कालेधन के विरुद्ध लड़ाई में नोटबंदी के निर्णय पर प्रतिपक्ष के नेता एक से बढ़कर एक कुतर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके कुतर्क यह भी साबित कर रहे हैं कि वह जमीन से जुड़े नेता नहीं हैं। उन्हें भारतीय जन के मानस की बिल्कुल भी समझ नहीं है। विपक्षी नेताओं के बयानों को सुनकर यह समझना मुश्किल हो रहा है कि वह आम जनता के शुभचिंतक हैं या फिल कालेधन वालों के? उनकी बौखलाहट देखकर संदेह यह भी है कि उनके पास भी कालेधन का भंडार है। वरना क्या कारण है कि नोटबंदी की वापसी के लिए चेतावनी जारी की जा रही हैं? साफ नजर आ रहा है कि विपक्षी नेता आम जनता की परेशानी की आड़ में अपने कालेधन की चिंता कर रहे हैं? तथाकथित पढ़े-लिखे नेता चौराहों की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। कुतर्क देखिए कि पाँच सौ और दो हजार रुपये का नया नोट चूरन की पुडिय़ा में निकलने वाले नकली नोट जैसा है। आश्चर्य है इनकी समझ पर।
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रविवार, 20 नवंबर 2016
बुधवार, 16 नवंबर 2016
जनता प्रसन्न, विपक्ष परेशान क्यों?
केन्द्र सरकार के नोटबंदी के निर्णय को आम आदमी सकारात्मक ढंग से ले रहा है। लेकिन, विपक्षी दलों के नेताओं की तकलीफ समझ पाना मुश्किल हो रहा है। वह कह रहे हैं कि लोग परेशान हो रहे हैं, लोगों को बैंक और एटीएम में कतार में लगना पड़ रहा है। छोटे नोट की कमी के कारण जनता हलाकान हो रही है। यह सच है कि जनता परेशान हो रही है। लेकिन, उसकी परेशानी देश से बड़ी नहीं है। यह बात आम आदमी जानता है। इसलिए कतार में खड़ा देशभक्त आदमी कह रहा है कि वह राष्ट्रहित के लिए थोड़ी-बहुत परेशानी उठाने के लिए तैयार है। सरकार के निर्णय का समर्थन करने के लिए अनेक स्वयंसेवी कार्यकर्ता भी जरूरतमंदों की मदद के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। यह लोग बैंक से पैसा निकालने में लोगों की मदद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपानीत सरकार का विरोध करने को अपना धर्म समझने वाले आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, बसपा प्रमुख मायावती और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी सामान्य व्यक्ति की भावना को समझने में भूल कर रहे हैं। इसे समझने के लिए इन दलों और नेताओं को 'इनशॉर्ट' की ओर से कराए गए सर्वेक्षण का अध्ययन करना चाहिए।
बेईमानों के लिए मुश्किल भरे रहेंगे ५० दिन
पाँच सौ और हजार रुपये के नोट बंद करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर अपने भाषण से भ्रष्टाचारी और बेईमान लोगों की नींद उड़ा दी है। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने का भरोसा दिलाते हुए जनता से कुछ वक्त और मांगा है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि 'मुझे सिर्फ 50 दिन दीजिए। यदि उसके बाद मैं सफल नहीं हो सका तो जो सजा आप देंगे वह मुझे मंजूर होगी।' प्रधानमंत्री ने अपने इस भाषण में बेनामी संपत्ति के खिलाफ भी बड़ी कार्रवाई के संकेत देकर भ्रष्टाचारियों को तनाव दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वह ३० दिसंबर के बाद भी चुप नहीं बैठेंगे। यह बात कहने में कोई गुरेज नहीं कि बाजार से लेकर सत्ता में घुसपैठ करके बैठे भ्रष्टाचारियों की नींद छीनने के लिए वाकई बड़े जिगर की जरूरत थी।
शनिवार, 20 अगस्त 2016
बोफोर्स का सच इसलिए है दफ़न
