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सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

बाचा : द राइजिंग विलेज

 देश का पहला गाँव, जिसके हर घर में सोलर इंडक्शन पर पकता है खाना

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले का एक छोटा-सा अनुसूचित जनजाति (शेड्यूल ट्राइब) बाहुल्य गाँव है- बाचा। आजकल यह छोटा-सा गाँव अपने बड़े नवाचारों के कारण चर्चा में बना हुआ है। वर्ष 2016-17 से बाचा ने बदलाव की करवट लेनी शुरू की। आज बाचा न केवल मध्यप्रदेश बल्कि भारत के सभी गाँवों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है। गाँववासियों की लगन, समर्पण, सूझबूझ और वैज्ञानिक समझ ने बाचा गाँव की तस्वीर में रंग भर दिए हैं। एक समय में पानी की समस्या का सामना करने वाले इस गाँव में अब पानी के पर्याप्त प्रबंध हैं। शैक्षणिक संस्था विद्या भारती से जुड़े समाजसेवी मोहन नागर की प्रेरणा से ग्रामवासियों ने परंपरागत ग्राम-विज्ञान के सहारे बारिश के पानी को एकत्र करना प्रारंभ किया। इसके लिए पहाड़ी या ढलान से आने वाले पानी को रेत की बोरियों की दीवार बनाकर एकत्र किया गया, इससे न केवल खेती और पशुओं के लिए पानी जमा हुआ, बल्कि गाँव का भू-जलस्तर (ग्राउंड वाटर लेवल) भी बढ़ गया। गाँववालों ने इस प्रयोग को नाम दिया- बोरी बंधान। 

बोरी बंधान के इस प्रयोग से संग्रहित बारिश के पानी का उपयोग फसलों की सिंचाई में किया जाता है। पशुओं के पेयजल के लिए भी यह पानी उपयोग होता है। एक छोटे से ग्रामीण विज्ञान के प्रयोग से आज बाचा गाँव वह खेत लहलहाते हैं, जो कभी सिंचाई के अभाव में सूखे रह जाते थे। बोरी बंधान से गाँव की लगभग 15 एकड़ जमीन सिंचित की जा रही है। इसके साथ ही समाजसेवी मोहन नागर की योजना से प्रारंभ हुए गंगाअवतरण अभियान के अंतर्गत सभी ग्रामीणों ने आस-पास की पहाड़ियों पर खंती खोद कर बारिश के जल को जमीन के भीतर भेजने का और पौधरोपण करने का अनुपम एवं अनुकरणीय कार्य आरम्भ किया है। पिछले कुछ वर्षों से यह कार्य लगातार जारी है। प्रकृति संवर्धन और जल संरक्षण का यह अभिनव कार्य उस समय भी नहीं रुका जब कोरोना के कारण समूचा देश स्थिर-सा हो गया है। चूंकि गाँव में घरवास (लॉकडाउन) से छूट थी, कोरोना के संक्रमण की दस्तक भी नहीं हुयी थी, इसलिए बाचा और उसके आसपास के ग्रामीणों ने बारिश के जल को संरक्षित करने के लिए मानसून के आने से पहले ही गंगा अवतरण अभियान को प्रारम्भ कर दिया।  

सौर ऊर्जा के प्रयोग के लिए देशभर में चर्चित :

बाचा गाँव ने न केवल स्वच्छता और जलसंरक्षण सहित अन्य महत्व अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, बल्कि प्राकृतिक ऊर्जा का दैनिक जीवन में उपयोग करने के लिए वैज्ञानिक पहल भी प्रारंभ की है। आज बाचा की पहचान देश में ऐसे पहले गाँव के रूप में है, जहाँ हर घर की रसोई में सौर ऊर्जा की सहायता से भोजन तैयार किया जाता है। समाजसेवी मोहन नागर बताते हैं- “जीवाश्म ईंधन से जहाँ पर्यावरण को क्षति पहुँच रही थी, वहीं महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी यह ठीक नहीं था। हमने सबसे पहले गाँववालों को सौर ऊर्जा के बारे में जागरूक किया गया। आईआईटी मुंबई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों के सहयोग गाँव में इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन लगाए गए हैं। अब गाँव के प्रत्येक घर में सौर्य ऊर्जा का उपयोग कर खाना बनाया जाता है। इसके लिए आईआईटी मुंबर्ई के विद्यार्थियों और ओएनजीसी के अधिकारियों ने गाँव के कुछ लोगों को प्रशिक्षित किया और उन्हें सौर ऊर्जा से बिजली कैसे बनाई जाती है, इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया की जानकारी दी।” 

