हम भारत के लोग अपना 74वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। हमारा गणतंत्र बीते 73 वर्षों में किस ओर बढ़ा है, विद्वान लोग अकसर इसकी समीक्षा/चर्चा करते रहते हैं। वैसे तो भारत के लिए गणतंत्र कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं है। जब हम अपने इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पलटकर देखते हैं, तो हमें भारत में गणतंत्र की समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। फिलहाल हम अपने वर्तमान गणतंत्र की बात करें तो ध्यान आता है कि अपनी चर्चाओं में अकसर विद्वान कहते हैं कि भारत का ‘तंत्र’ अभी पूरी तरह से ‘गण’ केंद्रित नहीं हुआ है। कहीं न कहीं औपनिवेशिक मानसिकता ही हमारे तंत्र पर हावी है। परंतु पिछले दस वर्षों में जिस तरह से भारत के गणतंत्र ने करवट बदली है, उससे स्पष्टतौर पर परिलक्षित हो रहा है कि हमारा तंत्र अब गण की ओर सम्मुख हुआ है। इसलिए पिछले कुछ वर्षों में शासन स्तर पर हुए निर्णय, नीतिगत बदलाव एवं सांकेतिक व्यवस्थाएं गण की मंशा के अनुरूप दिखाई देती हैं। अब अंतरराष्ट्रीय ताकतों के दबाव में नहीं अपितु जनता के हित में नीतियां बनती हैं। हमारा शासन किसी का पिछलग्गू नहीं है, वह भारतीय दृष्टिकोण से नीतियां बना रहा है। भारत अब बैशाखियां छोड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ चला है।
गुरुवार, 26 जनवरी 2023
रविवार, 8 जनवरी 2023
खेल पत्रकारिता की बारीकियां सिखाती पुस्तक- ‘खेल पत्रकारिता के आयाम’
‘खेल पत्रकारिता के आयाम’ पुस्तक का वीडियो ब्लॉग यहाँ देखें
“खेल में दुनिया को बदलने की शक्ति है, प्रेरणा देने की शक्ति है, यह लोगों को एकजुट रखने की शक्ति रखता है, जो बहुत कम लोग करते हैं। यह युवाओं के लिए एक ऐसी भाषा में बात करता है, जिसे वे समझते हैं। खेल वहाँ भी आशा पैदा कर सकता है, जहाँ सिर्फ निराशा हो। यह नस्लीय बाधाओं को तोड़ने में सरकार की तुलना में अधिक शक्तिशाली है”। अफ्रीका के गांधी कहे जानेवाले प्रसिद्ध राजनेता नेल्सन मंडेला के इस लोकप्रिय कथन के साथ मीडिया गुरु डॉ. आशीष द्विवेदी अपनी पुस्तक ‘खेल पत्रकारिता के आयाम’ की शुरुआत करते हैं। या कहें कि पुस्तक के पहले ही पृष्ठ पर इस कथन के साथ लेखक खेल की महत्ता को रेखांकित कर देते हैं और फिर विस्तार से खेल और पत्रकारिता के विविध पहलुओं पर बात करते हैं। डॉ. द्विवेदी की इस पुस्तक ने बहुत कम समय में अकादमिक क्षेत्र में अपना स्थान बना लिया है। दरअसल, इस पुस्तक से पहले हिन्दी की किसी अन्य पुस्तक में खेल पत्रकारिता पर समग्रता से बातचीत नहीं की गई।
शुक्रवार, 6 जनवरी 2023
भारतेंदु हरिश्चंद्र का घर
आज हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता के प्रकाशस्तंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र (9 सितंबर 1850-6 जनवरी 1885) को स्मरण करने का दिन है। पिछले वर्ष अगस्त में वाराणसी प्रवास के दौरान संयोग से उनके घर के सामने से गुजरना हुआ।
काल भैरव के दर्शन करने के लिए तेज चाल से बनारस की प्रसिद्ध गलियों से हम बढ़ते जा रहे थे। बाबा विश्वनाथ और गंगा मईया के दर्शन करके आगे बढ़ रहे थे तो मन आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ था। रिमझिम बारिश हो रही थी तो भीगते–बचते हुए और इधर–उधर नजर दौड़ाते हुए, अपन चल रहे थे।
