आजादी की 70वीं सालगिरह से ठीक पहले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जन्मभूमि भाबरा में 'आजादी 70 साल, याद करो कुर्बानी' अभियान की शुरुआत करने का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निर्णय सराहनीय है। प्रधानमंत्री मोदी ने मध्यप्रदेश के अलीराजपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद स्मारक जाकर उन्हें याद किया और देशवासियों से आह्वान किया कि आजादी के 70 साल और भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल पूरे होने के मौके पर हमारा कर्तव्य बनता है कि हम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने वाले लोगों को याद करें। हम उन लक्ष्यों को पाने की कोशिश करें, जिन्हें पाने का सपना लेकर आजादी के नायकों ने अपना जीवन कुर्बान किया। कहने को हम कह सकते हैं कि हम स्वतंत्रता सेनानियों को भूले कब हैं, जो याद करें। लेकिन, कलेजे पर हाथ रखकर खुद से पूछिए कि सवा सौ करोड़ भारतवासियों में से कितनों को स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान याद है। कितने लोग हैं, जो कम से कम दस बलिदानियों के नाम भी बता पाएंगे? उससे भी जरूरी सवाल यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने किस बात के लिए अपने प्राणों की आहूति दी?
बुधवार, 10 अगस्त 2016
मंगलवार, 9 अगस्त 2016
गोरक्षकों की प्रतिष्ठा का प्रश्न
गोरक्षा की आड़ में निंदनीय घटनाओं को अंजाम दे रहे तथाकथित गोरक्षकों के संबंध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टिप्पणी के गहरे निहितार्थ हैं। उतावलेपन से प्रधानमंत्री के बयान की गंभीरता को समझना मुश्किल होगा। प्रधानमंत्री के बयान के महत्त्व को समझने के लिए गंभीरता, धैर्य और वास्तविकता को स्वीकार करने का सामथ्र्य चाहिए। प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा है कि इन दिनों कई लोगों ने गोरक्षा के नाम पर दुकानें खोल रखी हैं। दिन में यह लोग गोरक्षक का चोला पहन लेते हैं और रात में गोरखधंधा करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन तथाकथित गोरक्षकों का डोजियर तैयार किया जाए, तब इनमें से तकरीबन 80 प्रतिशत असामाजिक तत्त्व निकलेंगे। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी पर कुछ हिंदूवादी संगठन गुस्से में हैं। उन्होंने इस बयान की निंदा की है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने गोरक्षकों को बदनाम किया है। लेकिन, क्या इन संगठनों ने एक बार भी सोचा है कि जिस तरह से पिछले कुछ समय में देशभर में गोरक्षा के नाम पर हत्या, मारपीट, धमकाने और धन वसूलने के मामले सामने आए हैं, उनसे गोरक्षकों का कितना मान बढ़ा है? गोरक्षा के नाम पर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाले इन लोगों ने वास्तविक गोरक्षकों की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया है। पूरी ईमानदारी से गो-सेवा में शामिल भोले-भाले लोगों को भी समाज में संदिग्ध निगाह से देखा जाने लगा है। हिंदू संगठनों को यह भी समझना चाहिए कि तथाकथित गोरक्षकों की इन हरकतों से उनकी स्वयं की प्रतिष्ठा भी धूमिल हो रही है। सच्चे गोरक्षकों की प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए इन नकली गोरक्षकों को बेनकाब किया जाना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि सच्चे गोरक्षकों को इन नकली गोरक्षकों से सजग रहना चाहिए। वरना, मुट्ठीभर गंदे लोग आपको बदनाम कर देंगे।
सोमवार, 8 अगस्त 2016
सना से सीखें कट्टरपंथियों को जवाब देना