गाँव वालों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रारंभ में उन्हें न तो सौर ऊर्जा के बारे में पता था और न ही इसके लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों की कोई जानकारी थी। इस समस्या का समाधान निकला आईआईटी मुंबई और ओएनजीसी के अधिकारीयों से। उन्होंने बाकायदा सौर ऊर्जा के उपयोग और उसके उपकरणों के रखरखाव के लिए गाँव के ही कुछ लोगों प्रशिक्षित किया। गाँववासियों को समझाया कि सौर ऊर्जा की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है और उससे कैसे बिजली बनाई जा सकती है। हालाँकि, शुरुआत में तो गांववालों को यह बेहद ही मुश्किल और खर्चीला काम नज़र आया। लेकिन, पुराने अनुभवों और सफलता ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। परिणाम सबके सामने हैं कि आज सौर ऊर्जा ने ग्रामीणों के ईंधन का खर्च तो बचाया ही, महिलाओं को चूल्हे के धुंए से भी बचा लिया है।

अपने रसोईघर में सौर ऊर्जा से खाना बनाने वाली लता बताती है कि सौर पैनल नहीं लगा था तब हमें लकड़ी लाने के लिए जंगल में दूर तक जाना पड़ता था। हमें डर भी लगता था। इसके साथ ही अब हमें रसोई में धुंए से भी छुटकारा मिल गया है। ग्रामीण शरद बताते हैं कि सौलर ऊर्जा के उपयोग के बाद से गाँव में बहुत परिवर्तन आया है। 

आईआईटी मुंबई के इंजीनियर देवसुख बताते हैं कि बाचा गाँव में 74 घर हैं। इन सभी घरों में एक-एक हजार वॉट के सोलर पैनल सिस्टम लगे हैं। इसमें चार पैनल, चार बैटरी और एक चूल्हा शामिल है। उनका दावा है कि बारिश के मौसम में सूरज की रौशनी नहीं मिलने पर भी बैटरी के बैकअप से 5-6 घंटे तक यह काम करता है। 

‘अन्नपूर्णा मंडपम’ से बचा रहे हैं प्रतिमाह 500 से 1000 रुपये : 

विद्या भारती ने इस गाँव में एक और सार्थक पहल की शुरुआत की है, जिसे “अन्नपूर्णा मंडपम” नाम दिया गया है। इसका अर्थ है घर का किचन गार्डन। गाँव के लगभग हर घर में यह गार्डन है, जिसमें ग्रामीण घर में उपयोग के लिए सब्जी उगा रहे हैं। इससे हर परिवार के महीने के 500-1000 रूपये की बचत हो जाती है। 

प्लास्टिक मुक्त घूरा :

इस गाँव की एक और बड़ी उपलब्धि है कि ग्रामीणों ने अपने घूरों (कचरा एकत्र करने के स्थान) को प्लास्टिक मुक्त कर लिया है। प्लास्टिक मुक्त घूरे में एकत्र कचरे का उपयोग खेत के लिए जैविक खाद बनाने में किया जाता है। वैसे तो इस गाँव में प्लास्टिक का उपयोग कम ही किया जाता है, लेकिन जो भी प्लास्टिक कचरा निकलता है, उसे अलग रखा जाता है। उसे घूरे में नहीं फेंका जाता है।

गाँव पर बनी फिल्म 'बाचा : द राइजिंग विलेज' को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार : 


माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक लोकेन्द्र सिंह और प्रोड्यूसर मनोज पटेल ने इस गाँव कहानी सबके सामने लाने के उद्देश्य से एक डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘बाचा : द राइजिंग विलेज’ का निर्माण किया। फिल्म को राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद के तत्वावधान में आयोजित ‘नेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑन रूरल डेवलपमेंट’ में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अलावा इस फिल्म को कोलकाता में आयोजित 5वें अंतरराष्ट्रीय विज्ञान फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग हेतु भी चुना गया। 

आदर्श गाँव के रूप में बाचा :

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के एक छोटे से अनुसूचित जनजाति गाँव “बाचा” की कहानी सबको प्रेरणा देने वाली है। आधुनिक और पारंपरिक विज्ञान के छोटे-छोटे उपायों को अपनाकर, "बाचा" जैसा कोई भी गाँव एक आदर्श गाँव के रूप में खड़ा हो सकता है। इसी बात को समझाने के लिए हमने इस गाँव पर एक फिल्म बनायी। जिसको लेकर अभी तक काफी अच्छी प्रतिक्रियाएं आई हैं। - मनोज पटेल, निर्देशक-संपादक 

हर कोई जाने बाचा की कहानी :

हम चाहते हैं कि बाचा की कहानी हर कोई जाने, ताकि अन्य गाँव भी आदर्श बनें। बाचा जलसंरक्षण और सौर ऊर्जा का बड़ा सन्देश देता है। “इलेक्ट्रिक सोलर इंडक्शन” और “बोरी बंधन” जैसे अनूठे प्रयोग अनुकरणीय हैं। - लोकेन्द्र सिंह, फिल्म प्रोड्यूसर



बाचा की कहानी साधारण कहानी नहीं है। यह पिछड़े गाँव से आदर्श गाँव तक सीमित रह जाने की कहानी भी नहीं है। ‘बाचा’ की यात्रा अभी रुकी नहीं है। आधुनिक और परंपरागत विज्ञान के छोटे उपायों को अपनाकर बाचा ने सफलता की जो नींव रखी हैं, वह उसे और मजबूत करने के लिए प्रयत्नशील है। यह अन्य गाँव को भी राह दिखा रहा है। निसंदेह यह छोटा गाँव आज सबके बीच न केवल चर्चा का बल्कि प्रेरणा का स्रोत भी बन गया है। 

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

शम्भू धारा : अमरकंटक का 'गुमनाम' आकर्षक जल प्रपात



शम्भू धारा जल प्रपात माँ नर्मदा उद्गम स्थल से तकरीबन 5 किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है। यहाँ जंगल इतना घना है कि धूप धरती को नहीं छू पाती है। ऊंचे और हरे-भरे वृक्षों के बीच से कच्चा रास्ता शम्भूधारा तक पहुँचता है। घने जंगल से होकर शम्भूधारा तक पहुँचना किसी रोमांच से कम नहीं है। अमरकंटक के अन्य पर्यटन स्थलों की अपेक्षा यहाँ कम ही लोग आते हैं। दरअसल, लोगों को इसकी जानकारी नहीं रहती। किसी मार्गदर्शक के बिना यहाँ तक आना किसी नये व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। यह स्थान बेहद खूबसूरत है। प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। यहाँ पशु-पक्षियों की आवाज किसी मधुर संगीत की तरह सुनाई देती हैं। 
          ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के एक नाम शम्भूनाथ पर इस जल प्रपात का नाम शम्भूधारा पड़ा है। हालाँकि यह माँ नर्मदा नदी पर बना हुआ जल प्रपात नहीं है, बल्कि बरसाती नाले का झरना है, जो लगभग 35 मीटर की ऊँचाई से नीचे गिरता है। यूँ तो आप वर्षभर इस जलप्रपात को देख सकते हैं। यदि आप बारिश के मौसम में यहाँ आएंगे तो अधिक आनंद आएगा। बारिश में शम्भूधारा जलप्रपात में जलराशि बढ़ जाती है और इसका सौंदर्य चरम पर पहुँच जाता है। शम्भू धारा से ठीक पहले एक स्टॉप डेम बनाया गया है। जहाँ एकत्र जल और उसके किनारे खड़े ऊँचे-पूरे पेड़ों के कारण मनमोहक दृश्य उपस्थित होता है। मानो जलराशि को दर्पण बना कर वृक्ष अपना रूप-यौवन निहार रहे हों। 


