मं दिर, मठ या अन्य पूजा स्थल महज धार्मिक महत्व के स्थल नहीं होते हैं। ये अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था के गवाह होते हैं। अपने में एक इतिहास समेटकर खड़े रहते हैं। उनको समझने वाले लोगों से वे संवाद भी करते हैं। ग्वालियर से करीब ७० किलोमीटर दूर मुरैना जिले के सिहोनिया गांव में स्थित ककनमठ मंदिर इतिहास और वर्तमान के बीच ऐसी ही एक कड़ी है। मंदिर का निर्माण ११वीं शताब्दी में कछवाह (कच्छपघात) राजा कीर्तिराज ने कराया था। उनकी रानी का नाम था ककनावती। रानी ककनावती शिवभक्त थीं। उन्होंने राजा के समक्ष एक विशाल शिव मंदिर बनवाने की इच्छा जाहिर की। विशाल परिसर में शिव मंदिर का निर्माण किया गया। चूंकि शिव मंदिर को मठ भी कहा जाता है और रानी ककनावती के कहने पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया था, इसलिए मंदिर का नाम ककनमठ रखा गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् श्री जयंत तोमर बताते हैं कि सिहोनिया कभी सिंह-पानी नगर था। बाद में अपभ्रंश होकर यह सिहोनिया हो गया। यह ग्वालियर अंचल का प्राचीन और समृद्ध नगर था। यह नगर कछवाह वंश के राजाओं की राजधानी था। इसकी उन्नति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्वालियर अंचल के संग्रहालयों में संरक्षित अवशेष सबसे अधिक सिहोनिया से प्राप्त किए गए हैं। श्री तोमर बताते हैं कि तोमर वंश के राजा महिपाल ने ग्वालियर किले पर सहस्त्रबाहु मंदिर का निर्माण कराया था। सहस्त्रबाहु मंदिर के परिसर में लगाए गए शिलालेख में अंकित है कि सिंह-पानी नगर (अब सिहोनिया) अद्भुत है।
रविवार, 22 दिसंबर 2013
सोमवार, 9 दिसंबर 2013
शिवराज को मिला जनआशीर्वाद
म ध्यप्रदेश की जनता ने शिवराज सरकार में भरोसा दिखाया है। भारी बहुमत से जनता ने भाजपा को राज्य की कुर्सी सौंपी है। भाजपा को 165 सीटों पर विजय मिली है। पिछले चुनाव से 22 सीट अधिक। कांग्रेस 58 सीट पर सिमट गई। उसे इस चुनाव में फायदा होने की जगह पिछले चुनाव के मुकाबले 13 सीट का नुकसान हो गया। यह जीत चौंकाने वाली है, भाजपा के लिए भी और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी। दरअसल, 'महाराज' ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान सौंपकर कांग्रेस ने मुकाबला पेचीदा बना दिया था। बेहद कमजोर दिख रही कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जान फूंक दी थी। कांग्रेस पूरी ताकत के साथ भाजपा से मुकाबला करने खड़ी हो गई। माना जा रहा था कि कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी और भाजपा पूरी ताकत लगाने के बाद बमुश्किल 120 सीट जीत सकेगी। एक अनुमान यह भी था कि कांग्रेस भी सत्ता हासिल कर सकती है। दो बार से प्रदेश की राजगद्दी से नीचे खड़ी कांग्रेस एक बार फिर सरकार में वापसी करना चाहती थी, इसके लिए तमाम गुटों ने एकजुटता दिखाने की भी कोशिश की। 'युवराज' राहुल गांधी ने भी खास फोकस किया मध्यप्रदेश के चुनाव पर, टिकट वितरण पर भी। यानी कांग्रेस की सारी कवायद देखकर अचानक से यह लगा था कि भाजपा के लिए आसान दिख रहा मुकाबला काफी कड़ा होगा। नतीजा शिवराज सिंह चौहान सहित पूरा भाजपा संगठन जबर्दस्त प्रचार अभियान पर निकल लिया। आखिरकार 'फिर भाजपा-फिर शिवराज' का नारा लेकर चुनावी रण में उतरी भाजपा और शिवराज सिंह चौहान को जनआशीर्वाद मिल गया है।
मौटेतौर पर देखा जाए तो मध्यप्रदेश में भाजपा की जीत शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रिय छवि की जीत है। सरकार की लोककल्याणकारी और लोक लुभावन योजनाओं की जीत है। भाजपा की विचारधारा की जीत है। नरेन्द्र मोदी फैक्टर का भी असर है। भाजपा इसे सुशासन की भी जीत मान रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कई सरकारी योजनाओं से लोगों के दिलों में घर कर लिया है। लाड़ली लक्ष्मी योजना, कन्यादान योजना और बेटी बचाओ अभियान से जहां उन्होंने महिला वर्ग में खुद का महिला हितैषी ब्रांड बनाया वहीं बुजुर्गों को मुफ्त में तीर्थदर्शन करवाकर उनके वोट अपनी झोली में डाल लिए। अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए शिवराज सिंह चौहान जनआशीर्वाद मांगने के लिए