो चुनाव लडऩे वाले नेताओं पर न्यूज कवरेज के पैकेज लेने के लिए दबाव भी बना रहे थे। जिन नेताओं ने ये पैकेज नहीं लिए उनके खिलाफ नकारात्मक खबरें प्रकाशित कर उन पर दबाव बनाया गया। यही नहीं कई नेता तो तगड़ा धन खर्च कर विरोधी नेता के खिलाफ नकारात्मक खबरें तक प्लांट कराने में सफल रहे। आंध्रप्रदेश की लोकसत्ता पार्टी के उम्मीदवार पी. कोडंडा रामा राव ने तो प्रेस काउंसिल को जो चुनाव खर्च का ब्योरा दिया, उसमें साफ बताया कि उन्होंने कितना पैसा मीडिया कवरेज पाने के लिए खर्च किया। पेड न्यूज सिन्ड्रोम पर इसके बाद जो बहस का दौर चला, उसमें मीडिया संस्थानों की काफी किरकिरी हुई। उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए। 
भारतीय प्रेस परिषद, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया, संसद की स्थायी समिति, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, प्रसार भारती और भारतीय निर्वाचन आयोग सहित मीडिया के क्षेत्र में काम कर रहे अन्य संगठनों, बुद्धिजीवियों ने पेड न्यूज सिन्ड्रोम पर चिंता जाहिर की। इससे उपजने वाले खतरों से आगाह किया। पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए उपाय करने पर विचार किया। इसके लिए देश के प्रतिष्ठित और क्षेत्रीय समाचार माध्यमों से अपेक्षा कि वे स्वत: ही इस दिशा में कुछ करें। आखिर यह उनकी भी विश्वसनीयता का सवाल है। लेकिन, जैसा कि हम समझ सकते हैं कि आसानी के साथ धन बनाने के माध्यम को इतनी आसानी से कोई नहीं छोड़ सकता। खासकर उसका इस्तेमाल कर चुके लोग/संस्थान। पेड न्यूज पर मचे हो-हल्ले के कारण अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखना और साबित करना देश के नामचीन मीडिया घरानों के सामने चुनौती बन गया। देश के छोटे से बड़े सभी मीडिया संस्थानों ने इस बात की घोषणा तो की कि वे पेड न्यूज परंपरा का विरोध करते हैं और अपने समाचार-पत्र और पत्रिका में पेड न्यूज नहीं छापेंगे। न्यूज चैनल पर पेड न्यूज नहीं दिखाएंगे। लेकिन चुनावी समय में इन मीडिया संस्थानों की सब घोषणाएं और विरोध धरा रह जाता है। वे पेड न्यूज को लेकर पहले से काफी सतर्क हो जाते हैं। एक ओर तो तमाम संस्थान अपने समाचार-पत्र में बकायदा पेड न्यूज के खिलाफ अभियान चलाते हैं, पेड न्यूज के खिलाफ विज्ञापन छापते हैं और लोगों को पेड न्यूज की शिकायत करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन दूसरी ओर पेड न्यूज का तरीका बदलकर समाचार बेचने का व्यापार किया जाता है। पेड न्यूज के लिए नए तरीके खोज लिए गए हैं। अब पैसा लेकर किसी पार्टी/नेता समर्थन में कैंपेनिंग करने और विज्ञापन को समाचार की शक्ल में प्रकाशित/प्रसारित करने से कुछ हद तक मीडिया संस्थान बच रहे हैं। अब मीडिया घरानों के द्वारा राजनीतिक दल/नेता से वादा किया जाता है कि आप धन दीजिए, आपके खिलाफ कोई खबर प्रकाशित/प्रसारित नहीं की जाएगी। आपकी गलतियों, भ्रष्टाचार और कमजोरियों को जनता के सामने नहीं रखा जाएगा। आपके खिलाफ आ रही नकारात्मक खबरों को हम अपने समाचार-पत्र/न्यूज चैनल में जगह नहीं देंगे। मतलब साफ है मीडिया संस्थानों में पेड न्यूज का चलन जारी है। पहले खुला खेल फर्रूखावादी था अब वे कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं। दरअसल, पत्रकारिता की आड़ में धन कमाने की लोलुपता इतनी अधिक बढ़ गई है कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी, सिद्धांत और मूल्य चूल्हे में चले गए हैं। 