          शम्भूधारा के आसपास निर्जन वन होने के कारण यहाँ साधु-संन्यासी धूनी भी रमाते हैं। एक स्थान हमें ऐसा मिला भी, जहाँ किसी साधु ने अपनी ध्यान-साधना के लिए शिवलिंग की स्थापना कर रखी थी और वहाँ अग्नि भी धधक रही थी। हालाँकि उस समय वहाँ कोई साधु उपस्थित नहीं था। संभवत: नगर की ओर निकल गया होगा। अंधेरा घिरने लगा था। घने जंगल में वैसे भी शाम जल्दी ढल जाती है। हमारे लौटने का वक्त हो गया था। हालाँकि, मन में एक और जलप्रपात देखने की लालसा थी, जो शम्भू धारा से आगे जाकर था। उसे फिर कभी तसल्ली से देखने का इरादा करके हम लौट पड़े। मैं नर्मदे हर सेवा न्यास में रुका था, जो शम्भू धारा से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर होगा। अपने कमरे पर लौटने के बाद तय किया कि एक बार बारिश में या फिर बारिश के बाद इस जलप्रपात को अवश्य देखूंगा। संयोग से ईश्वर ने वह अवसर दिया और मैंने दिसंबर-जनवरी में इस सुंदर झरने का आनंद लिया।

योगी की तपस्थली, शिव लिंग और धूनी 

वृक्षों के बीच से शम्भू धारा की एक झलक 

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

कविताओं में बसी मिट्टी की सौंधी सुगंध

 यु वा कवि लोकेन्द्र सिंह राजपूत का पहला काव्य संग्रह हिन्दी जगत के सम्मुख प्रस्तुत हो रहा है। वह इतनी ही स्वाभाविक घटना है जितनी कि बसंतागमन पर आम्रकुंजों का बौर राशि से संभारित होने लगना या प्राची से सूर्य को मुस्कराते देख किसी गौरैया का चहक-चहक पडऩा। तात्पर्य यह है कि श्री लोकेन्द्र सुमित्रानंदन पंत के 'वियोगी होगा पहला कवि' को चरितार्थ भले ही न करें किन्तु इतना तो है ही कि उनका काव्य सृजन 'वही होगी कविता अनजान' की तरह अनजाने और लगभग अनायास ही बह निकला है। उसके पीछे उनकी भाव प्रवणता ही प्रमुख है। 
  श्री लोकेन्द्र का यह काव्य संग्रह उनकी अपनी मातृभूमि, अपनी मां, अपने समाज और अपने परिवेश के प्रति उठती श्रद्धा, समादर, प्रेम एवं दायित्व चेता भावनाओं की अभिव्यक्ति है। उनकी यह भावाभिव्यक्ति अत्यन्त सहज, सरल एवं तरल है। कवि श्री लोकेन्द्र अपनी रचनात्मकता में प्राय: अकृत्रिम और कहीं-कहीं सपाट दिख पड़ते हैं। यह उनके काव्य लेखन का वैशिष्ट्य है और यही उनकी, कम से कम उनके साम्प्रतिक कवि व्यक्तित्व की पहचान है।
वीडियो में देखें- क्या कह रहे हैं वरिष्ठ साहित्यकार श्री जगदीश तोमर 


शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

माई की बगिया : जहाँ छुटपन में खेला करती माँ नर्मदा

- लोकेन्द्र सिंह -
नर्मदाकुंड से पूर्व दिशा की ओर लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर माई की बगिया स्थित है। यह बगिया माँ नर्मदा को समर्पित है। यह स्थान हरे-भरे बाग की तरह है। एक छोटा-सा मंदिर है। यहाँ एक कुण्ड भी है, जिसे चरणोदक कुण्ड के नाम से जाना जाता है। एक मान्यता है कि नर्मदा का वास्तविक उद्गम स्थल यही स्थान है। माई की बगिया में निकली जलधारा ही आगे जाकर वर्तमान नर्मदा उद्गम मंदिर में निकली है।
वीडियो देखें - 