प्रदेश के शहर-शहर और गांव-गांव तक पहुंचे। इस दौरान उन्होंने स्वयं की और सरकार की जमकर ब्रांडिंग की। हालांकि सरकार की तरफ से जनता के बीच सब अच्छा-अच्छा था, ऐसा भी नहीं था। प्रदेश सरकार के बहुतेरे मंत्रियों और विधायकों को लेकर जनता में भारी आक्रोश था। यही कारण है कि जनआशीर्वाद यात्रा और चुनाव प्रचार के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने प्रत्याशी के लिए वोट न मांगकर अपने नाम पर मतदान करने की अपील जनता से की। चुनाव से पूर्व टिकट वितरण में भाजपा ने काफी हद तक सावधानी बरतकर इस जीत की राह बनाई थी। करीब ५० टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया गया। ज्यादातर नए चेहरे जीते हैं जबकि पांच-छह मंत्री, जिनके टिकट कट जाने चाहिए थे लेकिन किसी कारणवश कट नहीं सके, वे चुनाव हार गए। शिवराज सिंह चौहान ने इस चुनावी लड़ाई को आम आदमी बनाम महाराज भी बना दिया था। निश्चित यह तरकीब शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में काम कर गई। शिवराज समझ रहे थे कि लोगों को अब राजनीति में अपने बीच का नेता ही चाहिए, राजवंश या खास परिवार की राजनीति के दिन लद गए हैं। नतीजों में यह दिखा भी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने ही गढ़ में कांग्रेस को बहुत अधिक सीट नहीं जितवा सके। यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया का नया चेहरा, ईमानदार छवि और महाराज वाला असर कांग्रेस के किसी काम नहीं आया। हां, यह बात अलग है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को और पहले काम करने का मौका कांग्रेस ने दिया होता तो शायद कुछ संभावना बनती, कांग्रेस के मजबूत होने की। संभवत: कांग्रेस की रणनीति रही होगी कि नवमतदाता यानी यूथ वोटर को सिंधिया के ग्लैमर से आकर्षित कर लिया जाए। लेकिन, नवमतदाताओं में तो नरेन्द्र मोदी का असर था। केन्द्र के चुनाव के लिए मोदी की तैयारी को मजबूत करने के लिए भी युवाओं ने अभी भाजपा को वोट दिया। केन्द्र में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए भाजपा को मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत की दरकार थी। यही कारण था कि मोदी ने चारों राज्यों में अथक चुनाव प्रचार किया। कई सभाएं लीं। एक ही दिन में अलग-अलग राज्यों में जनता को संबोधित किया। नतीजों में इसका असर भी दिखा है। मध्यप्रदेश में भी जहां-जहां नरेन्द्र मोदी ने सभा को संबोधित किया किया, वहां-वहां भाजपा के हित में नतीजे आए।
मध्यप्रदेश के विकास को भी शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव के दौरान बड़ा मुद्दा बनाया। शिवराज सिंह चौहान ने अपने भाषणों में जनता को दिग्विजय सिंह के शासन काल की याद दिलाई। कांग्रेस के ६० साल के विकास से अपने १० साल के विकास की तुलना कराई। उन्होंने जनता से वादा भी किया कि भाजपा को फिर सरकार में आई तो विकास की रफ्तार और तेज होगी। इस बात में कोई शंका नहीं कि पिछले १० साल में मध्यप्रदेश में काफी काम हुए हैं। यह जनता को दिख भी रहा था। यानी यह भी कहा जा सकता है कि सरकार ने विकास ने नाम पर जीत हासिल की है। अब देखना है कि भाजपा और उनके लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनता की भावनाओं को कैसे संभालकर रखते हैं। जनआशीर्वाद का कितना सम्मान करेंगे। जनादेश का कितना पालन करेंगे। इस बार शिवराज सिंह चौहान और भाजपा संगठन को इस बात पर सख्त होना पड़ेगा कि सरकार में भ्रष्टाचार न पनपे। साथ ही नेता जीत के बाद लापता न हो जाएं, जनता के बीच रहें, जनता के बीच दिखें, जनता के सुख-दु:ख में शामिल हों, जनता की समस्याएं सुनें और उनकी परेशानियों को दूर करने की दिशा में पहल करते दिखें। लगातार तीसरी बार जीत है, बड़ी जीत है, तो भाजपा गुरूर न करे। अदब से जनादेश को स्वीकार करें और विकास की पार्टी के रूप में बनी अपनी छवि को साबित करे।
