- लोकेन्द्र सिंह -
भारतीय सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने अपने विवादित बयान से एक बार फिर असहिष्णुता की बहस को जिंदा कर दिया है। एक ओर नसीर कह रहे हैं कि उन्हें भारत में डर लगता है, वहीं पाकिस्तान में यातनाएं झेल कर भारत सरकार के प्रयास से वापस लौटे हामिद नेहाल अंसारी अपने देश में सुकून महसूस कर रहे हैं। अब कौन सही है, नसीर साहब या हामिद? नसीरुद्दीन को इस देश ने बहुत सम्मान और प्रसिद्धि दी है। यह देश उनकी कला का प्रशंसक है। किंतु, नसीर अपने देश को क्या लौटा रहे हैं? आज कुछेक घटनाओं को आधार बना कर नसीर कह रहे हैं- 'मैं अपने बच्चों के लिए चिंतित हूं क्योंकि कल को अगर भीड़ उन्हें घेरकर पूछती है कि तुम हिंदू हो या मुसलमान? तो उनके पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। यह मुझे चिंतित करता है और मैं हालात को जल्द सुधरते हुए नहीं पा रहा हूं।' उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को चिह्नित कर के मारा और भगाया गया। उन्हें यह डर तब क्यों नहीं लगता, जब कैराना से हिंदुओं का पलायन कराया जाता है? नसीर साहब दुनिया देखती है कि वह भीड़ कौन-सी है जो घेर कर धर्म पूछती है और कुरान की आयत नहीं सुनाने वालों को गोलियों से भून देती है। शुक्र है कि आपके बच्चों को कुरान की आयतें तो याद हैं। जब उन्हें भीड़ घेरेगी तो आयतें सुनाकर वह जान बचा लेंगे, लेकिन उनका क्या होगा जिन्हें रामायण की चौपाई और गीता के श्लोक याद हैं?





