बुधवार, 19 दिसंबर 2012

सब समाज का है 'शिवराज'

 म ध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समाज के प्रत्येक वर्ग के करीबी हो गए हैं। जब कोई अपना हो जाता है तो उसे उसके मुख्य नाम से नहीं बुलाते। उसके लिए प्यार से एक नया नाम यानी निकनेम रखते हैं। प्रदेश में लिंगानुपात बहुत अधिक है। लड़का-लड़की के भेद को कम करने के लिए मुख्यमंत्री ने लाडली लक्ष्मी योजना शुरू की। इसके बाद शिवराज सिंह प्रदेशभर की बच्चियों के 'मामा' बन गए। किसान खुशहाल हों तो प्रदेश भी तरक्की की राह पकड़ ले। यही सोचकर मुख्यमंत्री  ने किसानों के लिए जीरो फीसदी पर कर्ज मुहैया कराने की योजना शुरू की। यानी ब्याज जीरो, किसान हीरो का नारा देकर वे किसानों के मसीहा बन गए। किसान पुत्र बन गए। हाल ही में बुजुर्गों को मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के तहत तीर्थ यात्रा पर भेजकर शिवराज इस युग के 'श्रवण कुमार' बन गए। काफिला रुकवाकर किसी की दुकान से जलेबी तो किसी ठेलेवाले से पोहा खाना, लोगों के कंधे पर हाथ रखकर उनका हालचाल पूछना और गांव-गांव संपर्क करने से उन्हें 'पांव-पांव वाले भैया' के नाम से पुकारा जाने लगा। योग और गीताज्ञान को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कराकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को संघ का खाटी 'स्वयंसेवक' कहलाने में गुरेज नहीं। भेष बदलकर, चोरी-छिपे जनता का हाल जानने सड़कों पर निकलकर 'विक्रमादित्य' बन गए शिवराज। प्रदेश में लोकप्रियता के चरम पर हैं शिवराज सिंह चौहान। मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बारे में एक लाइन में कुछ कहना हो तो - मध्यप्रदेश का मुखिया भारत के दिल पर काबिज है और आगे भी रहने वाला है।
    शिवराज सिंह चौहान की विनम्रता, पार्टी गाइडलाइन का पालन, वरिष्ठ नेताओं व पार्टी संगठन से सांमजस्य और विरोधियों की प्रशंसा करने के गुण उन्हें अन्य नेताओं से अलग करते हैं। 29 नवंबर, 2005 को उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। सात साल से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे शिवराज सिंह चौहान की शैली ऐसी है कि कोई उनसे नाराज नहीं होता। यहां तक कि विरोधी भी उनकी विनम्रता के मुरीद हो जाते हैं। विधानसभा की कार्यवाही में भी अकसर दिख जाता है कि कांग्रेस भाजपा सरकार को तो घेरने के प्रयास करती दिखती है लेकिन सीएम को निशाना नहीं बनाती। हाल ही में ग्वालियर में स्वर्गीय माधवराज सिंधिया प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम में कांग्रेस के युवा मंत्री ज्योतिरादित्य ने मुख्यमंत्री की कार्यशैली, विनम्रता और वाकपटुता की खुलकर प्रशंसा की। सिंधिया ने मुख्यमंत्री की प्रशंसा उस वक्त की है जबकि प्रदेश कांग्रेस का एक धड़ा उन्हें कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर २०१३ के चुनाव फतेह करना चाहता है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी कहते हैं कि एक सफल शासक में जिस प्रकार की विनम्रता जरूरी है, शिवराज का व्यक्तित्व उस पहलू को बहुत उजागर करता है।
    किसान परिवार में जन्मे और किरार जाति (पिछड़ा वर्ग) से संबंध रखने वाले शिवराज सिंह चौहान का भाषण देना का अंदाज भी निराला है। जिस तरह कथावाचक अपने श्रोताओं को बांधकर रखता है वैसे ही शिवराज सिंह चौहान अपनी बात आहिस्ता-आहिस्ता जनता के मन में गहरे तक उतार देते हैं। सरकार की उपलब्धि पर वे मंच से जनता की हामी भरवा लेते हैं और केन्द्र सरकार के खिलाफ अपनी बात पर लोगों की मुहर भी लगवा लेते हैं।
    जाति फैक्टर का भारतीय राजनीति में बड़ा महत्व है। किसी भी प्रांत की राजनीति पर नजरें दौड़ा लें तो जाति बड़ा कारक सामने आता है। उत्तरप्रदेश में यादव, ब्राह्मण और दलित राजनीति का बोलबाला है। बिहार में भी भाजपा के आने से पहले यही हाल था। शिवराज सिंह चौहान इस मामले में भी अन्य राजनेताओं से अलग दिखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में पाए गुणों के कारण ही वे समरस समाज का स्वप्न देखते हैं और जातिगत राजनीति से दूर रहते हैं। वर्ष २००५ में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान को ग्वालियर आने के लिए उनके जातिगत समाज ने बुलावा भेजा। किरार समाज ने अपनी जाति के साधारण से किसान पुत्र को बुलंदी चूमने पर सम्मानित करने का निर्णय लिया था। वीरागंना लक्ष्मीबाई समाधिस्थल के सामने मैदान में मुख्यमंत्री के सम्मान का समारोह आयोजित किया गया। मंच से किरार जाति के नेताओं ने समाजहित की चिंता करते हुए कुछ अपेक्षाएं अपने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समझ व्यक्त कीं। माइक संभालते ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने सम्मान के लिए समाज को धन्यवाद दिया। इसके बाद उन्होंने भरे मंच और मैदान में कहा- शिवराज किसी एक समाज का नहीं है। उसे प्रदेश के हर समाज, प्रत्येक वर्ग की चिंता का गुरुतर दायित्व प्रदेश की सारी जनता ने दिया है। इसीलिए आपसे माफी मांगते हुए कहता हूं कि मैं महज किरार समाज का नहीं वरन् सब समाज का हूं।
    भारतीय राजनीति में किसी भी नेता के लिए जाति के बड़े-बड़े नेताओं के सामने इस तरह की बात कहना इतना आसान नहीं होता लेकिन जिसे समाज को समरस बनाना हो उसके लिए इतना कठिन भी नहीं होता है। वरना वोटों और कुर्सी के भूखे नेता ऑनर किलिंग तक का समर्थन कर जाते हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यही व्यक्तित्व है, जिसके आगे विपक्ष टिक नहीं पा रहा है और भाजपा के लिए मिशन-२०१३ की राह भी आसान दिख रही है। 

