दलित उत्पीडऩ की घटनाएं यकीनन मानव समाज के माथे पर कलंक हैं। देश के किसी भी कोने में होने वाली दलित उत्पीडऩ की घटना सबके लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। जिस वक्त मानव सभ्यता अपने उत्कर्ष की ओर अपने कदम बढ़ा रही है, उस समय दलित उत्पीडऩ की घटनाएं पतन का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। मनुष्य-मनुष्य में भेद के इस अपराध से यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि आखिर हम कब जाति की बेडिय़ां तोड़ेंगे? कब मनुष्य को मनुष्य के तौर पर देखेंगे? सामाजिक समरसता के लिए जरूरी है कि इस तरह की घटनाओं पर कानून के हिसाब से कठोर से कठोर कार्रवाई हो, इस बात की चिंता सरकारों को करनी चाहिए। वहीं, इस संदर्भ में समाज की भी अपनी जिम्मेदारी है। बहरहाल, संसद भी दलित उत्पीडऩ पर चिंतित है, यह अच्छी बात है। भारतीय लोकतंत्र के मंदिर से यदि सामाजिक समरसता का रास्ता निकलता है, तब वह अधिक प्रभावी भी होगा। क्योंकि, हम जानते हैं कि सामाजिक समरसता में सबसे बड़ी बाधा कोई है तो वह राजनीति है, राजनीतिक पार्टियां हैं, उनके राजनीतिक स्वार्थ हैं। इसलिए यहाँ प्रश्न उठता है कि दलित उत्पीडऩ पर संसद में हो रही चिंता सामाजिक समरसता के लिए है, या फिर दलित विमर्श की आड़ में राजनीति खेली जा रही है?
गुरुवार, 21 जुलाई 2016
शुक्रवार, 15 जुलाई 2016
आतंकवाद पर एकसाथ आएं सभी दल
जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी और उसके साथियों की मौत पर जिस तरह से हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, वह कोई अनोखी बात नहीं हैं। जब-जब सुरक्षा बल किसी आतंकवादी को मार गिराते हैं, तब-तब जम्मू-कश्मीर की सड़कों पर उग्र प्रदर्शन होता ही है। पाकिस्तान और आतंकवादी संगठनों के इशारे पर भारत विरोधी नारे लगाए जाते हैं और सेना पर पत्थर भी बरसाए जाते हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि आतंकी बुरहान वानी की मौत पर घाटी में जिस प्रकार के हालात हैं, वह चिंता का विषय हैं। लेकिन, देश के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और कुछेक राजनीतिक दलों की ओर से जिस तरह की बयानबाजी सामने आ रही है, वह घाटी के हालात से कहीं अधिक चिंताजनक है। यह बयानबाजी इसलिए भी अधिक हो रही है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीडीपी गठबंधन की सरकार है। भाजपा की पहचान राष्ट्रवाद है। भाजपा के वैचारिक विरोधी सवाल उठा रहे हैं कि अब भाजपा का राष्ट्रवाद कहाँ गया? प्रदेश सत्ता में भाजपा के शामिल होने के बाद भी जम्मू-कश्मीर क्यों जल रहा है? बहरहाल, क्षेत्रीय राजनीतिक दलों, राष्ट्रीय दलों और राष्ट्रवाद के वैचारिक विरोधी बुद्धिवादियों को समझना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के हालात राष्ट्रीय चिंता का विषय है, आपसी राजनीति का नहीं। राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए चूल्हे-चौके और भी हैं। इसलिए सबको दलगत राजनीति और वैचारिक असहिष्णुता से ऊपर उठकर जम्मू-कश्मीर के हालात पर टिप्पणी करनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर से आतंकवाद पूरी तरह खत्म तभी हो सकता है, जब सब अपने-अपने स्वार्थ त्याग कर साथ आएंगे। आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर के विषय पर कांग्रेस की ओर से आया मंतव्य सराहनीय है। इस विषय पर कांग्रेस ने इस बार अपेक्षाकृत परिपक्व राजनीति का प्रदर्शन किया है। बाकि क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस से सीख लेनी चाहिए।
सोमवार, 11 जुलाई 2016
आतंकी से सहानुभूति क्यों?
आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के 22 वर्षीय कमांडर बुरहान वानी की मौत पर जम्मू-कश्मीर में मातम ही नहीं मनाया जा रहा है, बल्कि उपद्रव भी किया जा रहा है। सेना और पुलिस को निशाना बनाकर हमले किए जा रहे हैं। इस उपद्रव में अब तक करीब 20 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग घायल हो गए हैं। बुरहान वानी खतरनाक आतंकवादी था। उसके सिर पर दस लाख का इनाम था। बुरहान वानी भी इस्लामिक उपदेशक डॉ. जाकिर नाइक से प्रेरित था। उसकी मौत से हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन को बहुत बड़ा नुकसान होगा। दरअसल, वानी हिजबुल मुजाहिदीन के पोस्टर बॉय के रूप में स्थापित हो चुका था। खुद को आगे रखकर वह आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के लिए घाटी के मुस्लिम युवाओं की भर्ती करता था। उसकी मौत से आतंकवादी तैयार होने की यह प्रक्रिया टूटेगी। इसलिए वानी की मौत को पुलिस, सेना और सरकार आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कामयाबी मान रही है।
रविवार, 10 जुलाई 2016
जहरीली तकरीरों पर लगे अंकुश
ढाका हमले में निर्दोष विदेशी और गैर-मुस्लिम नागरिकों का गला रेतकर हत्या करने वाले आतंकवादियों के प्रेरणास्रोत साबित हो रहे इस्लाम के उपदेशक डॉ. जाकिर नाईक पहली बार अपनी जहरीली तकरीरों के लिए चौतरफा घिर रहे हैं। बांग्लादेश की जाँच एजेंसियों को इस बात के सबूत मिले हैं कि राजनयिक क्षेत्र में होली आर्टिसन बेकरी रेस्तरां पर हमला करने वाले आतंकियों ने इस्लाम की व्याख्या करने वाले जाकिर नाईक की तकरीर सुनकर आतंकी बनने का फैसला किया था। बांग्लादेश सरकार के आग्रह पर ही केन्द्र सरकार डॉ. नाईक के भाषणों की जाँच करा रही है। महाराष्ट्र सरकार ने भी जाकिर नाईक की जहरीली तकरीरों की जाँच कराने के निर्देश दिए हैं। अपने पड़ोसी मुल्क में हुई बीभत्स घटना की जाँच में मदद करने से आपसी संबंध भी प्रगाढ़ होते हैं। आतंकवाद के खिलाफ साझी लड़ाई में दोनों देशों का साथ आना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी वैश्विक मंचों से बार-बार आग्रह कर रहे हैं कि आतंकवाद को खत्म करने के लिए सबको साथ आना चाहिए। अकेले-अकेले लड़कर आतंकवाद का समूल नाश नहीं किया जा सकता। आतंकवाद के विरुद्ध दोनों देशों का साथ आना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि जिस तरह आतंकवाद बांग्लादेश में अपनी आमद दर्ज करा रहा है, वह भारत के लिए भी खतरनाक है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि जाकिर नाईक के भाषण मुसलमानों को आतंकवादी बनने के लिए प्रेरित करने वाले पाए तब उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
मंगलवार, 5 जुलाई 2016
आतंकवाद और इस्लाम में संबंध क्या है
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| ढाका हमले में आतंकियों का शिकार बनी भारत की बेटी तारुषी जैन. |
बांग्लादेश की राजधानी ढाका के प्रतिष्ठित और सुरक्षित क्षेत्र में आतंकी हमले के बाद आतंकवाद और इस्लाम के संबंधों पर फिर से बहस शुरू हो गई है। महत्त्वपूर्ण बात है कि इस बहस में तीखे सवाल स्वयं मुस्लिम ही पूछ रहे हैं। इसलिए इस बहस को गैर मुस्लिमों द्वारा इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने के लिए चलाई गई बहस के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि यह बहस इस्लाम और मुसलमानों के लिए आत्म विश्लेषण का जरिया बननी चाहिए। हालाँकि, आतंकवाद और इस्लाम के संबंध पर सबसे पहली आवाज भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने तब उठाई जब आतंकियों ने पंपोर में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के आठ जवानों की हत्या की थी। मुख्यमंत्री मुफ्ती ने कहा था कि मुस्लिम होने के नाते मैं बेहद शर्मिंदा हूं कि पवित्र माह रमजान में आतंकियों ने यह हमला किया है। आतंकियों के इस हमले से जम्मू-कश्मीर ही नहीं, बल्कि इस्लाम और मुसलमान भी बदनाम हुए हैं।
भारत के नजदीक आया इस्लामिक आतंकवाद
