मंगलवार, 22 जून 2010

बिहारी बाबू लालू और उनकी लालटेन

ब आप और हम क्या लालूजी को कौन नहीं जानता, अब आप सब लोगों तक ये खबर भी पहुंच ही गई होगी कि लालू के राष्ट्रीय जनतादल (आरजेडी) से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा और चुनाव चिह्न के छिनने पर खतरा आ गया है। चुनाव आयोग ने इसके लिए लालू को नोटिस जारी किया है और उन्हें सफाई में कुछ कहने के लिए २ जुलाई तक का समय दिया है। पूरी खबर यहां पढें
.....   अब आप सोचो अगर बड़बोले लालू अपनी पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण चुनाव चिह्न लालटेन नहीं बचा सके तो क्या होगा? लालू ने इसी लालटेन के उजाले में बिहार की भोली-भाली जनता को खूब ch2so4 बनाया है। पिछले लम्बे समय से उनकी लालटेन का तेल चुक गया तो बेचारे अंधेरे में फडफ़ड़ाते रहते हैं, कुछ तो भी बड़बड़ाते रहते हैं। और तो क्या करें भई लालू, मैडम के छोरे (बाबा) ने भी लालू को लाल बत्ती दिखा दी है। सुना है इस बार बाबा की पार्टी उनके दिशा-निर्देश में बिहार में अपने बूते चुनाव लड़ेगी। भई ये सब तो ठीक नहीं है लालू बेचारे तो पहले से ही अंधेरे में जी रहे हैं ऊपर से ये नए लड़के ने और उनकी हवा खराब कर दी है। उनकी लालटेन भी मुसीबत में है और गांधी-नेहरू घराने की पार्टी ने भी उनका साथ छोड़ दिया है। वैसे तो लालू बहुत बड़े तिकड़मी हैं। तिकड़म भिड़ाने में पूरे भारत ही क्या वरन विश्वभर में उनकी कोई सानी नहीं है। जैसे-तैसे करके वो अपनी लालटेन को बुझने नहीं देंगे। वे चुनाव आयोग को भी ch2so4 बना सकते हैं। नहीं बना पाए तो तिकड़म बिठा सकते हैं। वे धन-लाभ के लिए चारा तक खा सकते हैं तो धन-बरसाने वाली कुर्सी को पाने के लिए कुछ न कुछ तो करेंगे ही। इतना तो पूरे देश की जनता को उन पर भरोसा है।
..........अब अपन रहे गणित के विद्यार्थी तो अपन 'माना कि' का भरपूर उपयोग करते हैं। तो मान लो कि लालू अपनी बुझती (करीब-करीब बुझ ही गई) लालटेन को नहीं बचा पाते तब क्या होगा? ...... क्या लालू का जादू चल पाएगा? ...... क्या लालू बिहार जीत का हार पहन सकेंगे? ..... क्या लालू फिर से लालटेन को पाने के लायक तेल जुटा सकेंगे? ....... कहीं फिर लालू दीपक को तो चुनाव चिह्न नहीं बना लेंगे?  ....नहीं-नहीं इसे नहीं बना सकते ये निशान सेक्यूलर नहीं होगा। ये तो हिन्दू धर्म का पवित्र प्रतीक है। इससे तो लालू के मुस्लिम वोटर रूठ (जो वैसे भी रूठ चुके हैं) जाएंगे। लालू संभवत: इसे चुनाव चिह्न नहीं बनाएंगे। हां चिराग को बना सकते हैं लेकिन उसका जिन्न भी कब का निकल भागा। इससे भी कोई फायदा नहीं।
...........और सोचो...... भला लालू बिना लालटेन के बिहार की उबड़-खाबड़ मार्गों पर चुनाव प्रचार के लिए कैसे निकलेंगे। और निकलेंगे भी तो बिना उजाले के लोगों को कैसे अपने शासन काल का विकास और नीतीश के मुख्यमंत्रित्वकाल में हुए विनाश को दिखाएंगे?
बहुत सवाल हैं भैया! पर जवाब नहीं मिल पा रहे हैं। आप हमारी कोई मदद करो, सॉरी हमारी नहीं उनकी..... कोई अच्छे से सुझाव हों लालू के लिए तो बताइयेगा जरूर... काश बात बन जाए।

