शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

अब राष्ट्रगान से क्या आपत्ति?

 क्या किसी की धार्मिक भावनाएं राष्ट्र से ऊपर होनी चाहिए? जाहिरतौर पर जवाब होगी- 'नहीं'। प्रत्येक भारतीय के लिए उसका देश सबसे पहले होना चाहिए। राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सबको करना चाहिए, चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय या धर्म को मानने वाला हो। लेकिन, क्या कारण है कि एक संप्रदाय बार-बार भारतीय प्रतीकों का अपमान करता है? पहले राष्ट्रगीत वन्देमातरम् का विरोध किया गया। राष्ट्रगीत को इस्लाम विरोधी कहकर उसका गायन बंद कर दिया। अब राष्ट्रगान का विरोध होने लगा है। राष्ट्र के प्रतीक चिह्नों के विरोध को राष्ट्र का विरोध क्यों नहीं माना जाना चाहिए? राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का विरोध सरासर राष्ट्र की अवमानना है। कोलकाता के तालुकपुर मदरसे के हेडमास्टर काजी मासूम अख्तर को इसलिए मारा-पीटा गया क्योंकि वह बच्चों को गणतंत्र दिवस के लिए राष्ट्रगान का अभ्यास करा रहे थे। बच्चों से जन-मन-गण गवाने पर कई मौलानाओं और उनके समर्थकों ने मिलकर काजी मासूम अख्तर को पीट दिया। मौलवियों ने राष्ट्रगान को इस्लाम विरोधी गीत करार दिया है। उनका कहना है कि यह 'हिन्दूवादी गीत' इस्लाम को अपवित्र करता है। इस्लाम इतना छुईमुुई धर्म है क्या? बात-बेबात पर इस्लाम खतरे में आ जाता है?  
        मुसलमानों को समझना होगा कि यदि वे इस देश से प्रेम करते हैं तो उसके प्रतीकों को भी स्वीकार करना होगा। कल 'वन्देमातरम्' से इस्लाम खतरे में पड़ गया था और आज 'जन-गण-मन' से इस्लाम अपवित्र हो रहा है, कल इस देश के नाम से भी इस्लाम का पेट दुख सकता है। यह रवैया ठीक नहीं है। एक तरफ तो मुसलमान कहते हैं कि यह देश जितना हिन्दुओं का है, उतना ही मुसलमानों का है। फिर, देश का सम्मान जितना हिन्दू करते हैं, उतना मुसलमान क्यों नहीं करते? अभी कुछ दिन पूर्व भी ऐसे मामले सामने आए थे, जब राष्ट्रगान के सम्मान में मुस्लिम बंधु खड़े नहीं हुए। इस तरह की धार्मिक कट्टरता देश और धर्म दोनों के लिए खतरनाक है। इसी धार्मिक कट्टरता के कारण आज दुनिया में इस्लाम की बदनामी हो रही है। यदि इस्लाम ने बुनियादी सुधारों की ओर ध्यान नहीं दिया तो वह दिन दूर नहीं जब इस्लाम स्वयं ही खत्म हो जाएगा। वन्देमातरम् या जन-गण-मन से इस्लाम को खतरा नहीं है। इनके गायन से इस्लाम अपवित्र नहीं होगा। बल्कि, असल खतरा तो इस्लाम को कट्टरता से है। यह धार्मिक कट्टरता इस्लाम को अपवित्र कर रही है। अपनी छवि सुधारनी है और खुद को बचाना है तो इस्लाम को उदारवादी रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। 
        बहरहाल, मौलवियों ने राष्ट्रगीत गवाने के लिए सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे के शिक्षक को पीटकर यह साबित करने का प्रयास किया है कि मदरसे में उदारवादी शिक्षा के लिए जगह नहीं है। मदरसों में कट्टरता के पाठ पढ़ाये जाते हैं। लम्बी दाढ़ी रखने और ऊंचा पजामा पहनने के लिए भी मौलवियों ने काजी मासूम अख्तर के खिलाफ फतवा भी जारी किया है। आज के समय में इस तरह के फतवे बेतुके हैं। मौलवी यह तय नहीं कर सकते कि कौन कितनी लम्बी-छोटी दाढ़ी रखे या न रखे। ऊंचा पजामा पहने या जींस पहने, यह व्यक्तिगत पसंद और आजादी है। इस तरह की घटना किसी हिन्दू के साथ हुई होती तो ढोंगी सेक्युलर बुद्धिजीवी छाती कूट रहे होते। काजी मासूम अख्तर करीब आठ-नौ माह से पढ़ाने के लिए मदरसा नहीं जा पा रहे हैं लेकिन, कोई उनकी मदद के लिए अब तक आगे नहीं आया है। काजी साहब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, पुलिस और अल्पसंख्यक आयोग से मदद की गुहार कर चुके हैं, लेकिन अब तक न्याय के लिए भटक रहे हैं। एक बार इस्लाम के विचारकों को सोचना चाहिए कि उनके लिए देश पहले है या फिर धर्म? यह भी विचार किया जाना चाहिए कि इस धार्मिक कट्टरता से इस्लाम का कितना भला हो रहा है?

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. विचारणीय प्रस्तुति ..
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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