भाग्यनगर (हैदराबाद) में चल रहे रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जो उद्बोधन दिया है, वह वर्तमान राजसत्ता एवं समाजसत्ता के लिए दिशासंकेत है। उनके उद्बोधन पर संकीर्ण राजनीतिक दृष्टि से नहीं अपितु वृहद भारतीय दृष्टिकोण से चिंतन करने और उसका अनुसरण करने की आवश्यकता है। अपने व्याख्यान में सबसे पहले उन्होंने एक लोककथा के माध्यम से भारतीय समाज को उसके सामर्थ्य से परिचित कराया। भारतीय समाज के सामर्थ्य का ही परिणाम है कि विगत एक हजार वर्षों में अनेक बाह्य आक्रमणों के बाद भी हिन्दू संस्कृति जीवित है। अनेक ताकतों ने हिन्दुओं को नष्ट करने के लिए पूरी ताकत लगा ली लेकिन परिणाम क्या है, सब जानते हैं। इस ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि "हमें खत्म करने के अनेक कोशिशें की गईं लेकिन उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली। अगर हमें खत्म होना होता होता तो पिछले 1000 साल में ऐसा हो गया होता लेकिन लगभग पाँच हजार साल पुराना सनातम धर्म आज भी टिका हुआ है और अक्षुण्ण है। जिन्होंने हिन्दुओं को खत्म करने की कोशिश की वो आज पूरी दुनिया में आपस में संघर्ष कर रहे हैं। इतने अत्याचारों के बाद भी आज हमारे पास मातृभूमि है। हमारे पास संसाधनों की कमी नहीं है इसलिए हमें डरने की जरूरत भी नहीं है"।
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022
रविवार, 13 फ़रवरी 2022
लखीराम अग्रवाल : वैचारिक योद्धा की राजनीतिक यात्रा
भारतीय जनता पार्टी को 'पार्टी विद डिफरेंस' का तमगा निश्चित ही लखीराम जी अग्रवाल जैसे ईमानदार, जनसरोकारी और स्वच्छ छवि के राजपुरुषों के कारण ही मिला होगा। सादगी और मिलनसारिता की प्रतिमूर्ति थे लखीराम अग्रवाल। उनको जानने वाले बताते हैं कि राजनीति में लखीराम जैसे आदर्श राजनेता अब कम ही दिखते हैं। वे अलग ही माटी के बने थे। वे उस परम्परा के राजनेता थे, जिसका उद्देश्य राजनीति के मार्फत समाज की बेहतरी, जनसेवा और रचनात्मक सोच को आगे बढ़ाना था। जनसंघ से भाजपा के देशव्यापी पार्टी बनने के सफर में लखीराम अग्रवाल के योगदान को याद करना, सही मायने में भव्य और आलीशान इमारत की नींव के पत्थरों को याद करना है। उनको याद करते हैं तो एक वैचारिक योद्धा की राजनीतिक यात्रा भी याद आती है। इस यात्रा में स्थापित किए मील के पत्थर भी याद आते हैं। वह सब याद आता है जो आज की राजनीति में कम ही नजर आता है। लोकतंत्र के जीवत बने रहने के लिए किस तरह के राजनेताओं की जरूरत है, यह भी याद आता है।
शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022
हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व
एक ओर बाह्य विचारधारा के प्रभाव में कुछ राजनेता और उनके सहयोगी बुद्धिजीवी ‘हिन्दुत्व’ एवं ‘राष्ट्र’ की अवधारणा पर प्रश्न उठाकर उसे नकार रहे हैं। हिन्दुत्व को लेकर उनका विचार अत्यधिक नकारात्मक है। उन्हें जैसे ही अवसर मिलता है, नकारात्मक बातों के साथ हिन्दुत्व को जोड़कर, हिन्दुत्व के प्रति समाज में घृणा का भाव पैदा करने का प्रयास करते हैं। वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय विचार से अनुप्रमाणित संगठन हैं, जो हिन्दुत्व को भारत का मूल बता रहे हैं। हिन्दुत्व को सही प्रकार से परिभाषित करते हुए उनकी ओर से बताया जाता है कि उसमें सबके लिए सम्मानपूर्वक स्थान है। इस विमर्श के क्रम में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य को देखा जा सकता है। भाग्यनगर (हैदराबाद) में चल रहे रामानुजाचार्य सहस्राब्दी समारोह में शामिल होने पहुँचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि “हिन्दुत्व ही राष्ट्रत्व है। इसमें दो मत नहीं है। इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं है”।
सोमवार, 7 फ़रवरी 2022
शब्द-शब्द आपके भीतर उतर आएगा ‘नर्मदा का सौन्दर्य’
नर्मदा नदी के सौन्दर्य की गाथा | Saundarya ki nadi narmda
सदानीरा माँ नर्मदा का सौन्दर्य अप्रतिम है। शिवपुत्री को निहारन ही नहीं अपितु उसके किस्से सुनना भी अखंड आनंद का स्रोत है। और जब यह किस्से महान चित्रकार आचार्य नंदलाल बोस के यशस्वी शिष्य अमृतलाल वेगड़ सुना रहे हों, तब आनंद की अनुभूति की कल्पना कर ही सकते हैं। ईश्वर ने अमृतलाल वेगड़ की कूची और कलम दोनों पर अपार कृपा की है। जितने सुंदर उनके चित्र हैं, उतने ही रंग शब्द चित्रों में हैं। वेगडज़ी ने नर्मदा माई की परिक्रमा पर तीन पुस्तकें लिखी हैं- सौन्दर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे-तीरे नर्मदा।
