सोमवार, 11 मार्च 2013

समान अधिकार और सम्मान चाहिए, विशेषाधिकार नहीं

 बैं क में भारी भीड़ थी। लोग घंटों से लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी कॉलेज की एक लड़की आती है। उम्र २०-२२ साल। तंग कपड़े पहने हुए और आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए हुए थी। भीड़ देखकर परेशान थी। लेडीज फर्स्ट जुमले का फायदा उठाने के लिए लाइन खड़ी न होकर काउंटर पर आगे चली गई। तभी एक युवक ने उसे आवाज दी- ओ दोस्त लाइन में आ जाओ। हम भी बहुत देर से यहां खड़े हैं। क्या हो जाएगा? यदि मैं तुमसे पहले ड्राफ्ट बना लूंगी तो। अकेली ही तो हूं, बस पांच मिनट का ही तो अंतर आएगा। अब दूसरा दृश्य देखिए रेलवे स्टेशन टिकट के लिए लंबी कतार। ठीक बैंक वाली लड़की जैसी ही टिप-टॉप लड़की यहां भी आती है। आगे की ओर खड़े लोगों से अपना टिकट लेने का निवेदन करती है। इस पर एक युवक ने उससे कहा - अरे बहन, तुम खुद ही पहले टिकट ले लो। कहां लड़कों के साथ लाइन में फंसोगी। लकड़ी मुस्काती हुई आगे जाती है और टिकट ले लेती है। एक और दृश्य देखिए। मल्टीप्लेक्स सिनेमा का टिकट काउंटर। टिकट लेने के लिए लंबी लाइन लगी है। यहां भी महिलाओं की अलग से लाइन नहीं है। वह दो पल के लिए खड़ी होकर सोच ही रही थी कि टिकट ले या नहीं। इसके बाद वह लाइन में लगने लगी। लाइन में खड़े एक-दो लड़कों ने कहा- अरे आप कहां लाइन में लग रही हो। आप तो लड़की हो, आगे चली जाओ। वह पहले टिकट मिल जाएगा। यहां लड़की का जवाब गौर करने लायक था। उसने कहा- मुझे जरूरत नहीं। लड़की होने के कोई विशेषाधिकार नहीं चाहिए। जितने विशेषाधिकार देने थे, ऊपर वाले ने दे दिए हैं। धरती पर तो बस सम्मान और समान अधिकार चाहिए।
    तीनों लड़कियों में आखिरी वाली लड़की ने पते की बात कही। विशेषाधिकार तो कमजोर होने की निशानी है। स्त्रियां सदैव से यह सिद्ध करती आई हैं कि कम से कम वे पुरुषों के मुकाबले किसी काम में कमजोर तो नहीं ही है। बल्कि की आगे ही हैं। व्यक्तिगत गुणों के मुकाबले भी पुरुष उनके सामने कहीं नहीं टिकता। अब देखें तो नारी आंदोलन के नाम पर हो उल्टा रहा है।  स्त्री के लिए विशेषाधिकार की मांग की जा रही है। जिसकी उसे कतई जरूरत नहीं है। उसके जीवन में कमी है तो समान अधिकार की। सम्मान की। ये उसे मिल जाए तो फिर किसी विशेषाधिकार की उसे जरूरत नहीं रह जाती। बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ। कानून में भी फेरबदल किया गया। लेकिन, क्या इससे बलात्कार की घटनाओं में कमी आई। जवाब है नहीं। लड़कियों को उसी रफ्तार से रौंदा जा रहा है। महानगर से लेकर कस्बे तक एक जैसे हालात हैं। सवाल उठता है कि तो कैसे बदलाव आएगा? क्या कानूनों को कड़ा नहीं किया जाना चाहिए? जरूर आएगा बदलाव। कानून भी कड़े होने चाहिए सभी तरह के अपराधियों के लिए। यह अलग बात है कि बदलते दौर में कड़े कानून स्त्रियों के सहायक तो हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति समाज की सोच नहीं बदल सकते। स्त्री को देखने, सोचने और समझने का नजरिया बदलना होगा। इसकी शुरुआत किसी कानून के बनने से नहीं हो सकती। मन बनाना होगा। समाज यानी स्त्री-पुरुष दोनों को खुद से करनी होगी शुरुआत। स्त्री को कदम-कदम पर क्षणिक लाभ लेने के लिए खुद को कमजोर साबित करने से बचना होगा। उसे लेडीज फर्स्ट के जुमले को छोडऩा होगा। मैं नारी हूं इसलिए मेरी मदद कीजिए, यह भी नहीं चलने देना होगा। पुरुष को भी यह खयाल दिल से निकालना होगा कि नारी को उसकी जरूरत है। देखने में आता है कि कोई लड़का गाड़ी धकेलकर ले जा रहा है तो कोई उससे नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है? मैं क्या मदद कर सकता हूं? लेकिन, स्थिति इसके उलट हो यानी जब कोई लड़की गाड़ी धकेलकर ले जा रही हो तो राह चलते सौ लोग रुककर उससे पूछते हैं, क्या हुआ? कोई मदद तो नहीं चाहिए? पुरुषों को हर काम में लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की मानसिकता से भी पीछा छुड़ाना होगा। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपनी बहन-बेटी को स्कूल-कॉलेज छोडऩे जाने की बजाय उसे स्वयं जाने दिया जाए। घर में बेटे के समान ही बेटी को भी पढ़ाई का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। उसे सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ाना चाहिए कि ब्याह करने में दिक्कत न आए। उसे अच्छा नौकरीपेशा वर मिल सके। जिस तरह लड़के को अफसर बनाने के लिए पढ़ाई पर पैसा खर्च किया जाता है वैसी ही बिटिया को भी अफसर बनाने का सपना देखना चाहिए। घर की संपत्ति में भी पुत्र के बराबर पुत्री को हक देना चाहिए। इस मामले में अभी समाज बहुत रूढि़ है। घर की सबसे लाड़ली सदस्य से पिता, मां और भाई भी उस समय खपा हो जाते हैं, जब वह शादी के बाद पैतिृक संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग ले। इस वक्त घरवालों का एक ही कहना होता है कि दहेज तो दे दिया, अब क्या भाइयों का हिस्सा भी चाहिए। खून के रिश्ते बिगडऩे से बचाने के लिए घर की बेटी छोटी-मोटी नौकरी करके गुजारा कर लेती है लेकिन किसी भी आपात स्थिति में वह पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं मांगती। यहां समानता लाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। असमानता और विभेद की लकीर घर में बेटा और बेटी को दी जाने वाली अलग-अलग नैतिक शिक्षा से भी बनती है। बेटे के लिए भरपूर आजादी। बेटी को ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए, तमाम बंदिशें। जबकि नैतिकता और मर्यादा का पाठ लड़की के साथ-साथ लड़कों को भी पढ़ाया जाए तो ठीक बनेगा आने वाला समाज।
    दिक्कत कहां है? क्यों तमाम प्रयास के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं? इसके लिए हम सबके साथ-साथ बहुत हद तक नारी को आधुनिक बनाने के नाम पर चल रहे तमाम नारी आंदोलन भी जिम्मेदार हैं। मशहूर नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर का कथन याद आता है कि नारीवादी आंदोलनों ने भारतीय नारी को बस तीन चीजें दी हैं- लिपस्टिक, हाईहील सैंडल और ब्रा। हम सबकी नजर में भी आधुनिक स्त्री की छवि लाली-पाउडर पोते, स्टाइलिश बाल कटवाए और जींस-टीशर्ट पहनने वाली लड़की की है। इतना ही नहीं नारीवादी आंदोलनों से जुड़े लोग नारी की आजादी के नाम पर सिर्फ यौनिक आजादी की ही प्रमुखता से चर्चा करते हैं। जिसका खामियाजा स्त्री को ही उठाना पड़ रहा है। यौनिक आजादी की आड़ में बाजार ने उसे अपना गुलाम बना लिया है। बाजार ने आधुनिक नारी का समूचा व्यक्तित्व उसके शरीर पर केन्द्रित कर दिया है। नारी देह दिखाकर साबुन से लेकर सीमेंट तक बेचा जा रहा है। बाजार अपने मतलब के लिए नारी देह से सारे लिबास नोंच लेना चाहता है।
    बाजार और नारीवादी आंदोलन के नाम पर आए भटकाव से तो स्वत: नारी को ही बचना होगा। उसे तय करना चाहिए कि उसकी पहचान कैसे हो? उसे जरूरत नहीं पुरुषों की नजरों में सुंदर दिखने की। उसे ही तय करना होगा कि बाजार की ओर से सुझाए कपड़े उसे पहनने हैं या फिर देह और देश-काल के अनुरूप। उसे जरूरत नहीं किसी का सामान बेचने के लिए अपना शरीर बेचने की। उसे घर से लेकर बाजार तक स्वयं को मजबूत साबित करना होगा। कहीं भी अगर पुरुष उसे कमजोर समझ कर आगे जाने का अवसर दे या दया भाव दिखाए तो स्त्री को ताकत के साथ उसका प्रतिरोध करना चाहिए। बराबर ताकत वाले का सब सम्मान करते हैं।

