गुरुवार, 17 जुलाई 2014

संघ बांटता नहीं, जोड़ता है

वरिष्ठ समालोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह 
 दे श के जाने-माने समालोचक और बुद्धिजीवी विजय बहादुर सिंह का समाज में बड़ा आदर है। हजारों लोगों की तरह मैं स्वयं भी उनका मुरीद हूं। उनकी ओजस्वी वाणी और सशक्त लेखनी सदैव समाजहित में कुछ नया रचने-करने को उद्देलित करती है। भोपाल में आयोजित मीडिया चौपाल के समापन समारोह में उन्हें पहली बार सुना था। जब वे बोल रहे थे तो सभागार में सन्नाटा खिंच गया था, मानो सभागार में उनके अलावा कोई और नहीं हो। असल में करीब दो सौ लोगों की मौजूदगी से सभागार खचाखच भरा था। लेकिन उनके शानदार और भावपूर्ण भाषण को सब मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। अपनी बात कहने और लोगों को प्रभावित करने का यह अनोखा जादू आज के दौर में कम ही देखने को मिलता है। लेकिन विजय बहादुर जी इसमें सिद्धहस्त हैं। उनके भाषण के बाद, उनके विचारों से प्रभावित होकर एक मीडियाकर्मी अपनी कुर्सी से उठकर मंच की ओर आया और विजय बहादुर सिंह के चरणों में नमन करने लगा। यह था उनके ओजपूर्ण और संवेदनाओं से भरे भाषण का असर। अपनी बात को आगे बढ़ाने से पहले यहां एक-दो बातें बता देना चाहूंगा- मीडिया चौपाल का आयोजन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अनिल सौमित्र  की परिकल्पना है और जिस मीडियाकर्मी ने विद्वानों से सुशोभित सभागार में विजय बहादुर जी के चरणस्पर्श किए वह भी संघ का स्वयंसेवक था। 
          इस वाकये के बाद उद्भट विद्वान विजय बहादुर सिंह से कई बार भेंट हुई और बीच-बीच में उनको सुना-पढ़ा भी। मीडिया चौपाल में उनके भाषण को सुनकर जितनी उमंग का संचार हुआ था, मीडिया विमर्श में उनकी विशेष टिप्पणी पढ़कर उतनी ही निराशा हुई। वरिष्ठ पत्रकार, संपादक और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र पर केंद्रित मीडिया विमर्श के मार्च-२०१४ के अंक में पृष्ठ १०३ पर 'कठिन संभावनाओं के बीच शिवराज' शीर्षक से उन्होंने यह विशेष टिप्पणी लिखी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बहाने उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। अपनी सशक्त लेखनी से संघ की कमजोर आलोचना की है। संघ के संदर्भ में उनकी समालोचना किसी पूर्वाग्रह की चपेट में दिखी। अपनी विशेष टिप्पणी में उन्होंने संघ को कट्टर, विध्वंसक और तानाशाही परंपरा के पैरोकार के रूप में निरूपित करने की कोशिश की है। आलेख में श्री विजय बहादुर एक जगह लिखते हैं - 'अगर भाजपा के ताकतवर नायक नहीं चेते और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रोज-रोज अधिक पावरफुल होता गया तो एक वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन आएगा ही आएगा जब यह देश दोबारा बंटेगा और इस बार इसका अपराध और कलंक भाजपा के माथे का सबसे बड़ा ऐतिहासिक कलंक साबित होगा।' संघ के बारे में लगातार मीडिया में आने वाली नकारात्मक खबरों और नेताओं-बुद्धिजीवियों द्वारा भी लगातार संघ की निंदा किए जाने पर एक दफा वरिष्ठ प्रचारक से मैंने इसका कारण जानना चाहा। तब उन्होंने एक लाइन में इसका जवाब दिया था- 'किसी को संघ समझना है तो उसे संघ के नजदीक आना होगा। संघ को लेकर नकारात्मक टिप्पणी करने वाले लोग संघ के नजदीक आना ही नहीं चाहते तो वे कैसे संघ को समझेंगे।' उनका जवाब मुझे सच और वास्तविकता के काफी करीब लगा। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करीब आकर मेरी स्वयं की भी कई धारणाएं टूटी हैं। जहां तक मेरी जानकारी है विजय बहादुर जी संघ के लोगों के नजदीक रहे हैं, संघ के अनुषांगिक संगठनों के कार्यक्रमों में भी शामिल होते रहे हैं लेकिन प्रत्यक्षतौर पर संघ में कभी नहीं गए हैं। शायद यही कारण है कि संघ को लेकर उनके मन-मस्तिष्क में तमाम पूर्वाग्रह यथावत हैं। बहरहाल, संघ ही एकमात्र ऐसा बड़ा संगठन है जो देश के विभाजन के पक्ष में कतई नहीं है। वरना कम्युनिस्ट और दूसरे संगठन-लोग तो कब से जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की फिराक में है। जम्मू-कश्मीर इस देश का अभिन्न हिस्सा है और किसी भी कीमत पर इसे अलग नहीं होने देंगे, यह दंभ तो संघ और उसके अनुषांगिक संगठन ही भरते हैं। बाकी कई तो जम्मू-कश्मीर मामले पर भारत विरोधी बयान ही देते रहते हैं। संघ ही वह संगठन है जिसके कार्यकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर को देश का अभिन्न हिस्सा साबित करने के लिए बलिदान दिया है। संघ ही है जो राष्ट्रवादी विचारधारा का संचार लोगों के हृदय में कर रहा है। संघ ही है जो देश के लिए मरने से अधिक जीने की बात करता है। वह भी संघ ही है जो लगातार समाज और राजनीति को चेताता है कि स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण न होने से भारत वर्षों से खण्ड-खण्ड हो रहा है। अब जागने का वक्त है, देश की चिंता करने का वक्त है, अब देश के और टुकड़े न हों इसके लिए संघ सब समाज से आह्वान करता है। 
केरल में भूस्खलन के दौरान राहतकार्य करते स्वयंसेवक
