गुरुवार, 14 जुलाई 2022

अशोक स्तम्भ के सिंहों की ‘मुख मुद्रा’ पर बेतुके विरोध के बीच नयी संसद की ओर

केंद्र सरकार ने वर्तमान और भविष्य को देखते हुए ‘नये संसद भवन’ की योजना बनायी थी, जिसका निर्माण कार्य अब अपने अंतिम चरण में है। विश्वास है कि इस वर्ष के अंत तक समूचा कार्य पूरा हो जायेगा। नये संसद परिसर के लोकार्पण का क्षण ऐतिहासिक होगा। यह बात संसद भवन के निर्माण में लगे श्रमिकों को भी भली प्रकार पता है। सोमवार को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नये संसद भवन में राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तम्भ’ का अनावरण किया, तब वहां उन्होंने श्रमिकों से भी बातचीत की। उन्होंने जब श्रमिकों से पूछा, “आपको क्या लगता है कि आप भवन बना रहे हैं या इतिहास?” तब सभी श्रमिकों ने सामूहिक स्वर में उत्तर दिया- “इतिहास”। यकीनन नये संसद भवन के निर्माण के साथ एक इतिहास रचा जा रहा है, जिस पर हम सबको गौरव होना चाहिए। कितना सुखद संयोग है कि देश जब अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है तब उसे अपना नया संसद भवन मिल रहा है।

सोमवार, 4 जुलाई 2022

पत्रकारिता की शक्ति को बताने वाली दस्तावेजी पुस्तक है ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’

 

- डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या

भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास है। समाज जागरण से लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की चेतना जगाने में पत्रकारों एवं समाचारपत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। भारत में पत्रकारिता के विजयी प्रसंगों में से एक है-‘रतौना आन्दोलन’। गो-संरक्षण के जुड़ा यह आन्दोलन वर्ष 1920 में मध्यप्रदेश के सागर जिले के समीप रतौना नामक स्थान से शुरू हुआ, जिसे प्रखर संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के कलम ने शीघ्र ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया। पत्रकारिता के सशक्त भूमिका के कारण यह आन्दोलन अपने परिणाम को प्राप्त कर सका। तत्कालीन मध्यभारत प्रान्त में अंग्रेजों को पहले बार पराजय का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश सरकार को अपने निर्णय को वापस लेना पड़ा। जिस जगह प्रतिमाह ढाई लाख गोवंश के क़त्ल की योजना थी, आज वहां गोवंश की नस्ल सुधार का बड़ा केंद्र है। जहाँ गोवंश के खून की नदी बहनी थी, वहां आज इतना दुग्ध उत्पादन हो रहा है कि आस-पास के लोग शुद्ध दूध पी रहे हैं। इस सम्पूर्ण विवरण को हमारे सामने लेकर आती है, पुस्तक ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’।

मंगलवार, 28 जून 2022

पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव

जो बाबा पुष्पहार पहने हैं, चुनाव वे नहीं जीते हैं। जो शांत चित्त से पास में खड़े हैं, चेकवाली आधी बांह की शर्ट में, वे चुने गए हैं सरपंच। नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव। सही तो है, वे कहां जीते हैं। जीत तो समूचे गांव की हुई है। हर कोई जीता है। इसलिए तो समाज से प्राप्त आशीर्वाद के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का भाव ही उनके लिए सर्वोपरि है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा...

ये इतने ही सहज और सरल हैं। जीत का कोई अभिमान नहीं। विनम्र। हंसमुख। संवेदनशील। उनका मिलनसार व्यक्तित्व उन्हें बाकी सबसे अलग पहचान देता है। श्रेय की भूख नहीं। कर्तव्य समझकर काम किया और भूल गए। कभी बड़प्पन नहीं दिखाते। सदा छोटे बनकर रहते हैं। इसलिए समूचे गांव ने खूब सारा प्रेम दिया। ग्राम पिपरौआ ने मास्टर साहब के लड़के शैलेंद्र सिंह यादव को सरपंच चुना है, जो अपने पिता की तरह ही सुलझे हुए और गांव के विकास के लिए समर्पित हैं। 

जिस दिन पंचायत चुनाव के मैदान में नेताजी ने अपना परचम उठाया था, उसी वक्त से जीत सुनिश्चित थी, बस प्रक्रिया और परिणाम आने की औपचारिकता बाकी थी। 

