रविवार, 28 दिसंबर 2025

राष्ट्र प्रेरणा स्थल : वैचारिक विरासत को लेकर आगे बढ़ रहे मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना पर आधारित 'राष्ट्र प्रेरणा स्थल'

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी वैचारिक विरासत को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इसका नवीनतम उदाहरण ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती प्रसंग पर प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ का लोकार्पण किया। यह स्थान भारतीय राजनीति और समाज के लिए सामान्य नहीं है, अपितु यह उस लंबी वैचारिक यात्रा का गौरवपूर्ण पड़ाव है, जिसने आधुनिक भारत की नियति को बदलने का कार्य किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी है कि “राष्ट्र प्रेरणा स्थल, उस सोच का प्रतीक है जिसने भारत को आत्मसम्मान, एकता और सेवा का मार्ग दिखाया है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जी की विशाल प्रतिमाएं जितनी ऊंची हैं इनसे मिलनी वाली प्रेरणाएं उससे भी बुलंद है”। कहना होगा कि भारतीय राजनीति को राष्ट्रीय दिशा देने में तीनों ही विभूतियों का उल्लेखनीय योगदान है।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर चुप्पी

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार पर वैसी मुखरता दिखायी नहीं दे रही, जैसी अन्य मामलों में दिखायी देती है। हालिया उदाहरण गाजा का लिया जा सकता है, जहाँ दो देशों की आपसी संघर्ष में सैन्य हमलों का शिकार बने मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए भारत में प्रदर्शन किए गए। हालांकि, यहाँ भी चयनित पाखंड देखा गया था। इस्लामिक चरमपंथियों की ओर से यहूदी महिलाओं एवं लोगों के साथ किए गए घिनौने कृत्यों पर यहाँ भी चुप्पी साध ली गई थी। बांग्लादेश के प्रकरण में केवल भाजपा और राष्ट्रीय विचार के लोग ही हिन्दुओं के हितों की चिंता करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसी चयनात्मक चुप्पी को कठघरे में खड़ा किया है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और उस पर विपक्ष की चुप्पी को मुद्दा बनाया। उनका यह सवाल वाजिब है कि जो राजनीतिक दल गाजा की घटनाओं पर कैंडल मार्च निकालते हैं, वे पड़ोसी देशों (पाकिस्तान और बांग्लादेश) में हिंदुओं और सिखों के नरसंहार पर मौन क्यों साध लेते हैं?

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

बांग्लादेश में कट्टरपंथ का आतंक

बांग्लादेश आज एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ मानवता और कानून का शासन कट्टरपंथ एवं भीड़ तंत्र के सामने आत्मसमर्पण कर चुका है। अल्पसंख्यक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की जघन्य हत्या ने न केवल पड़ोसी देश की अंतरिम सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भारत के धैर्य की भी परीक्षा ली है। दीपू दास को उग्र भीड़ द्वारा जिंदा जला दिया जाना सभ्य समाज के माथे पर कलंक है, लेकिन इससे भी अधिक भयावह वे वीडियो साक्ष्य हैं जो बताते हैं कि मारे जाने से पहले दास स्थानीय पुलिस की हिरासत में था। यह संदेह गहराना स्वाभाविक है कि क्या रक्षकों ने ही उसे कट्टरपंथियों के हवाले कर दिया? दीपू चंद्र दास की नृशंस हत्या करते समय भीड़ ने जिस प्रकार की नारेबाजी की, उससे साफ पता चलता है कि इस्लामिक चरमपंथी, मुस्लिम बाहुल्य राज्य या देश में गैर-मुस्लिमों को स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं। सबसे अधिक खतरनाक और डराने वाली बात यह है कि दीपू की सुनियोजित हत्या में उसके मुस्लिम मित्र भी शामिल रहे हैं। यह जेहादी सोच या तो गैर-मुस्लिमों को इस्लाम में कन्वर्ट कर लेना चाहती है या फिर उन्हें वहाँ से खदेड़ देती है।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