        संघ विध्वंसक नहीं सृजक है। समाज में ऊंच-नीच की खाई को पाटने का काम संघ कर रहा है। सामाजिक समरसता के लिए संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के द्वारा किए जा रहे प्रयासों से दलित मसीहा बाबा भीमराव अम्बेडकर और अहिंसा के महान पुजारी महात्मा गांधी भी प्रभावित हुए थे। छोटे कद के ताकतवर प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को संघ के अनुशासन पर इतना भरोसा था कि सन् १९६५ में पाकिस्तान से युद्ध के समय दिल्ली की यातायात व्यवस्था की महती जिम्मेदारी ही स्वयंसेवकों को सौंप दी। यही नहीं दिल्ली के अस्पतालों में गंभीर घायल अवस्था में भर्ती सैनिकों को जब रक्त की जरूरत पड़ी तो सबसे पहले संघ के स्वयंसेवकों को बुलाया गया। देश में कहीं भी आपात स्थिति आती है तो राहत और बचाव कार्य के लिए वहां सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता ही खाकी नेकर में नजर आते हैं। हाल ही में उत्तराखण्ड त्रासदी में भी संघ के स्वयंसेवकों ने पीडि़तों की तन-मन-धन से मदद की। भारत की इलेक्ट्रोनिक मीडिया के इतिहास में पहली बार संघ के काम को सकारात्मक नजरिए से प्रस्तुत किया गया। वंचित और समय के साथ पिछड़ गए समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए संघ देश में हजारों की संख्या में नियमित रूप से सेवा और स्वावलंबन के प्रकल्प चला रहा है, बिना किसी भेदभाव के। 
         श्री विजय बहादुर अपनी टिप्पणी में एक-दो जगह यह बताने की कोशिश करते हैं कि संघ मुस्लिम विरोधी है। आज की स्थिति में यह किसी भी तरह सच नहीं दिखता। संघ की शाखाएं तो सुबह-शाम खुलेआम मैदान और पार्कों में लगती हैं। शाखाओं को देखने, उनमें शामिल होने से कोई किसी को नहीं रोकता। नजदीक से देखा और अनुभव किया हुआ ग्वालियर का एक प्रकरण मेरे ध्यान में आता है। वहां एक शाखा में मुस्लिम बच्चे आते थे, इस बात पर बच्चों के पिता और दादा में बहस होती थी। उस युवक ने अपने पिता के विचारों से इतर जाकर, बच्चों को संघ की गणवेश लाकर दी और स्वयं उन्हें शाखा में छोडऩे गया। हालांकि बाद में मुस्लिम समाज के दबाव के आगे उसे झुकना पड़ा। चम्बल के एक कस्बे भिण्ड का एक मुस्लिम युवक मेरे साथ पत्रकारिता कर रहा था, उसने मुझे बताया कि वह आरएसएस का बेहद सम्मान करता है और वह तो आरएसएस का प्रचारक बनाना चाहता था लेकिन घरवालों ने अनुमति नहीं थी। ये कुछ घटनाएं साबित करती हैं कि संघ कभी भी मुस्लिम विरोधी नहीं रहा है, बस उसे नजदीक से देखने की जरूरत है। संघ तो समाजकंटकों का विरोधी रहा है। संघ ही था जिसने भारत के सर्वोच्च पद (राष्ट्रपति) के लिए मिसाइल मैन के नाम से ख्यात देश के जाने-माने वैज्ञानिक एपीजे कलाम का आगे बढ़ाने पर भाजपा की पीठ थपथपाई। दरअसल, संघ ने कभी-भी मुसलमानों के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं किए हैं। यह अलग बात है कि तमाम बुद्धिजीवियों और सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले राजनेताओं के बहकावे में आकर मुस्लिम बंधु खुद ही संघ की देहरी नहीं चढ़े। सामाजिक समरसता की बात करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ही आखिर मुस्लिमों के लिए अलग मंच बनाना पड़ा। सांप्रदायिकता के अंधे गलियारे में भटक रहे मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाने के लिए संघ राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच के तहत एक बड़ा आंदोलन चला रहा है। संघ के चेहरे पर कट्टरवादी छवि का मुखौटा चेंप रहे बुद्धिजीवी उसकी उदारता की गहराई को जरा समझने की कोशिश करें तो शायद उनका स्वयं का पूर्वाग्रह तो दूर होगा ही, समाज भी भ्रमित होने से बच सकेगा। 
          सरल और सहज स्वभाव के धनी विजय बहादुर सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा (जिसे संघ के लोग व्यक्ति निर्माण का कारखाना कहते हैं) से निकलकर आए कलकत्ता विश्वविद्यालय में आचार्य रहे पंडित विष्णुकांत शास्त्री, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को तो पसंद करते हैं लेकिन संघ को नहीं। वे चन्द्रगुप्त मौर्य को तो चाहते हैं लेकिन उसके निर्माता और राष्ट्रहित में स्पष्ट सोच रखने वाले चाणक्य की निंदा करते हैं।    यह तो वही बात हुई कि कठोरता के लिए नारियल की निंदा करना और उसके अन्दर के स्वादिष्ट गूदे के प्रशंसक होना। छोटे मुंह बड़ी बात होगी, मुझ जैसे अदने से लेखक के लिए साहित्य और समाज के विराट व्यक्तित्व की बात को काटना। लेकिन फिर मेरा आग्रह है वाणी और लेखनी के जादूगर से कि वे बेफिक्र रहें, जब तक संघ है तब तक न देश बंटेगा, न मिटेगा और न ही बिकेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य देश को जोडऩा है, उसे खण्ड-खण्ड होने से बचाना है। इसी पवित्र उद्देश्य के लिए संघ प्रतिदिन तमाम व्यवधानों के बीच कर्मपथ पर आगे बढ़ रहा है। आज जब पश्चिम से आए भौतिकवाद के अंधड़ में हम आत्म विस्मृत हो रहे हैं तब संघ अपनी शाखाओं में भारत की संस्कृति, मूल्यों और दायित्वों का बोध करा रहा है। इसलिए हमें उसकी घृणा की हद तक निंदा नहीं बल्कि समालोचना करनी चाहिए ताकि वह अपने पथ से डिगे नहीं, भटके नहीं और देशहित में सही राह पर चलता रहे।  
(मीडिया विमर्श में प्रकाशित आलेख)