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

इमेज सेट करने का खालिस षड्यंत्र

 के न्द्र सरकार यानी यूपीए-२ भ्रष्टाचार के मामलों में अपनी साख बुरी तरह खो चुकी है। पहले सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने सरकार की जमकर किरकिरी कराई। बाद में, महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक (कैग) ने सारी ठसक छीन ली। यह अलग बात है कि सरकार और उसके नुमाइंदों ने बेशर्मी की मोटी चादर ओढ़ रखी है। बेहयाई की हद देखिए, जिसने भी सरकार के कामकाज के तरीके पर अंगुली उठाई, सरकार चून बांधकर (फोकस करके) उसके पीछे पड़ गई। चाहे वह बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे या फिर अरविंद केजरीवाल। सरकार के नुमाइंदों ने सब को चोर, ठग और सिरफिरा करार दे दिया। यूपीए-२ अब सीएजी को बदनाम करने के लिए प्रोपेगंडा रच रही है। भारतीय राजनीति के इतिहास में आपातकाल के काले पृष्ठ को छोड़ दिया जाए तो संवैधानिक संस्था को इस तरह कभी निशाना नहीं बनाया गया है। सीएजी को घेरना, उसकी विश्वसनीयता, निष्पक्षता और ईमानदारी पर सवाल खड़े करना बेहद हल्की राजनीति का उदाहरण भर है।
        भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस ने सीएजी के पूर्व अधिकारी आरपी सिंह के दावे को हथियार बनाकर भारतीय जनता पार्टी और सीएजी विनोद राय पर हमला बोल दिया है। आरपी सिंह ने दावा किया है कि सीएजी ने टूजी घोटाले में १.७६ लाख करोड़ के घाटे का जो आंकड़ा पेश किया है वह सही नहीं है। असल घाटा तो २६४५ करोड़ रुपए था। आरपी सिंह ने यह आरोप भी लगाया है कि रिपोर्ट पर जबरन दस्तखत कराए गए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि घाटे का आंकड़ा बड़ा दिखाने के लिए लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने सीएजी पर दबाव डाला था। इन आरोपों को मुद्दा बनाकर यूपीए की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी से लेकर हाल ही में प्रमोशन पाए सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी, कानून मंत्री अश्विनी कुमार और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भाजपा और संवैधानिक संस्था सीएजी पर सीधा हमला बोला है। इस मसले पर जरा गौर करें तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि यूपीए-२ किसी भी हद तक जाकर अपनी इमेज सेट करने की कोशिश कर सकती है। एक ऐसे व्यक्ति की बातों को आधार बनाकर संवैधानिक संस्था पर आरोप लगाए जा रहे हैं, जिसने टूजी पर हुए भारी बवंडर के बीच तो चुप्पी साधे रखी। भ्रष्टाचार के आरोप में कई मंत्री-संत्री जेल की सैर कर आए लेकिन आरपी सिंह कुछ बोले नहीं। इतना ही नहीं इन महाशय ने लोक लेखा समिति और टूजी घोटाले की जांच कर रही जेपीसी के समझ भी यह सच्चाई नहीं उगली थी। सेवानिवृत्त होने के १४ महीने बाद मुंह खोला है। आरपी सिंह के रवैए को देखकर भाजपा के इस आरोप में दम दिखती है कि आरपी सिंह कांग्रेस के हाथ खेल रहे हैं। कांग्रेस सीएजी को झूठा साबित करके अपना दामन उजला दिखने की कोशिश में हैं। जबकि कांग्रेस का दामन कोयले में भी खूब काला हो चुका है। यूपीए-२ के मंत्री कपिल सिब्बल ने तो शुरुआत में ही 'जीरो लॉस' की थ्योरी पेश की थी, जिससे सरकार की जमकर थू-थू हुई। बाद में, सरकार ने टूजी मामले की जांच कराई और अपने ही मंत्रियों को इस मामले में जेल की हवा खिलवाई। यह सवाल उठता है कि यदि आरपी सिंह के दावे सही हैं तो क्या सरकारी एजेंसियों की जांच गलत है? क्या सुप्रीम कोर्ट गलत है? चलो एक बार को मान भी लें कि आरपी सिंह का यह दावा सच है कि घाटे का आंकडा १.७६ लाख करोड़ बहुत अधिक ज्यादा है लेकिन फिर भी सरकार ने खेल तो खेला ही न। घोटाला छोटा ही सही, हुआ तो। फिर सरकार अपने को पाक-साफ दिखने की जद्दोजहद क्यों कर रही है? क्यों नहीं अपनी गलती मानकर देशवासियों से माफी मांग लेती? क्यों नहीं भ्रष्टाचार के दोषियों को सजा देती? लेकिन नहीं, कांग्रेसनीत सरकार गलती स्वीकार करने की जगह आरपी सिंह को ढाल बनाकर सीएजी पर अंगार उगल रही है।