रविवार, 3 मार्च 2013

सोने के दांत वाले लोगों का देश

 सो वियत संघ यानी रूस। लम्बे समय तक अमरीका का सीधा प्रतिद्वंद्वी रहा। अभी भी है। महाशक्ति रूस। १९९० में सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के कमजोर होने की शुरुआत। कम्युनिस्ट शासन के दौर में रूस विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट रहा था। लोग आर्थिक सुधारों के लिए लोकतंत्र सरकार के प्रति विश्वास जता रहे थे। रूसी जनता कम्युनिस्ट शासन की तानाशाही से तंग आ चुकी थी। कुछ साल पहले दैनिक समाचार-पत्र में किसी लेखिका का आलेख पढ़ा था कि रूस में जब कम्युनिज्म का परचम फहरा रहा था, तब लोगों को बोलने की पूरी आजादी नहीं थी। खासकर कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ तो कोई कुछ बोल भी नहीं सकता था। यहां तक कि कम्युनिस्ट सरकार की बुराई सुनना भी गुनाह था। लेखिका लिखती है कि ट्रेन में सफर करते समय एक विदेशी यात्री किन्हीं अव्यवस्थाओं को लेकर सरकार की बुराई कर रहा था। सामने की सीट पर बैठा रूसी नागरिक विदेशी यात्री को चुप रहने को कह रहा था। इतने में ट्रेन में सवार दो सुरक्षाकर्मियों ने विदेशी और सामने की सीट पर बैठे रूसी नागरिक दोनों को गिरफ्तार कर लिया। विदेशी यात्री को थाने ले जाकर कड़ी हिदायत दी गई कि इस देश में यहां की सरकार (कम्युनिस्ट) की निंदा करने की आजादी नहीं है। आप चूंकि बाहरी हो, हमारे मेहमान हो इसलिए जाने दे रहे हैं। विदेशी व्यक्ति ने पुलिस से पूछा कि सामने बैठे आदमी का क्या दोष था? उसे क्यों गिरफ्तार किया। पुलिस के अफसर ने कहा, उसने सरकार की निंदा सुनी। यह उसका बहुत बड़ा अपराध है, उसे कड़ी सजा दी गई है। अभिव्यक्ति पर कुछ इस तरह ताला लगा रखा था साम्यवादी सत्ता ने रूस में। सोवियत संघ के १९९० में विघटन के साथ ही वहां के लोगों को बोलने की आजादी मिल गई। हालात बदल गए। लोग सरकार की नीतियों और व्यवस्था के खिलाफ विचार कर सकते थे और बोलने भी लगे।
     सोवियत संघ के इस दौर का जिक्र पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शिखा वार्ष्णेय ने अपनी किताब 'स्मृतियों में रूस' में किया है। हालांकि किताब में इसकी विस्तृत चर्चा नहीं है। उन्होंने १९९० से १९९६ तक रूस में रहकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। इस दौरान शिखा वार्ष्णेय के अनुभवों का ही संकलन है स्मृतियों में रूस। सहज और सरल भाषा में यादों को उकेरने के खूबसूरत प्रयास के लिए वे बधाई की पात्र हैं। उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात अगस्त २०१२ में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई। मीडिया एक्टिविस्ट और चरैवेति (भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश की पत्रिका) के संपादक अनिल सौमित्र के प्रयासों से भोपाल में मीडिया चौपाल का आयोजन किया गया था। इसी में शामिल होने के लिए शिखा वाष्र्णेय आई थीं। हालांकि हमारी पहचान सोशल मीडया पर पहले ही हो चुकी थी। मीडिया चौपाल में ही उन्होंने 'स्मृतियों में रूस' मुझे भेंट की। सुखद आनंद की अनुभूति हुई क्योंकि पुस्तक की रोचकता के बारे में अलग-अगल ब्लॉग पर समीक्षाएं पढ़ चुका था और पुस्तक को पढऩे की तीव्र इच्छा थी। 
        रूस और भारत के बीच बेहद करीबी रिश्ते रहे हैं। अब भी दोनों देश दोस्त हैं। भारतीय जनता और रशियन आवाम में एक-दूसरे के लिए प्रेम और सम्मान है। रूस में भारत के सिनेमा को खूब पसंद किया जाता है। यह तो मालूम था लेकिन इतना नहीं पता कि रूस के अधिकतर घरों में 'मेरा जूता है जापानी' और 'आई एम ए डिस्को डांसर' बजा करता था। सिनेमा हॉल में मिथुन चक्रवर्ती और अमिताभ बच्चन की कोई न कोई फिल्म का प्रदर्शित होते रहना। शिखा किताब के आखिरी हिस्से में लिखती भी हैं कि न जाने कितनी बार सिर्फ भारतीय होने के कारण टैक्सी वालों ने उनसे किराया नहीं लिया।
         शिखा वार्ष्णेय की लेखन शैली इतनी धाराप्रवाह है कि किताब पढ़ते समय अंतरमन में एक-एक कर सारे दृश्य दीख पड़ते हैं। मास्को से वेरोनिश की ट्रेन यात्रा, वोरोनिश रेलवे स्टेशन,  मास्को यूनिवर्सिटी की भव्य इमारत, सड़कों पर जमी बर्फ, खूबसूरत मॉस्को मेट्रो स्टेशन, क्रेमलिन, मक्सिम गोर्की और पुश्किन का घर। पुस्तक में इनके चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं। हालांकि किताब में इनका सतही वर्णन है। दरअसल, किताब पर्यटक के नजरिए से लिखी भी नहीं है। यह तो एक मस्तमौला विद्यार्थी के संघर्ष के सुहावने पलों का दस्तावेज है। रूस के खान-पान, रहन-सहन और लोगों के व्यवहार को समझने में किताब बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। ठंड का तो बड़ा ही रोचक वर्णन है। रूस में १० महीने ठंड पड़ती है। ठंड इतनी कि खिड़की के बाहर थैला लटकाकर उससे डीप फ्रीजर का काम लिया जा सकता है। झील, तालाब सब जम जाते हैं और सड़कों पर सफेद मखमली चादर की तरह बर्फ फैल जाती है। जिस पर रूसी बच्चे जमकर आइस स्केटिंग करते हैं। रूस की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर दिखाने के साथ-साथ शिखा वाष्र्णेय वहां के सामाजिक जीवन का भी शब्द चित्र खींचती हैं। रूस में परिवार व्यवस्था पुरुष प्रधान है। हालांकि वहां की औरतें मर्दों की तुलना में अधिक मेहनती हैं। जिस तरह भारत में लड़कियों के खिड़की और छज्जों पर बैठने पर घर की बुजुर्ग महिलाएं व पुरुष टोक दिया करते हैं वैसे ही रूस में लड़की को खिड़की के आसपास बैठा देख कोई न कोई महिला टोक दिया करती हैं। हिदायत दी जाती है कि लड़कियों को खिड़की पर नहीं बैठना चाहिए। लोग नियमों को स्वत: पालन करते हैं। सड़कें साफ-सुथरी हैं। चॉकलेट का रैपर भी रूसी नागरिक सड़क पर नहीं फेंकते हैं। अंधविश्वास भी बहुत है रूसियों में। आत्माएं बुलाने और उनसे अपना भविष्य जानने का बहुत प्रचलन है।
कुछ मजेदार और रोचक बातें :
- चाय को रूस में चाय ही कहते हैं। वहां जाओ और चाय मांगनी हो तो कहिएगा चाय दे दे मेरी मां/बाप!
- वहां कद्दू के आकार का पत्तागोभी और सेव मिलता है।
- रूस में स्कूलों के नाम नहीं नंबर होते हैं। खास और जरूरी बात है कि वहां बच्चे अपने ही इलाके के स्कूल में पढ़ते हैं।
- अधिकतर रूसियों की बत्तीसी में कम से कम एक दांत तो सोने या चांदी का होता ही है।
- क्रिसमस २५ दिसंबर को नहीं बल्कि ७ जनवरी को मनाया जाता है।
- अंधविश्वास : खाना बनाते समय चाकू गिर गया तो पति भन्नाया हुआ घर आएगा। काली बिल्ली का रास्ता काटना शुभ माना जाता है।
दो शब्द अलग से : जैसा कि मैंने बताया कि यह किताब मुझे अगस्त २०१२ में शिखा वार्ष्णेय ने भेंट की। इसको पढऩे की इच्छा पहले से थी। लेकिन, किताब हाथ आने के बाद से छह माह बाद मैं इसे पढ़ सका। शिखा जी का लेखन इतना रसदार है कि एक बैठक में ही 'स्मृतियों में रूस' को पढ़ गया। सलिल वर्मा, अनूप शुक्ल, संगीता स्वरूप, मनोज कुमार, वन्दना अवस्थी दुबे सहित कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी पुस्तक के विषय में बढिय़ा टिप्पणी की है।
मक्सिम गोर्की टाउन और शिखा वार्ष्णेय अपने दोस्तों के साथ रूस में
पुस्तक : स्मृतियों में रूस
मूल्य : ३०० रुपए (सजिल्द)
लेखक : शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स
एक्स-३०, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-२, नईदिल्ली-११००२०