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

अभूतपूर्व चुनाव का अहम दस्तावेज 'मोदी लाइव'

 सो लहवीं लोकसभा का आम चुनाव अपने आप में अनोखा था। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहला मामला था जब समस्त राजनीतिक दल सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ न होकर एक विपक्षी पार्टी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहे थे। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को घेरने का काम सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं कर रहे थे बल्कि लेखक और बुद्धिजीवी वर्ग भी निचले स्तर तक जाकर मोदी विरोधी अभियान चला रहे थे। लेकिन, कांग्रेस के भ्रष्टाचार, घोटालों-घपलों और कुनीतियों से तंग जनता ने न केवल मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया बल्कि भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व, अकल्पनीय बहुमत दिया और कांग्रेस के गले में डाल दी ऐतिहासिक हार। 
भारत के सबसे लम्बे चलने वाले आम चुनाव-२०१४ की तारीखों की घोषणा के पहले से लेकर परिणाम के बाद तक की प्रक्रिया पर पैनी नजर रखने वाले देश के जाने-माने चुनाव विश्लेषक संजय द्विवेदी की पुस्तक 'मोदी लाइव' इस अभूतपूर्व चुनाव का एक अहम दस्तावेज है। श्री द्विवेदी भले ही आमुख में यह लिखें - ''यह कोई गंभीर  और मुकम्मल किताब नहीं है। एक पत्रकार की सपाटबयानी है। इसे अधिकतम चुनावी नोट्स और अखबारी लेखन ही माना जा सकता है।'' लेकिन, दो दशक से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय संजय द्विवेदी को जानने वाले जानते हैं कि उनका राजनीतिक विश्लेषण गंभीर रहता है। वे सपाटबयानी के साथ गहरी बातें कहते हैं, जो भविष्य में सच के काफी करीब होती हैं। इसी पुस्तक के कई लेखों में उनकी गहरी राजनीतिक समझ और ईमानदार विश्लेषण से परिचित हुआ जा सकता है। २५ जनवरी को लिखे गए एक आलेख में उन्होंने संकेत दिया था- ''इस बार के चुनाव साधारण नहीं, विशेष हैं। ये चुनाव खास परिस्थियों में लड़े जा रहे हैं जब देश में सुशासन, विकास और भ्रष्टाचार मुक्ति के सवाल सबसे अहम हो चुके हैं। नरेन्द्र मोदी इस समय के नायक हैं। ऐसे में दलों की बाड़बंदी, जातियों की बाड़बंदी टूट सकती है। गठबंधनों की तंग सीमाएं टूट सकती हैं। चुनाव के बाद देश में एक ऐसी सरकार बन सकती है जिसमें गठबंधन की लाचारी, बेचारगी और दयनीयता न हो।'' चुनाव परिणाम से उनकी एक-एक बात सच साबित हुई। लम्बे समय बाद किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिला। गठबंधन की अवसरवादी राजनीति से देश को राहत मिली। जात-पात और वोटबैंक की राजनीति काफी कुछ छिन्न-भिन्न हुई। अवसरवादी राजनीति के पर्याय बनते जा रहे क्षेत्रीय दलों का सफाया हो गया। राजनीतिक छुआछूत की शिकार भाजपा सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी बनकर उभरी, दक्षिण-पूर्व में भी कमल खिला। 
कांग्रेस के भ्रष्टाचार से अधिक, समय के साथ लोकनायक बनते जा रहे नरेन्द्र मोदी के कारण यह आम चुनाव सर्वाधिक चर्चा का विषय बना। संभवत: यह नए भारत का एकमात्र चुनाव है, जिसने फिर से राजनीतिक चर्चा-बहस को घर-घर तक पहुंचाया। राजनीति के नाम से ही बिदकने वाले लोग भी सकारात्मक परिवर्तन की बात कर रहे नरेन्द्र मोदी के भाषण गौर से सुन रहे थे। सबसे अहम बात यह है कि राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों के बीच ही नहीं युवाओं और महिलाओं के बीच भी नरेन्द्र मोदी चर्चा का केन्द्र बने। बच्चों की तोतली जुबान पर भी मोदी का नाम चढ़ा हुआ था। गुजरात से निकलकर देश के जनमानस पर यूं छा जाने के नरेन्द्र मोदी के सफर को 'मोदी लाइव' में आसानी से समझा जा सकता है। नरेन्द्र मोदी को किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, कैसे उन्होंने विरोधियों की ओर से उछाले गए पत्थरों से मंजिल तक पहुंचने के लिए सीढ़ी बनाई, कैसे अपनों से मिल रही चुनौती से पार पाई, इन सवालों के जवाब आपको मिलेंगे मोदी लाइव में। इसके साथ ही श्री द्विवेदी ने बहुत से सवाल राजनीतिक विमर्श और शोध के लिए अपनी तरफ से प्रस्तुत किए हैं। निश्चित ही उन सवालों पर भविष्य में राजनीति के विद्यार्थियों को शोध करना चाहिए और राजनीतिक विचारकों को सार्थक विमर्श। 
