मंगलवार, 4 अगस्त 2015

संसद में काम के उपाय सोचें

 सं सद के मानसून सत्र का लगभग आधा समय हंगामे की भेंट चढ़ चुका है। गतिरोध बरकरार है। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष की संयुक्त बैठक से भी संसद के संचालन की राह निकालने का प्रयास किया। लेकिन, बात नहीं बनी। प्रतिपक्ष हंगामा खड़ा करने की जिद लेकर अड़ा हुआ है। इस बीच केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा ने 'संसद में काम नहीं तो वेतन नहीं' का मुद्दा उठा दिया है। सभी पार्टियों के नेताओं की राय इसके पक्ष में भी है और विपक्ष में भी। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल है कि वेतन महत्वपूर्ण है या काम? वैसे भी बहुत से नेता यह तय ही नहीं करते हैं कि उन्हें संसद में काम नहीं करना है, बस हंगामा करना है, संसद को ठप कर देना है। यह तो पार्टी तय करती है। नेताओं को तो बस पार्टी लाइन पर चलना होता है। ऐसे में नेताओं का वेतन काटने से क्या लाभ होगा? तब क्या संसद चल पाएगी? संभवत: नहीं? इसलिए सांसदों के वेतन से अधिक महत्वपूर्ण है संसद की कार्यवाही। जनकल्याण के लिए संसद का चलना जरूरी है।

संसद ठप करने की राजनीतिक होड़

 रा जनीतिक दलों के बीच नए तरह की होड़ शुरू हो गईं हैं। एक, संसद नहीं चलने देना। कैसे भी करके संसद का कामकाज ठप कर देना। दूसरी, प्रत्येक मामले में मंत्री-मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे की मांग करना। संसद के मानसून सत्र का पहला दिन भी इसी होड़ से उपजे हंगामे की भेंट चढ़ गया। मनी लॉन्ड्रिग के आरोप का सामना कर रहे आईपीएल के पूर्व अध्यक्ष ललित मोदी की मदद के मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर विपक्ष ने सियासी संग्राम छेड़ दिया। मध्यप्रदेश के व्यापमं मामले में भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस्तीफा मांगते हुए विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया। विपक्षी पार्टियों के रवैये के कारण पहले तो सदन की कार्यवाही को चार बार स्थगित किया गया। बाद में, कार्यवाही को पूरे दिन के लिए स्थगित करना पड़ा। आसार हैं कि प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस आगे भी सदन की कार्यवाही नहीं चलने देगी। सरकार को घेरना और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करना, लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी। लेकिन, बीते कुछ समय से देखने में आ रहा है कि सदन को ठप कर देना और प्रत्येक मामले में इस्तीफे की मांग करना विपक्ष की आदत बनता जा रहा है। सभी राजनीतिक दलों को इस पर विचार करना चाहिए, क्या यह रवैया सही है। जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए बेवजह हंगामा खड़ा करना हमारा मकसद नहीं होना चाहिए। अब जनता को गुमराह करने की जरूरत नहीं है, ये 'जनता' है, सब जानती है। मुद्दों पर असहमति है, आपत्ति है तो पहले सदन में उन पर खुलकर चर्चा तो हो। सरकार को बहस में, तर्कों के आधार पर मजबूर किया जाए, अपने फैसले लेने और सुधारने के लिए। विमर्श के बाद मुद्दा सुलझे नहीं तब तो दूसरे तरीके अपनाने का तुक बनता है। वरना, तो यही समझा जाएगा कि सदन को नहीं चलने देने की एक नई परिपाटी ने जन्म ले लिया है। 