सोमवार, 7 जून 2010

ग्वालियर की शान महाराज बाड़े का वैभव खाक

महारानी लक्ष्मीबाई मार्केट हुई राख
महाराजबाड़ा स्थित ऎतिहासिक इमारत में संचालित विक्टोरिया मार्केट शनिवार तड़के लगी भीषण आग से जलकर खाक हो गया। इसमें सवा सौ दुकानों में रखा माल जलकर स्वाहा हो गया। आग बुझाने में 320 वाहन पानी लगा। इस कोशिश में दो सैनिक समेत 4 लोग घायल हो गए। लगभग दस करोड़ रूपए के नुकसान की खबर है।
मैं अधिक कुछ तो नहीं लिख सकता इस मामले पर... बस उस दर्दनाक मंजर को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे। कुछ तस्वीरें हैं मेरे पास जिन्हें मैं पोस्ट कर रहा हूं...... वे उस वीभत्स अग्निकांड का चित्र आपके दिमाग में उपस्थित कर देंगी। बस इतना कहूंगा कि इस इमारत में लगने वाले किताबों के बाजार से किताबें खरीदकर ही मैंने स्कूली और महाविद्यालयीन शिक्षा प्राप्त की। दोस्तों के साथ आते थे किताब खरीदते और बाहर बनी दुकान पर छोले भटूरा खाते थे। वैसे अपना आग से सीधा-सीधा बैर है इसने अपना प्रेरणा स्त्रोत छीना था।
महारानी लक्ष्मीबाई मार्केट (विक्टोरिया मार्केट ) आग की लपटों में

सब कुछ उजाड़ गया... अब क्या करेंगे

सुबह तक उठती रहीं आग की लपटें 

महराज बाड़े का वैभव ख़ाक
उमड़ा जनसैलाब
ग्वालियर का सबसे बड़ा अग्निकांड
ऐतिहासिक महत्व रखने वाली और 150 से अधिक व्यापारियों का घर चलाने वाली विक्टोरिया मार्केट एक चिनगारी से जलकर राख हो गई। यहां अधिकांश दुकानें किताबों और स्टेशनरी के व्यापारियों की थीं।
25-3० - करोड़ तक का नुकसान
1904-05 - में बनी थी विक्टोरिया मार्केट
02 - बजे के लगभग लगी थी आग
रात 10 - बजे तक भी नहीं बुझ पाई आग
352 - गाड़ी पानी फेंका गया
100 -  के करीब दुकानें जलकर खाक हुईं

106 साल पुराना निर्माण
- विक्टोरिया मार्केट का निर्माण 1904 में ग्वालियर के महाराज माधवराव प्रथम ने कराया था।
- 1905 में महारानी विक्टोरिया के भारत आगमन के उपलक्ष्य में इसका नामकरण विक्टोरिया मेमोरियल किया गया।
- सन् 1905 में ग्वालियर का पहला मेला भी इसी मार्केट में लगा।
- विक्टोरिया मार्केट, टाउनहॉल, रीजनल प्रेस, निगम मुख्यालय, पोस्ट ऑफिस बिल्डिंग के आर्किटेक्ट बलवंत भैया थे

- सन् 1911 में संपूर्ण महाराजबाड़े का सौंदर्यीकरण पूर्ण किया जा सका।
- इसके बाद जीवाजी राव की प्रतिमा स्थापित की गई।
- विक्टोरिया मार्केट की स्थापत्य कला इंडो-ब्रिटिश श्ौली की थी।