पुस्तक के पहले ही लेख 'भागवत, भाजपा और मोदी!' में श्री द्विवेदी उन तमाम विश्लेषकों का ध्यान दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन के सफल प्रयोग की ओर दिलाते हैं, जिसके कारण भारतीय जनता पार्टी को ऐतिहासिक विजय मिली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक खास नजरिए से देखने वाले बुद्धिजीवी सदैव उसका गलत मूल्यांकन करते हैं। इस सच को सबको स्वीकार करना होगा कि आरएसएस राजनीतिक संगठन नहीं है लेकिन जब बात देश की आती है तो राजनीतिक परिवर्तन के लिए भी वह चुप रहकर काम करता है। लोकनायक जेपी के नेतृत्व में व्यवस्था परिवर्तन के लिए खड़ा किया गया आंदोलन हो या फिर आपातकाल के खिलाफ संघर्ष, आम समाज की नजर में संघ की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। बावजूद इसके देश के तमाम तथाकथित बड़े साहित्यकार, इतिहासकार और बुद्धिजीवी संघ की भूमिका और ताकत को नजरंदाज ही नहीं करते बल्कि उसकी गलत व्याख्या करते हैं। श्री द्विवेदी अपने इसी लेख में बताते हैं कि किस तरह संघ ने 'मोदी प्रयोग' को सफल बनाया। वे लिखते हैं - ''संघ के क्षेत्र प्रचारकों ने अपने-अपने राज्यों में तगड़ी व्यूह रचना की और माइक्रो मॉनीटरिंग से एक अभूतपूर्व वातावरण का सृजन किया। चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ाने और शत प्रतिशत मतदान के लिए संपर्क का तानाबाना रचा गया।'' संघ के इस प्रयास का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए कि दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र के महायज्ञ की तैयारी की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाने वाले चुनाव आयोग के अलावा आरएसएस ही एकमात्र ऐसा संगठन था जिसने अपनी पूरी ताकत मतदान प्रतिशत बढ़ाने में झोंक रखी थी। पुस्तक का आखिरी लेख भी संघ को समझने में काफी मदद करता है। वरिष्ठ पत्रकार भुवनेश तोमर ने इस बात का जिक्र बातचीत के दौरान किया था कि इस आम चुनाव में संघ की भूमिका का सही विश्लेषण किसी ने किया है तो वे संजय द्विवेदी ही हैं। वे बताते हैं कि यह संघ की ही तैयारी थी कि उत्तरप्रदेश में उम्मीद से अधिक अच्छा प्रदर्शन भाजपा ने किया। 
'मोदी लाइव' २१ आलेखों का संग्रह है। हर एक आलेख चुनाव से जुड़ी अलग-अलग जिज्ञासाओं का समाधान है। चुनाव के दौरान की परिस्थितियों का बयान करते आलेखों में मीडिया गुरु संजय द्विवेदी ने नरेन्द्र मोदी के नाम पर बौद्धिक प्रलाप कर रहे बुद्धिजीवियों के चयनित दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने ऐसे लेखकों को 'सुपारी लेखक' बताया है। लेखक ने लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक तरीके से एक व्यक्ति के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाने वाले यूआर अनंतमूर्ति, अशोक वाजपेयी, नामवर सिंह, के. सच्चिदानंद और प्रभात पटनायक जैसे स्वयंभू बुद्धिजीवियों को आड़े हाथ लिया है। मोदी का भय दिखाकर सदैव से मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति करने वालों की हकीकत बयान की है। श्री द्विवेदी ने अपने एक आलेख में बताया है कि कैसे कांग्रेस सहित अन्य दल मुस्लिमों का अपनी राजनीतिक दुकान चलाने के लिए इस्तेमाल करते आए हैं। इसके अलावा इस अभूतपूर्व आम चुनाव में मीडिया की भूमिका, चुनाव से पहले अंगड़ाई लेने वाले तीसरे मोर्चे का वजूद, राष्ट्रीय दलों की स्थिति, परिवारवाद और अवसरवाद की राजनीति को समझने का मौका 'मोदी लाइव' में संग्रहित श्री द्विवेदी के चुनिंदा आलेख उपलब्ध कराते हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ७० पृष्ठों की बड़ी महत्वपूर्ण पुस्तक 'मोदी लाइव' की भूमिका लिखी है। 'मीडिया विमर्श' ने ३० मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के मौके पर पुस्तक को प्रकाशित किया है। इसका आवरण शिल्पा अग्रवाल ने तैयार किया है। 
पुस्तक : मोदी लाइव
लेखक : संजय द्विवेदी
मूल्य : २५ रुपये
पृष्ठ : ७० 
प्रकाशक : मीडिया विमर्श
एम.आई.जी.-३७, हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी
कचना, रायपुर (छत्तीसगढ़)-४९२००१
ईमेल : mediavimarsh@gmail.com