चलते–चलते जैसे ही एक दीवार पर भारतेंदु हरिश्चंद्र का मोहक चित्र देखा, तो तेजी से बढ़ते कदम एकदम से ठिठक गए। मुझे कतई अंदाजा नहीं था कि यह भवन निज भाषा का अभिमान जगानेवाले साहित्यकार–पत्रकार भारतेंदु हरिश्चंद्र का है। लेकिन जैसे ही चित्र के थोड़ा ऊपर देखा तो पट्टिका पर लिखा था– ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता गोलोकवासी भारतेंदु हरिश्चंद्र का निवास स्थान’। यह शिलालेख नागरी–प्रचारिणी सभा, काशी ने 1989 में लगवाया था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र श्रेष्ठ साहित्यकार होने के साथ ही उच्च कोटि के संपादक भी थे। उन्होंने हिन्दी की खूब सेवा की है। 35 वर्ष की अल्पायु में ही वे गोलोकवासी हो गए लेकिन उन्होंने जो सृजन किया, उसके कारण वे आज भी हमारे बीच प्रासंगिक हैं।
वे इतने प्रतिभाशाली थे कि 1868 में, केवल 18 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ का प्रकाशित किया। इसके बाद हिन्दी पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया। इसके साथ ही भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ और ‘बाला बोधिनी’ पत्रिका के संपादन के माध्यम हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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| वाराणसी में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के भवन पर उनका चित्र / फोटो : लोकेन्द्र सिंह |
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| वाराणसी में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का भवन / फोटो : लोकेन्द्र सिंह |
मंगलवार, 20 दिसंबर 2022
बेटी के लिए कविता-10
हम और तुम
दिल खोल कर करेंगे बातें हम-तुम।
चलो, अच्छे गहरे दोस्त बनते हैं हम-तुम।।
तुम्हें समझ रहा हूँ मैं, मुझे समझना तुम।
चलो, साथ बैठ मन की कह लेते हैं हम-तुम।।
एक-दूसरे की फिक्र करेंगे हरदम।
चलो, एक यह वादा कर लेते हैं हम-तुम।।
मैं कुछ कहूँ, कहो कुछ तुम, उससे पहले।
चलो, अंतर्मन पढ़ने का हुनर सीखते हैं हम-तुम।।
जीवन में रचनात्मक होने जरूरी है प्रेरणा।
चलो, एक-दूसरे के हीरो बन जाते हैं हम-तुम।।
रविवार, 4 दिसंबर 2022
जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार को नकारनेवालों की मानसिकता है ‘वल्गर’
गोवा में आयोजित भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सव (आईएफएफआई) के समापन समारोह में इजराइल मूल के फिल्म निर्माता नदव लैपिड ने फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी करके इस्लामिक आतंकवाद की क्रूरता का शिकार हुए हिन्दुओं के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया। लैपिड इस आयोजन के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष थे। फिल्म को लेकर की गई टिप्पणी में शब्दावली का चयन बता रहा है कि वह किसी खास विचार से प्रेरित हैं और ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर जानबूझकर टिप्पणी की है। अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा कि फिल्म उत्सव में इस फिल्म की स्क्रीनिंग को देखकर वे परेशान हुए और उन्हें झटका लगा। यह फिल्म वल्गर और प्रोपेगंडा है। यकीनन फिल्म देखकर लैपिड को झटका लगा होगा, वह क्रूरता के दृश्य देखकर परेशान भी हो गए होंगे, क्योंकि दृश्य परेशान करनेवाले और दिल-दिमाग को हिला देनेवाले ही हैं। भारत में पहली बार किसी फिल्म निर्माता ने साहस दिखाकर जम्मू-कश्मीर में हुए हिन्दुओं के नरसंहार को सामने लाने का काम किया है।