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

हिन्दुओं के लिए दोहरी त्रासदी था विभाजन

 १४ अगस्त १९४७ आधुनिक भारत का सबसे दु:खद दिन था। कुछ सिर-फिरे नेताओं की सत्तालोलुपता के कारण दोनों ओर से हजारों-लाखों लोगों को मार डाला गया। विशेषकर वर्तमान पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं की निर्ममता से हत्या की गई। जुलाई-अगस्त से ही उपद्रव शुरू हो गए थे, जो विभाजन के बाद तक जारी रहे। रात के समय हिन्दुओं के घर और दुकान अधिकारियों की मिलीभगत से उपद्रवी जला रहे थे और हिन्दुओं को मार-काट कर उन पर कब्जा कर रहे थे। बीभत्स नर-संहार के समाचार पाकिस्तान में बसने के इच्छुक लोगों को भी कंपा रहे थे। खून-पसीने की कमाई से बनाए पूर्वजों के और अपने पहले घर को कोई छोडऩा नहीं चाहता। लेकिन, धार्मिक देश के नाम पर नर से पिचाश बने लोगों के आगे उदार हिन्दुओं की हिम्मत जवाब देने लगी। आखिर ज्यादातर हिन्दुओं ने पाकिस्तान जो कि हिन्दुओं के लिए नापाक हो चुका था, से भाग आना ही उचित समझा। अहो! दुर्भाग्य, सुरक्षित भारत चले आना भी उनके नसीब में नहीं था। उस पार से रेलगाडिय़ों में जिन्दा इंसान की जगह लाशें यात्रा कर हिन्दुस्तान आती थीं। जिनकी किस्मत बहुत ही बुलंद थी, वे ही अमन की सरजमीं पर सही-सलामत आ सके। महज तीन माह में ही पाकिस्तान में बसे ९० फीसदी हिन्दुओं ने हमेशा के लिए अपने पैतृक भूमि को छोड़ दिया, या कहें छोडऩे पर मजबूर होना पड़ा। विभाजन की नींव हिन्दू-मुस्लिम एकता को छिन्न-भिन्न करके रखी गई थी। उस दौर के कई मुस्लिम  और हिन्दू संतों ने इस खूनी मंजर को रोकने के अथाह प्रयास किए थे लेकिन प्रयास रंग नहीं ला सके। विभाजन का दंश हिन्दुओं को ही नहीं चुभा वरन इससे उदार मुस्लिम भी आहत हुए। उन्होंने भी अपने लोग खोए और भूमि भी। लेकिन, तुलनात्मक रूप से इसका खामियाजा हिन्दुओं को अधिक उठाना पड़ा। विभाजन की अधिक मार हिन्दुओं पर ही पड़ी। लुटे-पिटे हिन्दू, खाली हाथ बमुश्किल जान बचाकर हिन्दुस्तान आ सके थे।
    कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद ने शायद इतिहास ठीक से नहीं पढ़ा या अहमद बेहद निर्मम है, जिसे विभाजन के घाव को कुरेदने में मजा आ रहा है। तभी मिस्टर अहमद ने बड़ी आसानी से कह दिया कि लालकृष्ण आडवाणी यहां सेवा नहीं मेवा खाने के लिए आए हैं। पाकिस्तान से यहां आना महज आडवाणी का मसला नहीं है। यह तो उन लाखों लोगों का दु:ख है, जिन्होंने अपनी जमीन खोयी और अपनी आंखों के सामने परिजनों की हत्या देखी। आडवाणी का भारत मेवा खाने के लिए आना, ऐसा कह कर कांग्रेसी नेता ने इन लाखों लोगों को तकलीफ पहुंचाई है। हकीकत तो यह है कि आडवाणी जैसे ही तमाम हिन्दुओं के लिए वहां रहना मुमकिन ही नहीं था। जो वहां रह गए, आज उनकी क्या हालत है, किसी से छिपी नहीं। विश्व के मीडिया में आई रिपोर्ट बयां करती हैं कि आज भी पाकिस्तान में हिन्दू सबसे निचले दर्जे का आदमी है। या कहें, पाकिस्तानी हुकूमत को उसकी फिक्र ही नहीं, उसकी नजर में हिन्दू पाकिस्तान का नागरिक है ही नहीं। वहां हिन्दू अपनी ही सुरक्षा और सेवा नहीं कर पा रहा है तो भला दूसरे हिन्दुओं की देखभाल कैसे करे? यह बात कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद को समझ नहीं आएगी क्योंकि वह भारत में रहते हैं। उन्हें जीने के लिए टेरर टैक्स नहीं देना पड़ता। उन्हें अपने परिजन की मौत पर धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार करने में बाधा नहीं होती। राजनीति में शीर्ष सत्ता तक पहुंचने में आसानी है। उन्हें जवान होती बेटियों के अपहरण और बलात्कार का डर नहीं। बलात धर्मांतरण का खौफ नहीं, क्योंकि शकील अहमद भारत में रहते हैं, धर्मनिरपेक्ष और हिन्दु बहुसंख्यक भारत में। पाकिस्तान में उक्त कामों में से एक भी हिन्दू आसानी के साथ नहीं कर पाता। उसका जीना दूभर है। वह बेचारा भारत भी नहीं आ पाता। आ भी जाता है तो यहां की सरकार उसकी चिंता नहीं करती है।
    विभाजन के वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी २० साल से भी कम उम्र के थे। लेकिन, सामाजिक जीवन में सक्रिय थे। सिंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ताओं में उनका नाम था।  संघ उस वक्त पाकिस्तान में बसे हिन्दुओं से यही आग्रह कर रहा था कि हिन्दू अपनी जमीन न छोड़ें, भारत नहीं जाएं, मिल-जुलकर यहीं पाकिस्तान में बसे रहें। इससे स्पष्ट है कि विभाजन की घोषणा के साथ ही लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का विचार नहीं बनाया होगा। लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' में लिखते हैं कि सितंबर के आरंभ में एक दिन वे मोटरसाइकिल से कराची के मुख्य रेलवे स्टेशन के पास की सड़क पर जा रहे थे। उन्होंने वहां एक व्यक्ति का शव देखा, जिसकी छुरा घोंपकर हत्या कर दी गई थी। कुछ दूर ही चले थे कि उन्होंने एक और शव देखा, फिर एक तीसरा....। वे आगे लिखते हैं कि यह दृश्य उनके लिए अस्वाभाविक और परेशान करने वाला था। उन्होंने अपने जीवन में पहली बार सड़कों पर इस तरह लाशें देखी थीं। अपने आसपास इस तरह की घटनाएं देखने के बाद ही आडवाणी ने पाकिस्तान छोडऩे का निश्चय किया।
    शकील अहमद साहब को जरा सोचना चाहिए कि ऐसी स्थिति में भला कोई इंसान रुकना चाहेगा। हां, उनकी सुप्रीमो यहां मेवा खाने जरूर आई हैं। अब भला शकील अहमद आडवाणी को ढाल बनाकर अपनी ही पार्टी की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी को निशाना बना रहे हैं तो बात अलग है। लेकिन, जायज फिर भी नहीं। क्योंकि यह केवल एक आडवाणी से जुड़ा मसला नहीं है वरन विभाजन से आहत लाखों लोगों की बात है।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