           कांग्रेस सीएजी को झूठा और नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती है। हालांकि हर बार उसे ही मुंह की खानी पड़ती है। इस मामले में भी आरपी सिंह ने जैसे ही खुद को घिरता देखा तो पलटी खा गए, साथ में कांग्रेस और यूपीए-२ को भी औंधा (उल्टा) करा दिया। दो दिन ही बीते कि आरपी सिंह ने कह दिया कि १.७६ लाख करोड़ के घाटे का आंकड़ा जारी कराने में भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कोई दबाव नहीं डाला। पूर्व में मीडिया ने उनके बयान को गलत अर्थ में पेश किया। आरपी सिंह के पलटी खाते ही भाजपा सोनिया गांधी सहित कांग्रेसनीत यूपीए सरकार पर मुखर हो गई। टूजी स्पेक्ट्रम मामले में इससे भी कांग्रेस के बयान उसके गले की फांस बन गए थे। हाल ही में टूजी स्पेक्ट्रम की निराशाजनक नीलामी के बाद भी सरकार के ढोलों ने जमकर हल्ला मचाया था कि देखा, हमने तो पहले ही कहा था कैग ने मनगढंत आंकडे पेश किए हैं। सरकार को कोई घाटा नहीं हुआ। कैग की मिलीभगत है भाजपा के साथ, उसने जबरन यूपीए सरकार को बदनाम करने की कोशिश की। दो दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने नीलामी में विसंगति पाई और सरकार की जमकर खिंचाई कर दी। मतलब साफ है, यहां भी सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट को झूठ का पुलिंदा साबित करने के लिए नीलामी ही गलत ढंग से कर दी। 
            यूपीए-२ सरकार सीएजी से इतनी परेशान है कि उसने सीएजी के पर कतरने की तैयारी तक कर रखी है। दरअसल, जल्द ही सीएजी जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम), मनरेगा, किसान कर्ज माफी योजना और उर्वरकों की सबसिडी में हुए घोटाले और अनियमितता को लेकर संसद में रिपोर्ट पेश करने वाली है। इससे फिर कांग्रेस की छवि पर बट्टा लगना है। इसलिए सरकार के अंदरखाने के लोगों ने सीएजी को नख-दंतहीन संस्था बनाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। यह बात यूं साफ होती है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने ११ नवंबर को बहुसदस्यीय महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव की भनक लगते ही विपक्ष ने जमकर विरोध किया। अपने मौन के लिए विख्यात प्रधानमंत्री को आखिर बोलना पड़ा। कहा कि कई सदस्यों का महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक बनाने की सरकार की कोई मंशा नहीं है। प्रधानमंत्री ने तब भले ही कांग्रेस और सरकार की किरकिरी होने से बचाने के लिए ऐसा जवाब दिया। असल में तो सरकार सीएजी को नापने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। दरअसल, सरकार का सोचना है कि सीएजी की गलत साबित करने के बाद ही जनता के बीच उसका चेहरा चमकदार दिखेगा।
          इधर, केन्द्र सरकार ने दूसरे उपाय भी शुरू कर दिए हैं अपनी छवि सुधारने के लिए। कांग्रेस के नेता दबी जुबान में स्वीकार कर रहे हैं कि कसाब को टांगकर सरकार ने जनता को अपनी ओर खींचने की कोशिश की है। वरना, देश की संसद पर हमला करने वाले अफजल का नंबर पहले था। खैर, सब जानते हुए जनता इस बात के लिए सरकार की पीठ थपथपा रही है। लेकिन, वह सरकार के घोटालों को भूलना नहीं चाहती। कसाब की फांसी के बदले केन्द्र सरकार की १०० गलतियों को माफ करना नहीं चाहती। २१ नवंबर को कसाब की फांसी की खबर सुनकर देशवासियों ने एक-दूसरे को बधाई संदेश भेजे। इनमें उन्होंने एक-दूसरे को याद दिलाया कि केन्द्र सरकार ने यह काम बढिय़ा किया है लेकिन उसके द्वारा किए गए घोटालों को हमें भूलना नहीं है।
कांग्रेस सीएजी पर सवाल उठाकर और कसाब को फांसी पर लटकाकर इतनी आसानी से अपनी इमेज सेट नहीं कर पाएगी। दरअसल, ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है। खास बात यह है कि इस बार पब्लिक माफ करने के मूड में दिख नहीं रही।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