बांग्लादेश की राजधानी ढाका के डिप्लोमैटिक जोन के होली आर्टीजन बेकरी रेस्तरां में आतंकी हमले ने दुनिया को दहला दिया है। यह हमला बांग्लादेश की अनदेखी का नतीजा है। पिछले कुछ समय से जिस तरह बांग्लादेश में आतंकियों द्वारा उदारवादी लेखकों, ब्लॉगरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और हिन्दुओं की सुनियोजित तरीके से हत्या की जा रही थी, उससे बांग्लादेश की सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा था। ज्यादतर हत्याओं की जिम्मेदारी आईएस जैसे खतरनाक आतंकी संगठन ने ली थी, लेकिन प्रधानमंत्री शेख हसीना बार-बार खारिज करती रहीं कि उनके देश में आईएस की उपस्थिति नहीं है। जबकि हकीकत उसके उलट थी। हकीकत से नजरें चुराने के कारण ही आईएस के आतंकी ढाका के सबसे संवेदनशील और सुरक्षित क्षेत्र गुलशन डिप्लोमैटिक जोन से यह संदेश देने में सफल रहे कि बांग्लादेश में उनकी सशक्त मौजूदगी है। इस आतंकी हमले की तुलना भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में होटल ताज में हुए २६/११ से की जा रही है। गौरतलब है कि ढाका हमले में मरने वालों में लगभग सभी विदेशी नागरिक हैं। आतंकियों की बर्बरता का शिकार होने वालों में एक भारतीय युवती तारुषी भी शामिल है।
शनिवार, 2 जुलाई 2016
कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू
बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथी हावी हो गए हैं। शेख हसीना सरकार भले ही दावा करे कि बांग्लादेश में इस्लामिक स्टेट और अन्य इस्लामिक आतंकी संगठनों का वजूद नहीं है लेकिन लगातार निर्दोष लोगों की हत्याएं कुछ और ही कहानी बयां करती है। बांग्लादेश में उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष सोच वाले लेखकों-ब्लॉगरों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुनियोजित हमले करके मौत के घाट उतारा जा रहा है। इनमें से अधिकतर हत्याओं की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली है। इस्लाम का झंडा थामकर चलने वाले आतंकवादियों के निशाने पर धार्मिक अल्पसंख्यक भी हैं, खासकर हिन्दू समुदाय। वैसे तो पाकिस्तान के साथ-साथ बांग्लादेश के इतिहास के पन्ने हिन्दुओं के रक्त से लाल हैं। लेकिन, पिछले कुछ समय में जिस तरह बांग्लादेश में हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है, उससे भविष्य के खतरे स्पष्ट नजर आ रहे हैं। एक के बाद एक हत्या किसी गहरे सांप्रदायिक षड्यंत्र की ओर इशारा कर रही हैं। मानो, बांग्लादेश की भूमि को हिन्दू विहीन करने की तैयारी इस्लामिक ताकतों ने कर ली है। वर्तमान सरकार को कथिततौर पर पंथनिरपेक्ष माना जाता है। लेकिन, इस्लामिक कट्टरपंथ पर जिस तरह से प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी सरकार ने आँखें बंद कर रखीं हैं, उसे देखकर लगता है कि उन्हें भी अपनी राजनीतिक रोटियों की फिक्र अधिक है। अल्पसंख्यकों पर हो रहे लगातार हमलों पर जिस तरह सरकार मूकदर्शक बन गई है, उससे लगता है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक खासकर हिन्दू समुदाय बचेगा ही नहीं। बांग्लादेश सरकार को समझना चाहिए कि इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी उसके लिए भी घातक हो सकती है। अतिवादी ताकतें जब अपनी जड़ें गहरी जमा लेती हैं तब वह सबके लिए नासूर बन जाती हैं और उस स्थिति में उनसे निपटना अधिक मुश्किल हो जाता है। बांग्लादेश आज उस जगह खड़ा है, जहाँ वह संभला नहीं तो उसकी बुरी गत हो जाएगी। प्रधानमंत्री शेख हसीना यह नहीं भूलें कि इस्लामिक आतंकवाद बांग्लादेश के इतिहास और वर्तमान को भी पूरी तरह निगल जाएगा। इस बात को समझने के लिए उन्हें इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों का अध्ययन कर लेना चाहिए। हाल की कई घटनाएं बताती हैं कि बांग्लादेश में आज जिस तरह हिन्दुओं की हत्याएं हो रही है, वह दिन भी दूर नहीं है जब इसी तरह मुसलमानों की हत्याएं होना शुरू हो जाएंगी।
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