मंगलवार, 1 जून 2010

उफ! कोई इन्हें भी फांसी दे दे

या तो हमारी सरकार का खून सूख गया है या फिर उसकी नक्सलियों से कोई गुप्त संधि है। वरना इतने बेगुनाहों का खून सड़कों पर, रेल की पटरियों पर और छोटे से घर के बाहर बने नाले में बहते देख सरकार का हृदय पिघलता जरूर। वह सिर्फ बातें नहीं करती, कुछ कड़े कदम भी उठाती। हाल ही की तीन बड़ी घटनाओं ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। और उन निरीह गरीबों की तो जान कलेजे में हैं जहां नक्सलियों की सरकार खुल के चलती है। जिसकी चाहे जान ले लेते हैं, चाहे जिस बच्चे को उठाकर ले जाते हैं उसके निश्छल मन में अपनी ही मिट्टी और अपने ही लोगों के खिलाफ बैर भर देते हैं। पिछले दिनों मामला सामने आया था कि एक लड़की ने नक्सलियों की शैतानी सेना में शामिल होने से इनकार किया तो इन्हीं नक्सलियों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। सात-आठ माह पुरानी घटना है किसी व्यक्ति के समूल परिवार (जिसमें मासूम दूध पीते बच्चे भी शामिल थे) को झौंपड़े के अंदर बंद कर आग से जला दिया। कारण बताया कि उस परिवार के एक व्यक्ति ने उनकी मुखबरी की थी। माना की भी हो तो उन मासूमों का क्या दोष था जो अभी अपनी मां को मां और पिता को बाप भी नहीं कहना सीख पाए थे। और दंतेवाड़ा में ७० जवान की हत्या, उसके बाद बस में विस्फोट कर ३५ लोगों की जान ली और अब रेल को खून से लाल करके करीब सवा सौ लोगों की जिंदगी छीन ली। माफ करना सवा सौ लोगों की जिंदगी नहीं संख्या और अधिक है। उनकी भी मौत हुई है जो इनसे प्रेम करते थे, जो इन पर आश्रित थे। 
कौन है नक्सली- 'नक्सलियों  का अर्थ में उन लोगों से लगाता हूं 'जिनकी नस्ल खराब हो गई है।  इनका कहना है कि इन्होंने हथियार गरीब और वंचितों के लिए उठाए हैं (शायद उन्हें जान से मारने के लिए)। लेकिन हकीकत यह है कि ये डाकू हैं, लुटेरे हैं, लूट-लूट के खाना पसंद करते हैं। यदि किसी ने इनकी बात नहीं मानी तो वो चाहे गरीब ही क्यों न हो वे उसे मार डालते हैं, इतना ही नहीं उसके परिवार का समूल नाश भी करने से नहीं चूकते। ये नहीं चाहते कि पिछड़े क्षेत्रों में विकास हो। तभी रेल की पटरियां उखाड़ते हैं, सड़कें खोदते हैं, स्कूल भवन को बम से उडाते हैं। इतना ही नहीं कहीं उन गरीबों के बच्चे पढ़-लिख कर समझदार न हो जाएं (हो गए तो इनके खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे) इसलिए ये बच्चों को पढ़ाने आने वाले मास्टर को ही उठवा लेते हैं और क्रूरता से उसकी हत्या कर देते हैं। इन्हें ही कहते हैं हम नक्सली।
इनके पैरोकार- इस देश में सब तरह के लोग हैं। आंतकवादी का सम्मान करने वालों से लेकर इन खूनी दरिंदों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर गला और लिख-लिखकर कलम की स्याही सुखाने वाले भी। ये ऐसे इसलिए कर पाते हैं क्योंकि इनके भीतर की भी मानवीय संवेदनाएं मर गईं हैं। साथ ेमें इस देश के प्रति प्यार भी नहीं बचा। और कभी नक्सलियों ने इनके घरों के दुधमुहें बच्चों को गोली नहीं मारी, वरना ये तथाकथित सेक्यूलर ऐसा कभी नहीं कह पाते।
सरकार जाग जाए वरना..... अब हद हो चुकी है। जनता और नहीं सहेगी। जनता खून से भरे गले से रो-रोकर कह रही है कोई है जो इन दुष्टों को भी फांसी देगा, कोई है जो इन्हें भी बुलेट को जबाव बुलेट से देगा। अगर सरकार ने नक्सलियों को खत्म करने के लिए हथियार नहीं उठाए तो मजबूरन भोली जनता को ये कदम उठाना पड़ेगा। और जब जनता उठाएगी तो फिर सरकार को भी नहीं छोड़ेगी। क्योंकि वे भोले मानुष सरकार से भी त्रस्त हैं। पंजाब में उग्रवाद का खात्मा करने के लिए जैसे कठोर निर्णय लेने पड़े थे वैसे ही खूनी हो चुके नक्सलवाद को खत्म करने के लिए लेने होंगे।