भारत में चमका था विज्ञान का सूर्य

 भा रत और भारत के लोगों के बारे में एक धारणा दुनिया में प्रचलित की गई कि भारत जादू-टोना और अंधविश्वासों का देश है। अज्ञानियों का राष्ट्र है। भारत के निवासियों की कोई वैज्ञानिक दृष्टि नहीं रही न ही विज्ञान के क्षेत्र में कोई योगदान है। भारत के संदर्भ में यह प्रचार लंबे समय से आज तक चला आ रहा है। नतीजा यह हुआ कि अधिकतर भारतवासियों के अंतर्मन में यह बात अच्छे से बैठ गई कि विज्ञान यूरोप की देन है। विज्ञान का सूर्य पश्चिम में ही उगा था उसी के प्रकाश से संपूर्ण विश्व प्रकाशमान है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज हम हर बात में पश्चिम के पिछलग्गू हो गए हैं क्योंकि हम मानते हैं कि पश्चिम की सोच वैज्ञानिक सम्मत है। पश्चिम ने जो सोचा है, अपनाया है वह मानव जाति के लिए उचित ही होगा। इसलिए हमें भी उसका अनुकरण करना चाहिए। भारत में योग पश्चिम से योगा होकर आया तो जमकर अपनाया गया। आयुर्वेद को चिकित्सा की सबसे कमजोर पद्धति मानकर एलोपैथी के मुरीद हुए लोगों की आंखें तब खुली जब आयुर्वेद पश्चिम से हर्बल का लेवल लगाकर आया। भारत में विज्ञान को लेकर जो वातावरण निर्मित हुआ उसके लिए हमारे देश के कर्णधार भी जिम्मेदार हैं। जिन्होंने तमाम शोध और विमर्श के बाद भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा को शामिल नहीं किया। भारत के छात्रों का क्या दोष, जब उन्हें पढ़ाया ही नहीं जाएगा तो उन्हें कहां से मालूम चलेगा कि भारत में विज्ञान का स्तर कितना उन्नत था।
    विज्ञान और तकनीकी मात्र पश्चिम की देन है या भारत में भी इसकी कोई परंपरा थी? भारत में किन-किन क्षेत्रों में वैज्ञानिक विकास हुआ था? विज्ञान और तकनीकी के अंतिम उद्देश्य को लेकर क्या भारत में कोई विज्ञानदृष्टि थी? और यदि थी तो आज की विज्ञानदृष्टि से उसकी विशेषता क्या थी? आज विश्व के सामने विज्ञान एवं तकनीक के विकास के साथ जो समस्याएं खड़ी हैं उनका समाधान क्या भारतीय विज्ञान दृष्टि में है? ऊपर के पैरे को पढ़कर निश्चिततौर पर हर किसी के मन में यही सवाल हिलोरे मारेंगे तो इन सवालों के जवाब के लिए 'भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा' पुस्तक पढऩी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक सुरेश सोनी की इस पुस्तक में तमाम सवालों के जवाब निहित हैं। पुस्तक में कुल इक्कीस अध्याय हैं। धातु विज्ञान, विमान विद्या, गणित, काल गणना, खगोल विज्ञान, रसायन शास्त्र, वनस्पति शास्त्र, प्राणि शास्त्र, कृषि विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, ध्वनि और वाणी विज्ञान, लिपि विज्ञान सहित विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भारत का क्या योगदान रहा इसकी विस्तृत चर्चा, प्रमाण सहित पुस्तक में की गई है। यही नहीं यह भी स्पष्ट किया गया है कि विज्ञान को लेकर पश्चिम और भारतीय धारणा में कितना अंतर है। जहां पश्चिम की धारणा उपभोग की है, जिसके नतीजे आगे चलकर विध्वंसक के रूप में सामने आते हैं। वहीं भारतीय धारणा लोक कल्याण की है। सुरेश सोनी मनोगत में लिखते हैं कि आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय की 'हिन्दू केमेस्ट्री', ब्रजेन्द्रनाथ सील की 'दी पॉजेटिव सायन्स ऑफ एन्शीयन्ट हिन्दूज', राव साहब वझे की 'हिन्दी शिल्प मात्र' और धर्मपालजी की 'इण्डियन सायन्स एण्ड टेकनोलॉजी इन दी एटीन्थ सेंचुरी' में भारत में विज्ञान व तकनीकी परंपराओं को प्रमाणों के साथ उद्घाटित किया गया है। वर्तमान में संस्कृत भारती ने संस्कृत में विज्ञान और बॉटनी, फिजिक्स, मेटलर्जी, मशीन्स, केमिस्ट्री आदि विषयों पर कई पुस्तकें निकालकर इस विषय को आगे बढ़ाया। बेंगलूरु के एमपी राव ने विमानशास्त्र व वाराणसी के पीजी डोंगरे ने अंशबोधिनी पर विशेष रूप से प्रयोग किए। डॉ. मुरली मनोहर जोशी के लेखों, व्याख्यानों में प्राचीन भारतीय विज्ञान परंपरा को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया गया है।
    भारत में विज्ञान की क्या दशा और दिशा थी उसको समझने के लिए आज भी वे ग्रंथ मौजूद हैं, जिनकी रचना के लिए वैज्ञानिक ऋषियों ने अपना जीवन खपया। वर्तमान में जरूरत है कि उनका अध्ययन हो, विश्लेषण हो और प्रयोग किए जाएं। हालांकि कई विद्याएं जानने वालों के साथ ही लुप्त हो गईं क्योंकि हमारे यहां मान्यता रही कि अनधिकारी के हाथ में विद्या नहीं जानी चाहिए। विज्ञान के संबंध में अनेक ग्रंथ थे जिनमें से कई आज लुप्त हो गए हैं। हालांकि आज भी लाखों पांडुलिपियां बिखरी पड़ी हैं। भृगु, वशिष्ठ, भारद्वाज, आत्रि, गर्ग, शौनक, शुक्र, नारद, चाक्रायण, धुंडीनाथ, नंदीश, काश्यप, अगस्त्य, परशुराम, द्रोण, दीर्घतमस, कणाद, चरक, धनंवतरी, सुश्रुत पाणिनि और पतंजलि आदि ऐसे नाम हैं जिन्होंने विमान विद्या, नक्षत्र विज्ञान, रसायन विज्ञान, अस्त्र-शस्त्र रचना, जहाज निर्माण और जीवन के सभी क्षेत्रों में काम किया। अगस्त्य ऋषि की संहिता के उपलब्ध कुछ पन्नों को अध्ययन कर नागपुर के संस्कृत के विद्वान डॉ. एससी सहस्त्रबुद्धे को मालूम हुआ कि उन पन्नों पर इलेक्ट्रिक सेल बनाने की विधि थी। महर्षि भरद्वाज रचित विमान शास्त्र में अनेक यंत्रों का वर्णन है। नासा में काम कर रहे वैज्ञानिक ने सन् १९७३ में इस शास्त्र को भारत से मंगाया था। इतना ही नहीं राजा भोज के समरांगण सूत्रधार का ३१वें अध्याय में अनेक यंत्रों का वर्णन है। लकड़ी के वायुयान, यांत्रिक दरबान और सिपाही (रोबोट की तरह)। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में चिकित्सा की उन्नत पद्धितियों का विस्तार से वर्णन है। यहां तक कि सुश्रुत ने तो आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का वर्णन किया है। सृष्टि का रहस्य जानने के लिए आज जो महाप्रयोग चल रहा है उसकी नींव भी भारतीय वैज्ञानिक ने रखी थी। सत्येन्द्रनाथ बोस के फोटोन कणों के व्यवहार पर गणितीय व्याख्या के आधार पर ऐसे कणों को बोसोन नाम दिया गया है।
    भारत में सदैव से विज्ञान की धारा बहती रही है। बीच में कुछ बाह्य आक्रमणों के कारण कुछ गड़बड़ जरूर हुई लेकिन यह धारा अवरुद्ध नहीं हुई। 'भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा' एक ऐसी पुस्तक है जो भारत के युवाओं को जरूर पढऩी चाहिए।