इधर, भोपाल में शिवराज सिंह चौहान ने मीडिया से बात करते हुए भारी बहुमत के लिए जनता को धन्यवाद दिया। कार्यकर्ताओं की मेहनत को स्वीकार किया। प्रदेश से लेकर केन्द्रीय नेताओं का सहयोग के लिए आभार जताया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि जनता ने जिस उम्मीद और भरोसे के साथ भाजपा को फिर से सरकार बनाने का मौका दिया है, हम उस उम्मीद और भरोसे के लिए दिन-रात काम करेंगे। मध्यप्रदेश की जनता की सेवा के लिए रात-दिन एक कर देंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आम चुनाव में केन्द्र में सरकार बनाने के लिए मध्यप्रदेश अन्य राज्यों के अनुपात में अधिक सीटें देगा। बहरहाल, भाजपा के हौंसले बुलंद हैं, इस जीत से। दिल्ली में हुई प्रेसवार्ता में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश में तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेंगे। बड़ी जीत और तीसरी पारी से शिवराज सिंह चौहान की केन्द्र में स्थिति मजबूत होगी और भूमिका भी बढ़ेगी।
शनिवार, 7 दिसंबर 2013
पेड न्यूज बनाम विश्वसनीयता
भा रत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है। लोकतांत्रिक सरकार के चुनाव में देश का प्रत्येक व्यक्ति हिस्सेदार होता है। इसमें मीडिया की भी अहम भूमिका होती है। अखबार और न्यूज चैनल्स लगातार सत्य और तथ्यात्मक खबरें प्रकाशित कर अपनी साख आम आदमी के बीच बनाते हैं। यही कारण है कि मीडिया की खबरों से पाठकों का मानस बनता और बदलता है। समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स लगातार सत्तारूढ़ दल और अन्य राजनीतिक दलों के संबंध में नीर-क्षीर रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं। मौके पर जनता अपने मताधिकार का उपयोग सही नेताओं और सरकार को चुनने में करे, इसके लिए एक तस्वीर मीडिया की इन खबरों से बनती है। लेकिन, कुछ वर्षों से पेड न्यूज का चलन बढ़ गया है। पेड न्यूज यानी ऐसी खबर जिसे प्रकाशित करने के लिए रुपए या अन्य किसी प्रकार का आर्थिक सौदा किया गया हो। पेड न्यूज यानी नोट के बदले खबर छापना। पेड न्यूज का ही असर है कि जिस सामग्री को विज्ञापन के रूप में प्रकाशित/प्रसारित होना चाहिए था वो समाचार के रूप में लोगों के पास पहुंच रही है। यानी पाठक/दर्शक को सीधे तौर पर भ्रमित किया जा रहा है। अखबार या न्यूज चैनल के प्रति जो पाठक/दर्शक का विश्वास है उसका मजाक बनाया जा रहा है। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान, जब मीडिया को तथ्यात्मक और निष्पक्ष समाचार प्रकाशित करने चाहिए थे, तब पेड न्यूज का बाजार गर्म है। महसूस होता है कि पेड न्यूज के सिन्ड्रोम में अब मीडिया का नीर-क्षीर वाला विवेक कहीं खो गया लगता है। वैसे भी जबसे पत्रकारिता के संस्थानों में कॉर्पोरेट कल्चर बढ़ा है, आर्थिक लाभ विश्वास की पूंजी कमाने से अधिक प्राथमिक हो गया है।
वर्ष २००९ में लोकसभा के चुनाव के दौरान पेड न्यूज के कई मामले सामने आए थे। पहली बार पेड न्यूज एक बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई थी। अखबारों और न्यूज चैनल्स ने बकायदा राजनीतिक पार्टी और नेताओं की खबरें प्रकाशित/प्रसारित करने के लिए पैकेज लांच किए थे। यानी राजनीति से जुड़ी खबरें वास्तविक नहीं थीं। जिसने ज्यादा पैसे खर्च किए उस पार्टी/नेता के समर्थन में उतना बढिय़ा कवरेज। जिसने पैसा खर्च नहीं किया उसके लिए कोई जगह नहीं थी। इस दौरान कई राजनेताओं ने सबूत के साथ मीडिया पर आरोप लगाए कि उनके समर्थन में खबरें छापने के लिए पैसा वसूला गया है या वसूला जा रहा है। कई मीडिया संस्थान तो चुनाव लडऩे वाले नेताओं पर न्यूज कवरेज के पैकेज लेने के लिए दबाव भी बना रहे थे। जिन नेताओं ने ये पैकेज नहीं लिए उनके खिलाफ नकारात्मक खबरें प्रकाशित कर उन पर दबाव बनाया गया। यही नहीं कई नेता तो तगड़ा धन खर्च कर विरोधी नेता के खिलाफ नकारात्मक खबरें तक प्लांट कराने में सफल रहे। आंध्रप्रदेश की लोकसत्ता पार्टी के उम्मीदवार पी. कोडंडा रामा राव ने तो प्रेस काउंसिल को जो चुनाव खर्च का ब्योरा दिया, उसमें साफ बताया कि उन्होंने कितना पैसा मीडिया कवरेज पाने के लिए खर्च किया। पेड न्यूज सिन्ड्रोम पर इसके बाद जो बहस का दौर चला, उसमें मीडिया संस्थानों की काफी किरकिरी हुई। उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए।