बोफोर्स घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। देश के वरिष्ठ राजनेता और समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने बोफोर्स घोटाले के मामले में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके बयान को आपराधिक स्वीकारोक्ति कहना अधिक उचित होगा। बुधवार को लखनऊ के राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने कहा कि 'जब मैंने बोफोर्स तोप को देखा तो पाया कि वह ठीक से काम कर रही है। उस वक्त मेरे मन में पहला विचार यह आया कि राजीव गांधी ने बढिय़ा काम किया है, इसलिए मैंने उससे जुड़ी फाइलों को गायब कर दिया। लोगों का ऐसा मानना है कि बोफोर्स सौदा राजीव गांधी की गलती थी, लेकिन रक्षा मंत्री के तौर पर मैंने देखा कि यह सही सौदा था और राजीव ने अच्छा काम किया।' मुलायम सिंह यादव की इस स्वीकारोक्ति ने देश को बता दिया है कि देश में किस तरह बड़े घोटालों का सच छिपाया जाता है। जाँच को कैसे भटकाया जाता है। सबूत किस तरह नष्ट किए जाते हैं। हमारे जिम्मेदार राजनेता ही जब फाइलें गायब करा देते हैं, तब जाँच में क्या खाक साबित होगा? उल्लेखनीय है कि मुलायम सिंह यादव वर्ष 1996 से 98 के दौरान जब रक्षा मंत्री थे, तब राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में स्वीडन की एबी बोफोर्स कंपनी से 400 हॉविट्जर तोपों की खरीद में कथित घोटाले का मुकदमा अदालत में चल रहा था। केंद्रीय जाँच ब्यूरो वर्ष 1990 से ही इस मामले की जाँच कर रहा था, लेकिन ब्यूरो कोई ठोस सबूत नहीं जुटा सका। भला सबूत मिलते भी कैसे, स्वयं रक्षामंत्री ने फाइलें गायब करा दी थीं।
गुरुवार, 16 जून 2016
कहाँ गई 'आप'की नैतिकता?
दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल अपने 21 विधायकों को लाभ का पद दिलाने के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं। साफगोई से अपनी गलती स्वीकारने की जगह मुख्यमंत्री केजरीवाल हमेशा की तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमलावर हो गए। यही नहीं, इस बार तो उन्होंने हद ही कर दी है, अपने राजनीतिक भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए उन्होंने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को भी निशाना बना लिया। संभवत: मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल स्वयं को सभी संवैधानिक संस्थाओं और नियम-कायदों से ऊपर मानते हैं। अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन की उपज हैं। सबसे पहले तो उन्होंने राजनीति में नहीं आने की कसम खाई थी। लेकिन, बाद में वह अपनी बात से पलट गए और राजनीति के नये पैमाने तय करने के लिए आम आदमी पार्टी बनाकर मैदान में आ गए। अब तक के उनके राजनीतिक करियर को देखकर सामान्य आदमी भी बता सकता है कि केजरीवाल ने राजनीति में शुचिता की कोई नई लकीर नहीं खींची है। बल्कि, उन्होंने एक अजीब किस्म की राजनीति को जन्म दिया है। अपने अपराध पर पर्दा डालने के लिए वह खुद को पीडि़त बताते हुए दूसरों पर हमलावर हो जाते हैं। उनके नेताओं-मंत्रियों पर आपराधिक और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन उन्होंने ठोस संदेश देने वाली कोई कार्रवाई नहीं की। केजरीवाल के भरोसेमंद और दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री गोपाल राय पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा है। हालांकि उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन इस्तीफे का कारण बनाया है बीमारी को।
गुरुवार, 17 दिसंबर 2015
भ्रष्टाचार का आरोपी कैसे बन गया केजरीवाल का प्रधान सचिव
दे श की जनता को हैरानी है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सहारे राजनीति में आने वाले अरविन्द केजरीवाल और उनका दल भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी को पाक-साफ साबित करने का प्रयास क्यों कर रहा है? आआपा और केजरीवाल प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के साथ खड़े क्यों दिखाई दे रहे हैं? मान लीलिए कि राजेन्द्र कुमार पर लगे आरोप सही साबित हो जाएं, तब अरविन्द केजरीवाल अपने वर्तमान व्यवहार के लिए क्या जवाब देंगे? किससे माफी मांगेंगे? उस समय किस आधार पर यू-टर्न लेंगे? जनता ने अरविन्द केजरीवाल को शासन-प्रशासन में से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए चुना था, भ्रष्ट अधिकारियों का संरक्षण करने के लिए नहीं। इसलिए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे प्रधान सचिव राजेन्द्र कुुमार के साथ खड़े होने से पहले अरविन्द केजरीवाल को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए था।