सांप्रदायिक और कट्टर सोच को उजागर करती दो घटनाएं हमारे सामने हैं। एक, मायानगरी मुम्बई की घटना है। दूसरी घटना मध्यप्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन की है। घर-घर 'आराध्या' नाम से पहचानी जाने वाली सना अमीन शेख टीवी कलाकार हैं। धारावाहिक 'कृष्णदासी' में सना का नाम आराध्या है। धारावाहिक में वह एक विवाहित मराठी महिला का किरदार कर रही हैं। भूमिका के अनुसार उन्हें माँग में सिंदूर भरना होता है और गले में मंगलसूत्र पहनना होता है। गजब की धार्मिक असहिष्णुता है कि पर्दे पर अपने किरदार को निभाने के लिए सना द्वारा सिंदूर भरने और मंगलसूत्र पहनने भर से ही इस्लाम खतरे में आ गया। सना ने धारावाहिक की शूटिंग के कुछ चित्र सामाजिक माध्यम (सोशल मीडिया) पर साझा किए, तबसे वह कट्टरपंथी मानसिकता के निशाने पर हैं। ओछी सोच के अनेक मुसलमान उन्हें नसीहत देने लगे हैं, यथा - 'मुस्लिम लड़कियों को सिंदूर नहीं लगाना चाहिए। तुम एक मुस्लिम लड़की हो, मंगलसूत्र क्यों पहनती हो? किसी भी मुस्लिम महिला को चाहे वह अभिनेत्री हो, सबसे पहले अपने धर्म का सम्मान करना चाहिए। कुछ अतिवादी तो धमकाने की हद तक पहुँच गए। सना शेख ने इन मनोरोगियों की कट्टरपंथी सोच को करारा जवाब दिया है। उसने सामाजिक माध्यम पर खुला खत लिखकर सांप्रदायिक सोच को लताड़ लगाई है। सना ने लिखा है कि क्या सिंदूर लगाने से अल्लाह मुझे दोजख में भेज देंगे और विरोध करने वालों को जन्नत में भेजेंगे? सना ने कहा कि शूटिंग के वक्त मेरी माँग में भरा सिंदूर तब तक मेरे बालों में रहता है जब तक मैं नहाती नहीं हूँ। सना ने संकुचित मानसिकता के लोगों को उनकी ही भाषा में आईना दिखाने का प्रयास भी किया। उसने कहा कि यदि अपने किरदार को निभाने के लिए मेरा सिंदूर लगाना और मंगलसूत्र पहनना इस्लाम के खिलाफ है तब मेरा धारावाहिक देखने वाले क्या कर रहे हैं? सिनेमा देखना, फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का उपयोग करना क्या हराम नहीं है? आप लोग मेरा धारावाहिक देखना बंद क्यों नहीं करते? फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर समय बर्बाद करके क्या तुम लोग जन्नत में जाओगे?
बुधवार, 3 अगस्त 2016
राजनीति की आदर्श परिपाटी
भारतीय जनता पार्टी सदैव राजनीतिक शुचिता और राजनीति में आदर्श स्थापित करने के विचार का प्रतिपादन करती रही है। अनेक अवसर पर उसने अपने इस विचार को स्थापित करने के प्रयास भी किए हैं। इस समय पार्टी का अघोषित सिद्धांत बन गया है कि 75 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले राजनेताओं को मंत्री पद और सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। हाल में केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में इस सिद्धांत का पालन होते दिखा। राज्य (मध्यप्रदेश) के मंत्रिमंडल में भी इसका असर दिखाई दिया। यहाँ तक कि पार्टी के विचार को पुष्ट करने के लिए केन्द्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने स्वयं मंत्री पद से अपना त्याग पत्र प्रस्तुत कर आदर्श व्यवहार प्रस्तुत किया। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से जिस अनुशासन की अपेक्षा रहती है, उसका प्रदर्शन गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने भी किया है। उन्होंने भी अपनी उम्र को ध्यान में रखकर मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र की पेशकश की है।
मंगलवार, 2 अगस्त 2016
विदेशों में फंसे भारतीयों की उम्मीद बनी सुषमा स्वराज
विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज बेहद संवेदनशील राजनेता हैं। पिछले दो वर्ष में उन्होंने विदेशों में संकटग्रस्त स्थितियों में फंसे अनेक भारतीयों की सुरक्षा की है। भारतीय नागरिकों को जिस तत्परता और राजनीतिक समझबूझ से उन्होंने मदद पहुंचाई है, उसकी जितनी सराहना की जाए कम है। सुषमा स्वराज को भविष्य में अपने इन राहत कार्यों के लिए याद किया जाएगा। बहरहाल, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक बार फिर सऊदी अरब के जेद्दा में भूख से तड़प रहे 10 हजार भारतीय कामगारों की मदद करके उन्हें उम्मीद दी है। उनके भीतर एक भरोसा जगाया है कि उनका अपना देश संकट की घड़ी में उनके साथ खड़ा है। उनकी चिंता कर रहा है। गौरतलब है कि एक शख्स ने सुषमा स्वराज को ट्वीट कर कहा था कि जेद्दा में करीब 800 भारतीय भूखे हैं। उन्हें मदद की जरूरत है। विदेश मंत्री श्रीमती स्वराज ने एक क्षण भी गंवाए बिना उस शख्स को किए जवाबी ट्वीट के जरिए सऊदी अरब में बेरोजगारी और भूख से जूझ रहे भारतीय नागरिकों को भरोसा दिलाया कि भारत उनको परेशान नहीं होने देगा। विदेश मंत्री ने कहा- 'मैं आपको यकीन दिलाती हूं कि सऊदी अरब में नौकरी गंवाने वाले किसी भारतीय को भूखा नहीं रहना पड़ेगा। मैं पूरे मामले की निगरानी हर घंटे कर रही हूं।' इसके बाद उन्होंने रियाद में भारतीय दूतावास से कहा कि सऊदी अरब में बेरोजगार कामगारों को नि:शुल्क राशन मुहैया कराने की व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही उन्होंने वहाँ बसे सभी भारतीयों से भी अपील की है कि वे संकट में फंसे अपने भारतीय बंधुओं की मदद के लिए आगे आएं। विदेश मंत्री की यह अपील बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि भारत सरकार के साथ-साथ वहाँ बसा भारतीय समुदाय भी अपने बंधुओं की चिंता करेगा तब इस तरह की चुनौती से पार पाना बहुत आसान हो जाएगा। सऊदी अरब में फंसे भारतीयों के साथ ही अन्य देशों में बसे भारतीयों को भी विदेश मंत्री ने इस अपील के जरिए संदेश दिया है कि एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत है। एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता, आपसी सहयोग की भावना और एक-दूजे के सुख-दुख में साथ खड़े होने की भावना ही विदेशों में बसे भारतीयों की ताकत है। एकजुटता ही छोटी-बड़ी समस्याओं से लडऩे का सबसे बड़ा विकल्प है।
रविवार, 31 जुलाई 2016
प्रेमचंद को याद करें साहित्यकार
दुनिया के महान साहित्यकारों में मुंशी प्रेमचंद को स्थान दिया जाता है। भारत में उन्हें 'कलम के सिपाही' के नाम से भी याद किया जाता है। जिस तरह उनकी रचनाएं कालजयी हैं और आज भी प्रेरणा देने वाली हैं, उसी तरह मुंशी प्रेमचंद का जीवन भी कालजयी है, उनका व्यक्तित्व साहित्यकारों का पथप्रदर्शन करता है। प्रेमचंद और उनकी रचनाएं सदैव प्रासंगिक रहने वाली हैं। गांव, गरीब और आम समाज की कहानियां रचने वाले महान साहित्यकार प्रेमचंद का आज 136वां जन्मदिन है। 1880 में उत्तरप्रदेश के लमही गांव में जन्मे प्रेमचंद की कलम से आज के कलमकारों को सीख लेनी चाहिए कि आखिर कलम चलाने का उद्देश्य क्या हो? समाज में दो तरह का लेखन किया जा रहा है- प्रगतिशील लेखन और आदर्शवादी लेखन। प्रगतिशील लेखन में यथार्थ लेखन पर जोर रहता है। लेकिन, इस तरह के लेखक समाज का यथार्थ लिखते समय लेखन की मर्यादाओं को तोड़ देते हैं। समाज की बुराइयों को अपने लेखन में इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि मानो समूचा समाज ही मूल्यहीन हो गया है। सब ओर व्याभिचार और भ्रष्टाचार पसर गया है। जबकि ऐसा नहीं है। आज भी भारत में सामाजिक जीवनमूल्यों का महत्त्व है और यह हमेशा रहने वाला है।