भारतीय प्रेस परिषद, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया, संसद की स्थायी समिति, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, प्रसार भारती और भारतीय निर्वाचन आयोग सहित मीडिया के क्षेत्र में काम कर रहे अन्य संगठनों, बुद्धिजीवियों ने पेड न्यूज सिन्ड्रोम पर चिंता जाहिर की। इससे उपजने वाले खतरों से आगाह किया। पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए उपाय करने पर विचार किया। इसके लिए देश के प्रतिष्ठित और क्षेत्रीय समाचार माध्यमों से अपेक्षा कि वे स्वत: ही इस दिशा में कुछ करें। आखिर यह उनकी भी विश्वसनीयता का सवाल है। लेकिन, जैसा कि हम समझ सकते हैं कि आसानी के साथ धन बनाने के माध्यम को इतनी आसानी से कोई नहीं छोड़ सकता। खासकर उसका इस्तेमाल कर चुके लोग/संस्थान। पेड न्यूज पर मचे हो-हल्ले के कारण अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखना और साबित करना देश के नामचीन मीडिया घरानों के सामने चुनौती बन गया। देश के छोटे से बड़े सभी मीडिया संस्थानों ने इस बात की घोषणा तो की कि वे पेड न्यूज परंपरा का विरोध करते हैं और अपने समाचार-पत्र और पत्रिका में पेड न्यूज नहीं छापेंगे। न्यूज चैनल पर पेड न्यूज नहीं दिखाएंगे। लेकिन चुनावी समय में इन मीडिया संस्थानों की सब घोषणाएं और विरोध धरा रह जाता है। वे पेड न्यूज को लेकर पहले से काफी सतर्क हो जाते हैं। एक ओर तो तमाम संस्थान अपने समाचार-पत्र में बकायदा पेड न्यूज के खिलाफ अभियान चलाते हैं, पेड न्यूज के खिलाफ विज्ञापन छापते हैं और लोगों को पेड न्यूज की शिकायत करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन दूसरी ओर पेड न्यूज का तरीका बदलकर समाचार बेचने का व्यापार किया जाता है। पेड न्यूज के लिए नए तरीके खोज लिए गए हैं। अब पैसा लेकर किसी पार्टी/नेता समर्थन में कैंपेनिंग करने और विज्ञापन को समाचार की शक्ल में प्रकाशित/प्रसारित करने से कुछ हद तक मीडिया संस्थान बच रहे हैं। अब मीडिया घरानों के द्वारा राजनीतिक दल/नेता से वादा किया जाता है कि आप धन दीजिए, आपके खिलाफ कोई खबर प्रकाशित/प्रसारित नहीं की जाएगी। आपकी गलतियों, भ्रष्टाचार और कमजोरियों को जनता के सामने नहीं रखा जाएगा। आपके खिलाफ आ रही नकारात्मक खबरों को हम अपने समाचार-पत्र/न्यूज चैनल में जगह नहीं देंगे। मतलब साफ है मीडिया संस्थानों में पेड न्यूज का चलन जारी है। पहले खुला खेल फर्रूखावादी था अब वे कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं। दरअसल, पत्रकारिता की आड़ में धन कमाने की लोलुपता इतनी अधिक बढ़ गई है कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी, सिद्धांत और मूल्य चूल्हे में चले गए हैं।
अगर पेड न्यूज को सिर्फ राजनीतिक खबरों तक नहीं बांधा जाए तो मीडिया संस्थान सालभर इस गोरखधंधे में लगे रहते हैं। व्यापारिक और कई सामाजिक संगठनों से पैसे लेकर उनके समर्थन में खबरें प्रकाशित/प्रसारित करना भी तो पेड न्यूज के दायरे में आता है। पेड न्यूज का ही असर है कि कोई संस्था भले ही कितना अच्छा काम कर रही हो लेकिन उससे संबंधित समाचारों को समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स में जगह नहीं मिलती। दरअसल, होता यह है कि उसी तरह की अन्य संस्थाएं मीडिया को मैनेज करके चलती हैं। कार्यक्रम कवरेज करने के लिए संस्थानों को विज्ञापन के रूप में धन दिया जाता है। जो संस्था विज्ञापन नहीं देती, उसके समाचार प्रकाशित नहीं किए जाते। जो संस्था विज्ञापन देती है, उसके किसी कार्यक्रम के आयोजन का समाचार चार दिन बाद भी प्रकाशित किया जा सकता है। इस तरह के समाचारों से भी मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