पंचू पंच- पंचू से किसी ने कहा कि मप्र में भी नक्सलवादियों की आहट हो गई है। वे तेरे गांव व शहर में भी आ सकते हैं। तब उसने क्या कहा सुन लें..........
'आने तो देओ वाये... ससुर के नाती को मूड़ (सिर) लठिया से फोर-फोर के लाल कर दंगो... मेरे गांम के एकऊ मोड़ा-मोड़ा (लड़का-लड़की) को हाथ लगायो तो सारे के हाथ कुलाई (कुल्हाड़ी) से काट दुंगो। आए तो सही न पनारे (घर से निकली नाली) में उल्टो करके गाप देंगो।

रविवार, 9 मई 2010

क्या इतना सहज होता है सांसद व वरिष्ठ पत्रकार

प्रभात झा बने मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष
राज्यसभा सांसद प्रभात झा को मप्र में भारतीय जनता पार्टी का निर्विरोध प्रदेश अध्यक्ष चुन लिया गया है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं मप्र भाजपा चुनाव पर्यवेक्षक कलराज मिश्र भोपाल में इसकी घोषणा की।
प्रभात का प्रदेश अध्यक्ष बनना

माना जा रहा है कि पत्रकार से सांसद बने प्रभात झा के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने से पार्टी कार्यकताओं में नया जोश व ऊर्जा का संचार होगा। प्रभात को संगठन और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता पसंद करते हैं इसी का परिणाम है कि उनके अध्यक्ष बनने पर किसी ने उंगली नहीं उठाई सिवाय ताई (इंदौर से भाजपा की सांसद सुमित्रा महाजन)। चूंकि वे भी प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए लालायतित थीं। लेकिन, पार्टी संगठन की डोर में बंधे होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। वहीं फग्गन सिंह कुलस्ते का भी मन प्रदेश अध्यक्ष बनने का था लेकिन वे संगठन के मनाने पर मन गए। खैर ये राजनीति की बाते हैं अपुन को ज्यादा तो समझ आती नहीं.......
प्रभात जी से मेरा प्रत्यक्ष का संपर्क है सो मैं लिख रहा हूं उनसे हुईं मुलाकात का जिक्र.....
कैंटीन में सीखी उनसे पत्रकारिता
बात उन दिनों की है जब मैं अपने साथियों के साथ जीवाजी यूनिवर्सिटी में थे और हम किताबों में पत्रकारिता पढ़ा करते थे। किसी पत्रकार या बड़े आदमी से हम कुछ सीखने की ललक से मिला करते थे। जब भी कोई बड़ा आदमी और नामचीन पत्रकार आता तो बड़ा सम्भलकर बात करना पड़ती थी। साथ में उनके सम्मान का भी पूरा ख्याल रखना पड़ता था। 
....... भले ही प्रभात जी पत्रकार से राज्यसभा सांसद हो गए हों लेकिन, पत्रकारिता आज भी उनके लिए सर्वोपरि है। गर्मियों के दिन थे शायद मई-जून होगी। प्रभात जी ग्वालियर प्रवास पर आए हुए थे। हमने और हमारे शिक्षक ने सोचा क्यों न प्रभात जी को विश्वविद्यालय आमंत्रित किया जाए और कुछ मार्गदर्शन लिया जाए। हमने उन्हें फोन किया और उनसे आग्रह किया,  वे मान गए और दोपहर का दो बजे का समय दिया। हम हमेशा की