शुक्रवार, 10 मई 2013
कांग्रेस ने चलायी भारत में भ्रष्टाचार की रेल
कां ग्रेसनीत यूपीए सरकार का कार्यकाल देखकर यह तो नहीं लगता कि इस सरकार के पास देश चलाने की जिम्मेदारी थी। जिस तरह बीते पांच साल में घोटालों की बाढ़ आई है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यूपीए की सरकार हजारों हाथ से देश को लूट रही है। मंत्री से सरकारी पद तक सब
नीलाम हो रहे हैं, बस खरीददार की जेब में दाम हो। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले ने बताया कि सरकार में मनचाहा मंत्रालय किस तरह बिकता है और अब रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंगला ने संवैधानिक पद की भी दलाली खाकर बता दिया कि कांग्रेस के राज में सब बिकाऊ है। मामा-भांजे की जोड़ी ने महेश कुमार को वेस्टर्न रेलवे जीएम से रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाने के लिए १० करोड़ की रिश्वत ली। सीबीआई ने भांजे को रंगेहाथ पकड़ा। बेशर्मी की हद है कि प्रधानमंत्री सहित पूरी कांग्रेस रेलमंत्री पवन बंसल के बचाव में आ खड़ी हुई। इसके लिए बेजोड़ तर्क दिया गया कि मंत्री जी का इसमें क्या दोष है, यह तो उनके रिश्तेदार की करतूत है। एक साधारण-सा आदमी भी इतना सहज ज्ञान रखता है कि पवन बंसल की शह के बिना भांजा विजय सिंगला इतना बड़ा कारनामा नहीं कर सकता था। अलबत्ता सीबीआई की रिपोर्ट भी पवन बंसल को इस रिश्वत काण्ड में लिप्त मानती है। कांग्रेस की बेशर्मी पर यहीं लगाम नहीं लगता, विपक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस्तीफा मांगने पर कांग्रेस के प्रवक्ता कहते हैं कि भाजपा को तो इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई है। यूं तो विपक्ष अपने धर्म का निर्वहन कर रहा था। फिर भी मान लिया कि भाजपा को इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई। लेकिन, क्या कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता बता सकते हैं कि आए दिन प्रधानमंत्री और मंत्रियों के इस्तीफे मांगने का मौका भाजपा को कौन दे रहा है? क्या यह सच नहीं कि हर माह औसत एक बड़ा भ्रष्टाचार इन पांच सालों में सामने आया है। हालात ये हैं कि प्रधानमंत्री को भी ऐसी सरकार से शर्मिंदा होकर खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए। भांजे के रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद भी पवन बंसल मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। एक जमाना था जब रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री हुआ करते थे, उन्होंने एक रेल दुर्घटना पर ही इस्तीफा दे दिया था। क्योंकि उन्हें अपनी नैतिक जिम्मेदारी का भान था। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के किसी भी मंत्री यहां तक कि सौम्यता और ईमानदारी का लबादा ओढ़े प्रधानमंत्री से भी इस स्तर की नैतिकता, शुचिता की राजनीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जिस सरकार का ध्येय ही भ्रष्टाचार हो गया हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। कांग्रेस का हाथ भी अब गरीब के साथ नहीं बल्कि गरीब के गिरेबां पर है और भ्रष्टाचारियों के साथ है। जरा अतीत पर नजर डाली जाए तो स्पष्ट होता है कि आज भ्रष्टाचार की जो विशाल इमारत खड़ी दिख रही है, उसकी नींव कांग्रेस ने अपने पहले ही शासन काल में रख दी थी।