पुस्तक : भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा
मूल्य : ६० रुपए
लेखक : सुरेश सोनी
प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन
१७, दीनदयाल परिसर, ई/२ महावीर नगर,
भोपाल-४६२०१६, दूरभाष - (०७५५) २४६६८६५
   

रविवार, 18 नवंबर 2012

क्या फिर से पढ़ाए जाएंगे नैतिकता के पाठ?

 भ्रष्टाचार, अत्याचार, यौनाचार, अवमानना जैसी बुराइयों की लम्बी सूची है, जो आज देश में चहुं ओर अपने बलवति रूप में दिख रही हैं। इन बुराइयों में लिप्त लोगों को सब दण्ड देना चाह रहे हैं। घोटाले-भ्रष्टाचार रोकने के लिए सिस्टम (जैसे लोकपाल) बनाने की मांग कर रहे हैं। अपराध को कम करने के लिए कानून के हाथ और लम्बे करने पर विमर्श चल रहा है। यह चाहत, मांग और विमर्श अपनी जगह सही है। दुष्टों को दण्ड मिलना ही चाहिए, भ्रष्टाचार रोकने सिस्टम जरूरी है और बेलगाम भाग रहे अपराध पर लगाम कसने के लिए कानून के हाथ मजबूत करना ही चाहिए। लेकिन, इसके बाद भी ये बुराइयां कम होंगी क्या? इस बात को लेकर सबको शंका है।
    ऐसे में विचार आता है कि भारत जैसे सांस्कृतिक राष्ट्र में ये टुच्ची बुराइयां इतनी विकराल कैसे होती जा रही हैं? यही नहीं घोटाले और भ्रष्टाचार व्यक्ति के बड़े होने की पहचान बन गए हैं। हाल ही में यूपीए सरकार के मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट पर विकलांगों का पैसा खाने का आरोप लगा। मामला पूरे ७१ लाख के घोटाले का था। लेकिन, खुर्शीद के बचाव में एक कांग्रेसी नेता कहते हैं कि ७१ लाख का घोटाला कोई घोटाला है। खुर्शीद मंत्री हैं वे महज ७१ लाख का घोटाला करेंगे ये माना ही नहीं जा सकता। हां, अगर ये ७१ लाख की जगह ७१ करोड़ होते तो सोचना भी पड़ता कि खुर्शीद ने गबन किया है। कांग्रेस नेता के बयान से साफ झलकता है कि बड़ा घोटाला यानी बड़ा मंत्री। खैर जाने दीजिए। कमी कहां हो रही है कि समाज की यह स्थिति बनी है। दरअसल, इसका मूल कारण नैतिक मूल्यों का पतन होना है। जब मनुष्य की आत्मा यह पुकारना ही भूल जाए कि तुम जो कर रहे हो वह गलत है तो मनुष्य किसकी सुनेगा। नैतिक मूल्यों की कमी तो आएगी ही शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी कर रखी है कि मनुष्य को मनुष्य नहीं पैसा कमाने वाला रोबोट बनाया जा रहा है। रोबोट तो रोबोट होता है। उसे क्या भले-बुरे का ज्ञान। स्कूल के समय से उसके मन में एक बात बिठाई जाती है कि बड़ा होकर अमीर बनना है, पैसा कमाना है, अरबों-खरबों में खेलना है। बड़ा होकर वह इसी काम में जुट जाता है। जो जिस स्तर पर है उस स्तर का घोटाला कर रहा है।
    आज हालात ये हैं कि व्यक्ति महिलाओं के बदसलूकी करते वक्त भूल जाता है कि उसके घर में भी मां-बहन है। अपने बूढ़े मां-पिता को सताते समय उसे यह ज्ञान नहीं रहता कि आने वाले समय में वह भी बूढ़ा होगा। दूसरों को ठगते समय वह यह नहीं देखता कि बेईमानी की कमाई नरक की ओर ले जाती है। किसी की मेहनत की कमाई चोरी करते वक्त वह सोचता है कि उसे कौन पकड़ेगा, वह भूल जाता है कि आत्मा है, परमात्मा है जो सबको देख रहा है और पकड़ रहा है। यह सब उसे भान नहीं है क्योंकि उसका नैतिक शिक्षण नहीं हुआ। वह नैतिक रूप से पतित है। बेचारा सीखता कहां से? हमारी शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों को विकसित करने की व्यवस्था ही खत्म कर दी गई। परिवार भी एकल हो गए। दादा-दादी से महापुरुषों का चरित्र सुनकर नहीं सोते आजकल का नौनिहाल बल्कि उनका चारित्रिक विकास तो टीवी, कम्प्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट कर रहा है। मैकाले का उदाहरण अकसर सभी देते हैं। उसने ब्रिटेन पत्र लिखकर बताया कि भारत को गुलाम बनाना मुश्किल है क्योंकि यहां की शिक्षा व्यवस्था लोगों के नैतिक पक्ष को मजबूत बनाती है। वे देश और समाज के लिए जीने-मरने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। यदि भारत को गुलाम बनाना है तो सबसे पहले यहां की शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त करनी होगी। बाद में उसने यही किया। भारत में गुरुकुल और ग्राम-नगर की पाठशालाएं खत्म कर मिशनरीज के स्कूल खुलवा दिया। अभी तक हम मैकाले के हिसाब से पढ़ रहे हैं, अपना नैतिक पतन करने के लिए। आजाद होने के बाद सबसे पहला सुधार शिक्षा व्यवस्था में होना चाहिए था लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब जाकर भाजपा या अन्य राष्ट्रवादी पार्टियां/संगठन शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की बात करती हैं तो भगवाकरण कहकर उसका विरोध किया जाता है।
    भारत में गैरसरकारी स्तर पर अतुलनीय योगदान देने वाले महान शिक्षाविद् गिजुभाई बधेका भी इस बात को कई बार कहते थे कि भारत की शिक्षा व्यवस्था का कबाड़ा कर दिया गया है। शिक्षा से नैतिक मूल्य हटाने से बच्चे स्कूल-कॉलेजों से स्वार्थी, स्पर्धालु, आलसी, आराम-तलबी और धर्महीन मनुष्य बनकर निकल रहे हैं। उनका शिक्षा की दशा-दिशा तय करने वालों से आग्रह था कि शिक्षा पद्धति में धार्मिक-नैतिक जीवन को, गुरु-परंपरा और आदर्श शिक्षक को स्थान दें।  लेकिन, इस दिशा में अभी तक कुछ हुआ नहीं। उल्टा जितना था उसे भी निकाल बाहर किया। हां, रामायण के कुपाठ पढ़ाने के जरूर इस बीच प्रयास हुए, भरपूर हुए। खैर, जब बात हाथ से निकलती दिखने लगी है। समाज एकदम विकृत होता दिखने लगा तब जाकर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की आंख खुली है। अब ये कितनी खुलीं हैं और किस ओर खुलीं हैं, ये देखने की बात है। खबर है कि एनसीईआरटी प्राथमिक स्तर पर नैतिक और मूल्य आधारित शिक्षा शुरू करेगा। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने बड़े होते बच्चों को नैतिक शिक्षा के सकारात्मक पक्ष के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए एनसीईआरटी को इसकी संभावना तलाशने को कहा है। मंत्रालय ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के एक प्रतिनिधि मंडल को अगले महीने इस मुद्दे पर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया है। नैतिक शिक्षा का विषय प्राथमिक शिक्षा का एक हिस्सा होगा। इसके अलावा मूल्य आधारित विषय जैसे बड़ों का आदर और उनके प्रति संवेदनशीलता इस विषय और उनके प्रति संवेदनशीलता इस विषय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। अब यहां यह देखना है कि एनसीईआरटी और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय नैतिक मूल्य भारत की संस्कृति की जड़ों में तलाश करेंगे या फिर बाहर से आयातित करेंगे। भारत की आने वाली युवा पीढ़ी को संभालकर रखना है और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाना है तो उसे शिक्षित करने के लिए भारतीय संस्कृति की जड़ों में ही लौटना होगा। पश्चिम में तो वैसे ही नैतिक मूल्यों के नाम पर कुछ है नहीं। वहां के नैतिक मूल्य ही तो मैकाले हमारी शिक्षा में ठूंस गया जिसके दुष्परिणाम हम आज भुगत रहे हैं।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