भारत, विज्ञान और सोशल मीडिया

 स्कू ल-कॉलेज के समय अक्सर एक सवाल मन में नागफनी-सा चुभता था कि विज्ञान की किताबों में डब्ल्यू के रोएण्टजेन, जेएच वैंटहाफ, एई वॉन बेहरिंग, रेगनर फ्रिश, जॉन टिनबर्गन और आइंस्टीन जैसे कठिन और विदेशी नाम क्यों हैं? रामचंद्र, श्यामसुन्दर, अनिल, सुनील जैसे सरल और हमारे-तुम्हारे जैसे नाम क्यों नहीं है? क्या विज्ञान के क्षेत्र में सबकुछ विदेशियों की ही देन है? भारतमाता ने ऐसे सुत नहीं जने, जिन्होंने विज्ञान की प्रज्वला जलाई हो? बहुत पूछ-पड़ताल करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि भारत में विज्ञान का दीप प्रज्वलित ही नहीं था बल्कि अन्य को प्रकाश भी दे रहा था। लेकिन हम बचपन से रटे हुए विज्ञान को झुठलाना नहीं चाहते। हम आज भी विज्ञान के विकास और वैज्ञानिक दृष्टि के लिए पश्चिम की ओर ही देखते रहना चाहते हैं। हम यह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है कि रॉकेट और बारूद विदेश में नहीं बल्कि अपने ही देश में ईजाद हुए। इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के एक अनुभव को उल्लेखित करना चाहूंगा। उन्होंने अपनी पुस्तक 'इंडिया टू थाउजेंड ट्वेंटी : अ विजन फॉर न्यू मिलेनियम' में लिखा है कि एक बार वे रात्रिभोज में आमंत्रित थे। जहां बाहर के अनेक वैज्ञानिक और भारत के कुछ प्रमुख लोग आमंत्रित थे। वहां चर्चा चलते-चलते रॉकेट की तकनीक के विषय पर चर्चा चली। किसी ने कहा कि चीनी लोगों ने हजार वर्ष पूर्व बारूद की खोज की, बाद में तेरहवीं सदी में इस बारूद की सहायता से अग्नि तीरों का प्रयोग युद्धों में प्रारंभ हुआ। इस चर्चा में भाग लेते हुए डॉ. कलाम कहते हैं कि एक बार वे इंग्लैड गए थे। वहां लंदन के पास वुलीच नामक स्थान पर रोटुण्डा नाम का संग्रहालय है। इसमें टीपू श्ररंगपट्टनम् में अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध में टीपू सुल्तान की सेना द्वारा प्रयुक्त रॉकेट देखे और यह विश्व में रॉकेट का युद्ध में सर्वप्रथम प्रयोग था। डॉ. कलाम के इतना कहते ही वहां मौजूद एक प्रमुख भारतीय ने तुरन्त टिप्पणी की कि वह तकनीक फ्रेंच लोगों ने टीपू को दी थी। इस पर डॉ. कलाम ने उन सज्जन से कहा कि आपका कथन ठीक नहीं है। मैं आपको प्रमाण बतलाऊंगा। बाद में डॉ. कलाम ने उन्हें प्रख्यात ब्रिटिश वैज्ञानिक सर बर्नाड लॉवेल की पुस्तक 'द ऑरीजिन एण्ड इंटरनेशनल इकॉनॉमिक ऑफ स्पेस एक्सप्लोरेशन' बताई। इसमें लिखा था कि विलियम कोनग्रेव्ह ने टीपू की सेना द्वारा प्रयुक्त रॉकेट का अध्ययन किया। उसमें कुछ सुधार कर सन् १८०५ में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट और युद्ध सचिव के्रसर लीध के सामने प्रस्तुत किया। वे इसे देखकर प्रभावित हुए और उन्होंने इसे सेना में शामिल करने की अनुमति प्रदान की। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम क्रोनगेव्ह के बारे में तो जानते हैं लेकिन उन महान वैज्ञानिकों के बारे में कोई जानकारी नहीं, जिन्होंने टीपू सुल्तान की सेना के लिए तोप बनाकर दी।
       दरअसल, भारत में वर्तमान में विज्ञान को लेकर जो धारणा प्रचलित है उसके लिए बहुत हद तक हमारा शिक्षा विभाग और बुद्धिजीवी लोग जिम्मेदार रहे हैं। शिक्षा संस्थानों ने अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई। कहते हैं न जो बोएंगे वही तो काटेंगे। हमने एक लंबे अंतराल से विज्ञान के बीज शिक्षा संस्थानों में बोए ही नहीं तो विज्ञान के पौधे-वृक्ष कहां से मिलेंगे। विज्ञान के गीत गाना बंद कर दिया तो विज्ञान की अनुगूंज कहां से आएगी। भारत में आने वाली नस्ल को अपनी परंपरा, संस्कृति, इतिहास और ज्ञान के प्रति गौरव का भाव न रहे, इसके लिए १८३५ में लार्ड थॉमस बॉबिंग्टन मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति लागू करके पूरी कर दी। रही-सही कसर भारतीय मैकाले पुत्रों ने मैकाले के पौधे को सींच कर पूरी कर दी।
      चलिए अब इस बात पर गौर किया जाए कि भारत में फिर से वैज्ञानिक सोच का समाज बनाने के लिए सोशल मीडिया किस प्रकार की भूमिका निभा सकता है। अन्ना हजारे का आंदोलन हो बाबा रामदेव का आंदोलन दोनों को सोशल मीडिया से खूब ताकत मिली। असांजे ने विकीलीक्स के माध्यम से अमरीका के चाल, चरित्र और चेहरे को बेपर्दा कर उसकी चूलें हिला दीं। सोशल मीडिया वर्तमान में अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। परंपरागत मीडिया की तरह यह मैनेज नहीं हो सकता। सोशल मीडिया में कहीं भी कोई चिंगारी उठती है तो वह दूर तक जाती है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर भारतीय जनमानस के मस्तिष्क पर छाई धुंध को हटाने में सोशल मीडिया एक कारगर माध्यम है। बस करना यह है कि सोशल मीडिया में विज्ञान लेखन की शुरुआत हो। हालांकि अभी भी कई सोशल मीडियाकर्मी विज्ञान लेखन का कार्य कर रहे हैं लेकिन यह अभी सीमित है। इस कार्य को गति देने की जरूरत है। चूंकि आजकल स्कूल-कालेज के विद्यार्थी अध्ययन के लिए इंटरनेट का काफी इस्तेमाल करते हैं। अब तो इंटरनेट डेस्कटॉप और लैपटॉप से निकलकर मोबाइल में आ गया है। ऐसे में सोशल मीडिया विज्ञान को रोचक तरीके से प्रस्तुत कर युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। बाल सुलभ मन विज्ञान के परंपरागत अध्ययन से ऊब जाता है। छुटपन से ही बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि जगानी है तो विज्ञान कथा लेखन इस दिशा में बेहतर उपाय हो सकता है। कथा रुचिकर होने के साथ अंतर्मन में पैठ करती है। विज्ञान कथा लेखन कर सोशल मीडिया दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका निभा सकता है। साथ ही अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए। गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस बात पर बड़ा जोर दिया है कि सृजन मातृभाषा में ही हो सकता है। शिक्षा की राष्ट्रीय परिचर्या-2005 की रूपरेखा में भी इस बात को स्वीकारा गया है कि अपनी भाषा में इंसान बेहतर सीख सकता है। वहीं कोठारी आयोग-1966 ने भी कहा था कि दुनियाभर के देशों में बच्चों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जाती है। भारत ही एकमात्र देश है जहां यह व्यवस्था नहीं है। अपनी भाषा में विज्ञान लेखन का कार्य सोशल मीडिया पर अच्छे से किया जा सकता है। विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन जरूरी है। इसके साथ ही इस बात के भी प्रयास करने होंगे की हमारे सुझाव सरकार तक भी पहुंचे। समाज में वैज्ञानिक सोच का वातावरण बनाने के लिए कुछ निजी और सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं। विज्ञान भारती, मेपकॉस्ट, मध्यप्रदेश विज्ञान सभा, साइंस सेंटर और स्पंदन इसके उदाहरण है, ऐसे और भी कई नाम हैं। सोशल मीडिया में जो लोग विज्ञान लेखन की जिम्मेदार संभाले हुए हैं या जो इस दिशा में कुछ करने का मन बना रहे हैं, वे इनके साथ जुड़कर काम कर सकते हैं। विज्ञान मेले, विज्ञान सेमिनार, परिचर्चा, वर्कशॉप, वैज्ञानिक संस्थानों का भ्रमण, वैज्ञानिकों से मुलाकात, विज्ञान नाटकों का आयोजन आदि गतिविधियां शुरू कर सकते हैं। इससे वैज्ञानिक सोच का समाज बनाने में बड़ी मदद मिलेगी।
      आखिर में एक बात और कहूंगा कि भारत में सदैव से विज्ञान की गंगाधारा बहती रही है। बीच में बाह्य आक्रमणों के कारण कुछ गड़बड़ जरूर हुई लेकिन यह धारा अवरुद्ध नहीं हुई। समाज में वैज्ञानिक चेतना खासकर विज्ञान के प्रति भारतीय दृष्टि के विकास के लिए अब सोशल मीडिया को मिलकर भगीरथी प्रयास करने होंगे।

