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बुधवार, 21 नवंबर 2018

बेटी के लिए कविता-6



हो गई चार साल की छोकरी 
बाँधकर चलती है बातों की पोटली। 


पोटली में बातें, रंग-बिरंगी सतरंगी
बातें खट्टी-मीठी, अदा नखराली। 



समय की जैसी मांग, हाजिर वैसी बात
मीठी बातों में लेकर तुम पोटने वाली।



पोटली में बातें, दुनिया जहान की
मैं सुनने वाला और तुम सुनाने वाली। 



छकपक-छकपक चलती बातों की रेल
सुबह से शाम तक, बेरोकटोक चलने वाली। 



पोटली में बातें, मतलब-बेमतलब
सुननी होंगी सब, लड़की ज़िद वाली। 



खजाने से भी कीमती ये पोटली 
मन बहलाये, बोली उसकी तोतली। 



मैं सुनता रहूं और तुम सुनाती रहो 
कभी न हो खाली, तुम्हारी ये पोटली। 
- लोकेन्द्र सिंह -

बुधवार, 21 मार्च 2018

बेटी के लिए कविता – 5



हो बहुत उतावली
उगाना चाहती हो
सरसों हथेली पर।

क्षणभर,
गर हो जाए देर
नौटंकी तुम्हारी
बिना देरी हो जाती शुरू।
- लोकेन्द्र सिंह -

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

बेटी के लिए कविता-3


भले ही तुम हो गई हो
तीन साल की।
फर्क क्या आया? 
आज भी तुम्हारी भाषा-बोली को 
हम दो लोग ही समझते हैं।

हाँ, तुम्हारा भाई भी समझने लगा है
बल्कि, कर्ई दफा 
हमसे ज्यादा वह ही तुम्हें समझता है
जैसे हम दूसरों को बताते हैं
किसी अनुवादक की तरह 
तुमने क्या बोला?
ठीक उसी तरह, कई दफा
वह हमें बताता है
तुमने क्या बोला?

चलो, अच्छा है
हम संवाद के लिए
परस्पर निर्भर हैं। 
उच्चारण स्पष्ट हो जाए
तब भी, एक-दूसरे को समझने की
परस्पर निर्भता बनी रहे।
- लोकेन्द्र सिंह -
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ऋष्वी के जन्मदिन की तीसरी वर्षगाँठ पर... 21 नवंबर, 2017

शनिवार, 21 नवंबर 2015

बेटी के लिए कविता-2


"मेरी चिड़िया, 
आज तुम पूरे एक साल की हो गयी हो। 
तुम्हारी हँसी के मौसम में मौज का एक साल कब निकल गया, 
पता ही नहीं चला। 
तुम्हारे आने के बाद असल में अहसास हुआ, 
पिता होने का अर्थ क्या है? 
हृदय और अधिक संवेदनशील हो गया है। 
लौट आया है मेरा भी बचपन तुम्हारे साथ। 
तुम्हारी नन्ही कोमल अंगुलियां जब मेरे गालों को स्पर्श करती हैं, 
मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठता है। 
सुबह-सुबह ऑफिस जाते वक्त रोज देखता हूँ, 
किवाड़ के उस पार छूटता हुआ मेरा मन 
और इस पार घुटने-घुटने चलकर आता तुम्हारा मन। 
शाम को घर लौटने की व्याकुलता रहती है, 
तुम्हारी हँसी के साथ झरने वाले 
चमेली-चम्पा-गेंदा-गुलाब समेटने के लिए। 
पता नहीं तुम कौन-सा जग जीत लेती हो, 
मुझे सामने पाकर। 
अपने नन्हे घुटनों पर खड़ी हो जाती हो, दोनों हाथ विजयी मुद्रा में उठाकर। 
जब तक कलेजे से लटक नहीं जाती हो, 
सुकून नहीं मिलता तुम्हें और मुझे भी। 
मेरे साथ से तुम्हें कौन-सा खजाना मिलता, मुझे पता नहीं। 
लेकिन हाँ, मुझे जरूर धरती पर स्वर्ग मिल जाता है। 
तुम्हारी अजब लीला है। 
मेरे घर आने के बाद तो जैसे धरती पर कांटे उग आते हैं, 
गोदी से उतरने का नाम नहीं लेती हो। 
फिर तो नींद भी तुम्हें मेरे कंधे पर ही आती है। 
खैर, बहुत बात हैं लिखने-कहने को, ख़त्म नहीं होंगी। 
कभी-कभी मन करता है, घड़ी की सुईयों से लटक जाऊँ, 
कालचक्र के पहिये को थाम लूँ। 
ऐसे ही रहे यह समय, हमेशा के लिए। 
तुम नन्ही परी और मैं अल्हड़ पिता।"
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- लोकेन्द्र सिंह -