तरह अपने मेहमान के स्वागत की जुगत भिड़ाने लगे। तब हमें ख्याल आया अरे यार आज तो संडे है। राजनीति विभाग के एचओडी से कॉनफ्रेंस हॉल की अनुमति के लिए गए। चूंकि वे मन से कांग्रेसी ठहरे सो उन्होंने संडे का बहाना लेते हुए मना कर दिया। हांलाकि इससे पूर्व हम वहां संडे के दिन ही एक आयोजन कर चुके थे। खैर अब हमारा दिमाग खराब हो रहा था। दोपहर के दो बज गए श्री प्रभात जी विश्वविद्यालय परिसर में आए तो हमने उन्हें अपनी परेशानी से अवगत कराया। उन्होंने सहज लेते हुए कहा-बात करने के लिए किसी खास जगह की क्या जरूरत है कहीं भी बैठ लेते हैं। भगवान का शुक्र था कि कैंटीन खुली थी। उन्होंने कैंटीन खुली देख कर कहा चलो कैंटीन की टीनशेड में ही बैठ लेते हैं। हम सभी असहज थे लेकिन वो बिल्कुल सहज दिख रहे थे। करीब उन्होंने एक घंटे का समय बिताया और अपने अनुभव बांटे साथ ही पत्रकारिता करियर के लिए कुछ टिप्स भी दिए। एक राज्यसभा सांसद और एक वरिष्ठ पत्रकार को इतना सहज कभी नहीं देखा।
कर्मयोगी
सहज उपलब्ध 
पत्रकारिता जीवन की शुरुआत होने के बाद की मुलाकात भी जेहन में है। प्रभात जी ने ग्वालियर की तमाम छोटी-मोटी गलियां और हर ओर जाने वाली सड़कें अपने कदमों से नापी हैं अपने पत्रकारिता जीवन में। मेरे मामाजी (नरोत्तम यादव)  उनके अच्छे मित्र थे। एक दफा मैंने बातों बातों में मामा जी से कहा-मैं पत्रकार बनना चाहता हूं। तब उन्होंने प्रभात जी के बारे में मुझे बताया कि पत्रकारिता आसान नहीं, प्रभात जी कांधे एक थैला टांगे सुबह  घर से निकलते हैं और पैदल-पैदल सब दूर हो आते हैं। (तब मैं प्रभात जी को न जानता था).... उनकी बातों से मुझे जान पड़ा पत्रकारिता तो अपने बस की नहीं। लेकिन किस्मत को तो इसी झमेले में फंसाना था, फंसा ही लिया। हां तो बात कर रहा था..... मैं जबलपुर नईदुनिया से इंटर्नशिप करके शहर लौटा था। एक भाईसाहब शाम को मुझसे मिलने आए। अचानक से उन्होंने कहा चलो प्रभात जी से मिल आएं। मैं फुरसत में था और मेरा उनसे मिलने का मन भी रहता है तो तुरंत चल दिया। पडाव स्थित उनके कार्यालय पहुंचे। काफी लोग उनसे मिलने के लिए बैठे थे। वे सो रहे थे। उठने पर जैसे ही उन्हें भाई साहब (राजेश पुरोहित) और मेरे आने के बारे में पता चला उन्होंने अंदर ही हमें बुला लिया। काफी देर तक बात होती रही। मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की बधाई देते हुए  कार्यकर्ता द्वारा लाई गई मिठाई से मेरा मुंह मीठा कराया। वे पैरों में दवा लगा रहे थे तब मैंने उनके पैरों की ओर  देखा।  तो उनकी तपस्या साफ-साफ दिखी। उन्होंने जो शिद्दत से पत्रकारिता की थी उसके निशा आज भी उनके पैरों में थे। ........... कोई अपने काम के प्रति कितना समर्पित होता है उनको देखकर पता चला।