लोग चुनाव जीतने के लिए विकास और सहयोग के वायदे करते हैं। यह ऐसे चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने सरपंच बने बिना ही गांव की तस्वीर बदलने में अग्रणी भूमिका निभाई है। 

रिष्ठ पत्रकार अनंत विजय और शिवानन्द द्विवेदी की पुस्तक 'परिवर्तन की ओर' में जिला पंचायत भितरवार के गाँव पिपरौआ का उल्लेख

नेताजी शैलेंद्र सिंह यादव तो पहले से ही सच्चे जनप्रतिनिधि थे। अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने हुए सरपंच भी बन गए। 

उन्होंने अपने सामर्थ्य का उपयोग सदा ही लोगों की भलाई के लिए किया है। वे लोगों की सहायता के लिए हर समय एक फोन कॉल की दूरी पर उपलब्ध रहते हैं। समाज से ऐसा गहरा नाता है कि अनेक जरूरतमंदों की मदद स्वयं आगे बढ़कर उस समय में की, जब उन्हें कहीं से सहायता की उम्मीद नहीं थी। शासकीय योजनाओं का लाभ ग्रामीण बंधुओं को मिले, ऐसे प्रयास भी लगातार उनकी ओर से रहते हैं। 

इस विजय के साथ यह विश्वास सबको है कि गांव की तरक्की को अब और पंख लग जायेंगे। शासकीय योजनाओं का लाभ गांव के अधिकतम लोगों को मिल सकेगा। नेताजी के नेतृत्व में गांव खुशहाली की ओर बढ़ेगा और बाकी अन्य पंचायतों के सामने उदाहरण बनेगा।

ईश्वर से प्रार्थना है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी यात्रा और आगे बढ़े। मध्यप्रदेश की राजधानी उनकी प्रतीक्षा में है...

पंचायत चुनाव में जीत के बाद पिपरौआ के ग्रामवासियों का धन्यवाद ज्ञापन एवं सम्मान करते नवनिर्वाचित सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव


पिपरौआ गाँव के सरपंच शैलेन्द्र सिंह यादव / Shelendra Singh Yadav

मंगलवार, 14 जून 2022

विश्वपटल पर एकजुट हो सज्जनशक्ति

चित्र प्रतीकात्मक है. पाकिस्तान के ही किसी मंदिर पर हमले का यह चित्र है.

शिवलिंग पर की जा रहीं आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरोध में किये गए एक बयान के आधार पर भारत के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनानेवाला पाकिस्तान कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखने की कोशिश नहीं करता। हिंदुओं सहित गैर-इस्लामिक मत के अनुयायियों पर होनेवाले अत्याचार पाकिस्तान के भीतर की कालिख को उसके मुंह पर मलने के लिए पर्याप्त हैं। कट्टरता और घोर सांप्रदायिक सोच में डूबा पाकिस्तान न जाने किस मुंह से दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र पर सवाल उठाता है। पाकिस्तान में जो हाल हिन्दू समुदाय का है, वही स्थिति उनके पूजास्थलों के साथ भी है। अक्सर हिन्दू मंदिर कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार हो जाते हैं। विगत बुधवार को एक बार फिर कराची के कोरंगी इलाके में श्री मरी माता मंदिर में मूर्तियों पर हमला हुआ। श्री मरी माता मंदिर कोरंगी पुलिस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर स्थित है। इसका अर्थ है कि पाकिस्तान में अतिवादियों के मन में पुलिस का भी भय नहीं है।