संघ साहित्य में वंदे मातरम् की गूंज

संघ शताब्दी वर्ष : वंदे मातरम् और आरएसएस - भाग 2

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साहित्य में वंदे मातरम् की स्पष्ट छाया दिखायी देती है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और राष्ट्र-निर्माण का आधार है, जो भाषा, क्षेत्र से ऊपर उठकर एकता का संदेश देता है। यही कारण है कि संघ के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीयता की अलख जगाने के लिए अपने लेखन में वंदे मातरम् का खूब उपयोग किया है। संघ गीतों में वंदे मातरम् की गूंज है, तो वंदे मातरम् पर लेख और पुस्तकों की रचना भी की गई है। जब भी वंदे मातरम् को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया गया और उसकी अवमानना करने का प्रयास किया गया, तब-तब संघ के स्वयंसेवकों ने मुखरता से वंदे मातरम् के पक्ष में अपनी कलम चलायी है। अगर हम संघ साहित्य का गहनता से अध्ययन करेंगे तो हमें स्पष्टतौर पर उसमें वंदे मातरम् की छाया दिखायी देगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के थिंक टैंक रहे, चिंतक-मनीषी श्रद्धेय रंगा हरि जी ने वंदे मातरम् पर अनूठी पुस्तक की रचना की है- ‘वंदे मातरम् की आत्मकथा’। यह पुस्तक केवल राष्ट्रगीत के इतिहास का वर्णन नहीं करती, बल्कि इसे एक जीवंत इकाई के रूप में प्रस्तुत करती है, जो राष्ट्र के जन्म और संघर्ष की गाथा स्वयं अपने मुख से सुना रही हो। इस पुस्तक का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। यानी इसके माध्यम से वंदे मातरम् की गौरवगाथा संपूर्ण देश में प्रसारित करने का प्रयास संघ ने किया।

रविवार, 14 दिसंबर 2025

अंग्रेजों के विरुद्ध डॉ. हेडगेवार ने चलाया वंदे मातरम् आंदोलन

संघ शताब्दी वर्ष : वंदे मातरम् और आरएसएस - भाग 1

 

हेडगेवार जी ने जब अंग्रेजों के विरोध में वंदे मातरम् का जयघोष बुलंद किया, तो उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया


प्रतीकात्मक चित्र: आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और स्वयंसेवक। Gemini AI द्वारा निर्मित छवि

मातृभूमि की वंदना का वह कौन-सा काव्य है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के लिए श्रीमद्भगवद गीता के संदेश के बराबर न हो। जिस गीत ने राष्ट्रीय आंदोलन को धार दी, अंग्रेजों के पाँव उखाड़ दिए, समाज में राष्ट्रीयता का भाव जगाया, ऐसा अद्भुत ‘वंदे मातरम्’ तो संघ के स्वयंसेवकों के लिए अक्षय ऊर्जा का स्रोत है। बंग-भंग आंदोलन के बाद से ‘वंदे मातरम्’ मातृभूमि की आराधना और देशभक्ति का मंत्र बन गया। अंग्रेजों के खिलाफ चलने वाले प्रत्येक आंदोलन का बीज मंत्र वंदे मातरम् बन गया। अंग्रेज सरकार ने स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से दूर करने के लिए ‘रिस्ले सर्कुलर’ जारी किया, जिसके द्वारा विद्यार्थियों को आंदोलनों में शामिल होने से प्रतिबंधित किया गया। यहाँ तक कि ‘वंदे मातरम्’ और ‘तिलक महाराज की जय’ जैसे नारे लगाने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों ने अंग्रेजों के इस सर्कुलर की खुलकर आलोचना की। महर्षि अरविंद ने ‘वंदे मातरम्’ समाचार पत्र में लेख लिखकर रिस्ले सर्कुलर की भर्त्सना की। उन्होंने स्पष्टतौर पर लिखा कि अंग्रेज युवाओं को देशभक्ति की धारा से दूर करके स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करना चाहते हैं। हालांकि, अंग्रेज इसमें सफल नहीं हो सके। उनका यह सर्कुलर युवाओं को राष्ट्रभक्ति के तराने गाने और आंदोलनों में शामिल होने से रोक नहीं सका।