पैसा लेकर खबर छापना/दिखाना एक सामान्य अपराध नहीं है बल्कि यह नैतिक अपराध है। यह पाठक और दर्शक की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। आम दिनों की अपेक्षा चुनाव के नजदीक या चुनाव के दौरान पेड न्यूज के जरिए आम जनता से धोखाधड़ी अधिक गंभीर होती है। मीडिया लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मीडिया के प्रति जनमानस में यह विश्वास है कि मीडिया आम आदमी की आवाज बनकर उसकी समस्याएं तो उठाता ही है साथ ही देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिति पर भी नजर रखता है। चूंकि आम आदमी अपना मानस समाचार-पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट पढ़कर और न्यूज चैनल्स पर प्रसारित खबरें देखकर बना रहा है। उसे भरोसा होता है कि समाचार माध्यम पुख्ता और सही जानकारी उस तक पहुंचा रहे हैं। लोगों तक सच पहुंचाना ही तो मीडिया की जिम्मेदारी है। मीडिया को सच का प्रहरी ही तो माना जाता है। मीडिया खुद भी स्वयं को लोकतंत्र का चौथा खंबा मानता है। लोकतंत्र में खुद को वॉच डॉग की भूमिका में मानता है। ऐसे में चुनाव के समय में पेड न्यूज कहीं न कहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विपरीत असर डालती हैं। संभवत: यही कारण है कि सालभर चलने वाली पेड न्यूज की अपेक्षा चुनाव के वक्त राजनीतिक खबरों की खरीद-फरोख्त पर अधिक चिंता जताई जाती है। पेड न्यूज सिन्ड्रोम भारतीय पत्रकारिता के समक्ष एक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। एक तरफ पैसा है और दूसरी तरफ विश्वसनीयता। स्वस्थ लोकतंत्र और विश्वसनीय पत्रकाारिता के लिए पेड न्यूज की बीमारी पर जल्द काबू पाना होगा। बीमारी और अधिक बढ़ी तो बहुत नुकसान करेगी। समय रहते इसका इलाज जरूरी है। पेड न्यूज के दायरे और उसकी परिभाषा को जानकर तो लगता है कि किसी कानून की मदद से उस पर रोक लगा पाना मुश्किल है। इसके लिए स्वार्थ और धन लोलुपता छोड़कर मीडिया संस्थानों को ही आगे आना पड़ेगा। आखिर सबसे बड़ा सवाल मीडिया की विश्वसनीयता का है। यदि पेड न्यूज को दूर नहीं किया तो भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता जाती रहेगी, फिर उसकी किसी बात पर कोई आसानी से भरोसा नहीं करेगा। जब लोगों को ही मीडिया पर भरोसा नहीं रहेगा तो राजनीतिक दल/नेता क्यों अपनी खबरें छपवाने/दिखवाने के लिए पैसा खर्चा करेंगे। तब मीडिया के पास न धन आएगा और न ही विश्वसनीयता बची रहेगी। इसलिए अच्छा होगा पेड न्यूज के चलन को खत्म करने के लिए अभी कुछ ठोस उपाय किए जाएं।
- मीडिया विमर्श में प्रकाशित आलेख
रविवार, 17 नवंबर 2013
मन बस गया बस्तर में
छ त्तीसगढ़ की राजनीतिक राजधानी जरूर रायपुर है लेकिन छत्तीसगढ़ का असली रंग तो बस्तर में ही है। संभवत: यही कारण है कि बस्तर को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। अहो बस्तर, तुम भाग्यशाली हो, अभी भी प्रकृति की गोद में हो। इंद्रावति नदी तुमको सिंचित करती है। वरना तो विकास के नाम पर कितने शहर कांक्रीट के जंगल बन गए। सघन वन, ऊंचे-नीचे पहाड़ और आदिवासी लोकरंग से समृद्ध है बस्तर। बस्तर का जिला मुख्यालय जगदलपुर शहर है। जगदलपुर राजधानी रायपुर से करीब 305 किलोमीटर दूर स्थित है। सड़क मार्ग से जगदलपुर पहुंचने में 5 से 6 घंटे का सफर तय करना पड़ता है। सड़क मार्ग के दोनों और हरे-भरे, ऊंचे और घने पेड़ हैं, जो खूबसूरत बस्तर की तस्वीर दिखाते हैं। ये नजारे कहते हैं कि अगर आप घुमक्कड़ हो तो सही जगह आए हो, स्वागत है तुम्हारा।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से एक शोध कार्य के संदर्भ में बस्तर जाने का मौका मिला। पांच दिन बस्तर की वादियों और बस्तर के सरल स्वभाव के लोगों के बीच रहना हुआ। बस्तर की ज्यादातर आबादी वनवासी (आदिवासी) है। कुछ आबादी देश के अन्य प्रान्तों से आकर बस गई है या बसाई गई है। ग्वालियर-चंबल संभाग के भिण्ड जिले के प्रेम भदौरिया बताते हैं कि काफी पहले उनका परिवार भिण्ड से कारोबार के लिए जगदलपुर आया था। यहां की आबोहवा इतनी रास आई कि वे यहीं बस गए। वे बताते हैं कि बस्तर के एक राजा ने ग्वालियर-चंबल संभाग के कई ठाकुरों को यहां लाकर बसाया था। वनवासी समाज के बीच यहां एक गांव ठाकुरों का भी है। व्यापार करने के लिए मारवाडिय़ों ने भी यहां दुकानें जमा रखी हैं। उड़ीसा से बस्तर बेहद नजदीक है। यही कारण है कि उड़ीसा के लोग भी यहां आकर बस गए हैं। बस्तर के लोग भी कामकाज और बेहतर इलाज के लिए विशाखापट्नम जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश रावल बताते हैं कि मूलत: वे भी उड़ीसा के हैं। काफी पहले यहां आकर बस गए हैं। बस्तर को समझने और देखने में श्री सुरेश रावल का बहुत सहयोग मिला। एक ढाबा पर, एक ही टेबल पर हम चार लोग खाना खा रहे थे। इनमें से एक पंजाब, दूसरा उड़ीसा, तीसरा उत्तरप्रदेश और चौथा यानी मैं मध्यप्रदेश का मूल निवासी था। मुझे छोड़कर बाकी के तीन सज्जन बस्तर में ही रच-बस गए थे। यानी कह सकते हैं बस्तर छत्तीसगढ़ी संस्कृति का गढ़ तो है ही देशभर की साझा संस्कृति की झलक भी यहां देखने मिलती है।