शनिवार, 12 जनवरी 2013

भारत यानी गाँव नहीं

 रा ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत के बयान के बाद भारत बनाम इंडिया की बहस शुरू हुई है। संघ पर हमला करने के लिए तैयार बैठे रहने वाले लोग और संगठन कथ्य की गंभीरता को समझे बिना मोहनराव भागवत के बयान पर हाय तौबा मचा रहे हैं। इस बीच देखने और सुनने में आया कि भारत का अर्थ ज्यादातर लोग ग्रामीण क्षेत्र से और इंडिया का अर्थ शहरी क्षेत्र से लगा रहे हैं। यह सरासर गलत है। भारत का अर्थ किसी भी नजरिए से ग्रामीण क्षेत्र नहीं, संघ प्रमुख श्री भागवत की व्याख्या के अनुसार भी नहीं। संघ प्रमुख के मुताबिक तो भारत का अर्थ सांस्कृतिक भारत से हैं, जहां भारतीय मूल्यों और संस्कारों का पालन हो रहा है। इंडिया से अभिप्राय उस वर्ग से है जो पश्चिम से आई हवा के असर में हैं। स्पष्ट है कि पश्चिम की हवा टेलीविजन व अन्य संचार माध्यमों से गांव तक भी पहुंच गई है। इसके अलावा पहले भी कई गांव बुराइयों के लिए कुख्यात रहे हैं। ऐसे में इन गांवों को संघ प्रमुख की परिभाषा की कसौटी पर कसा जाए तो ये इंडिया ही होंगे, भारत नहीं। भारत का अर्थ तो भाव, राग और ताल से है। भाव से भरा है, संस्कारों से पूर्ण वर्ग ही भारत का प्रतिनिधित्व करता है। ये वर्ग शहर में भी आसानी से मिल जाएगा। ऐसा नहीं है कि यह परिभाषा अभी हाल ही में मोहनराव भागवत ने ही की है। भारत में बढ़ रहे सांस्कृतिक भेद को देखते हुए पहले भी कई विद्वान कह चुके हैं कि इस देश में दो राष्ट्र बन रहे हैं- भारत और इंडिया। जिसमें एक वर्ग पाश्चिात्य जीवनशैली, भोगवाद, चमक-दमक और स्वच्छंदचारिता से जीवन व्यतीत कर रहा है। जबकि एक वर्ग भारतीय संस्कारों को स्थापित कर रहा है और सहअस्तित्व के सिद्धांत का पोषण कर रहा है। खैर, इस विवाद को यहीं छोड़ते हैं। आइए देखते हैं कि आखिर इस देश का नाम क्या है? भारत और इंडिया में से अधिक गौरव की अनुभूति कौन कराता है? इस देश के लिए क्या नाम अधिक उपयुक्त है? क्या भारत गांव है और इंडिया शहर? इन सवालों के जबाव अभी तलाशना जरूरी है क्योंकि इनसे हमारा अतीत भी जुड़ा, वर्तमान का भी वास्ता है और भविष्य भी निर्भर है।
    देश का नाम क्या है? भारत या इंडिया? अकसर यह सवाल देश के तमाम नौजवानों और नौनिहालों के दिमाग को नागपाश की तरह जकड़ता रहता है। दुनियाभर के देशों के एक ही नाम हैं। जापान, जापान है, अमेरिका, अमेरिका है, चीन, चीन है और नेपाल का नेपाल। लेकिन, क्या कारण है कि भारत के दो आधिकारिक नाम प्रचलित हैं - भारत और इंडिया। इस सवाल से परेशान लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केन्द्र सरकार से इसका उत्तर पूछा था। सूचना के अधिकार कानून के तहत उर्वशी शर्मा ने केन्द्र सरकार से पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उसने यह भी पूछा कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? लेकिन, सरकार इसका अब तक स्पष्ट जवाब नहीं दे सकी है। हालांकि हम सभी जानते हैं कि इंडिया शब्द अंग्रेजों का दिया हुआ है। जिसे हम आज तक ढो रहे हैं। हमारे कर्णधारों को १९४७ में अंग्रेजों से सत्ता लेने के साथ ही देश का आधिकारिक नाम भारत ही घोषित कर देना चाहिए था। लेकिन, हुआ इसका उल्टा। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही लिख दिया गया -इंडिया दैट इज भारत। दरअसल, उस वक्त देश की कमान जिन हाथों में थी वे पाश्चात्य शैली में ही रचे-बसे थे। भारतीय राजनेताओं को अन्य देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए थी, जिन्होंने आजाद होते ही या समय आने पर तत्काल अपने मूल नाम को स्थापित किया और गुलामी की याद दिलाने कारण को खत्म कर दिया। सीलोन ने अपना नाम बदलकर श्रीलंका, बर्मा ने म्यांमार और पौलेंड ने पोलेस्का कर लिया था। रूस में भी वामपंथी तानाशाही और क्रूर नेता लेनिन और स्टॉलिन के नाम ऐतिहासिक नगरों से हटा दिए गए। लेनिनग्राद को बदलकर सेंट पीटर्सबर्ग और स्टालिनग्राद को वोल्वोग्राद कर दिया था। दुनिया के इतिहास में ऐसे और भी उदाहरण भरे पड़े हैं लेकिन हमारे नेताओं ने इनसे कोई सीख नहीं ली।