बुधवार, 5 मई 2010

... और जीत गए जंग

म सदा एक ही रोना रोते रहते हैं कि इस समय मैं कौन किसके लिए क्या करता है? सब अपने-अपने लिए जीते हैं। हकीकत में यह पूर्ण सत्य नहीं है आज भी दुनिया में कई लोग मौजूद हैं जो निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करते हैं। असल में उसमें उन्हें जो मजा आता है सुख मिलता है, बस इसी अद्भुत सुख की कामना उस निस्वार्थ भाव से किए जा रहे काम के पीछे का स्वार्थ होता है।
मेरा शहर है ग्वालियर। ग्वालियर का स्टेशन, यहां से होकर हजारों यात्री निकलते हैं। कोई नई बात नहीं सभी रेलवे स्टेशन पर यही होता है। पर एक खास चीज है, मेरे ग्वालियर के रेलवे स्टेशन की। यहां आपको कई युवक-युवती और बुजुर्ग लोग ट्रेन के हर डिब्बे तक दौड़-भाग कर पानी पिलाते नजर आएंगे। ये सभी पंजाबी परिषद के माध्यम से निशुल्क और निस्वार्थ भाव से रेलवे यात्रियों को भरी दोपहर में पानी पिलाते हैं। इसके लिए न तो सरकार-प्रशासन उन्हें कुछ देता है और न ही संस्था के माध्यम से उन्हें कुछ मिलता है। फिर भी बड़ी जीवटता से ये ४५-४८ डिग्री के प्राणसुखाऊ टेम्परेचर में भी सूख रहे गलों को तर करने के लिए दौड़-भाग करते हैं।
मुख्य बात यह है कि सात-एक दिन पहले प्रशासन ने स्टेशन पर पानी बेचने वालों के हित को ध्यान में रख कर फैसला लिया था कि कोई भी अब स्टेशन पर निशुल्क पानी उपलब्ध नहीं कराएगा। मुझे प्रशासन के इस आदेश से बड़ी हताशा हुई। खुद तो कोई व्यवस्था करता नहीं और कोई आगे आकर भला काम करना चाहे तो उसे करने नहीं देता। पंजाबी परिषद के लोगों ने इस आदेश के विरुद्ध आवाज बुलंद की। उनकी आवाज में सत्य था और उन करोड़ों लोगों की दुआएं थीं, जिनके सूखे गलों तक परिषद के लोगों ने नीर पहुंचाया था। आखिर में चार-एक दिन में ही प्रशासन को अपने फैसला बदलना पड़ा। आज जब स्टेशन पहुंचा तो उन्हें पानी पिलाते देख सुखद अनुभूति हुई। 
---->>  "एक याद है मेरी परिषद के साथ आप पढ़ो तो सुनाऊं। चूंकि अपुन का मन भी थोड़ा-सा सेवाभावी है। मैं कॉलेज में पढ़ रहा था तब मेरा भी मन हुआ कि खुद एक प्याऊ खोलूं। खर्चा पानी जोड़ा, अपने पॉकेट से बाहर का मामला दिखा। फिर सोचा किसी को स्पॉन्सर बना देते हैं, कुछेक नाम थे मेरे पास जो मेरा कहा नहीं टाल सकते थे। खैर ये आइडिया भी ड्राप किया। फिर डिसाइड किया कि क्यों न परिषद के काम में हाथ बंटाया जाए। अपने एक भाई साहब जी हैं उन्होंने रेलवे स्टेशन पर परिषद की उत्साही टीम से मिलवाया। ग्वालियर की गर्मी, उफ! बाबा। ऐसी गर्मी में सिर से बांधी सॉफी और पानी की ट्रॉली इधर से उधर दौड़ा कर डिब्बे-डिब्बे जाकर पानी पिलाया। कभी-कभी थकान होने पर बैठ जाते तो, ऊर्जा से लबालब बुजुर्ग कहते-क्या बेटा अभी तो खून गर्म है और इस गर्मी से उबल भी रहा होगा। आलस मत खाओ। उनका कहना सुनकर फिर अपने काम पर लग जाते। बड़ा अच्छा अनुभव रहा। खूब मजे आए थे सफर पर निकले लोगों को पानी पिलाने में......."

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

पाक में जबरन कराया धर्मातरण

पाकिस्तान के प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी ने देश के पंजाब प्रान्त में एक हिन्दु लड़की को अगवा करके उससे जबरन इस्लाम कुबूल करवाए जाने का शुक्रवार को दावा किया। बर्नी का कहना है कि उनके संगठन अंसार बर्नी ट्रस्ट इंटरनैशनल को रहीम यार खां जिले के लियाकतपुर स्थित काची मंडी में मेंघा राम की 15 साल की बेटी गजरी को 21 दिसम्बर 2009 को उसके मुस्लिम पड़ोसी द्वारा अगवा किए जाने का पता लगा है।

देश के मानवाधिकार मंत्री रह चुके बर्नी ने अगवा की गई हिन्दू लड़की को जबरन इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर करने की घटना की निंदा करते हुए उसे फौरन मुक्त करने की मांग की है। लेकिन शायद ही उनकी सुनी जाये...बर्नी ने कहा कि तलाश करने पर गजरी के माता-पिता को मालूम हुआ कि उनकी बेटी की शादी करवाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाया गया है और इस वक्त वह दक्षिणी पंजाब स्थित एक मदरसे में परेशानियों भरी जिंदगी जी रही है। उन्होंने कहा कि स्थानीय प्रशासन लड़की के अपहरण के मामले पर टिप्पणी से इनकार कर रहा है। स्थानीय प्रशासन तो मन करेगा ही क्योकि इस तरह की घटनाएं होती ही उसके इशारे पर है. इस तरह के घटनाक्रमों में उसकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मिली भगत होती है..... ऐसी कई घटनाएं  तो मीडिया के सामने आ ही नहीं पाती. पाकिस्तान में हिन्दुओं की बड़ी बुरी दशा है... जो समय-समय पर सामने आ ही जाती है.. आखिर सच को कब तक और कैसे दबाया जा सकता है..... पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या हालत है उसका बयां तो खुद पाकिस्तान के जनसँख्या के आंकड़े कर रहे है.... जहाँ लगातार हिन्दुओं की संख्या में कमी आती जा रही है... इसे भी पढ़ें...