रविवार, 27 नवंबर 2022
संविधान के प्रति आरएसएस का दृष्टिकोण
आरएसएस और संविधान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का प्रभावशाली सांस्कृतिक संगठन है। उसके विचार एवं गतिविधियों से समाज का मानस बनता और बदलता है। इसलिए अकसर विभिन्न विषयों को लेकर चर्चा चलती है कि उन विषयों पर संघ का विचार क्या है? कई बार ऐसा भी होता है कि भारतीयता विरोधी और विदेशी विचार से अनुप्राणित समूह भी राष्ट्रीय प्रतीक और संघ के संदर्भ में मिथ्याप्रचार कर देते हैं। दोनों ही कारणों से बौद्धिक जगत से लेकर आम समाज में भी संघ के दृष्टिकोण को जानने की उत्सुकता रहती है। भारतीय संविधान भी ऐसा ही विषय है, जिस पर संघ के विचार सब जानना चाहते हैं। दरअसल, भारत विरोधी ताकतों ने अपने समय में यह मिथ्याप्रचार जमकर किया है कि आरएसएस संविधान विरोधी है? वह वर्तमान संविधान को खत्म करके नया संविधान लागू करना चाहता है। मजेदार बात यह है कि गोएबल्स की अवधारणा में विश्वास रखनेवाले गिरोहों ने इस तरह के झूठ की बाकायदा एक पुस्तिका भी तैयार करा ली, जिस पर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का चित्र एवं नाम प्रकाशित किया गया और लिखा गया था- नया भारतीय संविधान। संघ की ओर से इस दुष्प्रचार के विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी गई, उसके बाद से यह मिथ्याप्रचार काफी हद तक रुक गया। और भी अनेक प्रकार के भ्रम खड़े करने के प्रयास संघ विरोधी एवं भारत विरोधी ताकतों की ओर से किए गए हैं लेकिन बिना पैर के झूठ संघ की प्रामाणिक एवं देशभक्त छवि के कारण समाज में टिकते ही नहीं हैं।
बुधवार, 23 नवंबर 2022
समाज के लिए घातक है मूल्यविहीन पत्रकारिता
"जिस तरह मनुष्य के जीवन को सार्थकता प्रदान करने के लिए जीवन मूल्य आवश्यक हैं, उसी तरह मीडिया को भी दिशा देने और उसको लोकहितैषी बनाने के लिए मूल्यों की आवश्यकता रहती है"।
मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मूल्यों की आवश्यकता है। मूल्यों का प्रकाश हमें प्रत्येक क्षेत्र में राह दिखता है। मूल्यों के अभाव में हमारे जीवन की यात्रा अँधेरी सुरंग से गुजरने जैसी होगी, जिसमें हम दीवारों से तो कभी राह में आई बाधाओं से टकराते हुए आगे बढ़ते हैं। जीवन मूल्य हमें बताते हैं कि समाज जीवन कैसा होना चाहिए, परिवार एवं समाज में अन्य व्यक्तियों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए, करणीय क्या है और अकरणीय क्या है? मूल्यों के अनुरूप आचरण करनेवाले व्यक्ति सज्जन पुरुषों की श्रेणी में आते हैं। वहीं, जो लोग मूल्यों की परवाह नहीं करते, उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है, ऐसे कई लोग समाजकंटक के रूप में सबके लिए परेशानी का कारण बन जाते हैं। अर्थात मूल्यों के अभाव में मानव समाज स्वाभाविक रूप से गतिशील नहीं हो सकता। मूल्यों के अभाव में सकारात्मकता का लोप होकर नकारात्मकता हावी हो जाती है।