भारत में भ्रष्टाचार की पौध आजादी की तुरंत बाद ही कांग्रेस ने रोप दी थी। अनेक वीर स्वतंत्रता सेनानियों के प्राणों की आहुति देकर सन् १९४७ में भारत ने अंग्रेजों के चंगुल से शासन व्यवस्था छीनी। लेकिन, तत्कालीन कर्णधारों ने सुराज देने की जगह कुराज के बीज बो दिए। आजादी के बाद कांग्रेस के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार का बीज अंकुरित हुआ बल्कि शनै-शनै बढ़ता भी गया। अलग-अलग समय सत्ता में रही कांग्रेस ने उस भ्रष्टाचार के पौधे को खूब खाद-पानी दिया, उसका खयाल रखा। आज वही पौधा विशाल वट वृक्ष बन गया है। उसके इस प्रिय पौधे पर जब भी कोई अंगुली उठाता है कांग्रेस उसकी खूब खिंचाई करती है। बाबा रामदेव ने वर्षों से विदेश में जमा होते आ रहे कालेधन की मांग की तो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार उन पर डण्डा लेकर पिल पड़ी। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करके रात में सो रही महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों पर आंसूगैस के गोले छोड़े गए। अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार का गला घोंटा गया। बाद में इस बर्बर घटना में घायल एक महिला ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था। जो कुछ समय पहले तक बाबा रामदेव के आश्रम में जाकर उनका आशीर्वाद लेते थे वे बाबा को ठग कहते नहीं थक रहे। वहीं कांग्रेस ने बाबा रामदेव के तमाम ट्रस्टों पर जांच बैठा दी।
अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मजबूत लोकपाल की आवाज बुलंद की तो कांग्रेस ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस के नेता अन्ना हजारे के साथ बदतमीज पर उतर आए। उनका चरित्रहनन करने के लिए अमर्यादित भाषा का जमकर इस्तेमाल किया गया। जिस आदमी के पास अपना खुद का घर नहीं उसे बेईमान ठहराने में पीछे नहीं रहे कांग्रेसी। अन्ना के दामन पर कीचड़ उछालते समय कांग्रेस भूल गई कि उसी ने अन्ना की ईमानदार और समाजसेवी छवि के लिए उन्हें पदम् विभूषण पद से सम्मानित किया था। किरण बेदी जैसी ईमानदार महिला को भी कांग्रेस ने निशाना बनाना शुरू कर दिया। दरअसल, कांग्रेस भ्रष्टाचार को रोकना ही नहीं चाहती। वह ऐसा चाहेगी भी क्यों? उसने तो आजादी के बाद ६४ वर्षों में भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर दिया है, संरक्षण दिया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) की १८३ देशों की सूची में भारत भ्रष्टाचार के मामले में ९५वें नंबर पर है। अगर कोई पानीदार सरकार होती तो भ्रष्टाचार के मामले में देश की यह रैंकिंग देखकर चुल्लूभर पानी में डूब मरती। स्विटजरलैण्ड बैंकिंग एसोसिएशन की रिपोर्ट भी कहती है कि स्विस बैंकों में जमा धन के मामले में भारत सबसे आगे है। यानी विदेशों भारत का कालाधन सबसे अधिक है। कालाधन भ्रष्टाचार से ही बनाया है। आजादी के बाद से लेकर अब तक भारत में करीब ९१ सौ खरब के घोटाले प्रकाश में आ चुके हैं और अभी भी नए-नए घोटालों का जन्म तेजी से होता जा रहा है।
आजाद भारत का पहला ज्ञात घोटाला सन् १९४७ में हुआ था। सन् १९४८-४९ में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में जीप घोटाले को उनके चहेते वीके कृष्णा मेनन ने अंजाम दिया। वीके कृष्णा मेनन उस समय लंदन में भारत के हाई कमिश्नर थे। १९४८ में ही पाकिस्तान ने हमला कर दिया था। भारतीय सेना को जीपों की जरूरत आन पड़ी। जीप खरीदने की जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू ने मेनन को सौंपी। मेनन ने विवादास्पद कंपनी से जरूरी औपचारिकताएं पूरी किए बिना २००० जीप खरीदने का सौदा कर लिया। इसके लिए उन्होंने कंपनी को एक लाख ७२ हजार पाउंड की राशि (८० लाख रुपए, उस समय) का भुुगतान भी कर दिया। ब्रिटेन से १५५ जीप की एक ही खेप पहुंची सकी थी। कृष्णा मेनन की करतूत से पर्दा उठ गया। १५५ जीप में से एक भी चलने की स्थिति में नहीं थी। उस समय नाममात्र के विपक्ष की मांग पर दिखाने के लिए एक जांच कमेटी बनाई गई। लेकिन, दोषी मेनन पर कार्रवाई तो दूर बल्कि उनका प्रमोशन कर दिया गया। १९५६ में वीके कृष्णा मेनन कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। यहीं से भ्रष्टाचार को बल मिला। अगर