शुक्रवार, 27 जून 2014

विकास के लिए जरूरी है स्वदेशी मॉडल

 भा रत १५ अगस्त, १९४७ को आजाद हुआ। प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने में जवाहरलाल नेहरू ने सफलता पाई। हालांकि देश सरदार वल्लभ भाई पटेल को अपना मुखिया चुनना चाहता था और चुना भी था। लेकिन, महात्मा गांधी की भूल कहें या जवाहरलाल नेहरू की जिद, सरदार को सदारत नहीं मिल सकी। बहरहाल, देश सशक्त हो, विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़े, इसके लिए जब नीतियां बनाने की बारी आई तो हमारे पहले प्रधानमंत्री ने विवेकानंद, गांधी, विनोबा और अरविन्द के विचारों की अनदेखी की। जवाहरलाल नेहरू विदेश में पढ़े-लिखे थे। उससे भी ज्यादा वे पश्चिम की चकाचौंध और साम्यवादी विचारधारा की गिरफ्त में भी थे। भारत के मानस को शायद वे नहीं समझ सके। यही कारण था कि उनके नेतृत्व में बनी नीतियों पर पश्चिमी और साम्यवादी मॉडल की स्पष्ट छाप देखी गई। गांधी के रामराज्य की परिकल्पना को कहीं अंधेरे में धकेल दिया गया। महात्मा की ग्रामवासिनी भारतमाता की चिंता भी उस व्यक्ति ने नहीं की जो गांधी के हस्तक्षेप के कारण ही प्रधानमंत्री बना। शहरों के विकास को प्राथमिकता दी गई, वह भी विकास के विदेशी मॉडल के आधार पर। गांधीजी को नजरअंदाज करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने विवेकानंद, अरविन्द, विनोबा, दीनदयाल और लोहिया के स्वदेशी चिंतन पर क्या कान दिया होगा, आज हम आसानी से समझ सकते हैं। प्रारंभ से पड़ी लीक से हटकर स्वदेशी मॉडल को विकसित करने में अब तक किसी ने रुचि नहीं दिखाई है। पश्चिम का पिछलग्गू बनकर हम आधुनिकता में भी पिछड़े ही रह गए। दूसरे के रंग में रंगकर हमने अपनी मौलिकता भी खो दी। कोई भी देश अपने स्वाभिमान, अतीत-वर्तमान के गौरव और स्वचिंतन के आधार पर ही आगे बढ़ सकता है, इस बात को भूलना नहीं चाहिए। भारत के आसपास ही चीन और जापान सहित अन्य देश आजाद हुए थे। आज चीन और जापान कहां है और हम कहां? जापान पर तो अमरीका ने परमाणु बम गिराकर उसकी कमर तक तोड़ दी थी। इसके बावजूद उसका हौसला कम नहीं हुआ। उसने अपने विकास का अपना मॉडल बनाया। नतीजा आज वह दुनिया के शीर्षस्थ देशों में से एक है। चीन और जापान विकसित देश हैं और हम अब भी विकासशील।
          किसी भी देश की अपनी संस्कृति होती है। उसकी अपनी भाषा-बोली, संचार की व्यवस्था होती है। उसकी अपनी भौगोलिक स्थिति होती है। उसकी अपनी पारिवारिक और सामाजिक संरचना होती है। किसी भी देश के विकास की नीतियां जब बनाई जाती हैं तो ये तथ्य ध्यान में रखने होते हैं। देश के मानस को समझना होता है। कोई भी नीति जब इन तथ्यों को ताक पर रखकर और विदेशी चकाचौंध को देखकर बनाई जाती है तो उसकी सफलता संदिग्ध हो जाती है। इसे एक सहज उदाहरण से समझ सकते हैं। किर्सी स्थूलकाय आदमी के नाप से पेंट सिलाकर किसी कृषकाय व्यक्ति को पहनाई जाएगी तो हास्यास्पद स्थिति ही बनेगी। संसाधनों का उपयोग कर पेंट तो सिलवा ली लेकिन क्या वह किसी काम आ रही है? ऐसी पेंट का क्या किया जाए? इस देश में यही हुआ। सरकारों ने देश की जरूरत को नहीं समझा, उसके मानस को नहीं समझा। साठ साल में विकास का स्वदेशी मॉडल भी तय नहीं कर सके। २०० साल की गुलामी की विरासत में अंग्रेज जो सौंप गए हमारे नेता उसे ही आगे बढ़ाते रहे हैं। दरअसल दोष उनका नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा का था। शिक्षा को लेकर मैकाले की नीति से हम सब वाकिफ हैं। भारत को सदैव मानसिक रूप से पश्चिम को गुलाम बनाने के लिए किस तरह उसने भारतीय शिक्षण प्रणाली को ध्वस्त किया। अंग्रेजियत के बुखार से पीडि़त हमारे नीति निर्माताओं के मन में यह बात गहरे पैठ गई थी कि जो कुछ पश्चिम में हुआ और हो रहा है, वह निश्चित ही श्रेष्ठ है। पश्चिम ही बेहतर है, इस व्याधि से ग्रस्त नेतृत्व क्यों स्वदेशी मॉडल की चिंता करने लगा। वह तो उसी पश्चिमी मॉडल को हम पर लादने को आतुर था, जिसकी जरूरत और समझ इस देश की ७० फीसदी आबादी को नहीं थी, लेकिन उसे पश्चिमी मॉडल से ब्लाइंड लव था। गांधीजी के स्वदेशी विकास के मॉडल में गांवों का विकास प्राथमिकता में था जबकि नेहरू की प्राथमिकता शहरों का विकास थी। भारत कृषि प्रधान देश है। उस वक्त कृषि उत्पादन में हम शीर्ष पर थे। यह हमारी ताकत थी। हमारे नेतृत्व ने इसकी अनदेखी की। जब आप अपनी ताकत की अनदेखी करते हैं तो निश्चित ही मुश्किल का सामना करना पड़ता है। बहुसंख्यक समाज की अनदेखी का ही नतीजा है कि स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनस्तर, पर्यावरण, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की क्या स्थिति है? सब वाकिफ हैं। एक भी क्षेत्र में हम मजबूती के साथ नहीं खड़े हैं। जब नींव ही खोखली है तो इमारत का कमजोर होना निश्चित है। हजारों लोगों के बलिदान और संघर्ष से हासिल स्वाधीनता के बाद व्यवस्था में हम क्या बदलाव लाए, सोचने की बात है। सत्ता सुख ध्येय हो जाए तो देश की चिंता रहती किसे है। देश के विकास के लिए नई नीतियां बनाना तो छोडि़ए हमारे राजपुरुष तो अंग्रेजों के बनाए कानूनों और व्यवस्थाओं को अब तक घसीट रहे हैं। राजनीति अब समाजसेवा का माध्यम नहीं रही बल्कि भोग-विलास का साधन बनकर रह गई है। समाज के लिए स्वयं को खपाने वाले लोग अब राजनीति में बहुत खोजने पर ही मिलेंगे। 
            अदूरदर्शी सोच और गलत नीतियों के फलस्वरूप ६० साल बाद हम कहां खड़े हैं? गरीब और गरीब होता जा रहा है। अमीर दोगुनी-चौगुनी गति से अमीर हो रहा है। एक छोटा-सा घर तो छोडि़ए जनाब ६० फीसदी से अधिक आबादी को दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है। पश्चिमी मॉडल के कारण आज पर्यावरण जो क्षति पहुंची है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। युवा ताकत को हम पहचान नहीं रहे, उनके हाथों को काम नहीं दे पा रहे हैं, हमारी सरकारों ने समय के साथ बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दी है। तकनीक और उत्पादन में हम कहां हैं? शिक्षा का स्तर क्या है? भारत कितना स्वस्थ है? ऐसे तमाम सवाल हैं जो हुक्कामों का मुंह नोंचने के लिए छटपटा रहे हैं। वाजिब सवाल निरुत्तर खड़े बैचेन-से हैं। होना यह था कि जब हमारे हाथ में सत्ता की चाबी आई थी तब ही तय करना था कि हमें जाना किधर है? भारत के मानस को समझकर विकास का मॉडल तय करना चाहिए था। एकात्म मानववाद के जनक पं. दीनदयाल उपाध्याय के कतार के अंतिम व्यक्ति की चिंता का मॉडल बनना चाहिए था। महात्मा गांधी के रामराज्य की अवधारणा को समझना चाहिए था। भारत की तासीर को पहचान कर, महसूस करके, उसके अनुरूप नीतियां बनानी थी। ऐसा मॉडल बनना चाहिए था जिसमें व्यक्ति, परिवार, समाज, नगर, राज्य और देश की जरूरतों को ध्यान में रखा जाता। स्वदेशी और सर्वस्पर्शी मॉडल के जरिए ही हम दुनिया के सामने 'मॉडल' के रूप में स्थापित हो सकते थे। 