शनिवार, 11 जून 2022

नूपुर शर्मा विवाद : प्रदर्शन और मानसिकता


कथित विवादास्पद टिप्पणी के मामले में मुस्लिम समुदाय की ओर से किए जा रहे प्रदर्शन रुकने की बजाय हिंसक होते जा रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। इन प्रदर्शनों से भविष्य के लिए गंभीर संकेत मिल रहे हैं। जिस छोटे से घटनाक्रम का पटाक्षेप भाजपा प्रवक्ताओं के खेद प्रकट करने के साथ ही हो जाना चाहिए था, वह प्रवक्ताओं के निलंबन और पुलिस प्रकरण दर्ज होने के बाद भी थम नहीं रहा है। शुक्रवार को नमाज के बाद जिस तरह देश के विभिन्न शहरों में सड़कों पर निकलकर धर्मांध भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन किए हैं, उससे इस वर्ग की मानसिकता भी प्रकट होती है। एक ऐसी टिप्पणी पर यह वर्ग हिंसातुर हो गया है, जिसका जिक्र उनकी किताबों में है और प्रमुख मुस्लिम प्रवक्ता उस बात का उल्लेख करते रहते हैं। जबकि इस वर्ग के लोगों की ओर से पिछले दिनों में भगवान शिव के लिए कितनी ही ओछी और अश्लील बातें कही गई हैं, लेकिन न तो हिन्दू समाज ने हिंसक प्रदर्शन किए और न ही किसी का सिर काटने पर ईनाम की घोषणा की। किसी हिन्दू संगठन या हिन्दू धर्मगुरु ने सड़कों पर हिंसा करने के लिए उकसाने वाले भाषण भी नहीं दिए हैं। शिव की तरह हिन्दू समाज गरल को अपने कंठ में धारण करके बैठ गया है। मानवता के लिए कुछ कड़वी बातों को सहन कर ही लेना उचित होता है। यह धैर्य अन्य संप्रदायों को हिन्दू समाज से सीखना चाहिए। 

रविवार, 24 अप्रैल 2022

केरल में बेलगाम राजनीतिक हिंसा


केरल में राजनीतिक हिंसा के लिए कम्युनिस्ट सरकार की अक्षमता जिम्मेदार है या फिर यह कम्युनिस्ट विचारधारा के रक्तचरित्र का प्रकटीकरण। जब से केरल में कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई है, तब से वैचारिक असहमतियों को क्रूरतापूर्ण ढंग से खत्म करने एवं दबाने के प्रयास बढ़ गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने केरल को पूरी तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा के ‘प्रैक्टिकल’ की प्रयोगशाला बना दिया है। भारत में ही नहीं अपितु दुनिया में जहाँ भी कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था रही हैं, वहां हिंसा के बल पर उन्होंने अपने विरोधियों को समाप्त करने का प्रयास किया है। भारत में केरल, त्रिपुरा एवं पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों के कुछ हिस्सों में भी यही दिखाई देता है।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

इस्लाम के कठोर आलोचक थे बाबा साहेब

बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर द्वारा की गईं हिन्दू धर्म की आलोचनात्मक टीकाओं को खूब उभारा जाता है, इसके पीछे की मंशा ठीक नहीं होती। बाबा साहेब ने हिन्दू धर्म में व्याप्त जातिप्रथा, जातिगत भेदभाव और उसके लिए जिम्मेदार प्रसंगों की आलोचना की, उसके मानवीय कारण हैं। उनकी आलोचनाओं को हिन्दू समाज ने स्वीकार भी किया क्योंकि उन आलोचनाओं के पीछे पवित्र नीयत थी। किन्तु जो लोग हिन्दू धर्म को लक्षित करके नुकसान पहुँचाने के लिए बाबा साहेब के कंधों का दुरुपयोग करने का प्रयत्न करते हैं, वे भूल जाते हैं कि बाबा साहेब ने सिर्फ हिन्दू धर्म की कमियों की ही आलोचना नहीं की, बल्कि उन्होंने ईसाई और इस्लाम संप्रदाय को भी उसके दोषों के लिए कठघरे में खड़ा किया है। ‘बहिष्कृत भारत’ में 1 जुलाई, 1927 को लिखे अपने लेख ‘दु:ख में सुख’ में बाबा साहेब लिखते हैं- “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि प्रकार के भेद सिर्फ हिन्दू धर्म में ही हैं, ऐसी बात नहीं, बल्कि इस तरह के भेद ईसाई और इस्लाम में भी दिखाई देते हैं”। इस्लाम पर तो बाबा साहेब ने खूब कलम चलाई है। परंतु यहाँ तथाकथित प्रगतिशील बौद्धिक जगत एवं अन्य लोगों की बौद्धिक चालाकी उजागर हो जाती है, जब वे इस्लाम के संबंध में बाबा साहेब के विचारों पर या तो चुप्पी साध जाते हैं या फिर उन विचारों पर पर्दा डालने का असफल प्रयास करते हैं। आज बाबा साहेब होते तो वे निश्चित ही ‘भीम-मीम’ का खोखला, झूठा और भ्रामक नारा देने वालों को आड़े हाथों लेते।