          एक दूसरी मान्यता यह है कि इस बाग को नर्मदा मैया के खेलने-कूदने के लिए बनाया गया था। छुटपन में नर्मदा अपनी सखी जोहिला सहित अन्य के साथ यहाँ खेला करती थीं। पूजा-अर्चना के लिए भी इसी स्थान से माँ नर्मदा पुष्प चुना करती थी। दूसरी मान्यता कहीं न कहीं पहली मान्यता को स्थापित करती प्रतीत होती है। माई की बगिया परिक्रमावासियों का एक पड़ाव भी है। माँ नर्मदा की परिक्रमा के लिए निकले श्रद्धालुओं को यहाँ देखा जा सकता है। वे सब आनंद से यहाँ ठहरते हैं। थोड़ा विश्राम करते हैं। माई के भजन करते हुए भोजन प्रसादी तैयार कर उसे प्राप्त करते हैं।
          माई की बगिया का और भी महत्त्व है। नेत्र औषधि के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण पौधे गुलबकावली की जन्म स्थली भी माई की बगिया है। गुलबकावली पुष्प के अर्क से आयुर्वेदिक 'आईड्राप' तैयार किया जाता है। अमरकंटक के वैद्य ही नहीं, अपितु सामान्य नागरिक भी बहुत सरल विधि से गुलबकावली के फूल से नेत्र औषधि तैयार कर लेते हैं। अमरकंटक इस बात के लिए भी प्रसिद्ध है कि यहाँ के जंगलों में प्रचूर मात्रा में जड़ी-बूटी पाई जाती हैं।



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यह भी देखें - 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

माँ नर्मदा मंदिर, उद्गम स्थल


- लोकेन्द्र सिंह - 
अमरकंटक में जब हम नर्मदा उद्गम स्थल के समीप पहुँचते हैं, तब धवल रंग के मंदिरों का समूह बरबस ही हमें आकर्षित करता है। 24 मंदिरों वाले इसी परिसर में स्थित है नर्मदा कुण्ड, जहाँ से सदानीरा माँ नर्मदा का उद्गम हुआ है। श्री नर्मदा मंदिर के निर्माण के संबंध में कोई प्रमाण उपलब्ध नही हैं। यह मंदिर बहुत प्राचीन हैं। मंदिरों का निर्माण किसने कराया, यह भी कहा नहीं जा सकता। चूँकि माँ नर्मदा के उद्गम कुण्ड में रेवा नायक की प्रतिमा स्थित है। इसलिए यह माना जा सकता है कि प्रारंभिक तौर पर माँ नर्मदा मंदिर का निर्माण रेवा नायक नाम के व्यक्ति ने कराया होगा। रेवा नायक के नाम पर ही माँ नर्मदा का एक नाम रेवा है। आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने यहाँ बंसेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की और नर्मदा कुण्ड बनवाया। उस समय यहाँ बांस के बहुत पेड़ थे, इसलिए आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित महादेव को बंसेश्वर महादेव कहा गया। बाद में, अन्य राजाओं-महाराजाओं ने मंदिर परिसर के निर्माण में अपना योगदान दिया है। 
माँ नर्मदा मंदिर और उद्गम स्थल वीडियो में देखें - 

         

रविवार, 30 सितंबर 2018

तेलुगु मीडिया की विकास यात्रा पर महत्वपूर्ण सामग्री से भरपूर मीडिया विमर्श का "तेलुगु मीडिया विशेषांक"