कांग्रेस वाकई देश को सुशासन देना चाहती थी तो उसी समय जीप घोटाले के दोषी वीके कृष्णा मेनन पर कड़ी कार्रवाई कर देती तो शायद आज भारत में भ्रष्टाचार की यह स्थिति नहीं होती। कांग्रेस और उसके वरिष्ठ नेता इसी एक घोटाले पर नहीं रुके। कांग्रेस के नेताओं में होड़-सी लग गई घोटाले करने की। जीप घोटाले को दो साल भी नहीं बीत पाए थे कि साइकिल घोटाला १९५१ में सामने आ गया। यह भ्रष्टाचार की यह काली सूची दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती गई। अब तो घोटालों में रकम का आंकड़ा करोड़ो-अरबों में पहुंच गया है। लाख रुपए के घोटाले को घोटाला ही नहीं माना जाता। सलमान खुर्शीद पर जब विकलांगों के उपयोग की सामग्री वितरण में कुछ लाख के घोटाले का आरोप लगा था तो कांग्रेस के प्रवक्ता यह कहते हुए पाए गए कि इस कदर मंत्री की औकात कम मत करो, भला मंत्री भी लाख का घोटाला करेगा क्या? यह राशि करोड़ में होती तो ही विश्वास किया जा सकता था। कांग्रेस को अपनी बची-खुची छवि बचानी है तो तत्काल भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे मंत्रियों को बर्खास्त कर देना चाहिए। वरना, यूं ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बातों का क्या है, बातें तो सब करते हैं।
शनिवार, 1 दिसंबर 2012
इमेज सेट करने का खालिस षड्यंत्र
के न्द्र सरकार यानी यूपीए-२
भ्रष्टाचार के मामलों में अपनी साख बुरी तरह खो चुकी है। पहले सुप्रीम
कोर्ट की टिप्पणियों ने सरकार की जमकर किरकिरी कराई। बाद में, महालेखा
परीक्षक एवं नियंत्रक (कैग) ने सारी ठसक छीन ली। यह अलग बात है कि सरकार और
उसके नुमाइंदों ने बेशर्मी की मोटी चादर ओढ़ रखी है। बेहयाई की हद देखिए,
जिसने भी सरकार के कामकाज के तरीके पर अंगुली उठाई, सरकार चून बांधकर (फोकस
करके) उसके पीछे पड़ गई। चाहे वह बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे या फिर
अरविंद केजरीवाल। सरकार के नुमाइंदों ने सब को चोर, ठग और सिरफिरा करार दे
दिया। यूपीए-२ अब सीएजी को बदनाम करने के लिए प्रोपेगंडा रच रही है। भारतीय
राजनीति के इतिहास में आपातकाल के काले पृष्ठ को छोड़ दिया जाए तो
संवैधानिक संस्था को इस तरह कभी निशाना नहीं बनाया गया है। सीएजी को घेरना,
उसकी विश्वसनीयता, निष्पक्षता और ईमानदारी पर सवाल खड़े करना बेहद हल्की
राजनीति का उदाहरण भर है।
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस ने सीएजी के पूर्व अधिकारी आरपी सिंह के दावे को हथियार बनाकर भारतीय जनता पार्टी और सीएजी विनोद राय पर हमला बोल दिया है। आरपी सिंह ने दावा किया है कि सीएजी ने टूजी घोटाले में १.७६ लाख करोड़ के घाटे का जो आंकड़ा पेश किया है वह सही नहीं है। असल घाटा तो २६४५ करोड़ रुपए था। आरपी सिंह ने यह आरोप भी लगाया है कि रिपोर्ट पर जबरन दस्तखत कराए गए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि घाटे का आंकड़ा बड़ा दिखाने के लिए लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने सीएजी पर दबाव डाला था। इन आरोपों को मुद्दा बनाकर यूपीए की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी से लेकर हाल ही में प्रमोशन पाए सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी, कानून मंत्री अश्विनी कुमार और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भाजपा और संवैधानिक संस्था सीएजी पर सीधा हमला बोला है। इस मसले पर जरा गौर करें तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि यूपीए-२ किसी भी हद तक जाकर अपनी इमेज सेट करने की कोशिश कर सकती है। एक ऐसे व्यक्ति की बातों को आधार बनाकर संवैधानिक संस्था पर आरोप लगाए जा रहे हैं, जिसने टूजी पर हुए भारी बवंडर के बीच तो चुप्पी साधे रखी। भ्रष्टाचार के आरोप में कई मंत्री-संत्री जेल की सैर कर आए लेकिन आरपी सिंह कुछ बोले नहीं। इतना ही नहीं इन महाशय ने लोक लेखा समिति और टूजी घोटाले की जांच