अगर पेड न्यूज को सिर्फ राजनीतिक खबरों तक नहीं बांधा जाए तो मीडिया संस्थान सालभर इस गोरखधंधे में लगे रहते हैं। व्यापारिक और कई सामाजिक संगठनों से पैसे लेकर उनके समर्थन में खबरें प्रकाशित/प्रसारित करना भी तो पेड न्यूज के दायरे में आता है। पेड न्यूज का ही असर है कि कोई संस्था भले ही कितना अच्छा काम कर रही हो लेकिन उससे संबंधित समाचारों को समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स में जगह नहीं मिलती। दरअसल, होता यह है कि उसी तरह की अन्य संस्थाएं मीडिया को मैनेज करके चलती हैं। कार्यक्रम कवरेज करने के लिए संस्थानों को विज्ञापन के रूप में धन दिया जाता है। जो संस्था विज्ञापन नहीं देती, उसके समाचार प्रकाशित नहीं किए जाते। जो संस्था विज्ञापन देती है, उसके किसी कार्यक्रम के आयोजन का समाचार चार दिन बाद भी प्रकाशित किया जा सकता है। इस तरह के समाचारों से भी मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। 
पैसा लेकर खबर छापना/दिखाना एक सामान्य अपराध नहीं है बल्कि यह नैतिक अपराध है। यह पाठक और दर्शक की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। आम दिनों की अपेक्षा चुनाव के नजदीक या चुनाव के दौरान पेड न्यूज के जरिए आम जनता से धोखाधड़ी अधिक गंभीर होती है। मीडिया लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मीडिया के प्रति जनमानस में यह विश्वास है कि मीडिया आम आदमी की आवाज बनकर उसकी समस्याएं तो उठाता ही है साथ ही देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिति पर भी नजर रखता है। चूंकि आम आदमी अपना मानस समाचार-पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट पढ़कर और न्यूज चैनल्स पर प्रसारित खबरें देखकर बना रहा है। उसे भरोसा होता है कि समाचार माध्यम पुख्ता और सही जानकारी उस तक पहुंचा रहे हैं। लोगों तक सच पहुंचाना ही तो मीडिया की जिम्मेदारी है। मीडिया को सच का प्रहरी ही तो माना जाता है। मीडिया खुद भी स्वयं को लोकतंत्र का चौथा खंबा मानता है। लोकतंत्र में खुद को वॉच डॉग की भूमिका में मानता है। ऐसे में चुनाव के समय में पेड न्यूज कहीं न कहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विपरीत असर डालती हैं। संभवत: यही कारण है कि सालभर चलने वाली पेड न्यूज की अपेक्षा चुनाव के वक्त राजनीतिक खबरों की खरीद-फरोख्त पर अधिक चिंता जताई जाती है। पेड न्यूज सिन्ड्रोम भारतीय पत्रकारिता के समक्ष एक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। एक तरफ पैसा है और दूसरी तरफ विश्वसनीयता। स्वस्थ लोकतंत्र और विश्वसनीय पत्रकाारिता के लिए पेड न्यूज की बीमारी पर जल्द काबू पाना होगा। बीमारी और अधिक बढ़ी तो बहुत नुकसान करेगी। समय रहते इसका इलाज जरूरी है। पेड न्यूज के दायरे और उसकी परिभाषा को जानकर तो लगता है कि किसी कानून की मदद से उस पर रोक लगा पाना मुश्किल है। इसके लिए स्वार्थ और धन लोलुपता छोड़कर मीडिया संस्थानों को ही आगे आना पड़ेगा।  आखिर सबसे बड़ा सवाल मीडिया की विश्वसनीयता का है। यदि पेड न्यूज को दूर नहीं किया तो भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता जाती रहेगी, फिर उसकी किसी बात पर कोई आसानी से भरोसा नहीं करेगा। जब लोगों को ही मीडिया पर भरोसा नहीं रहेगा तो राजनीतिक दल/नेता क्यों अपनी खबरें छपवाने/दिखवाने के लिए पैसा खर्चा करेंगे। तब मीडिया के पास न धन आएगा और न ही विश्वसनीयता बची रहेगी। इसलिए अच्छा होगा पेड न्यूज के चलन को खत्म करने के लिए अभी कुछ ठोस उपाय किए जाएं।
- मीडिया विमर्श में प्रकाशित आलेख