    भारतवर्ष ऐसा नाम है जिसके साथ तमाम गौरवान्वित करने वाले प्रसंग जुड़े हैं। महान प्रतापी और लोक कल्याणकारी राजा भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत रखा गया था लेकिन इंडिया किसके नाम पर रखा गया, किसी के पास कोई जवाब नहीं। सरकार के पास भी नहीं। इंडिया शब्द के साथ इस तरह का कोई गौरव का विषय भी नहीं जुड़ा। जुड़ा है तो बस गुलामी और पीड़ा का किस्सा। भारत नाम देश की भाषा, समाज और संस्कृति की थाती है। इस नाम के साथ हजारों वर्ष पुरानी परंपराएं, स्मृति, रीति और ज्ञान जुड़ा है। इस राष्ट्र के प्रत्येक काल, वर्ग और भाषा के साहित्य में इस देश का नाम भारतवर्ष बताया गया है। नाम अपने आप में बड़ा महत्व रखते हैं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। यही कारण है कि अपने बालक का नाम राम तो कोई भी रखने को तैयार हो सकता है लेकिन रावण संभवत: सामान्य आदमी नहीं रखना चाहेगा। ठीक इसी तरह अपनी बेटी का नाम सीता रखना सुखद है लेकिन सूपर्णखा कोई नहीं रखना चाहेगा। दरअसल, नाम अपने साथ इतिहास लेकर चलते हैं। नाम विशेष संस्कृति का भान कराते हैं।
    भारत का अर्थ ग्रामीण और इंडिया का अर्थ शहर, किसी भी नजरिए से ठीक नहीं है। पिछड़ा है वह भारत है और जो प्रगतिशील है वह इंडिया है। दरअसल, इसी सोच के कारण दिक्कत बढ़ी है। भारत ग्रामीण और पिछड़ा है, यह सोच बनी क्यों? किसी भी देश या समाज को अपना अनुयायी बनाना है तो उसे उसकी जड़ों से काट देना चाहिए। मैकाले के मानसपुत्रों ने यही भारत के संदर्भ में किया। उन्होंने भारत को झाड़-फूंक, जादू-टोना करने वालों का देश बताया, वैज्ञानिक रूप से बंजर कहा तो आधुनिकता के नजरिए से बेहद पिछड़ा और रूढ़ीवादी ठहरा दिया। इसी का नतीजा रहा कि धीरे-धीरे भारत में इंडिया वर्चस्व बढ़ता रहा। इसके उलट यदि भारत के विचारकों ने युवा नागरिकों को भारत के उजले पृष्ठ पढ़ाए होते तो आज स्थिति कुछ और होती। अंग्रेजों के आने तक न तो भारत वैज्ञानिक तौर पर सुप्त था, न ही शिक्षा-दीक्षा के नजरिए और न ही शहरीकरण और आधुनिक तौर पर पिछड़ा था वरन भारत विश्व की तमाम सभ्यताओं के शीर्ष पर था। प्रथम सुव्यवस्थित नगर के प्रमाण भारत में ही मिले हैं। स्त्री-पुरुषों को जिस समान रूप से सम्मान भारत में मिलता रहा है, उतना संभवत: किसी अन्य देश में नहीं मिला। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जितना संरक्षण भारतीय परिवेश में हुआ, उतना शायद और कहीं नहीं। अधिकारों के अधिक यहां मनुष्य को उसके कर्तव्य के पाठ पढ़ाए गए।
    खुले दिल से स्वीकारना होगा कि देश में फैली तमाम बुराइयों पर विजय पाना है तो भारत के महान संस्कार और परंपराओं को बढ़ावा देना ही होगा। भारत के संस्कार और जीवनशैली किसी भी वर्ग को दबा कर आगे बढऩे की नहीं है, हमें यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए। वरन भारतीय जीवन तो सहचार्य, सहकार्य, सहयोग, समभाव और समान आजादी पर आधारित है। इसमें मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं, स्त्री-पुरुष में भी भेद नहीं। भ्रष्टाचार, अनाचार, अपराध पर लगाम कसना है तो नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना ही होगा। भारत को फिर से भारत बनाना ही होगा। निश्चिततौर पर बहुत समय बीत गया है, अब इंडिया का त्याग कर भारत को नाम स्वाभाविक रूप से भारत घोषित कर दिया जाना चाहिए। देश के कई नगरों और राज्यों के नाम हमने समय-समय पर सुधारे हैं। असम,  तिरुअनंतपुरम्, चेन्नई, बेंगलूरू, मुंबई, कोलकाता और ओडिसा सहित अन्य राज्य और कई स्थान अब गौरव के साथ पहचाने जा रहे हैं।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

