रविवार, 26 जून 2016

आतंक का अंत कब?

 जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के पांपोर में आतंकवादियों की ओर से घात लगाकर किए गए हमले में सीआरपीएफ के आठ जवानों की शहादत बहुत बड़ी क्षति है। यह हमला न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि चिंताजनक भी है। आखिर कब तक आतंकी भारत को इस तरह लहूलुहान करते रहेंगे? रह रहकर होने वाले इन आतंकी हमलों में भारत माता के अनेक लाल असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं। क्या कभी हमने विचार किया है कि इन आतंकी हमलों में हमने कितने जवान खोए हैं? आखिर आतंक का अंत कब होगा? क्यों नहीं आतंक के समूल नाश के लिए आरपार की लड़ाई की पुख्ता योजना बनाई जाती? यदि हम वैश्विक मंच पर अपने देश की छवि एक शक्तिशाली राष्ट्र के तौर पर बनाना चाहते हैं तब हमें इन आतंकी हमलों को रोकना होगा।
         यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम प्रत्येक आतंकी घटना के बाद कहते हैं कि अब सुरक्षा व्यवस्था और चौकस कर दी जाएगी और आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यानी कि हम यह मानते हैं कि आतंकी हमले हमारी लापरवाही के कारण होते हैं। लापरवाही की यह बात कहीं न कहीं सच है। संवेदनशील क्षेत्रों में हम पहले से सतर्कता क्यों नहीं बरतते हैं? जबकि हम जानते हैं कि संवेदनशील क्षेत्रों में जरा-सी चूक घातक साबित होती है। 
         हालांकि, पिछले कुछ समय में सुरक्षा जवानों ने आतंकियों को वारदात करने से पहले ही ढेर करने में सफलता प्राप्त की है। दक्षिणी कश्मीर के शोपिया में शनिवार को सुरक्षा बलों ने हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़े तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी एक सर्च ऑपरेशन के दौरान हुई। गौरतलब है कि पिछले तीन दिनों से कश्मीर घाटी में सेना द्वारा अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान में अब तक सात आतंकवादियों को मार गिराया गया है। लेकिन, फिर वही सवाल कि सर्च ऑपरेशन के बाद भी कुछ आतंकी बच कैसे जाते हैं? आतंकियों को ढूंढ़-ढूंढ़कर मारने की यह कार्रवाई सौ प्रतिशत होनी चाहिए। इसके लिए सबसे जरूरी है कि आतंकियों के मददगार गद्दारों की पहचान सुनिश्चित हो। 
         हाल में गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट आई थी कि पठानकोट में फिर से आतंकवादी हमला कर सकते हैं। पठानकोट के आसपास के गाँवों में आतंकियों के छिपे होने की जानकारी है। हमारे सामने प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर आतंकियों के पनाहगार कौन हैं? निशानेबाजी के अभ्यास से लौट रहे सीआरपीएफ के जवानों पर हमला करने वाले आतंकियों की मदद भी निश्चित ही इन्हीं पनाहगारों ने की होगी। सीआरपीएफ के महानिरीक्षक नलिन प्रभात ने कहा कि आतंकवादियों के शवों से ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों पाकिस्तानी थे। यानी हमले को अंजाम देने के लिए सीमा पार से घुसपैठ करके आए आतंकियों ने हमले से पहले जम्मू-कश्मीर में किसी के यहाँ शरण ली होगी। जब तक आतंकियों के पनाहगार उजागर नहीं होंगे तब तक शत-प्रतिशत सफलता मिलना मुश्किल है। 
         वहीं, घुसपैठ को रोकने के लिए पाकिस्तान को घेरना जरूरी है। जब तक पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब नहीं मिलेगा, वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा। प्रत्येक आतंकी हमले के बाद एक सच तो यही सामने आता है कि आतंकी पाकिस्तान मूल के हैं। आतंकी पाकिस्तान की धरती पर चल रही कट्टरवाद की फैक्ट्रियों में तैयार होते हैं। लेकिन, पाकिस्तान हर बार इन तथ्यों को सिरे से खारिज कर देता है। पाकिस्तान अपनी जवाबदेही स्वीकार करे इसके लिए उसे विवश करना होगा। वरना, भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित जैसे लोग हमारे जवानों की शहादत पर 'इफ्तार पार्टी का लुत्फ' उठाते रहेंगे और हम हर बार आँसू बहाते रहेंगे। 

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