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

मध्यप्रदेश की मोहन सरकार के दो वर्ष

सशक्त नेतृत्व और संतुलित विकास के दो वर्ष

राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन अकसर अनिश्चितता लेकर आता है, लेकिन मध्यप्रदेश में पिछले दो वर्षों ने साबित किया है कि यदि नेतृत्व में स्पष्टता और इच्छाशक्ति हो, तो परिवर्तन ‘विकास की नई गति’ का पर्याय बन जाता है। आज, जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूर्ण कर रहे हैं, तो पीछे मुड़कर देखने पर एक ऐसी सरकार की छवि उभरती है जिसने परंपरा, आधुनिकता, कल्याकारी योजनाओं और कठोर प्रशासनिक फैसलों के बीच एक बेहतरीन संतुलन साधा है। 13 दिसंबर, 2023 को जब डॉ. मोहन यादव ने सत्ता की बागडोर संभाली थी, तब उनके सामने ‘लाड़ली बहना’ जैसी लोकप्रिय योजनाओं को जारी रखने के साथ-साथ अपनी अलग पहचान बनाने की चुनौती थी। दो साल बाद, यह कहा जा सकता है कि उन्होंने न केवल अपनी ही पार्टी की पूर्ववर्ती सरकार के अच्छे कार्यों को आगे बढ़ाया, बल्कि शासन की एक नई, अधिक सख्त और परिणाम-मूलक शैली भी विकसित की है।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

भाषा जोड़ती है, तोड़ती नहीं

जब कहीं से यह समाचार पढ़ने/सुनने को मिलता है कि मराठी, तमिल, तेलगू या अन्य कोई भाषा नहीं बोलने के कारण व्यक्ति के साथ मारपीट कर दी गई, तो दु:ख होता है कि संकीर्ण राजनीति हमें किस दिशा में लेकर जा रही है। हम अपनी ही भाषाओं का सम्मान क्यों नहीं कर रहे हैं? जो भाषाएं आपस में जुड़ी हैं, उनके नाम पर हम एक-दूसरे से दूर क्यों हो रहे हैं? भारत की सभी भाषाओं के शब्द भंडार एक-दूसरे के शब्दों से समृद्ध हैं। हमें तो भाषायी विविधता का उत्सव मनाना चाहिए। भारत की संस्कृति की विशेषता है कि वह विविध रूपों में प्रकट होती है। हम सब मिलकर 11 दिसंबर को महान तमिल कवि सुब्रह्मण्यम भारती की जयंती प्रसंग पर ‘भारतीय भाषा दिवस’ मनाते हैं। यह प्रसंग ही हमें भाषाओं के प्रति संवेदनशील होने की ओर संकेत करता है और बताता है कि भाषाएं मानवीय संबंधों में सेतु का कार्य करती हैं। एक-दूसरे से जोड़ती हैं। श्री भारती ने तमिल को शास्त्रीय स्वरूप से बाहर निकालकर सरल और आम बोलचाल की तमिल का प्रयोग किया ताकि उनके विचार और तमिल साहित्य का ज्ञान आम लोगों तक पहुँच सके। तमिल को प्राथमिकता देने के बावजूद सुब्रह्मण्यम भारती ने हिन्दी और तेलुगु सहित अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति भी सम्मान दिखाया। वह चाहते थे कि सभी भारतीय भाषाओं के बीच ज्ञान का आदान-प्रदान हो, जिससे भारत एक सशक्त राष्ट्र बन सके। उनका स्पष्ट दृष्टिकोण था कि भारत की विभिन्न भाषाएं उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और सुंदरता हैं।

सोमवार, 8 दिसंबर 2025

बाबर की औलादें

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने कथित तौर पर बाबरी मस्जिद की नींव रखकर ‘बाबर की औलादों’ को जिंदा कर दिया है। अब तहरीक मुस्लिम शब्बन नाम के संगठन ने ग्रेटर हैदराबाद में बाबरी स्मारक बनाने का ऐलान किया है। ये घटनाएं केवल अपने मत-संप्रदाय के प्रति अपना विश्वास प्रकट करने का विषय नहीं है, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था, सांप्रदायिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देने की कोशिश के तौर पर इन्हें देखना चाहिए। यह एक प्रकार से अलगाववादी सोच है, जो पहले भी भारत का विभाजन करा चुकी है। यह सोच इसलिए और भी अधिक खतरनाक दिखायी दे रही है क्योंकि ये किसी सिरफिरे कट्टरपंथियों की घोषणा मात्र नहीं है, अपितु इस विचार के पीछे मुसलमानों की अच्छी-खासी भीड़ भी खड़ी दिखायी दे रही है। कथित बाबरी मस्जिद की नींव रखने के लिए जिस तरह सिर पर ईंटें ढोकर लाते मुसलमानों की भीड़ दिखायी दी, उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’ के नारों के बीच लाखों समर्थकों का जुटना और बाबरी मस्जिद के निर्माण की बात दोहराना, साफ तौर पर मुस्लिम समुदाय की सांप्रदायिक लामबंदी को स्पष्टतौर पर रेखांकित करता है।