संकल्प


दीपों के इस महा उत्सव में 
एक दीप कर्म-ज्योति का हम भी जलाएं। 
धरा के गहन तिमिर को हर लें
हम स्वमेव दीपक बन जाएं।।

भारत के नवोत्थान के प्रयत्नों में 
एक अमर प्रयत्न हम भी कर जाएं। 
उत्कृष्ट भारत के निर्माण में काम आए
हम नींव के पत्थर बन जाएं।। 

नवयुग के इन निर्माणों में
एक निर्माण हम भी कर जाएं।
संस्कृति का तेजस झलकाएं
हम वो आत्मदीप बन जाएं।।

पशुता/अनाचार के जग में
एक बने सब और नेक भी हम बन जाएं। 
छू न सके भावी पीढ़ी को पाप छद्म ये
हम वो अकाट्य पर्वत बन जाएं।।

- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

मेरा भारत



मेरा भारत है साक्षात कृष्ण स्वरूप।
देखो उसके आभा-मंडल से झलकता है अलौकिक तेज।
छेड़कर मुरली की मधुर तान
चर-अचर समूचे जग को आनंदित करता है।
शांति, पंचशील की संरचना हेतु
पल प्रतिपल सौम्य वातावरण निर्मित करता है।
अखिल ब्रह्मांड का पोषण करने
डाल अंगोछा कांधे, चरवाहा बनता है मेरा मोहन।।

मेरा भारत है साक्षात राजा राम स्वरूप।
देखो उसके ललाट पर दमकता है अनोखा ओज।
पुरुखों की रीति-परम्परा
जग कल्याण हित अग्रेषित वह करता है।
सत्य, सत की रक्षा हेतु
वन में रहकर विध्वंसक का वध करता है।
स्वर्णमयी लंका तज करके
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी कहता है मेरा पुरुषोत्तम।।
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- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)


शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

कुंआरा करवाचौथ

 का र्तिक मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी का दिन था। यानी करवाचौथ के एक दिन बाद। सुबह के करीब ११ बज रहे होंगे। सूरज आसमान के बीचों-बीच जगह बनाने को चल रहा था। धूप हो रही थी लेकिन जाड़े ने उसकी उष्णता कम कर दी थी। दोपहर की धूप भी गुनगुनी, अच्छी लग रही थी। छत पर सब बैठे थे। मैं अभी-अभी नहा-धोकर निपटा था। ठंड में देर से ही नहाने की हिम्मत हो पाती है। फिर ग्वालियर की ठंड के क्या कहने। हालांकि अभी ठंड अपने सबाब पर नहीं आई थी। भोजन की तैयारी थी। तभी दरवाजे से आवाज आई।
    कहां है भाई? इधर आ।
    अंदर ही आ जा। मैं खाना खाने बैठ गया हूं।
आवाज मैं पहचान गया था। सत्यवीर आया था बाहर। यहीं एक गली छोड़कर ही तो रहता है। मैन रोड पर उसका मकान है। मेरा सबसे खास दोस्त है। दिन-रात के २४ घंटे में से कम से कम १० घंटे हम साथ रहते हैं। वैसे तो वह मेरे घर कम ही आता है। मैं ही उसके घर पहुंच जाता हूं। थोड़ी देर पहले उसी के यहां से तो आया था।
    अरे यार, तू बाहर निकल आ।
    अब ऐसी भी क्या बात है। अंदर आकर ही बता देता।
    क्या बता देता? बैंड बजी पड़ी है। तू तो यहां आराम से रोटी खा रहा है कोई दो दिन से प्यासा है।
    क्यों, क्या हो गया? कौन प्यासा है? साफ-साफ बता।
    अरे यार, उसकी अम्मा की... पूर्वी ने करवाचौथ का व्रत धर लिया है। कल से पानी तक नहीं पिया है, पिया के चक्कर में। सत्यवीर ने झुंझलाते हुए कहा। मेरे कंधे पर हाथ रखा और फिर मुझे सड़क की ओर लेकर चल दिया।
    साली कुतिया की तरह घूम रही है। मेरा तो दिमाग खराब हो गया है। एक तो मां को पहले ही सब पता चल गया है कि मेरा उसके साथ लफड़ा चल रहा है। तुझे तो पता ही है चार दिन पहले ही मां उसके घर जाकर उसकी मां को ठांस आई- तुम्हारी लड़की हवा में उडऩे लगी है। संभालो। मेरे घर आई या मेरे लड़के से मिली तो टांगे तोड़ दूंगी। ये साली हरामखोर ने करवाचौथ का व्रत धर लिया। अब व्रत खुलवाने के लिए दिमाग खा रही है। संदेश पर संदेश भेज रही है। मैं क्या करूं? कुछ समझ में नहीं आ रहा।
    तू बहुत बड़ा वाला है यार। तेरे से मैंने पहले ही कही थी- मत पड़ उस लड़की के चक्कर में। तुझे उससे प्यार-व्यार तो था नहीं। मजे के चक्कर में फंस गईं न लेंडी। अब भुगतो, और क्या।
    अबे तू दोस्त है या दुश्मन। मैं मुसीबत में हूं तू मजे ले रहा है। उसे समझा न कि ये त्योहार कुंआरी लौंडियों के लिए नहीं होता। ब्याह के बाद रहे अपने पति के लिए रखे मजे से। मेरे गले क्यों पड़ रही है?
    उसने तो तुझे मन ही मन पति मान लिया न। अब क्या किया जा सकता है। मैंने हंसते हुए कहा।
    वह शांत रहा क्योंकि घर आ गया था। हम छत पर पहुंचे। दो मंजिल मकान है। कुल जमा ३० जीने चढऩे होते हैं छत पर पहुंचने के लिए। यहां ही हम सब मुद्दों पर चर्चा करते हैं। पूर्वी को पहली चिट्ठी भी सत्यवीर ने मुझसे यहीं बैठकर लिखवायी थी।
    अबे यार, मजाक का टाइम नहीं है। हमको तो समझ में नहीं आता कि ये कौन-सा चलन चल निकला है, कुंआरी लड़कियां करवाचौथ का व्रत रख लेती हैं।
    हम बताते हैं क्या चलन है। वैलेन्टाइन का नाम सुना है।
    अब हमको ये भी नहीं पता होगा क्या?
    मालूम है तुम्हें नहीं पता होगा तो क्या मुझ जैसे ब्रह्मचारी को पता होगा। दो-दो तीन-तीन गोपियों से उपहार जो वसूलते हो उस दिन। देने के नाम पर सबको चूतिया बना देते हो। हां तो सुनो भाई साधौ। देशी वैलेन्टाइन हो गया है करवाचौथ। जितनी भी लड़कियां प्रेम में आकंठ डूबी हैं। जिनका प्रेम सरेबाजार बाइक पर बैठते समय कुछ अपने प्रेमी पर टपकता है कुछ रास्ते पर, ऐसी सभी कथित कुंआरी लड़कियां करवाचौथ का व्रत रखने लगी हैं। और सुन बेटा लौंडे भी कम नहीं, वे भी करवाचौथ कर रहे हैं।