गुरुवार, 19 जून 2014

चुनाव और राजनीति की रिपोर्टिंग सिखाती किताब

 ते ज रफ्तार इलेक्ट्रोनिक मीडिया के महत्वपूर्ण और प्रमुख संवाददाता की जिंदगी भागम-भाग की होती है। वह भारत की वाचक परंपरा का प्रतिनिधि होता है। नियमित लेखन के लिए समय निकालने वाले इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकार विरले ही होते हैं। एबीपी न्यूज के मध्यप्रदेश के ब्यूरोचीफ बृजेश राजपूत ऐसे ही हैं। लिखने की धुन और जुनून उनके भीतर है। टीवी स्क्रीन पर नित्य-प्रतिदिन छाए रहने वाले बृजेश राजपूत अखबारों और पत्रिकाओं में भी नियमित छपते रहते हैं। दैनिक जागरण से अपने पत्रकार जीवन की शुरुआत करने वाले बृजेश राजपूत दैनिक भास्कर में होते हुए डीडी मेट्रो के मार्फत इलेक्ट्रोनिक मीडिया में पहुंचे। एक दशक से भी अधिक वक्त से वे इलेक्ट्रोनिक मीडिया को जी रहे हैं और उसे नजदीक से देख रहे हैं। बीते दस वर्षों में मध्यप्रदेश की राजनीति में आए उतार-चढ़ाव को भी उन्होंने बेहद करीब से देखा है। इसलिए जब बृजेश राजपूत 'चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग' पर किताब लिखते हैं तो वह न केवल राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है बल्कि मीडिया में आने की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए भी जरूरी बन जाती है। उनकी किताब 'चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग' मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव-२०१३ पर केन्द्रित है। 
           मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव-२०१३ कई मायनों में अहम था। यह चुनाव आम आदमी के नेता की छवि वाले शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता की परीक्षा था तो केन्द्र की सत्ता के लिए होने वाले महासंग्राम का सेमीफाइनल भी था। ऐतिहासिक भ्रष्टाचार और घोटालों से किरकिरी करा चुकी कांग्रेस भी पांच राज्यों में एक साथ हो रहे इन चुनावों के माध्यम से अपनी ताकत को समेटना चाहती थी। मध्यप्रदेश में उसे उम्मीद अधिक थी। भाजपा लगातार दो बार से सत्ता में थी इसलिए कांग्रेस सोच रही थी कि भाजपा के खिलाफ एंटीइनकम्बेंसी होगी। यही कारण रहा कि पूरी ताकत के साथ रणक्षेत्र में डटने के लिए कई धड़ों में बंटी कांग्रेस को एकजुट होने के स्पष्ट संकेत राहुल गांधी ने दिए थे। एकजुटता के प्रयास हुए भी लेकिन सिर्फ दिखाने के लिए। मध्यप्रदेश के चुनाव में रोचक मोड़ तब आया जब कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रबंधन समिति का अध्यक्ष केन्द्रीय मंत्री और ईमानदार छवि के युवा ज्योतिरादित्य सिंधिया को बनाया गया। खैर, चुनाव की चर्चा को छोड़ते हैं, चुनाव आंखों देखा हाल तो आप बृजेश राजपूत की इस पुस्तक में पढ़ ही सकते हैं। पुस्तक बेहद सरल और सहज प्रवाह में लिखी गई है। लेखक की भाषा-शैली ऐसी है कि वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार भी लिखते हैं- 'किताब को पढ़ते वक्त लगा कि कोई चुनाव के बाद किस्सा सुना रहा है और इस तरह सुना रहा है कि जैसे इस वक्त चुनाव हो रहे हों। एकदम लाइव कमेंट्री की तरह।'
          किताब की बात करें तो 'चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग' को आप तीन हिस्सों में रखकर देख सकते हैं। शुरू के पहले हिस्से में लेखक ने यह बताने की कोशिश की है कि चुनाव पर यह किताब क्यों लिखी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि चुनाव रिपोर्टिंग क्यों और कैसे की जाती है या की जानी चाहिए। यह हिस्सा खासकर मीडिया के विद्यार्थियों या नए पत्रकारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस अध्याय में राजनीतिक पत्रकारिता में लम्बा समय बिता चुके एक संजीदा पत्रकार ने अपने अनुभव साझा किए हैं। इसी हिस्से में श्री राजपूत ने बताया है कि मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव-२०१३ क्यों खास रहे। क्यों देशभर के मीडिया की नजरें मध्यप्रदेश के चुनाव पर थीं। १९२ पृष्ठ की 'चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग' के संबंध में देश के वरिष्ठ पत्रकारों की टिप्पणियां भी पुस्तक के पहले हिस्से में ही हैं। पुस्तक का दूसरा हिस्सा बृजेश राजपूत के सक्रिय लेखन को जाहिर करता है। इस हिस्से में मध्यप्रदेश चुनाव की तस्वीर बताते उनके तेरह लेख शामिल हैं। ये आलेख चुनाव की शुरुआत के पहले से लेकर परिणाम के बाद तक का हाल बयान करते हैं। तीसरे हिस्से में चुनाव-२०१३ को चित्रों और आंकड़ों के आईने में समझने की कोशिश है। यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राजनीति-मीडिया के विद्यार्थियों, राजनीतिक विचारकों, विश्लेषकों और भविष्य के चुनाव के लिए यह पुस्तक एक उपयोगी दस्तावेज साबित होगी। मध्यप्रदेश के छोटे से जिले नरसिंहपुर के करेली से निकलकर देश के क्षितिज पर छा जाने वाले सौम्य स्वभाव के बृजेश राजपूत ने मध्यप्रदेश की धरती पर ही नहीं बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखण्ड में घूम-घूमकर समाज के मिजाज को समझा है। राजनीतिक पत्रकारिता के अलावा वे सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता को भी साथ लेकर चलते हैं। पत्रकारिता में अपने काम के लिए कई पुरस्कारों से नवाजे गए बृजेश राजपूत को इस किताब के लिए बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
पुस्तक : चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग
लेखक : बृजेश राजपूत
मूल्य : १९५ रुपये
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन
पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैण्ड, सीहोर-४६६००१ 
फोन : ०७५६२४०५५४५
ईमेल : shivna.prakashan@gmail.com

सोमवार, 26 मई 2014

सशक्त समाज के लिए जरूरी है स्वतंत्र पत्रकारिता


लेखक लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' विमोचित 
ग्वालियर, २४ मई। पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं का संप्रेषण नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता में संवेदनशील लेखन होना चाहिए। आज देश में जिस प्रकार से पत्रकारिता और राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हो रही हैं, उनके मूल में विदेशी पूंजी निवेश है। इसलिए सशक्त समाज के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता बहुत आवश्यक है। वर्तमान में पत्रकार परतंत्र हो गए हैं, जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी प्राप्त नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। यह बात गणेश शंकर विद्यार्थी मंच एवं जीवाजी विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में 'पत्रकारिता, राजनीति और देश' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में आमंत्रित वक्ताओं ने कही। गालव सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के प्रोडक्शन सहायक लोकेन्द्र सिंह राजपूत की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' का विमोचन भी किया गया। 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर थे। जबकि अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक जगदीश तोमर ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष एवं राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी उपस्थित थे। इस मौके पर स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा एवं पुस्तक के लेखक लोकेन्द्र सिंह भी मंचासीन थे।