दामिनी कह गई- अब सोना नहीं

 दु: खद, बेहद दु:खद 2012 का आखिरी शनिवार। दामिनी चली गई। हमेशा के लिए इस बेदर्द दिल्ली से। बेहया दुनिया से, जहां उसे सिर्फ मांस की तरह देखा गया। भेडिय़ों ने नोंचा था, 13 दिन पहले उसका जिस्म। १३ दिन बाद मौत हो गई भारत की अस्मिता की। घनघोर शर्मनाक दिन था 16 दिसंबर, जब भारत के दिल में महज रात 9 बजे, चलती बस में दामिनी की आत्मा का बलात्कार किया ६ हरामखोर भेडिय़ों ने। 17 दिसंबर की सुबह लज्जा से सिकुड़ गया था सारा देश (युवा), जमा हो गया राजपथ पर, इंडियागेट पर और संसद के माथे पर। आक्रोशित, उद्ेलित, बेबस देश अपनी ही सरकार से पूछ रहा था- नारी को पूजने वाले देश में अब नारी कहां सुरक्षित रह गई है? सरकार आखिर करती क्या है? कब तक यूं ही तार-तार होती रहेगी मर्यादा, आजादी और दामिनी?
    शर्मनाक आंकड़ा है- भारत में हर 20 मिनट में एक दामिनी के साथ बलात्कार होता है और हवस का शिकार बनाया जाता है। हर 25 मिनट में किसी न किसी सार्वजनिक जगह, बस, ट्रेन, चौराहा, मॉल, स्कूल-कॉलेज या बाजार में दामिनी को छेड़ा जाता है। उस पर अश्लील फब्तियां कसी जाती हैं। ये इस हद तक अश्लील और अमर्यादित होती हैं कि कई दामिनी घर जाकर जिंदगी ही खत्म कर लेती हैं। वर्ष 2009 में 23 हजार 996, वर्ष 2010 में 25 हजार 215, वर्ष 2011 में 26 हजार 436 और वर्ष 2012 में भी लगभग बीते वर्ष के बराबर दामिनी भूखे जानवरों का ग्रास बनीं। लेकिन, देश अब जागा। देर से ही सही जागा तो सही वरना और देर हो जाती। ये मामले ऐसे हैं, जिनमें चार्जशीट दाखिल हुई। इसके इतर कई मामले तो थाने ही नहीं पहुंच पाते तो कई मामले थाने में ही समझौते के बाद खत्म हो जाते हैं। इतना ही नहीं उक्त मामलों में महज 22 फीसदी बलात्कारियों को ही सजा हुई। जबकि बलात्कार की शिकार प्रत्येक दामिनी रोज सजा पा रही है। जिंदगीभर भेडिय़े की हरकत उसे भीतर ही भीतर खाये जाती है।
    देश इस बार जागा था कि अपराधियों को फांसी से कम सजा पर नहीं मानेगा, चुप नहीं बैठेगा। देश की यह स्व स्फूर्त जाग्रति है। सोशल मीडिया की इसमें अहम भूमिका है। निरुत्तर सरकार देश को जवाब देने की जगह पुलिस को देश पर लाठियां भांजने का हुक्म देती है। लेकिन, इस बार गुस्सा पानी का बुलबुला नहीं था। युवा राजपथ पर डट गए, सह गए पानी की तेज धार। आंसू गैस के गोले क्या रूलाते आंखें तक 16 दिसंबर को ही सूख गईं थी। युवा जोश के सामने बेकार साबित हुए पुलिस के अश्रु गोले। पीठ, पैर और सीने पर लाठी खाकर भी मुंह से उफ नहीं निकली, निकली तो बस एक आवाज- वी वांट जस्टिस। बलात्कारियों को फांसी दो। देश की अस्मित की सुरक्षा की गारंटी दो..... सरकार फिर भी खामोश रही। सोनिया के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी आज भी कायम रही। युवराज हमेशा की तरह लापता थे। मंत्री फितरत के मुताबिक आज भी देश को टरकाने के मूड में दिखा। दिल्ली की महारानी एक बार भी पीडि़त के हाल जानने नहीं पहुंची। सब दूर से निराश युवा इंसाफ की आस लिए नए नवेले राष्ट्रपति प्रणव दा के पास भी गया था लेकिन वहां भी सन्नाटा ही पसरा था। न्याय नहीं मिलता देख आखिर युवा मन उखड़ गया। लेकिन, हारा नहीं। अब तो मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल.... मुंबई यानी सारा देश साथ खड़ा हो गया दामिनी के हक के लिए। आधी आबादी के लिए। सृष्टि के शक्ति केन्द्र के सम्मान में सब दूर आवाज बुलंद हो उठी। जज्बा, उत्साह, उमंग, हौसला, गुस्सा और आक्रोश ऐसा दिखा कि सरकार से आर-पास की लड़ाई हो ही जाए। नारा बुलंद हुआ- कितना दम है दमन में तेरे, देखा है और देखेंगे। गूंजी मांग - जब तक इंसाफ नहीं होता ये आक्रोश ठंडा नहीं पड़ेगा। कानून कड़े बनाए। सुधार लाओ। सुरक्षा पुख्ता करो। बलात्कारियों को फांसी दो। 13 दिन से आक्रोश बरकरार था। अब अलविदा कह गई दामिनी। तो क्या गुस्से को ठंडा होने दिया जाए। सरकार तो यही चाहती है। लेकिन, आज फिर युवा देश ने कह दिया- अभी न्याय बाकी है, गुस्सा बाकी है, लड़ाई जारी है और जारी रहेगी इंसाफ होने तक। 29 दिसंबर को दामिनी चली गई हमें बेशर्म व्यवस्था से अपने अधिकार के लिए लडऩा सिखाकर। उसकी सीख जाया नहीं होने देना है, गुस्सा खत्म नहीं होने देना है। कभी नहीं जागने वाली नींद में जाने से पहले कह गई वो- अब और कोई दामिनी नहीं बननी चाहिए। न्याय चाहिए। मेरे हक में उठे हाथ, आवाज अब खामोश नहीं होने चाहिए। युवा मन में जो उबाल आया है वह ठंडा नहीं होना चाहिए। नींम बेहोशी से जो देश जागा है तो अब सोना नहीं चाहिए।
    इन १३ दिन में राजनीति के पतन का शीर्ष भी दिखा तो हड़बड़ाए नेताओं का मानसिक दिवालियापन भी सामने आया। लोमहर्षक, बीभत्स, नृशंस अपराध के बाद भी नेता जुबान संभालकर बात नहीं कर पाते। प्रणव दा के बेटे अभिजीत कहते हैं कि कैंडल मार्च फैशन हो गया है। दिन में प्रदर्शन, शाम को कैंडल जलाने के बाद ये रंगी-पुती युवतियां पब में मौज उड़ाती हैं। एक महिला नेता कहती है कि जब छह लोगों ने घेर लिया था तो उसे वीरता दिखाने की क्या जरूरत थी, सरेंडर कर देना चाहिए था। महिला अधिकारी की हितैषी एक अन्य महिला कहती है कि इतनी रात फिल्म देखने जाएंगी तो यही होगा। घोर आपत्तिजनक हैं ये बयान। चाय की गुमठी और चौराहे पर पान की पीक थूकते लोग भी शायद इस समय ऐसी बात कर रहे हों। दूसरे नेता कहते हैं कि देश में अराजक स्थितियां हैं। सवाल उठता है कि इन स्थितियों के लिए कौन जिम्मेदार है? कौन संभालेगा देश? एक ने कहा कि माहौल ऐसा है कि मेरी बेटियां भी सुरक्षित नहीं। महोदय यह सफेद झूठ है। आपकी बेटियां जिस दिन असुरक्षित हो जाएंगी तो झट से कड़े कानून आ जाएंगे। तब दरिंदे 13 दिन तक जीवित नहीं रहेंगे। शर्म करो... संसद और विधानसभा में बैठकर काम करने की जगह अश्लील फिल्म देखते हो, दामिनी पर बहस होती है तो खीसें निपोरकर हंसते हो। कुछ काम करो ताकि आम आदमी की बेटी, पत्नी, बहू घर से बिना संकोच निकले, शान से सिर उठाकर सड़क पर चले और बिना किसी अपमानजनक स्थिति का सामना किए खुशी मन से घर लौट सके। कानून में सुधार लाओ। वैज्ञानिक तरीके से सबूत जुटाए जाएं। पुलिस को संवेदनशील बनाओ। गवाहों को सरंक्षण दो। फास्ट ट्रैक कोर्ट पर सुनवाई हो ताकि अपराधी बचकर न निकल सकें। उनमें खौफ पैदा हो। गलत काम की कीमत उन्हें चुकानी पड़े।
    आखिर में लंबी नींद से जागे हुए देश से अपील है। जिंदगी की जंग हारने से पहले दामिनी जगा गई है देश को। 13 दिन देश सोया नहीं, थका नहीं, डरा नहीं सरकार के वार से। इस जज्बे को बनाए रखना होगा वरना फिर किसी चलती बस में, होटल में, पब में या फिर किसी चाहरदीवारी के भीतर तार-तार कर दी जाएगी दामिनी।