    पगला गए है भौसड़ी के सब। उसकी झुंझलाहट और बढ़ गई थी। छत से पूर्वी का घर साफ-साफ दिखता है। सत्यवीर और पूर्वी के नैना यहीं से चार होते रहे हैं। अभी भी पूर्वी इधर-उधर चहल-कदमी कर रही थी। वह इशारे से सत्यवीर को कहीं बुलाना चाह रही थी। यह देखकर सत्यवीर का दिमाग गर्म हो रहा था। वह रसिक जरूर था लेकिन ये सब चोचलेबाजी उसे कतई पसंद नहीं थी। पूर्वी को वैसे भी वह छोडऩे की फिराक में था। एक तो मां ने सारा मामला पकड़ लिया था। दूसरा सत्यवीर को भी समझ आ गया था कि यह चिपकने वाली लड़की है।
    पगलाए नहीं हैं बच्चू। प्रेम में हैं। प्रेम जो न कराए वो कम है। तू सुन, प्रेमी युगल करवाचौथ का व्रत खोलने के क्या-क्या उपाय करते हैं। तेरा मामला तो लेट हो गया। बेचारी पूरे दो दिन से बिना अन्न-पानी के है। कुछ रहम कर अपनी महबूबा पर। तो लड़के पाइप से चढ़कर अपनी कुंआरी पत्नी को चांद से चेहरे का दीदार कराने और उसे अपने हाथ से पानी पिलाने पहुंच जाते हैं। लड़कियां सबके सोने के बाद चुपके से छत पर आ जाती हैं। या फिर कहीं बाहर मिल लेते हैं।
    तू एक काम कर खाना खाकर आ। फिर अपन दो दिन के लिए गांव चलते हैं। कॉलेज में भी खास पढ़ाई नहीं चल रही है। मुझे समस्या से बाहर निकालने के लिए तेरा दिमाग भी नहीं चल रहा है।
    गांव जाने से समस्या का हल नहीं निकलेगा मेरे भाई।
    अब तू जा जल्दी खाना खाकर आ। तेरा दिमाग नहीं चलेगा। मेरी खाज है मुझे ही खुजानी पड़ेगी।
    खाना खाने के बाद मैंने घर पर बताया कि दो दिन के लिए गांव होकर आता हूं। बहुत दिन हो गए हैं, गांव गए हुए। एक जोड़ी कपड़े पॉलीबैग में डाले और चला आया फिर से सत्यवीर के घर। वो तैयार बैठा था। बस पकडऩे के लिए हम घर से बचते-बचाते निकले, कहीं पूर्वी न देख ले। बस स्टॉप पर खड़े हुए पांच मिनट ही हो पाईं थीं कि पूर्वी आ गई। वो मैडम तो घाघ की तरह शिकार पर नजरें जमाए बैठी थी। उसे देखकर सत्यवीर के माथे की लकीरें बढ़ गईं। कोई देख ले और घर जाकर कह दे तो मां के हाथ दोनों के बारह बजने तय थे। सत्यवीर और पूर्वी के बारह मेरे नहीं। मेरे तो तेरह बजते।
    भैया इन्हें समझाओ न। मैंने इनके लिए व्रत रखा है और ये हैं कि मुझे पानी तक नहीं पिला रहे हैं। मैं दुकान तक जाने की कहकर आई हूं जल्दी वापस जाना होगा। आप प्लीज इन्हें समझाइए। पूर्वी ने उदास चेहरे के साथ मुझसे गुहार लगा रही थी।
    वैसे तुम्हें ये व्रत रखने की सलाह किसने दी? ये व्रत कुंआरी लड़कियों के लिए होता ही नहींं हैं। जाओ खुद ही पानी पी लेना, कोई दिक्कत नहीं होगी। मैंने अपनी लंगोटिया यारी निभाने की कोशिश की। हालांकि मुझे पता थी कि लड़की प्रेम में पगलाई हुई है। आसानी से मानेगी नहीं। वह नहीं मानी और सत्यवीर के पास पहुंच गई। खूब विनय किया पूर्वी ने लेकिन सत्यवीर नहीं माना। तब एक बार फिर वो मेरे पास आई।
    बस आप मेरा व्रत खुलवा दीजिए। आपका एहसान रहेगा मुझ पर।
    यहां तो पानी ही नहीं है। कैसे खुलेगा तुम्हार व्रत?
    इतना सुनते ही उसने इधर-उधर देखा। टिक्की (पानी पूरी) वाले के ठेले को देखकर उसका चेहरा खिल गया। वो पट्ठी दौड़ते हुए वहां गई। टिक्की वाले से एक दोना (पत्ते की कटोरी) लिया और उसमें जलजीरा का पानी भरकर ले आई।
    अब बुला लो अपने दोस्त को। जरा अपने हाथ से पिला दे फिर भाग जाए, जहां जाना हो।
    ठीक है। लेकिन, तुम्हारे लिए एक सलाह है। ये लड़का तुम्हें प्यार नहीं करता। इसलिए इसका ख्याल अपने दिल से निकाल देना। भविष्य में इस तरह की नाटक-नौटंकी मत करना। हमारी बात बुरी लग रही होगी लेकिन यही सत्य है।
    सत्यवीर के हाथ से टिक्की का पानी पीकर वह अपने घर चली गई। सत्यवीर ने भी राहत की सांस थी। उसने कहा - अब क्या करेंगे गांव जाकर।
    अब गांव तो चलना ही पड़ेगा। हम मन बना चुके हैं। दो दिन गांव में रहकर आएंगे। चलो बस आ गई।
    दोनों बस में सवार हो गए। ईश्वर की कृपा से सीट भी मिल गई। सत्यवीर किसी सोच में डूब गया। हम मंद-मंद मुसकरा रहे थे। पूरे एपिसोड को सोच-सोच कर मैं मन ही मन व्यथित भी था तो हंस भी रहा था। व्यथित इसलिए था कि आज के युवा किस रास्ते पर हैं। जिन्हें न तो प्रेम का पता है न परंपराओं का।