सोमवार, 28 अक्टूबर 2013
सपने से निकलेगा अंधविश्वास और अविश्वास
उ त्तरप्रदेश के उन्नाव जिले का डोडियाखेड़ा गांव दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। भारत की मीडिया ने तो फिलहाल वहीं तम्बू तान लिया है। बाबा शोभन सरकार ने एक सपना देखा और सपने में एक हजार टन सोने का खजाना देखा। खंडहर हो चुके किले के राजा राव रामबक्श बाबा शोभन सरकार के सपने में आए और उन्हें खजाने की जानकारी दी। बाबा ने बिना देरी किए खजाना निकालने के लिए केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत और प्रधानमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखी। सरकार में बैठे नुमाइन्दों की आंखें एक हजार टन सोने के ख्याल से ही चुंधिया गईं। देश की तरक्की के लिए तैयार बैठी सरकार ने बिना सोचे-विचारे 'पहुंचे हुए बाबा' के सपने को सच मानकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को खुदाई के आदेश जारी कर दिए। एक हजार टन सोने का खजाना निकालने के लिए एएसआई ने खुदाई भी शुरू कर दी। एक बाबा के सपने के आधार पर खुदाई शुरू कराने के मसले को लेकर केन्द्र सरकार की देश-दुनिया में थू-थू होने लगी। रायता बहुत फैल गया तो सरकार ने उसे समेटना शुरू कर दिया। कभी सरकार की ओर से तो कभी एएसआई की ओर से कहा जाने लगा कि यह खुदाई बाबा के सपने के आधार पर नहीं बल्कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के सर्वे के आधार पर की जा रही है। सवाल उठता है कि सच यह था तो सरकार इतने दिन से क्यों चुप थी? क्यों देश की छवि धूमिल होने दी जा रही थी? क्यों नहीं तत्काल खजाने की खोज का खण्डन किया गया? आखिर सर्वे और बाबा के सपने में क्या संबंध है? बाबा के सपने के बाद ही क्यों खुदाई की तैयारी की गई? खैर, इन सवालों को यूं ही खड़े छोड़कर जरा दूसरी तरफ बात करते हैं।
सोमवार, 14 अक्टूबर 2013
राष्ट्रवादी विचारधारा का सशक्त प्रहरी ‘प्रवक्ता डॉट कॉम’
प्र वक्ता डॉट कॉम महज एक बेवसाइट नहीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारों का एक सशक्त प्रहरी है। भारत राष्ट्र के हितचिंतक संजीव सिन्हा की एक सकारात्मक पहल के कारण प्रवक्ता डॉट कॉम के रूप में राष्ट्रीय विचारधारा को जीने वाले लोगों को लेखन के लिए एक सशक्त माध्यम मिला। अभिव्यक्ति की रक्षा करने में भी प्रवक्ता पूरी तरह सफल रहा है। अपनी विचारधारा को लेकर प्रवक्ता और उसके संस्थापक एवं संचालक संजीव सिन्हा जी की स्थिति एकदम स्पष्ट है। कोई दुराव-छिपाव नहीं। दोनों के लिए भारत और सनातन धर्म पहले है। भारत, भारत की परंपरा, उसके धर्म और राष्ट्रीयता के खिलाफ जाने वाले किसी भी विचार और व्यक्ति का दोनों ही प्रखर विरोध करते हैं। अन्यथा तो प्रवक्ता सभी विचारधारा के लोगों को अपनी बात कहने के लिए मंच प्रदान करता है। प्रवक्ता के जुड़े कई लेखक घोर वामपंथी हैं। इस सबके बावजूद यह पोर्टल भारतीयता और प्रखर राष्ट्रवाद का ‘प्रवक्ता’ है। प्रवक्ता डॉट कॉम पर 6000 से ज्यादा लेख हैं। प्रतिदिन 51 हजार से ज्यादा पेज देखे जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रवक्ता से आज 500 से अधिक लेखक जुड़े हैं। यह अपने तरह का रिकॉर्ड है। संभवतः किसी भी वेबपोर्टल से इतनी बड़ी संख्या में लेखक नहीं जुड़े होंगे। ज्यादातर लेखक अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं। स्थापित और ख्यातनाम लेखक प्रवक्ता के पास हैं। इससे समझ सकते हैं कि प्रवक्ता पर प्रकाशित सामग्री काफी समृद्ध है। यही नहीं प्रवक्ता की उपलब्धि यह भी है कि कई गुमनाम लेकिन अच्छे लेखकों को प्रवक्ता के कारण बड़ी प्रसिद्धि मिली। नियमित तौर पर समसामयिक घटनाओं, विषयों और चर्चाओं पर धारधार लेख एवं टिप्पणियों के कारण प्रवक्ता शीघ्र ही बेहद लोकप्रिय हो गया।