रविवार, 30 जनवरी 2022
हंगामा नहीं, सत्यान्वेषण कीजिये
Lokendra Singh / लोकेन्द्र सिंह |
पत्रकारिता के संबंध में कुछ विद्वानों ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वह विपक्ष है। जिस प्रकार विपक्ष ने हंगामा करने और प्रश्न उछालकर भाग खड़े होने को ही अपना कर्तव्य समझ लिया है, ठीक उसी प्रकार कुछ पत्रकारों ने भी सनसनी पैदा करना ही पत्रकारिता का धर्म समझ लिया है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की विराट भूमिका से हटाकर न जाने क्यों पत्रकारिता को हंगामाखेज विपक्ष बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है? यह अवश्य है कि लोकतंत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए चारों स्तम्भों को परस्पर एक-दूसरे की निगरानी करनी है। पत्रकारिता को भी सत्ता के कामकाज की समीक्षा करनी है और उसको आईना दिखाना है। हम पत्रकारिता की इस भूमिका को देखते हैं, तब हमें वह हंगामाखेज नहीं अपितु समाधानमूलक दिखाई देती है। भारतीय दृष्टिकोण से जब हम संचार की परंपरा को देखते हैं, तब प्रत्येक कालखंड में संचार का प्रत्येक स्वरूप लोकहितकारी दिखाई देता है। संचार का उद्देश्य समस्याओं का समाधान देना रहा है।
बुधवार, 12 जनवरी 2022
भारत भक्ति से भरा मन है ‘स्वामी विवेकानंद’
स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मलेन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि विवेकानंद अपनी मातृभूमि भारत से असीम प्रेम करते थे। भारत और उसकी उदात्त संस्कृति के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा थी। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो स्वामी जी या फिर अन्य महान आत्माओं के जीवन से प्रेरणा लेकर भारत की सेवा का संकल्प लेते हैं। रामजी की गिलहरी के भांति वे भी भारत निर्माण के पुनीत कार्य में अपना योगदान देना चाहते हैं। परन्तु भारत को जानते नहीं, इसलिए उनका गिलहरी योगदान भी ठीक दिशा में नहीं होता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, चिन्तक एवं वर्तमान में सह-सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य अक्सर कहते हैं कि “भारत को समझने के लिए चार बिन्दुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले भारत को मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ”। भारत के निर्माण में जो भी कोई अपना योगदान देना चाहता है, उसे पहले इन बातों को अपने जीवन में उतरना होगा। भारत को मानेंगे नहीं, तो उसकी विरासत पर विश्वास और गौरव नहीं होगा। भारत को जानेंगे नहीं तो उसके लिए क्या करना है, क्या करने की आवश्यकता है, यह ध्यान ही नहीं आएगा। भारत के बनेंगे नहीं तो बाहरी मन से भारत को कैसे बना पाएंगे? भारत को बनाना है तो भारत का भक्त बनना होगा। उसके प्रति अगाध श्रद्धा मन में उत्पन्न करनी होगी। स्वामी विवेकानंद भारत माता के ऐसे ही बेटे थे, जो उनके एक-एक धूलि कण को चन्दन की तरह माथे पर लपेटते थे। उनके लिए भारत का कंकर-कंकर शंकर था। उन्होंने स्वयं कहा है- “पश्चिम में आने से पहले मैं भारत से केवल प्रेम करता था, परंतु अब (विदेश से लौटते समय) मुझे प्रतीत होता है कि भारत की धूलि तक मेरे लिए पवित्र है, भारत की हवा तक मेरे लिए पावन है, भारत अब मेरे लिए पुण्यभूमि है, तीर्थ स्थान है”।
शनिवार, 8 जनवरी 2022
सूर्य नमस्कार का मूर्खतापूर्ण विरोध
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के निर्णय एवं प्रस्ताव स्पष्ट करते हैं कि मुस्लिम समुदाय को पिछड़ा रखने एवं उसमें सांप्रदायिक कट्टरता को बढ़ावा देने में इस संस्था की बड़ी भूमिका है। अपनी सांप्रदायिक सोच एवं प्रस्तावों के कारण यह संस्था विवादों में रहती है। पिछले दिनों भारत में पाकिस्तान के घोर सांप्रदायिक ‘ईशनिंदा कानून’ को भारत में लागू करने की माँग करके मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड विवादों में रहा था। उस समय देशभर में इस सांप्रदायिक माँग का विरोध किया गया। लेकिन उसके बाद भी बोर्ड ने अपनी सोच को बदला नहीं है। अब बोर्ड ने सूर्य नमस्कार का विरोध करके जता दिया है कि उसे कथित ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ से उसको कोई लेना-देना नहीं है। सबको मिलकर ऐसी कट्टर और संकीर्ण विचारों का विरोध करना चाहिए। इस तरह के विचारों को हतोत्साहित करना सभी समुदायों के हित में है।