गुरुवार, 21 जुलाई 2016
गांधी हत्या और आरएसएस
राजनेताओं को यह समझना होगा कि अपने राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए किसी व्यक्ति या संस्था पर झूठे आरोप लगाना उचित परंपरा नहीं है। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी शायद यह भूल गए थे कि अब वह दौर नहीं रहा, जब नेता प्रोपोगंडा करके किसी को बदनाम कर देते थे। आज पारदर्शी जमाना है। आप किसी पर आरोप लगाएंगे तो उधर से सबूत मांगा जाएगा। बिना सबूत के किसी पर आरोप लगाना भारी पड़ सकता है। भले ही कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष इस मामले पर माफी माँगने से इनकार करके मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार दिखाई देते हैं लेकिन, कहीं न कहीं उन्हें यह अहसास हो रहा होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का अनर्गल आरोप लगाकर उन्होंने गलती की है। इसका सबूत यह भी है कि वह अदालत गए ही इसलिए थे ताकि यह प्रकरण खारिज हो जाए। गौरतलब है कि गांधी हत्या का आरोप संघ पर लगाने के मामले में कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके सीताराम केसरी को भी माफी का रास्ता चुनना पड़ा था। प्रसिद्ध स्तम्भकार एजी नूरानी को भी द स्टैटसमैन अखबार के लेख के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। बहरहाल, वर्ष 2014 में ठाणे जिले के सोनाले में आयोजित चुनावी सभा में संघ को गांधी का हत्यारा बताने पर राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि के मामले की सुनवाई कर रहे उच्चतम न्यायालय ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा है कि राहुल गांधी इस मामले में माफी माँगे या फिर मुकदमे का सामना करें। उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी के भाषण पर सवाल उठाए और आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि 'उन्होंने गलत ऐतिहासिक तथ्य का उद्धरण लेकर भाषण क्यों दिया? राहुल गांधी को इस तरह एक संगठन की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करनी चाहिए थी।' हमें गौर करना होगा कि कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति विरोध और द्वेष प्रारंभ से ही है। वैचारिक विरोध और द्वेष के कारण ही कांग्रेस का एक धड़ा अनेक अवसर पर संघ को बदनाम करने का प्रयास करता रहा है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक संघ के प्रति वही संकीर्ण नजरिया और द्वेष कायम है। साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखने के कारण जवाहरलाल नेहरू संघ का विरोध करते थे। वह किसी भी प्रकार संघ को दबाना चाहते थे। वर्ष 1948 में जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की, तब संघ को बदनाम करने और उसे खत्म करने का मौका प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मिल गया। 'नाथूराम गोडसे संघ का स्वयंसेवक है और गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र आरएसएस ने रचा है।' यह आरोप लगवाकर कांग्रेसनीत तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर न केवल प्रतिबंध लगाया, बल्कि देशभर में उससे संबंद्ध नागरिकों को जेल में ठूंस दिया। परंतु, साँच को आँच क्या? तमाम षड्यंत्र के बाद भी सरकार गांधीजी की हत्या में संघ की किसी भी प्रकार की भूमिका को साबित नहीं कर सकी। संघ अग्नि परीक्षा में निर्दोष साबित हुआ। नतीजा, सरकार को संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। क्या राहुल गांधी और संघ विरोधी बता सकते हैं कि जब संघ ने महात्मा गांधी की हत्या की थी, तब कांग्रेस ने ही उससे प्रतिबंध क्यों हटाया? राहुल गांधी संभवत: अब भी यह नहीं समझ पाए हैं कि गांधीजी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी, संघ ने नहीं। उन्हें इसके लिए उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी पर ध्यान देना होगा। न्यायालय ने कहा है कि गोडसे ने गांधी को मारा और संघ या संघ के लोगों ने गांधी को मारा, दोनों कथनों में बहुत बड़ा अंतर है। बहरहाल, नाथूराम गोडसे और संघ के संबंध में स्वयं गोडसे ने अदालत में कहा था कि वह किसी समय संघ की शाखा जाता था लेकिन बाद में उसने संघ छोड़ दिया। बहरहाल, यदि यह माना जाए कि एक समय गोडसे संघ का स्वयंसेवक था, इसलिए संघ गांधी हत्या के लिए जिम्मेदार है। तब यह भी बताना उचित होगा कि एक समय नाथूराम गोडसे कांग्रेस का पदाधिकारी रह चुका था। लेकिन, संघ विरोधियों ने नाथूराम गोडसे और कांग्रेस के संबंध को कभी भी प्रचारित नहीं किया। इससे स्पष्ट होता है कि आज की तरह उस समय का तथाकथित बौद्धिक नेतृत्व, वामपंथी लेखक/इतिहासकार और कांग्रेस का नेतृत्व ऐन केन प्रकारेण संघ को कुचलना चाहता था। यह सच है कि एक समय में नाथूराम गोडसे संघ की गतिविधियों में शामिल रहा। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि वह संघ की विचारधारा के साथ संतुलन नहीं बैठा सका। संभवत: वह संघ को कट्टर हिन्दूवादी संगठन समझकर उससे जुड़ा था। लेकिन, बाद में जब आरएसएस के संबंध में गोडसे की छवि ध्वस्त हुई, तब गोडसे न केवल संघ से अलग हुआ बल्कि एक हद तक संघ का मुखर विरोधी भी बन गया था। उनके समाचार पत्र 'हिन्दू राष्ट्र' में संघ विरोधी आलेख प्रकाशित होते थे। गोडसे ने संघ की आलोचना करते हुए सावरकर को पत्र भी लिखा था। इस पत्र में उसने लिखा कि संघ हिन्दू युवाओं की ऊर्जा को बर्बाद कर रहा है, इससे कोई आशा नहीं की जा सकती। स्पष्ट है कि गोडसे संघ समर्थक नहीं, बल्कि संघ विरोधी था। गांधी हत्या की जांच के लिए गठित कपूर आयोग को दी अपनी गवाही में आरएन बनर्जी ने भी इस सत्य को उद्घाटित किया था। बनर्जी की की गवाही इस मामले में बहुत महत्त्वपूर्ण थी। क्योंकि, गांधीजी की हत्या के समय आरएन बनर्जी केन्द्रीय गृह सचिव थे। बनर्जी ने अपने बयान में कहा था कि यह साबित नहीं हुआ है कि वे (अपराधीगण) संघ के सदस्य थे। वे तो संघ की गतिविधियों से संतुष्ट नहीं थे। संघ के खेलकूद, शारीरिक व्यायाम आदि को वे व्यर्थ मानते थे। वे अधिक उग्र और हिंसक गतिविधियों में विश्वास रखते थे। (कपूर आयोग रिपोर्ट खंड 1 पृष्ठ 164)
राजनीतिक और वैचारिक षड्यंत्र के तहत ही गांधी हत्या के मामले में आरएसएस को घसीटा गया था। गांधी हत्या की प्राथमिकी (एफआईआर) तुगलक रोड थाने में दर्ज कराई गई है। इस प्राथमिकी (एफआईआर-68, दिनांक- 30 जनवरी, 1948, समय - सायंकाल 5:45 बजे ) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहीं कोई जिक्र नहीं है। लेकिन, गांधीजी की हत्या के बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषणों में गांधी हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दोष देना शुरू कर दिया। इस बात से जाहिर होता है कि पंडित नेहरू आरएसएस के संबंध में पूर्वाग्रह से ग्रसित थे और उन्हें तत्कालीन वामपंथी विचारकों/नेताओं द्वारा लगातर संघ के प्रति भड़काया जा रहा था। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के भड़काऊ भाषणों से देशभर में कांग्रेस के लोग संघ से संबंध रखने वाले लोगों को प्रताडि़त करने लगे थे। संघ कार्यालयों पर पथराव हुआ, तोडफ़ोड़ हुई और कई जगह आगजनी भी की गई। लेकिन, संघ के अनुशासित स्वयंसेवकों ने कोई प्रतिकार नहीं किया। कांग्रेस की हिंसा का शांति से सामना कर उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि संघ अंहिसक संगठन है। बहरहाल, गांधी हत्या में आरएसएस की भूमिका की पड़ताल करने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की निगरानी में देशभर में अनेक गिरफ्तारियां, छापेमारी और गवाहियां हुईं। इनसे धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि गांधी हत्या का संघ से कोई वास्ता नहीं है। संघ पर जघन्य आरोप साबित नहीं होते देख पंडित जवाहरलाल नेहरू कुछ विचलित हुए और उन्होंने जाँच पर असंतोष जाहिर करते हुए सरदार पटेल को पत्र लिखा। उन्होंने अपने पत्र में आरोप लगाया कि दिल्ली की पुलिस और अधिकारियों की संघ के प्रति सहानुभूति है। इस कारण संघ के लोग पकड़े नहीं जा रहे। उसके कई प्रमुख नेता खुले घूम रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि देशभर से जानकारियां मिली हैं और मिल रही हैं कि गांधीजी की हत्या संघ के व्यापक षड्यंत्र के कारण हुई है, परंतु उन सूचनाओं की ठीक प्रकार से जांच नहीं हो रही। जबकि यह पक्की बात है कि षड्यंत्र संघ ने ही रचा था। आदि-आदि। सरदार पटेल ने इस पत्र का क्या जवाब दिया वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि कुछ लोग सरदार पटेल को भी गलत अर्थों में उद्धृत करते हैं। संघ विरोधी सरदार पटेल की तत्कालीन प्रतिक्रियाओं को तो लिखते हैं, जिनमें उन्होंने भी यह माना कि गांधी हत्या में संघ की भूमिका हो सकती है। लेकिन, जाँच के बाद सरदार पटेल की क्या धारणा बनी, यह नहीं बताते। खैर, पंडित नेहरू की जिज्ञासा को शांत करने के लिए सरदार पटेल पत्र (27 फरवरी, 1948) में लिखते हैं कि गांधी जी की हत्या के सम्बन्ध में चल रही कार्यवाही से मैं पूरी तरह अवगत रहता हूं। सभी अभियुक्त पकड़े गए हैं तथा उन्होंने अपनी गतिविधियों के सम्बन्ध में लम्बे-लम्बे बयान दिए हैं। उनके बयानों से स्पष्ट है कि यह षड्यंत्र दिल्ली में नहीं रचा गया। वहां का कोई भी व्यक्ति षड्यंत्र में शामिल नहीं है। षड्यंत्र के केन्द्र बम्बई, पूना, अहमदनगर तथा ग्वालियर रहे हैं। यह बात भी असंदिग्ध रूप से उभर कर सामने आयी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इससे कतई सम्बद्ध नहीं है। यह षड्यंत्र हिन्दू सभा के एक कट्टरपंथी समूह ने रचा था। यह भी स्पष्ट हो गया है कि मात्र 10 लोगों द्वारा रचा गया यह षड्यंत्र था और उन्होंने ही इसे पूरा किया। इनमें से दो को छोड़ सब पकड़े जा चुके हैं। इस पत्र व्यवहार से भी स्पष्ट है कि कांग्रेस का एक धड़ा लगातार पंडित नेहरू को संघ के विरोध में गलत सूचनाएं उपलब्ध करा रहा था। लेकिन, वास्तविकता धीरे-धीरे स्पष्ट होती जा रही थी।
महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित संवेदनशील मामले को सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति आत्मा चरण की विशेष अदालत को सौंपा गया। प्रकरण की सुनवाई के लिए 4 मई, 1948 को विशेष न्यायालय का गठन हुआ। 27 मई से मामले की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई लालकिले के सभागृह में शुरू हुई। यह खुली अदालत थी। सभागृह खचाखच भरा रहता था। 24 जून से 6 नवंबर तक गवाहियां चलीं। 