नेता समझें, ये सियासत नहीं है

 भा रतीय नेता और राजनीति वोट बैंक की तलाश में अंधे गलियारों में भटक रहे हैं। आतंकवाद के नाम पर दोहरा रवैया अपनाने वाली कुछ चिह्नित पार्टियां और नेता पहले मुम्बई शृंखलाबद्ध धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फाँसी की सजा को माफ कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे। हद तो तब हो गई जब आतंकवाद को धर्म से न जोडऩे की दुहाई देने वाले ही एक आतंकवादी को धर्म विशेष से जोडऩे लगे। उसके बचाव में कुतर्कों पर भी उतर आए। न राष्ट्र के स्वाभिमान का ख्याल उन्होंने किया और न ही न्यायपालिका के प्रति सम्मान व्यक्त किया। नेताओं के बयानों को पढ़-सुन-देखकर आतंकवादी हमलों में अपने परिजनों को खोने वाले परिवार क्या सोच रहे होंगे? शहीद जवान आसमान से देख रहे होंगे तो खून के आँसू रो पड़ेंगे। लेकिन, नेताओं को शर्म नहीं, आतंकियों की पैरवी करने में, उन्हें 'जी' और 'साहब' कहने में भी। आतंकवादी की फाँसी पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश की गई। अपराधी को धर्म से जोड़ दिया। 

कोहिनूर लौटाएगा न माफी मांगेगा ब्रिटेन

 भा रत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नवंबर में ब्रिटेन जाने वाले हैं। यह दौरा भारत से अधिक ब्रिटेन के लिए महत्वपूर्ण है। एक जमाने में व्यापार के बहाने भारत में घुसने वाला ब्रिटेन फिर भारत के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए प्रयासरत है। अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए भारत से गहरी दोस्ती ब्रिटेन की जरूरत भी है। बहरहाल, हाल में बार-बार ब्रिटेन का जिक्र हो रहा है। भारत के सांसद शशि थरूर ने ब्रिटेन को उसके ही घर में उसे असली चेहरा दिखा दिया। ऑक्सफोर्ड यूनियन सोसायटी में 'ब्रिटिश शासन' की धज्जियां उड़ाता हुआ महज 15 मिनट का उनके भाषण का वीडियो वायरल हो गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ब्रिटेन ने 200 साल तक भारत में लूट मचाई। ब्रिटेन को समृद्ध करने के लिए भारत के खजाने लूटे गए थे। इसलिए ब्रिटेन से भारत को मुआवजा मिलना चाहिए। ब्रिटेन पर भारत का नैतिक कर्ज भी है। थरूर ने बताया कि जब अंग्रेज भारत आए तब दुनिया की इकोनॉमी में भारत का हिस्सा 23 प्रतिशत था। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तब यह आंकड़ा महज चार फीसदी रह गया। वैसे, एक अध्ययन के मुताबिक 14वीं शताब्दी तक दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 66 फीसदी था। गांधीवादी विचारक और प्रख्यात इतिहासकार धर्मपाल ने लम्बे समय तक ब्रिटिश दस्तावेजों का अध्ययन कर यह बात सिद्ध भी की है कि अंग्रेजों के आने तक भारत प्रत्येक क्षेत्र में समृद्ध था। अंग्रेजों ने यहां के कपड़ा मिल, लोहा निर्माण के कारखाने, उत्पादन के अन्य उपक्रम और गांव-गांव में संचालित पाठशालाएं, सबको खत्म कर दिया। यह पहली बार है जब किसी कांग्रेसी सांसद ने ब्रिटेन के बारे में इस तरह बेबाकी से सच बोला है। प्रधानमंत्री सहित पूरे देश ने शशि थरूर की प्रशंसा की है। वरना तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके पी. चिदम्बरम तो ब्रिटेन के सामने नतमस्तक थे। बल्कि इन्होंने तो यह तक कहा था कि हम धन्य हैं कि अंग्रेज हम पर शासन करने आए। 

बनाना होगा धरती को जीने लायक

 ह म सबके हृदय द्रवित हैं। आँखें नम हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति, वैज्ञानिक और भारत रत्न डॉ. एपीजे कलाम चले गए। असल मायने में वे गए नहीं हैं बल्कि हमारे दिलों में और गहरे उतर गए हैं। यह मौका है, जब हमें कलाम साहब के सिद्धांतों को अपने व्यक्तित्व में उतार लेना होगा। वे चाहते थे कि उन्हें हमेशा शिक्षक के रूप में याद रखा जाए। संभवत: इसीलिए अपने पीछे एक अहम पाठ छोड़ गए हैं। एक बड़ा व्याख्यान, जो आईआईएम शिलांग में देना था- 'धरती को जीने लायक कैसे बनाया जाए।' उनके इस पाठ को हमें स्वयं भी बार-बार पढऩा है, जीवन में उतारना है और दूसरों को भी पढ़ाना है। उनके पाठ को आगे बढ़ाने के लिए प्रत्येक भारतीय को संकल्प लेना होगा। 