राजनीति और पत्रकारिता एक सिक्के के दो पहलू : रघु ठाकुर
गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर ने कहा कि पत्रकारिता और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें धर्म के रास्ते पर चलाना चाहिए। धर्म का तात्पर्य यह है कि वह समाज की पीड़ा को समझें। उन्होंने पत्रकारिता की आजादी की बात करते हुए कहा कि आज देश में लिखने वाले परतंत्र हो गए हैं। जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। श्री ठाकुर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज राजनीति और पूंजी में एक रिश्ता बन गया है। राजनीति और पूंजी के घालमेल के कारण आज समाज प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसा लेखन करना चाहिए जिससे समाज सही दिशा पा सके। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों के मालिक निजी स्वार्थ देखते हैं। पत्रकारों के भले के लिए मालिक नहीं सोच रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी अब तक देश के प्रमुख समाचार पत्रों ने मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं। मजीठिया से संबंधित कोई समाचार भी समाचार-पत्रों में भेजा जाए तो एक लाइन भी नहीं छपेगा। उन्होंने मीडिया के वर्तमान स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के मीडिया के लिए खबर के मुख्य आधार हैं- क्राइम, कॉमेडी, क्रिकेट, सिनेमा और सेलेब्रिटी। सामाजिक सरोकार आज पत्रकारिता में कहीं पीछे छूट गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने आम चुनाव में खर्च की सीमा तय कर दी ७० लाख रुपए। ऐसे में क्या कोई आम आदमी चुनाव लड़ सकेगा। क्या आम आदमी चुनाव में खड़े होकर ७० लाख रुपए खर्च करने के क्षमता रखने वाले व्यक्ति से मुकाबला कर सकेगा। 

सवालों से मजबूत होता है लोकतंत्र : संजय द्विवेदी  
राजनीतिक विश्लेषक और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने कहा कि हिन्दुस्तान को समझने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि जनता को मीडिया और राजनेताओं से सवाल करते रहना चाहिए क्योंकि सवालों से ही लोकतंत्र मजबूत होता है। निष्पक्ष होकर पत्रकार को अपनी कलम चलानी चाहिए। किसी पार्टी विशेष से जुड़कर लिखेंगे तो उस लेखन में वह धार नहीं होगी। किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लेखन करना भी ठीक नहीं। चुनाव के दौरान कई लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी सुपारी लेकर कलम चला रहे थे कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे। क्यों नहीं बनने देंगे, इसका किसी के पास वाजिब जवाब नहीं था। यह तरीका ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता, राजनीति और देश आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता देश हित में होनी चाहिए। श्री द्विवेदी ने मुजफ्फरनगर के दंगों का जिक्र करते हुए बताया कि मुजफ्फरनगर के दंगों की रिपोर्टिंग गलत तरीके से की गई। इसका नतीजा यहा रहा कि स्थितियां और अधिक बिगड़ीं।  

स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है : रमाशंकर सिंह
कार्यक्रम के विशिष्ट आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह  ने कहा कि महात्मा गांधी भी मानते थे कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया और राजनीति में गहरा रिश्ता हो गया है, जिसे समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज शेयर बाजार, सट्टा और सर्वे कई गलत तस्वीरें समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान तभी आगे बढ़ेगा जब लोगों में सामाजिक न्याय के लिए भूख पैदा होगी। पत्रकारिता का यह दायित्व है कि लोगों में सामाजिक चेतना की भूख पैदा करे। 

कठपुतलियों की डोर अपने हाथ में ले जनता : लोकेन्द्र पाराशर
स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर ने कहा कि मीडिया और पत्रकारिता में भिन्नता है लेकिन समाज को दोनों एक ही दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया प्रबंधन हो रहा है तो उसमें पत्रकारिता नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज का दर्द लिखने के लिए लेखक या पत्रकार के मन में आग होनी चाहिए। यह आग एक से दूसरे के मन में जलनी चाहिए। पुस्तक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश कठपुतलियों के हाथ में नहीं होना चाहिए। अगर कठपुतलियों के हाथ में देश है भी तो इन कठपुतलियों की डोर हमारे हाथ में होनी चाहिए, किसी और के हाथ में डोर नहीं होनी चाहिए।

लोकेन्द्र ने देश के मानस को झकझोरा है : जगदीश तोमर
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश तोमर ने पत्रकारिता और पत्रकार को समाज का महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि आजादी के समय भी हर पत्रकार एक स्वतंत्रता सेनानी की भूमिका में था। पत्रकार अच्छे से काम कर सके, सकारात्मक पत्रकारिता कर सके इसके लिए समाज को उसका साथ देना चाहिए। पत्रकारिता के मूल्यों में समय के साथ कमी आई है लेकिन यह सही नहीं है कि पत्रकारिता में सब बुरा ही बुरा है। पत्रकारिता एकदम भ्रष्ट हो गई है। पत्रकारिता में अब भी अच्छे लोग हैं। उनका साथ देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता आज भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और वह अपना धर्म आज भी निभा रही है। श्री तोमर ने 'देश कठपुतलियों के हाथ में' पुस्तक के लेखक एवं युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह को बधाई देते हुए कहा कि लोकेन्द्र ने अपने आलेखों के माध्यम से देश के मानस को झकझोरने की कोशिश की है। उनके लेखों में सकारात्मकता है। पत्रकारिता को सही मायने में एक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। लोकेन्द्र ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से उसी विपक्ष की भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि लोकेन्द्र सिंह के आलेख ही नहीं बल्कि उनकी कहानियां भी विचारोत्तेजक हैं। वे लेखक हैं, कहानीकार हैं, कवि हैं। लोकेन्द्र बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं।

प्रबुद्धजन रहे मौजूद : 
पुस्तक विमोचन समारोह और संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सहकार्यवाह यशवंत इंदापुरकर, दूरदर्शन केन्द्र ग्वालियर के निदेशक संतोष अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र श्रीवास्तव, सुरेश सम्राट, राकेश अचल, देव श्रीमाली, जनसम्पर्क विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. एच.एल. चौधरी, सुभाष अरोरा, प्रो. ए.पी.एस. चौहान, डॉ. केशव ङ्क्षसह गुर्जर, प्रो. अयूब खान सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया गया। अतिथियों का स्वागत हरेकृष्ण दुबोलिया, विभोर शर्मा, गिरीश पाल, विवेक पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन जयंत तोमर ने एवं आभार दूरस्थ शिक्षण अध्ययन के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा ने व्यक्त किया।