कर रही जेपीसी के समझ भी यह सच्चाई नहीं उगली थी। सेवानिवृत्त होने के १४ महीने बाद मुंह खोला है। आरपी सिंह के रवैए को देखकर भाजपा के इस आरोप में दम दिखती है कि आरपी सिंह कांग्रेस के हाथ खेल रहे हैं। कांग्रेस सीएजी को झूठा साबित करके अपना दामन उजला दिखने की कोशिश में हैं। जबकि कांग्रेस का दामन कोयले में भी खूब काला हो चुका है। यूपीए-२ के मंत्री कपिल सिब्बल ने तो शुरुआत में ही 'जीरो लॉस' की थ्योरी पेश की थी, जिससे सरकार की जमकर थू-थू हुई। बाद में, सरकार ने टूजी मामले की जांच कराई और अपने ही मंत्रियों को इस मामले में जेल की हवा खिलवाई। यह सवाल उठता है कि यदि आरपी सिंह के दावे सही हैं तो क्या सरकारी एजेंसियों की जांच गलत है? क्या सुप्रीम कोर्ट गलत है? चलो एक बार को मान भी लें कि आरपी सिंह का यह दावा सच है कि घाटे का आंकडा १.७६ लाख करोड़ बहुत अधिक ज्यादा है लेकिन फिर भी सरकार ने खेल तो खेला ही न। घोटाला छोटा ही सही, हुआ तो। फिर सरकार अपने को पाक-साफ दिखने की जद्दोजहद क्यों कर रही है? क्यों नहीं अपनी गलती मानकर देशवासियों से माफी मांग लेती? क्यों नहीं भ्रष्टाचार के दोषियों को सजा देती? लेकिन नहीं, कांग्रेसनीत सरकार गलती स्वीकार करने की जगह आरपी सिंह को ढाल बनाकर सीएजी पर अंगार उगल रही है।
कांग्रेस सीएजी को झूठा और नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती है। हालांकि हर बार उसे ही मुंह की खानी पड़ती है। इस मामले में भी आरपी सिंह ने जैसे ही खुद को घिरता देखा तो पलटी खा गए, साथ में कांग्रेस और यूपीए-२ को भी औंधा (उल्टा) करा दिया। दो दिन ही बीते कि आरपी सिंह ने कह दिया कि १.७६ लाख करोड़ के घाटे का आंकड़ा जारी कराने में भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कोई दबाव नहीं डाला। पूर्व में मीडिया ने उनके बयान को गलत अर्थ में पेश किया। आरपी सिंह के पलटी खाते ही भाजपा सोनिया गांधी सहित कांग्रेसनीत यूपीए सरकार पर मुखर हो गई। टूजी स्पेक्ट्रम मामले में इससे भी कांग्रेस के बयान उसके गले की फांस बन गए थे। हाल ही में टूजी स्पेक्ट्रम की निराशाजनक नीलामी के बाद भी सरकार के ढोलों ने जमकर हल्ला मचाया था कि देखा, हमने तो पहले ही कहा था कैग ने मनगढंत आंकडे पेश किए हैं। सरकार को कोई घाटा नहीं हुआ। कैग की मिलीभगत है भाजपा के साथ, उसने जबरन यूपीए सरकार को बदनाम करने की कोशिश की। दो दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने नीलामी में विसंगति पाई और सरकार की जमकर खिंचाई कर दी। मतलब साफ है, यहां भी सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट को झूठ का पुलिंदा साबित करने के लिए नीलामी ही गलत ढंग से कर दी।
यूपीए-२ सरकार सीएजी से इतनी परेशान है कि उसने सीएजी के पर कतरने की तैयारी तक कर रखी है। दरअसल, जल्द ही सीएजी जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम), मनरेगा, किसान कर्ज माफी योजना और उर्वरकों की सबसिडी में हुए घोटाले और अनियमितता को लेकर संसद में रिपोर्ट पेश करने वाली है। इससे फिर कांग्रेस की छवि पर बट्टा लगना है। इसलिए सरकार के अंदरखाने के लोगों ने सीएजी को नख-दंतहीन संस्था बनाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। यह बात यूं साफ होती है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने ११ नवंबर को बहुसदस्यीय महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव की भनक लगते ही विपक्ष ने जमकर विरोध किया। अपने मौन के लिए विख्यात प्रधानमंत्री को आखिर बोलना पड़ा। कहा कि कई सदस्यों का महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक बनाने की सरकार की कोई मंशा नहीं है। प्रधानमंत्री ने तब भले ही कांग्रेस और सरकार की किरकिरी होने से बचाने के लिए ऐसा जवाब दिया। असल में तो सरकार सीएजी को नापने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। दरअसल, सरकार का सोचना है कि सीएजी की गलत साबित करने के बाद ही जनता के बीच उसका चेहरा चमकदार दिखेगा।