भाषायी पत्रकारिता पर मीडिया विमर्श का एक और महत्वपूर्ण प्रयास
- लोकेन्द्र सिंह - 
पत्रकारिता एवं संचार क्षेत्र से जुड़े लोगों को मीडिया विमर्श के प्रत्येक अंक का बेसब्री से इंतजार रहता है। मीडिया विमर्श का प्रत्येक अंक न केवल अपने पाठकों एवं प्रबुद्ध वर्ग की कसौटी पर खरा उतरता है, बल्कि और अधिक अपेक्षाएं बढ़ा देता है। 12 वर्ष से यह क्रम जारी है। एक के बाद एक महत्वपूर्ण विशेषांक हमारे सामने आए हैं। इस सबके पीछे मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी हैं। 
          भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता की समृद्ध विरासत और प्रयोगों को हिंदी जगत के सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य भी मीडिया विमर्श के माध्यम से प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने हाथों में संभाल रखा है। वह सबसे पहले उर्दू पत्रकारिता पर चर्चित विशेषांक लेकर आए। उसके बाद गुजराती पत्रकारिता पर एक उल्लेखनीय विशेषांक उपलब्ध कराया। अब नये विशेषांक के माध्यम से उन्होंने हिंदी मीडिया के जगत को तेलुगु मीडिया से परिचित कराने का प्रयत्न किया है। 
           हम सब जानते हैं कि तेलुगु भाषा का एक बड़ा परिवार है। तेलुगु भारत की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। भारत में तेलुगु बोलने वालों की संख्या 15 करोड़ से अधिक है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अलावा संपूर्ण भारत में तेलुगु भाषी रहते हैं। यही नहीं, भारत के बाहर भी तेलुगु बोलने वालों की बड़ी संख्या है। ऐसे में तेलुगु मीडिया को समझना और उसको जानना जरूरी हो जाता है। इस काम में मीडिया विमर्श का यह अंक बहुत ही सहयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। 
          तेलुगु मीडिया विशेषांक के अतिथि संपादक हैं- सी. जयशंकर बाबु, जिन्हें अकसर हम मीडिया विमर्श में पढ़ते रहे हैं। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाहन किया है। तेलगू मीडिया के विविध आयामों पर इस विशेषांक में सामग्री है। भारतीय भाषायी पत्रकारिता का जगत कितना वृहद और समृद्ध है, यह समझाने में मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला साधुवाद की पात्र है। मीडिया विमर्श की यह श्रृंखला अनवरत चलती रहनी चाहिए... यही शुभकामनाएं हैं।  
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मीडिया विमर्श के "तेलुगु मीडिया विशेषांक" पर यूट्यूब चैनल "अपना वीडियो पार्क" में चर्चा देखिये.... 


रविवार, 23 सितंबर 2018

हैरतंगेज और रोमांचक नृत्य भवई

- लोकेन्द्र सिंह
भवई, राजस्थान के पारंपरिक लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य बहुत कठिन है। हैरतंगेज और अत्यंत रोमांचक भी। जब नर्तकियां भवई की प्रस्तुति देती हैं, तो लोग दाँतों तले अंगुलियां दबा कर उनकी प्रस्तुति देखते हैं। भवई नृत्य के लिए लंबी नृत्य साधना की आवश्यकता होती है। कुशल कलाकार ही इस नृत्य की प्रस्तुति दे सकते हैं। भवई नृत्य में नर्तकियां अपने सिर पर 7 से 8 घड़े एक के ऊपर एक रखकर संतुलन बनाते हुए नाचती हैं। उसके बाद इस नृत्य को और अधिक रोमांचक बनाने के लिए यह नर्तकियां सिर पर घड़े रख कर काँच या अन्य धातु के गिलास पर पैर रखकर नाचती हैं। दर्शक सबसे अधिक हैरत में तब पड़ जाते हैं, जब यह कुशल नर्तकियां नंगी तलवारों के ऊपर चढ़ कर नाचती हैं। 
          मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 11-12 अगस्त, 2018 को आयोजित 'यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव' में राजस्थानी कलाकारों की भवई नृत्य की एक प्रस्तुति दी। उस शानदार प्रस्तुति की छोटी-सी वीडियो क्लिप की लिंक यहाँ दी हुई है। उस लिंक पर क्लिक करके आप भी रोमांचित करने वाले भवई नृत्य का आनंद ले सकते हैं। उल्लेखनीय है कि भवई नृत्य में पुरुष संगीतकार नर्तकियों के लिए पृष्ठभूमि संगीत बजाता है। संगीत के लिए कई यंत्र जैसे पखावज, ढोलक, झांझर, सारंगी और हार्मोनियम बजाए जाते हैं। आमतौर पर इसके साथ ही मधुर राजस्थानी लोक गीत भी संगीतकारों द्वारा गाया जाता है। नर्तकियों सहित सभी कलाकार राजस्थान के पारंपरिक रंगीन और सुंदर कपड़े पहनते हैं। 
          यह रहा भवई नृत्य का लिंक। 