शुक्रवार, 16 मई 2014

साठ महीने दिए, अब अच्छे दिन दो

 न तीजे साफ हैं। एकदम खुला खेल फर्रुखाबादी टाइप। नरेन्द्र मोदी सरकार बनाएंगे। जनता ने उन्हें पूर्ण बहुमत दिया है। जनता ने मोदी के लिए अपना दिल खोलकर रख दिया है। भाजपा सरकार बनाएगी, यह जानबूझकर नहीं लिखा है क्योंकि सारा कमाल मोदी ब्रांड का है। नरेन्द्र मोदी की रणनीति काबिलेतारीफ है। मोदी ने एक राज्य से निकलकर दिल्ली तक का रास्ता बेहद करीने से साफ किया। जबकि रास्ते में कांटे ही कांटे थे। बहुत-से नुकीले कांटे तो उनके अपनों ने ही बिखराए थे। लेकिन, शतरंज के सबसे चतुर खिलाड़ी की तरह नरेन्द्र मोदी ने सूझबूझ से राजनीति की बिसात पर अपनी चालें चलीं। अथक मेहनत के बाद खेल को अपने पाले में कर लिया।

रविवार, 11 मई 2014

मेरा आसमान

 पि ताजी बेहद सख्त हैं। नारियल की तरह कठोर। अंतर्मन से नरम हैं या नहीं, कह नहीं सकता, क्योंकि कभी पिताजी के भीतर झांककर नहीं देखा। लेकिन, मां का व्यवहार बेहद मुलायमियत भरा है। उसकी तुलना नहीं की जा सकती। मां सृष्टि का केन्द्र है। खुदा है। भगवान है। जब भी ऐसा लगता था कि अपने से कुछ गड़बड़ हो गई है और पिताजी की डांट पडऩा तय है। तब पिताजी के शब्द-बमों से बचने का एक ही सुरक्षित बंकर नजर आता था, मां का आंचल। असल में मां का आंचल मेरे हिस्से का सबसे सुंदर आसमान भी था। उसकी साड़ी में जड़े मोती और सितारे, मेरे अपने चंदा मामा और तारे हुआ करते थे। पिताजी की नजरों से बचना होता था तो इसी आसमान को ओढ़ लिया करता था। मां ने बहुत पोथी तो नहीं पढ़ीं, लेकिन वह मेरी आंखें अच्छे से पढ़ लिया करती है, तब भी और आज भी। मां दुनिया को अच्छे से समझती है। जब वह इस दुनिया में मुझे लेकर आई तो उसे हमेशा मेरी सुरक्षा की फिक्र रहने लगी थी। कहीं किसी की नजर न लग जाए। तब कुछ लोगों की काली नजर से बचाने के लिए मां अपने आंचल में मुझे छिपा लिया करती थी। फिर जब बड़ा हुआ तो तेज धूप, लपट, धूल-धक्कड़ से बचाने के लिए भी वह इसी आसमान को मेरे सिर पर रख दिया करती थी और मैं दुनियावी झंझटों से बेफिक्र अपने चांद-तारों में खो जाया करता था। 
         एक दिन का वाकया अच्छे से याद है मुझे। तब मैं करीब दस बरस का था। शाम को दोस्तों के साथ खेलने पुलिस ग्राउंड गया था। वहां लाल रंग से पुते लगभग गोल और चिकने कंकर सड़क के दोनों ओर डाले गए थे। मैं रोज एक गिलास दूध पीता था और मेरा दोस्त गिलास भरकर चाय। मां की धारणा है कि दूध पीने वाला बच्चा अंदर से ताकतवर और फुर्तीला होता है जबकि ज्यादा चाय पीने वाला अंदर से फुंका हुआ रहता है। मां के इसी दर्शन पर दोस्त से बहस हो गई। मां सही कहती है या गलत इसको साबित करने के लिए शर्त रखी गई कि मैं दौड़कर उसकी साइकिल से आगे निकलकर दिखाऊं। दौड़ शुरू हुई। मां को सच साबित करने के लिए पूरी जान लगाकर दौड़ा। लक्ष्य तक पहुंचने के चंद कदम पहले ही मेरा पैर उन गोल और चिकने कंकरों पर पड़ गया। मैं फिसलता हुआ तय स्थान तक पहुंच गया। कौन हारा-जीता, नहीं देख सका। मेरी कनपटी बुरी तरह छिल गई थी। अरबी की सब्जी बनाने से पहले जैसे मां उसे टाट पर छीला करती है, ठीक वैसे ही मेरे गाल की खाल निकल आई थी। इसी गाल पर तो मां स्कूल जाने से पहले मुझे प्यार किया करती थी। 
          मैं दर्द से तड़प रहा था। दोस्त ने किसी तरह मुझे घर पहुंचाया। मुझे डर था कि पिताजी आज सिर्फ डांटेंगे ही नहीं बल्कि पीट भी सकते हैं। डर के मारे मैं चादर ओढ़कर सो गया। बिना खाना खाए जल्दी सोने पर मां को शक हुआ। उसने चादर उठाकर देखा, मैं जख्मी कनपटी को छिपाकर सो रहा था। लेकिन, चेहरे पर दर्द के भाव को उसने पढ़ लिया। मां ने हाथ पकड़ा। मैं बुखार में तप रहा था। मेरी हालत देखकर उसकी आंखों से आंसू छलक आए। 
           उसने गुस्से से कहा- 'तूने बताया क्यों नहीं।' 
         मैंने रोते हुए कहा- 'पिताजी का डर था। वो मारते मुझे।' 
मैं कुछ और बता पता, तब तक पिताजी आ गए। मां ने हमेशा की तरह आज फिर मेरे चेहरे पर अपना आंचल डाल दिया। मेरे सारे दर्द और डर जाते रहे। मां ने पिताजी को मेरी चोट के बारे में बताया। पिताजी ने कुछ नहीं कहा। जल्दी से ऑटो बुलाई और दोनों मुझे डॉक्टर के पास ले गए। रास्ते भर मैं मेरे हिस्से के आसमान में खोया रहा। ऐसे कई वाकये हैं जब सारे दर्द, व्यथाएं और चिंताएं मां के आंचल में कहीं खो जाती थीं। अब जब बड़ा हो गया तो लगता है कि मेरे हिस्से का वह आसमान कहीं खो गया है। मां है, उसका आंचल भी है लेकिन मैं ही अब पहले जैसा नहीं रहा हूं।