01 से 30 दिसंबर तक बहस हुई और 10 जनवरी 49 को फैसला सुना दिया गया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने 149 गवाहों के बयान 326 पृष्ठों में दर्ज हुए। आठों अभियुक्तों ने लम्बे-लम्बे बयान दिए, जो 323 पृष्ठों में दर्ज हुए। 632 दस्तावेजी सबूत और 72 वस्तुगत साक्ष्य पेश किए गए। इन सबकी जांच की गयी। न्यायाधीश महोदय ने अपना निर्णय 110 पृष्ठों में लिखा। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। शेष पाँच को आजन्म कारावास की सजा हुई। इस मामले में कांग्रेस और वामपंथियों ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी विनायक दामोदर सावरकर को भी फंसाने का प्रयास किया था। लेकिन, उनका यह षड्यंत्र भी असफल रहा। न्यायालय से सावरकर को निर्दोष बरी किया गया। इसी फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर यह कहा कि महात्मा गांधी की हत्या से संघ का कोई लेना-देना नहीं है। स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन, नहीं। न्यायालय के निर्णय से कांग्रेस और वामपंथी नेता संतुष्ट नहीं हुए। संघ विरोधी लगातार न्यायालय के प्रति असम्मान प्रदर्शित करते हुए गांधी हत्या के लिए संघ को बदनाम करते रहे। बाद में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दबाव या भरोसे में लेकर इस मामले को फिर से उखाड़ा गया। वर्ष 1965-66 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गांधी हत्या का सच सामने लाने के लिए न्यायमूर्ति जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में कपूर आयोग का गठन किया। दरअसल, इस आयोग के गठन का उद्देश्य गांधी हत्या का सच सामने लाना नहीं था, अपितु संघ विरोधी एक बार फिर आरएसएस को फंसाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन, इस बार भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। कपूर आयोग ने तकरीबन चार साल में 101 साक्ष्यों के बयान दर्ज किए तथा 407 दस्तावेजी सबूतों की छानबीन कर 1969 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग अपनी रिपोर्ट में असंदिग्ध घोषणा करता है कि महात्मा गांधी की जघन्य हत्या के लिए संघ को किसी प्रकार जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। (रिपोर्ट खंड 2 पृष्ठ 76)
न्यायालय और आयोग के स्पष्ट निर्णयों के बाद भी आज तक संघ विरोधी गांधी हत्या के मामले में संघ को बदनाम करने से बाज नहीं आते। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि संघ विरोधियों का भारतीय न्याय व्यवस्था, संविधान और इतिहास के प्रति क्या दृष्टिकोण है? जब यह मामला शीर्ष न्यायालय में पहुंच गया है तब न्यायालय को यह भी ध्यान देना चाहिए कि गांधी हत्या के लिए बार-बार संघ को जिम्मेदार बताने से न केवल एक संगठन पर कीचड़ उछाली जाती है, वरन भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति भी अविश्वास का वातावरण बनाया जाता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद भी संघ को गांधी हत्या के लिए आज तक जिम्मेदार बताना, न्यायपालिका के प्रति असम्मान प्रकट करता है। न्यायालय को इस संबंध में भी संज्ञान लेना चाहिए। बहरहाल, हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि गांधी हत्या में संघ को बार-बार इसलिए घसीटा जाता है ताकि सत्ताधीश और वामपंथी विचारक अपने निहित स्वार्थ पूरे कर सकें। संघ विरोधियों ने अब तक गांधी हत्या प्रकरण को राजनीतिक दुधारू गाय समझ रखा था। लेकिन, उन्हें यह समझना चाहिए कि अब प्रोपेगंडा राजनीति का दौर बीत चुका है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)