इधर, केन्द्र सरकार ने दूसरे उपाय भी शुरू कर दिए हैं अपनी छवि सुधारने के लिए। कांग्रेस के नेता दबी जुबान में स्वीकार कर रहे हैं कि कसाब को टांगकर सरकार ने जनता को अपनी ओर खींचने की कोशिश की है। वरना, देश की संसद पर हमला करने वाले अफजल का नंबर पहले था। खैर, सब जानते हुए जनता इस बात के लिए सरकार की पीठ थपथपा रही है। लेकिन, वह सरकार के घोटालों को भूलना नहीं चाहती। कसाब की फांसी के बदले केन्द्र सरकार की १०० गलतियों को माफ करना नहीं चाहती। २१ नवंबर को कसाब की फांसी की खबर सुनकर देशवासियों ने एक-दूसरे को बधाई संदेश भेजे। इनमें उन्होंने एक-दूसरे को याद दिलाया कि केन्द्र सरकार ने यह काम बढिय़ा किया है लेकिन उसके द्वारा किए गए घोटालों को हमें भूलना नहीं है।
कांग्रेस सीएजी पर सवाल उठाकर और कसाब को फांसी पर लटकाकर इतनी आसानी से अपनी इमेज सेट नहीं कर पाएगी। दरअसल, ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है। खास बात यह है कि इस बार पब्लिक माफ करने के मूड में दिख नहीं रही।
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस ने सीएजी के पूर्व अधिकारी आरपी सिंह के दावे को हथियार बनाकर भारतीय जनता पार्टी और सीएजी विनोद राय पर हमला बोल दिया है। आरपी सिंह ने दावा किया है कि सीएजी ने टूजी घोटाले में १.७६ लाख करोड़ के घाटे का जो आंकड़ा पेश किया है वह सही नहीं है। असल घाटा तो २६४५ करोड़ रुपए था। आरपी सिंह ने यह आरोप भी लगाया है कि रिपोर्ट पर जबरन दस्तखत कराए गए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि घाटे का आंकड़ा बड़ा दिखाने के लिए लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने सीएजी पर दबाव डाला था। इन आरोपों को मुद्दा बनाकर यूपीए की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी से लेकर हाल ही में प्रमोशन पाए सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी, कानून मंत्री अश्विनी कुमार और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भाजपा और संवैधानिक संस्था सीएजी पर सीधा हमला बोला है। इस मसले पर जरा गौर करें तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि यूपीए-२ किसी भी हद तक जाकर अपनी इमेज सेट करने की कोशिश कर सकती है। एक ऐसे व्यक्ति की बातों को आधार बनाकर संवैधानिक संस्था पर आरोप लगाए जा रहे हैं, जिसने टूजी पर हुए भारी बवंडर के बीच तो चुप्पी साधे रखी। भ्रष्टाचार के आरोप में कई मंत्री-संत्री जेल की सैर कर आए लेकिन आरपी सिंह कुछ बोले नहीं। इतना ही नहीं इन महाशय ने लोक लेखा समिति और टूजी घोटाले की जांच कर रही जेपीसी के समझ भी यह सच्चाई नहीं उगली थी। सेवानिवृत्त होने के १४ महीने बाद मुंह खोला है। आरपी सिंह के रवैए को देखकर भाजपा के इस आरोप में दम दिखती है कि आरपी सिंह कांग्रेस के हाथ खेल रहे हैं। कांग्रेस सीएजी को झूठा साबित करके अपना दामन उजला दिखने की कोशिश में हैं। जबकि कांग्रेस का दामन कोयले में भी खूब काला हो चुका है। यूपीए-२ के मंत्री कपिल सिब्बल ने तो शुरुआत में ही 'जीरो लॉस' की थ्योरी पेश की थी, जिससे सरकार की जमकर थू-थू हुई। बाद में, सरकार ने टूजी मामले की जांच कराई और अपने ही मंत्रियों को इस मामले में जेल की हवा खिलवाई। यह सवाल उठता है कि यदि आरपी सिंह के दावे सही हैं तो क्या सरकारी एजेंसियों की जांच गलत है? क्या सुप्रीम कोर्ट गलत है? चलो एक बार को मान भी लें कि आरपी सिंह का यह दावा सच है कि घाटे का आंकडा १.७६ लाख करोड़ बहुत अधिक ज्यादा है लेकिन फिर भी सरकार ने खेल तो खेला ही न। घोटाला छोटा ही सही, हुआ तो। फिर सरकार अपने को पाक-साफ दिखने की जद्दोजहद क्यों कर रही है? क्यों नहीं अपनी गलती मानकर देशवासियों से माफी मांग लेती? क्यों नहीं भ्रष्टाचार के दोषियों को सजा देती? लेकिन नहीं, कांग्रेसनीत सरकार गलती स्वीकार करने की जगह आरपी सिंह को ढाल बनाकर सीएजी पर अंगार उगल रही है।