अब तो इस रोग से मुक्ति चाहिए

 आ खिर आतंकवाद के दंश से कब मुक्ति मिलेगी? यह सवाल प्रत्येक भारतवासी के दिल और जुबान पर है। आतंकवाद ने भारत के कोने-कोने को लहूलुहान कर दिया है। आतंकवादी हमलों में कभी आम आदमी मरते हैं, कभी सिपाही की जान जाती है तो कभी सैनिक शहीद होते हैं। तंग आ गए हैं, कायरों की हरकतों से। बहुत हुआ, अब इस नासूर का इलाज चाहिए। हमेशा-हमेशा के लिए। आतंकवाद को जड़ से खत्म करना कोई असम्भव कार्य नहीं है। यह संभव है। अमरीका और ब्रिटेन सहित अन्य देशों ने अपनी भूमि से आतंकवाद को उखाड़ फेंका है। फिर हम क्यों नहीं कर सकते? कर सकते हैं। आतंकवाद को रोकने के लिए फिर से एक कड़े कानून की जरूरत है। दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। आतंकवाद को खत्म करने के लिए वर्तमान सरकार से तो और अधिक उम्मीद हैं। राष्ट्रवादी सरकार है। प्रधानमंत्री का सीना भी 56 इंच का है। सुरक्षा बलों को पिछली सरकार के मुकाबले अधिक समर्थन है। अभी हाल ही में म्यांमार की सीमा में घुसकर भारतीय सैनिकों ने आतंकवादियों को मार गिराया था। 

सोमवार, 3 अगस्त 2015

आईएसआईएस की भारत पर बुरी नजर

 अ मरीकी अखबार में खुलासा हुआ है कि आतंक का पर्याय बन चुके आईएसआईएस के निशाने पर भारत है। अमरीकी सुरक्षा एजेंसियों को तालिबान से जुड़े पाकिस्तानी नागरिक से कुछ दस्तावेज मिले थे। जिनका अध्ययन करने के बाद अमरीकी सुरक्षा एजेंसियां इस नतीजे पर पहुंची हैं कि भारत के खिलाफ जंग का ऐलान करके इस्लामिक स्टेट निर्णायक युद्ध छेडऩा चाहता है। वह जानता है कि भारत जैसे महत्वपूर्ण देश पर हमला किया गया तो अमरीका भी हस्तक्षेप करेगा। अमरीका के हस्तक्षेप करने के बाद आईएसआईएस दुनिया के तमाम आतंकवादी संगठनों और उसकी कट्टर धार्मिक विचारधारा में भरोसा रखने वाले मुस्लिम देशों को एकजुट कर इस्लामिक स्टेट की स्थापना के लिए निर्णायक युद्ध छेड़ सकता है। आईएसआईएस भारत पर हमला करने की तैयारी में जुटा हुआ है। इसके लिए वह अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सक्रिय जिहादियों के साथ मिलकर षड्यंत्र रच रहा है। भारत के विरुद्ध बड़ी आतंकी कार्रवाई में निश्चित ही आईएस को लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों का साथ मिल जाएगा। दोनों आतंकी गुट लम्बे समय से भारत को परेशान कर रहे हैं। भारत में आतंकी विस्फोट कराने में अमूमन इन दोनों गुटों का ही हाथ रहता है। इतिहास को देखते हुए पाकिस्तानी सेना पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। खबर यह भी है कि पाकिस्तान ने भी आतंकियों को भारत में घुसपैठ करने की छूट दे दी है। पाकिस्तानी रेंजर्स आतंकियों को भारत की सीमा पार कराने में मदद करेंगे। पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान लगातार सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है। घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तानी सेना सीमा पर गोलाबारी करती है, ताकि भारतीय सेना का ध्यान बंटाया जा सके।