रविवार, 16 सितंबर 2018

नर्मदा के तट पर हुई सांख्य दर्शन की रचना

भारतीय संस्कृति के प्रमुख दर्शनों में से एक है- "सांख्य दर्शन"। महाभारतकार वेद व्यास ने कहा है कि "ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्" (शांति पर्व 301.109)।  इसका अर्थ है- इस संसार में जो कुछ भी ज्ञान है, सब सांख्य से आया है। शान्ति पर्व के कई स्थलों पर सांख्य दर्शन के विचारों का बड़े काव्यमय और रोचक ढंग से उल्लेख किया गया है। 
       इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना अमरकंटक में नर्मदा तट के किनारे पर कपिल मुनि ने की है। कपिल मुनि और सांख्य दर्शन से जुड़े उस स्थान को देखने के लिए यह वीडियो देखें...  


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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

यहाँ का कंकर-कंकर शंकर है

नर्मदा नदी के जल में पाए जाने वाले शिव लिंग का बहुत महत्व है। शास्त्रों में नर्मदा में पाए जाने वाले "शिवलिंग" को नर्मदेश्वर और बाणलिंग भी कहा गया है। इन शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है। जानिये क्यों है नर्मदा जल में पाए जाने वाले शिव लिंग का इतना महत्व - 


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सोमवार, 13 अगस्त 2018

देहरी छूटी, घर छूटा


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काम-धंधे की तलाश में
देहरी छूटी, घर छूटा
गलियां छूटी, चौपाल छूटा
छूट गया अपना प्यारा गांव
मिली नौकरी इक बनिया की
सुबह से लेकर शाम तक
रगड़म-पट्टी, रगड़म-पट्टी
बन गया गधा धोबी राम का।

आ गया शहर की चिल्ल-पों में
शांति छूटी, सुकून छूटा
सांझ छूटी, सकाल छूटा
छूट गया मुर्गे की बांग पर उठना
मिली चख-चख चिल्ला-चौंट
ऑफिस से लेकर घर के द्वार तक
बॉस की चें-चें, वाहनों की पों-पों
कान पक गया अपने राम का।

सीमेन्ट-कांक्रीट से खड़े होते शहर में
माटी छूटी, खेत छूटा
नदी छूटी, ताल छूटा
छूट गया नीम की छांव का अहसास
मिला फ्लैट ऊंची इमारत में
आंगन अपना न छत अपनी
पैकबंद, चकमुंद दिनभर
बन गया कैदी बाजार की चाल का।
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)

रविवार, 5 अगस्त 2018

दोस्ती क्या है?


दोस्ती क्या है? 
उसे कुछ यूं समझें...
वह पहला रिश्ता है 
रक्त संबंधों से इतर
लेकिन, उतना ही या 
शायद उनसे अधिक गहरा।

दोस्ती क्या है? 
उसे कुछ यूं समझें...
पहली बारिश के बाद
भुरभुरी मिट्टी से उठी
सौंधी सुगंध-सा या
शायद उससे भी ऊंचा अहसास।

दोस्ती क्या है? 
उसे कुछ यूं समझें...
सूरज के डूबने के बाद
धरा पर अंधेरे से लड़ती
दीपक की ज्योति-सा या
शायद उससे भी तेज प्रकाश।

दोस्ती क्या है?
उसे कुछ यूं समझें...
वह एकमात्र तिजोरी है
उसके दिल में राज हमारा
सुरक्षा की पूरी गारंटी या
शायद उससे भी पक्का विश्वास।
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)
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इस कविता का आनंद मराठी में भी ले सकते हैं... मराठी में अनुवाद किया है, आपला यश की संपादक अपर्णा पाटिल जी ने और उसे बोल दिए हैं अनिल वल्संगकर जी ने