शुरुआती पांच सालों में ही प्रवक्ता डॉट कॉम ने न्यू मीडिया/सोशल मीडिया/वैकल्पिक मीडिया में एक मील का पत्थर स्थापित कर दिया है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रबंधन और संपादक की विचारधारा के कारण जिन विचारों-समाचारों को जगह नहीं मिल सकती उनको वेबपोर्टल पर आसानी के साथ चर्चित कराया जा सकता है। बहस कराई जा सकती है। सकारात्मक परिणाम निकाला जा सकता है। प्रवक्ता पर प्रकाशित होने के बाद कई आलेखों पर अन्य-अन्य मंचों पर भी काफी चर्चा हुई। प्रवक्ता डॉट कॉम पर लगातार छपने के बाद लेखक के रूप में स्थापित होने वाले कई सज्जनों से मेरी सीधी बात होती है। उनका कहना होता है कि पहले कई समाचार-पत्र और पत्रिकाएं उन्हें प्रकाशित ही नहीं करते थे लेकिन अब कभी-कभी ही उनके आलेख, फीचर और साहित्यिक सामग्री को इन पत्र-पत्रिकाओं द्वारा लौटाया जाता है। यानी न्यू मीडिया/सोशल मीडिया/वैकल्पिक मीडिया के सशक्त मंच प्रवक्ता डॉट कॉम ने नए लेखकों, विचारधारा के लेखकों और तथाकथित सेक्यूलरवाद के नाम पर तथ्यों को छिपाए बिना साफ-साफ लिखने वाले लेखकों को अपनी बात सबसे कहने का माध्यम उपलब्ध कराया। साथ ही साथ परंपरागत मीडिया को चेतावनी दी कि तुम नहीं छापोगे-दिखाओगे तो हम छापेंगे, दिखाएंगे और बहस भी कराएंगे। इस सबके बीच प्रवक्ता ने परंपरागत मीडिया को कई लेखक और साहित्यकार भी दिए।
प्रवक्ता डॉट कॉम के संस्थापक एवं संचालक संजीव सिन्हा जी से मेरी पहली मुलाकात भोपाल में आयोजित मीडिया चौपाल-2012 में हुई थी। हालांकि मैं तीन साल से लगातार प्रवक्ता पर लिख रहा था। इस नाते संजीव जी से परिचय तो पहले से था। मुझे ठीक-ठीक याद है, 2007 में मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, तब मेरी पहली बार संजीव सिन्हा जी से बात हुई थी। तब संजीव जी हितचिंतक ब्लॉग के माध्यम से आभासी दुनिया में सक्रिय थे। प्रवक्ता डॉट कॉम तब नहीं था। दरअसल, मुझे ब्लॉग बनाने के टिप्स चाहिए थे। संजीव जी के साथ इत्मिनान से मेरी बात हुई, कई अच्छे सुझाव उन्होंने मुझे दिए थे। हितचिंतक ब्लॉग सर्वाधिक चर्चित ब्लॉगों में से एक था। एक घोर वामपंथी ब्लॉगर के ब्लॉग पर एक चौकाने वाली घोषणा मैंने देखी/पढ़ी- ‘हितचिंतक और लालमिर्ची ब्लॉग का बहिष्कार किया जाए। ये समाज विरोधी हैं।’ हितचिंतक के जरिए संजीव सिन्हा और लालमिर्ची के जरिए अनिल सौमित्र वामपंथ और वामपंथियों की जबर्दस्त तरीके से पोल खोल रहे थे। इस घोषणा से पहले न तो मैं हितचिंतक-संजीव जी और न ही लालमिर्ची-अनिल जी से परिचित था। यह घोषणा मुझे इन दोनों ब्लॉग का बहिष्कार करने के लिए तो प्रेरित नहीं कर सकी बल्कि इन ब्लॉग तक पहुंचाने का माध्यम जरूर बन गई। एक और मजेदार बात यह हुई कि इससे पहले उक्त ब्लॉग और उसके संचालक से मेरा प्रत्यक्ष परिचय था, मैं उनका सम्मान भी करता था लेकिन इस घोषणा ने उस वामपंथी आदमी की ओछी मानसिकता को प्रदर्शित किया।
हितचिंतक पर संजीव जी अकेले मोर्चा संभाले हुए थे। राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार के लिए एक सशक्त प्रवक्ता की जरूरत महसूस की जा रही थी। इस जरूरत को निश्चित ही हितचिंतक संजीव सिन्हा ने सही समय पर समझा। परिणाम स्वरूप प्रवक्ता डॉट कॉम का जन्म हुआ। अब राष्ट्रवाद पर लिखने वालों की एक फौज खड़ी हो गई। अब कई हितचिंतक एक ही जगह पर जुट आए। बिना किसी लाभ की स्थिति के पांच साल तक बेवपोर्टल का सफल संचालन वाकई बड़ी बात है। इसके लिए तो संजीव सिन्हा जी का सम्मान होना चाहिए था। लेकिन वे विनय के साथ इस सफलता का सारा श्रेय प्रवक्ता के लेखकों को देते हैं। उनकी बात सही है लेकिन पांच साल तक अपनी गांठ का पैसा लगाकर विचार क्रांति की लौ को जलाए रखना कोई छोटी बात तो नहीं। सभी लेखकों को इतने लम्बे समय तक प्रवक्ता के साथ जोड़े रखना और उन्हें लेखन कार्य में व्यस्त रखना भी काबिलेतारीफ है। प्रवक्ता डॉट कॉम और संजीव सिन्हा एकमय हो गए हैं। बात प्रवक्ता की हो या संजीव सिन्हा की, एक ही है। प्रवक्ता डॉट कॉम महज वेबपोर्टल नहीं वरन सही मायने में राष्ट्रवाद का ‘प्रवक्ता’ है। भारतीय परंपरा का हितचिंतक है। राष्ट्रवादी आंदोलन है। एक विचारधारा भी है। इस सबके बीच प्रवक्ता अभिव्यक्ति का अपना मंच है।
प्रवक्ता डॉट कॉम की उत्तरोत्तर प्रगति की कामना......