रविवार, 7 दिसंबर 2025

डॉक्टर साहब के विचारों से पोषित है संघ की यात्रा

जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू समाज को आत्मदैन्य की स्थिति से बाहर निकाल कर आत्मगौरव की भावना से जागृत किया, उसी प्रकार डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने भी हिन्दू समाज का आत्मविश्वास जगाकर बिखरे हुए हिन्दुओं को एकजुट करने का अभिनव कार्य आरंभ किया। दोनों ही युगपुरुषों ने लगभग एक जैसी परिस्थितियों में संगठन का कार्य प्रारंभ किया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिन उद्देश्यों के साथ हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के मूल में भी उसी ‘स्व बोध’ का संकल्प है। भारत का स्वदेशी समाज जागरूक और संगठित रहे, उसमें ही सबका हित है। स्वराज्य प्राप्ति के बाद भारत किस प्रकार अपने खाये हुए वैभव और गौरव को प्राप्त करे, यह चिंतन-धारा युगद्रष्टा डॉक्टर हेडगेवार के मन में चलने लगी थी। उसी चिंतन-धारा में से संघ धारा का एक सोता फूटा था। डॉक्टर साहब ने जिस प्रकार का संकल्प व्यक्त किया था, उसी के अनुरूप नागपुर के मोहिते बाड़ा रूप गोमुख से निकली संघधारा आज सहस्त्र धारा के रूप में समाज को सिंचित कर रही है।

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

स्वयं को अनंतकाल तक बनाए नहीं रखना चाहता संघ

संघ शताब्दी वर्ष : संघमय बने समाज, संघ का लक्ष्य है कि संपूर्ण हिन्दू समाज संगठित हो और संघ उसमें विलीन हो जाए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज जिस विराट स्वरूप में दिखायी देता है, उसका संपूर्ण चित्र संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के मन में था। संघ समय के साथ उनकी संकल्पना के अनुरूप ही विकसित हुआ है। इस संदर्भ में संघ के विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “जैसे कोई कुशल चित्रकार पहले अपने मन के संकल्प चित्र की केवल आउटलाइन खींचता है। क्या कोई कह सकता है कि आउटलाइन के आगे उसके सामने कुछ भी नहीं है। ऐसा तो नहीं। उसके मन में तो पूरा चित्र स्पष्ट रूप से रेखांकित हुआ करता है, और कागज पर खींची हुई आउटलाइन में धीरे-धीरे उसी के अनुसार रंग भरते-भरते, उमलते हुए रंगों से कल्पना साकार होती है। अंग्रेजी में इसे ‘प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि जो बात पहले से ही मौजूद रहती है, वही समय के अनुसार उत्तरोत्तर अधिकाधिक प्रकट होकर दिखाई देना प्रारंभ होती है। संघ कार्य का भी इसी प्रकार प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट हुआ है”। अपनी 100 वर्ष और चार चरणों की यात्रा में संघ के विस्तार के बाद अब आगे क्या, यह चर्चा सब ओर चल रही है। शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ में भी यह चर्चा खूब है। इसका संकेत भी हमें संस्थापक सरसंघचालक डॉक्टर साहब की संकल्पना में मिलता है। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार कहते थे कि “संघ कार्य की जुबली मनाने की कल्पना नहीं है। यानी कि शतकानुशतक संघ अपने ही स्वरूप में समाज को संगठित करने का कार्य करता रहेगा, यह कल्पना नहीं है”। डॉक्टर साहब चाहते थे कि संघ यथाशीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त करे और समाज में विलीन हो जाए। संघ का अगला ‘प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ समाज के साथ एकरूप होना ही है। इसलिए संघ और समाज के लिए पाँचवा चरण बहुत महत्वपूर्ण रहनेवाला है। संघ अपने पाँचवे चरण में समाज के साथ एकरस होना चाहता है। यानी संघ जिन उद्देश्यों को लेकर चला है, वह समाज के उद्देश्य बन जाएं। यानी भारतीय समाज संघमय हो जाए। समाज और संघ में कोई अंतर न दिखे।