सोमवार, 8 मार्च 2010

क्या हमें सोने के लिए औरतें मिलेंगी


ओरछा में राजा राम के दरबार में उस दिन बहुत हलचल थी। इस दिन विवाह की उत्तम लग्र थी। कई युवा जोड़े एक-दूजे का हाथ थाम कर, अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूजे के हो रहे थे। यह बात फरवरी माह की है। मैं अजीज के विवाह समारोह में शामिल होने के लिए ओरछा पहुंचा था। मेरा यह मित्र बहुत ही सादगी पसंद है। उसने धूमधाम से विवाह करने की जगह साधारण ढंग से विवाह करने का फैंसला लिया था। विवाह में उसने दहेज के रूप में एक नया पैसा लड़की वालों से नहीं लिया। जैसे-तैसे हमने जिद करके एक स्टेज सजा ली थी उसे तो वह भी पसंद नहीं था। स्टेज पर दो कुर्सियां जमा ली थीं और उनके पीछे कुछ फूलों की लडिय़ां लटका ली थीं। उन कुर्सियों पर ही दूल्हा-दुल्हन बैठे थे। सभी उनको बधाई दे रहे थे और याद के लिए फोटो निकलवा रहे थे। कार्यक्रम चल ही रहा था तभी अचानक मैं पलटा और देखा कि हमारा एक दोस्त दो अंग्रेजों के साथ स्टेज की ओर चला आ रहा है। मैंने दोस्त से पूछा कहां से पकड़ लाया तू इन फिरंगियों को। उसने कहा कहीं से नहीं खुद ही कौतुहलवश विवाह की रस्में देखने चले आए थे। अतिथि देवो भव की परंपरा हमारे यहां है ही। सो मैंने उससे कहा अब ये आए हैं तो इनका स्वागत सत्कार करो। कुछ खिलाओ-पिलाओ आखिर ये हमारे अतिथि हैं। वे बेल्जियम के रहने वाले थे और भारत भ्रमण पर आए थे। उनसे पूछने के बाद मुझे पता चला। मैंने उन्हें गुलाब जामुन और दहीबड़े  खाने को दिए। उन्होंने चटकारे लेकर दो दौने दहीबड़े चट कर दिए। काफी देर तक मैं और मेरा दोस्त उनसे बातें करते रहे। विवाह की अलग-अलग रस्मों की जानकारी उन्हें देते रहे। उनकी भी इच्छा हुई वर-वधू के साथ फोटो निकलवाने की। मैंने उनको हिंदी में सिखाया कि वर-वधू को कहना- खुश रहो और पूतो फलो-दूधो नहाओ। बंदो ने जल्दी सीख भी लिया। स्टेज पर पहुंचते ही जैसे ही उसने ये बोला, माहौल ठहाकों से गूंज गया। काफी देर बाद जब वो जाने लगे तो मैं उन्हें बाहर तक छोडऩे गया। अधिक समय हो जाने के कारण धर्मशाला के दोनों गेट पर ताला लटक रहा था। मैंने दोस्त को चौकीदार को बुलाने के लिए भेजा। मजाक में दोनों गोरों से कहा कि- अब आप आज यहीं रूक जाइए, सुबह चले जाना। उन्होंने जो जवाब दिया उसकी मुझे कतई आशा नहीं थी। उनका प्रत्युत्तर सुनकर मुझे बड़ा क्रोध आया। मैंने तुरंत ही गेट खोलकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया और सोचता रहा- इतना सम्मान मिलने पर क्या हम इस तरह की बात अपने मेजबान के सामने रख सकते हैं। दिल ने उत्तर दिया नहीं मेरे संस्कार इस बात की इजाजत नहीं देते। उनकी बात सुनकर ही मुझे समझ आया कि- क्यों हमारी सभ्यता और संस्कृति महान है। उन्होंने जवाब दिया था- हम रुक जाते हैं। क्या हमें सोने के लिए सुंदर औरतें मिलेंगी।
स्त्री की इज्जत करो
दुनिया आपकी इज्जत करेगी।