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013
रावण मारो, शक्तिशाली बनो
द शहरा आने को है। सब ओर तैयारियां चल रही हैं। मोहल्लों में रहने वाले बच्चे खुद ही रावण तैयार कर रहे हैं जबकि बड़ी मंडलियां चंदा जमा कर रही हैं, बाजार से रेडीमेड बड़ा रावण खरीदा जाएगा। छोटे-बड़े सभी रावणों को गली-मैदान में स्वाह कर दिया जाएगा। उल्लास मनाएंगे कि बुराई का अंत कर दिया। सब माया है। रावण तो जिन्दा है। हम सबके भीतर। तैयारी उसे मारने की होनी चाहिए। भीतर का रावण एक तीर से नहीं मरता, उसके लिए रोज सजग रहना पड़ता है कमान खींचकर, जैसे ही सिर उठाए, तीर छोड़ देना होता है। कई दिन तो रोज उसे मारना पड़ता है। इसके बाद फिर समय-समय पर उसका वध करना होता है। यह सतत प्रक्रिया है। लेकिन, हम मार किसे रहे हैं, बाहर के रावण को, वह भी पुतले को। असल रावण तो जीते रहते हैं, हम में और तुम में। ये हम और तुम का रावण मर गया फिर सब ठीक हो जाएगा।
अब सवाल यह है कि आखिर भीतर कौन-सा रावण है। लोभ, वासना, बेईमानी, कायरता, आलस, क्रोध, स्वार्थ, कपट, झूठ और फरेब। ये सब भीतर के रावण हैं। इनसे युद्ध मनुष्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। लोभ मनुष्य को भ्रष्टाचारी बनाता है। लोभ ही हमे बेईमान भी बनाता है। अब हम देखें कि लोभ के कारण आज देश की क्या स्थिति है और आम समाज को क्या नुकसान है। लोभ पर शुरुआत से ही काबू नहीं किया गया तो यह बढ़ता ही जाता है। यह कभी-भी कम नहीं होता। लोभी मनुष्य ने पहले हजारों के घोटाले किए फिर लाखों के और अब लाखों के घोटाले उनके लिए घोटाले ही नहीं हैं। क्योंकि लोभ बढ़ गया। यानी भ्रष्टाचार की सीमा बढ़ गई। देश-समाज का नुकसान ज्यादा बढ़ गया। यही हाल वासना रूपी रावण का है। वासना के फेर में फंसकर अच्छे से अच्छा व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है, क्षणभर में। सिर्फ व्यक्तित्व धूमिल नहीं होता बल्कि उसके साथ जुड़े मानबिन्दुओं पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। यदि धार्मिक चोला ओढ़कर बैठा व्यक्ति काम का शिकार हो जाता है तो लोगों का विश्वास डिगता है। इसका फायदा धर्म-परंपरा विरोधी लोग उठाते हैं। धर्म-परंपरा के नाम पर अपना जीवनयापन कर रहे चारित्रिक रूप से कमजोर व्यक्ति की आड़ में धर्म विरोधी लोग हमलावर भूमिका में आ जाते हैं। वे संबंधित धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। परंपराओं पर अंगुली उठाते हैं। हालांकि जिस धर्म और समाज पर अगुंली उठाई जा रही होती है, वह धर्म और समाज ही चारित्रिक रूप से पतित व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है। रावण को प्रकांड ब्राह्मण बताया जाता है लेकिन इसके बावजूद हिन्दू समाज में उसका आदर नहीं है। कारण, उसका अमर्यादित आचरण। इसलिए आपने जीवनभर में नाम रूपी जो पूंजी कमाई है, उसे बचाए रखना चाहते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करना चाहते हैं तो वासना रूपी रावण का अंत बार-बार करते रहिए।
दशहरा चूंकि शक्ति का पर्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते हैं। पूर्वजों ने समाज को एक संदेश देने की कोशिश की है कि ताकत हासिल कीजिए। साथ में यह भी संकेत कर दिया कि इसका दुरुपयोग मत कीजिए। गरीब, असहाय पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करें बल्कि उनकी रक्षा के लिए आगे खड़े रहें। साथ ही अन्य लोगों को भी यह आभास बना रहना चाहिए कि यह शक्तिशाली है ताकि वह आप पर हावी न हो सके। कमजोर को हर कोई दबाना चाहता है। भारतीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है। यहां बाहुबली नेतागिरी कर रहे हैं। कमजोर की कोई पूछ नहीं। जो शक्तिशाली है, संगठित वोट बैंक हैं उनकी भारतीय राजनीति में भारी पूछपरख है, मौज भी उनकी ही है। शासन की योजनाएं भी उनके लिए हैं जबकि असंगठित बहुसंख्यक समाज की फिक्र तक किसी को नहीं। उसकी भावनाएं भी गईं चूल्हे में।
मजबूत और शक्तिशाली दिखने की जरूरत जितनी व्यक्तिगत स्तर पर है, उससे कहीं अधिक एक देश के लिए आवश्यक है। इजराइल के संबंध में समझा जा सकता है। इजराइल छोटा-सा देश है लेकिन साहस उसका किसी ऊंचे पर्वत से भी विशाल है। चारों तरफ से शत्रु देशों से घिरा है लेकिन मजाल है कि कोई उसकी तरफ आंख उठाकर देख जाए। इजराइल ने अपनी शक्तिशाली छवि यूं ही नहीं बनाई है। उसने करके दिखाया है। अपने शत्रुओं को ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध में ऐसा नहीं दिखता। पाकिस्तान बार-बार गुर्राता है। भारत की ओर आंखें तरेरता है। चार युद्ध हारने के बाद भी उसकी इतनी हिम्मत भारत की सुरक्षात्मक नीति के कारण है। भारत सरकार बार-बार उसके अमर्यादित व्यवहार को माफ करती है। जबकि होना यह चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से कोई संदिग्ध गतिविधि की आशंका दिखे तो घटना घटने से पहले ही भारत की ओर से कार्रवाई कर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आ जाए। वह भारत विरोधी कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा।
दशहरा महज उल्लास का पर्व नहीं है। बल्कि बहुत कुछ संकेत की भाषा में बताने की कोशिश करता है। अपने भीतर के तमाम रावणों को मारो-जलाओ बाकि बाहर सब ठीक हो जाएगा। खुद सशक्त बनो तो समाज ताकतवर बनेगा और देश को भी मजबूती मिलेगी। आखिर लोकतंत्र है भारत में, नेता इसी समाज से चुनकर जाने हैं। जैसा हम समाज बनाएंगे, वैसे ही नेता चुने जाएंगे। लोभ, लालच, स्वार्थ सहित अन्य सारे रावणों पर विजय पा लेंगे तभी तो हम आने वाले वक्त में सही चुनाव कर सकेंगे। तो खींच लो कमान अब ज्यादा वक्त नहीं बचा।
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