कांग्रेस सीएजी को झूठा और नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती है। हालांकि हर बार उसे ही मुंह की खानी पड़ती है। इस मामले में भी आरपी सिंह ने जैसे ही खुद को घिरता देखा तो पलटी खा गए, साथ में कांग्रेस और यूपीए-२ को भी औंधा (उल्टा) करा दिया। दो दिन ही बीते कि आरपी सिंह ने कह दिया कि १.७६ लाख करोड़ के घाटे का आंकड़ा जारी कराने में भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कोई दबाव नहीं डाला। पूर्व में मीडिया ने उनके बयान को गलत अर्थ में पेश किया। आरपी सिंह के पलटी खाते ही भाजपा सोनिया गांधी सहित कांग्रेसनीत यूपीए सरकार पर मुखर हो गई। टूजी स्पेक्ट्रम मामले में इससे भी कांग्रेस के बयान उसके गले की फांस बन गए थे। हाल ही में टूजी स्पेक्ट्रम की निराशाजनक नीलामी के बाद भी सरकार के ढोलों ने जमकर हल्ला मचाया था कि देखा, हमने तो पहले ही कहा था कैग ने मनगढंत आंकडे पेश किए हैं। सरकार को कोई घाटा नहीं हुआ। कैग की मिलीभगत है भाजपा के साथ, उसने जबरन यूपीए सरकार को बदनाम करने की कोशिश की। दो दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने नीलामी में विसंगति पाई और सरकार की जमकर खिंचाई कर दी। मतलब साफ है, यहां भी सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट को झूठ का पुलिंदा साबित करने के लिए नीलामी ही गलत ढंग से कर दी।
यूपीए-२ सरकार सीएजी से इतनी परेशान है कि उसने सीएजी के पर कतरने की तैयारी तक कर रखी है। दरअसल, जल्द ही सीएजी जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम), मनरेगा, किसान कर्ज माफी योजना और उर्वरकों की सबसिडी में हुए घोटाले और अनियमितता को लेकर संसद में रिपोर्ट पेश करने वाली है। इससे फिर कांग्रेस की छवि पर बट्टा लगना है। इसलिए सरकार के अंदरखाने के लोगों ने सीएजी को नख-दंतहीन संस्था बनाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। यह बात यूं साफ होती है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने ११ नवंबर को बहुसदस्यीय महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव की भनक लगते ही विपक्ष ने जमकर विरोध किया। अपने मौन के लिए विख्यात प्रधानमंत्री को आखिर बोलना पड़ा। कहा कि कई सदस्यों का महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक बनाने की सरकार की कोई मंशा नहीं है। प्रधानमंत्री ने तब भले ही कांग्रेस और सरकार की किरकिरी होने से बचाने के लिए ऐसा जवाब दिया। असल में तो सरकार सीएजी को नापने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। दरअसल, सरकार का सोचना है कि सीएजी की गलत साबित करने के बाद ही जनता के बीच उसका चेहरा चमकदार दिखेगा।
इधर, केन्द्र सरकार ने दूसरे उपाय भी शुरू कर दिए हैं अपनी छवि सुधारने के लिए। कांग्रेस के नेता दबी जुबान में स्वीकार कर रहे हैं कि कसाब को टांगकर सरकार ने जनता को अपनी ओर खींचने की कोशिश की है। वरना, देश की संसद पर हमला करने वाले अफजल का नंबर पहले था। खैर, सब जानते हुए जनता इस बात के लिए सरकार की पीठ थपथपा रही है। लेकिन, वह सरकार के घोटालों को भूलना नहीं चाहती। कसाब की फांसी के बदले केन्द्र सरकार की १०० गलतियों को माफ करना नहीं चाहती। २१ नवंबर को कसाब की फांसी की खबर सुनकर देशवासियों ने एक-दूसरे को बधाई संदेश भेजे। इनमें उन्होंने एक-दूसरे को याद दिलाया कि केन्द्र सरकार ने यह काम बढिय़ा किया है लेकिन उसके द्वारा किए गए घोटालों को हमें भूलना नहीं है।
कांग्रेस सीएजी पर सवाल उठाकर और कसाब को फांसी पर लटकाकर इतनी आसानी से अपनी इमेज सेट नहीं कर पाएगी। दरअसल, ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है। खास बात यह है कि इस बार पब्लिक माफ करने के मूड में दिख नहीं रही।
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