रविवार, 23 दिसंबर 2012

ठाकरे पथ के राही प्रभात

 म ध्यप्रदेश में प्रभात झा ने महज ढाई साल में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया और शक्तिशाली भी बनाया। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे अति सक्रिय नेता थे। उनका क्षण-क्षण पार्टी के विस्तार के लिए समर्पित था। पार्टी की जड़ें मजबूत करने में उनका अतुलनीय योगदान है। उन्होंने देश के कई प्रांतों में भाजपा को खड़ा किया। मध्यप्रदेश की राजनीति का सौभाग्य है कि इसे कुशाभाऊ ठाकरे ने सींचा। प्रदेश के इस छोर से उस छोर तक प्रवास किया, कई बार किया। कभी थके नहीं, कभी रुके नहीं, कभी थमे नहीं। छोटे से लेकर बड़े, सभी कार्यकर्ताओं के लिए वे सहज थे। दूसरे दल के नेताओं के लिए भी अनुकरणीय थे। प्रभात झा को ऐसे ही कुशल संगठनकर्ता का सानिध्य मिला। मार्गदर्शन मिला। सार्थक और सकारात्मक काम करने की प्रेरणा मिली। सच के लिए अडऩे और लडऩे का हौसला मिला। कुशाभाऊ ठाकरे के विराट व्यक्तित्व की तुलना प्रभात झा से नहीं की जा सकती लेकिन राजनीति की जिस राह पर प्रभात झा ने कदम रखा है, जिस राह पर वे बढ़ रहे हैं, उस राह पर स्वर्गीय ठाकरे के पग चिह्न हैं। वह राह ठाकरे की राह है। वह सही राह है। सकारात्मक और असली राह है।
    प्रभात झा ने ढाई साल पहले प्रदेशाध्यक्ष बनते ही अपने काम करने के तौर तरीके जाहिर कर दिए थे। मेरे स्वागत-सत्कार में कोई बैनर और होर्डिंग नहीं लगाया जाएगा। कार्यकर्ताओं को यही सबसे पहले निर्देश थे उनकी ओर से। वे जानते हैं, भारतीय जनता पार्टी के पितृपुरुष कभी नहीं चाहते थे कि भाजपा में व्यक्ति पूजा को महत्व दिया जाए। व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिले। यह कैडर आधारित पार्टी है। यहां संगठन और सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, व्यक्ति नहीं। उन्होंने दूसरा जरूरी काम किया कि पार्टी को पार्टी कार्यालय से चलाया, बंगले से नहीं। प्रभात झा से पूर्ववर्ती प्रदेशाध्यक्ष बंगले से ही सारे राजनीतिक कार्यक्रम संचालित करते थे। ऐसे में पार्टी कार्यालय खाली-खाली सा रहता था। प्रभात झा के प्रदेशाध्यक्ष बनने से पार्टी कार्यालय में रौनक बढ़ गई। लगने लगा कि यह सत्तारूढ़ पार्टी का कार्यालय है। प्रदेश के पार्टी कार्यालय में ही प्रदेशभर के कार्यक्रमों की रूपरेखा बनना शुरू हो गई।
    प्रभात झा का व्यक्तित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में भी गढ़ा गया है। वहीं उन्होंने सीखा कि कार्यकर्ता को अपने कार्य से सीख दो, सिर्फ भाषण से नहीं। उन्होंने मंडल-मंडल में प्रवास शुरू कर मंत्रियों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों को नींद से जगाना शुरू किया। उन्होंने सबको साफ शब्दों में कह दिया आपको जो जिम्मेदारी पार्टी ने दी है, जनता ने दी है उसका निर्वहन ठीक ढंग से किया जाए। अपने-अपने क्षेत्र में लोगों से मिलो, संपर्क करो, दौरे करो। कुर्सी मिल गई है तो काम करो वरना कुर्सी जाते देर नहीं लगेगी। एक साधारण से कार्यकर्ता को अहसास कराया कि भाजपा तुम्हारी पार्टी है, तुम्हारे सहयोग के बिना नहीं चल सकती। सेठ-साहूकारों की जगह उन्होंने आम कार्यकर्ता से १०-१० रुपए चंदा एकत्र कराया ताकि कार्यकर्ता में समर्पण का भाव जगे। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे के बाद प्रभात झा ऐसे प्रदेशाध्यक्ष हैं जिन्होंने अपने एक ही कार्यकाल में प्रदेश के लगभग सभी मंडलों में प्रवास किया, एक बार नहीं कई जगह तो कई बार पहुंचे। उनके लगातार संपर्क और अथक मेहनत का ही नतीजा रहा कि भाजपा उनके कार्यकाल में कोई भी उपचुनाव नहीं हारी। कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में भी जीत का परचम पहराया। स्थानीय नगर पालिका और नगर पंचायतों के चुनाव में भी पार्टी को विजय मिली। प्रभात झा ने कभी भी किसी जीत को अपनी या किसी और व्यक्ति विशेष की मेहनत नहीं बताया। उन्होंने हर जीत के बाद यही कहा कि यह जीत पार्टी की जीत है, अनुशासन की जीत है, कार्यकर्ताओं की मेहनत की जीत है। वर्ष २०११ में प्रदेश में कई जगह स्थानीय निकायों के चुनाव चल रहे थे। प्रभात झा प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते सभी जगह पहुंचकर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा रहे थे। शाजापुर नगरपालिका के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी की आर्थिक स्थिति कुछ कमजोर थी। चुनाव खर्च उसके लिए मुश्किल खड़ी कर रहा था। प्रभात झा को इस बात का जैसे ही पता चला, उन्होंने तुरंत मौके पर ही उन्हें अपना एक माह का वेतन उस कार्यकर्ता को चुनाव लडऩे के लिए दे दिया। उनके इस प्रयास का असर बाकी कार्यकर्ताओं पर भी हुआ। शाजापुर नगरपालिका का अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे कार्यकर्ता के चुनाव प्रचार के लिए उसी दिन करीब १२ लाख रुपए जमा हो गए।
    प्रभात झा भाजपा सरकार के श्रेष्ठ पालक साबित हुए। वे उच्चकोटि के पत्रकार रहे हैं। पत्रकारों को क्या खबर चाहिए, बेहतर जानते हैं प्रभात झा। अपने इसी चातुर्य का फायदा उन्होंने मुख्ममंत्री और भाजपा सरकार का संरक्षण करने में किया। वे ढाई साल तक पत्रकारों से लेकर कांग्रेसी नेताओं को अपने मायाजाल में ही उलझाकर रखे रहे। लगातार कांग्रेसी नेताओं पर बयानबाजी कर उन्हें घेरे रखा। उन्हें फुरसत ही नहीं दी कि वे भारतीय जनता पार्टी को सदन या सदन के बाहर घेर सकें। प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अधिक समाचार माध्यमों और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय प्रभात झा हो गए थे। यही कारण है कि प्रदेश में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने उन्हें डेंजर की उपाधि से नवाजा। प्रभात झा का कार्यकाल पूरा होने पर अजय सिंह ने राहत की सांस लेते हुए कहा भी - अहा! हमारा डेंजर चला गया।
    हालांकि प्रभात झा को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलना अप्रत्याशित है। उनके मुताबिक परमाणु विस्फोट जैसा ही है। २०१३ विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। ढाई साल में प्रभात झा ने जो मेहनत की उसकी परीक्षा का समय आ रहा था। प्रभात झा की संगठन पर बढ़ती पकड़ और लोकप्रियता प्रदेश के मुख्यमंत्री को सशंकित करने लगी थी। उस पर भी प्रभात झा मुख्यमंत्री को हटाकर स्वयं प्रदेश के मुखिया बनना चाहते हैं, जैसी अफवाहों से बाजार गर्म था। इन सब कारणों से शिवराज सिंह चौहान प्रभात झा को फिर से भाजपा प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी पर देखना नहीं चाहते थे। वे अपने किसी विश्वस्त सिपहसलार को पार्टी संगठन की कमान सौंपना चाह रहे थे। वे ऐसे किसी चेहरे की तलाश में थे कि उनके सामने नरेन्द्र सिंह तोमर को आगे कर दिया गया। एक सुनियोजित योजना के तहत नरेन्द्र सिंह प्रदेश में अपनी वापसी के लिए प्रयासरत भी थे। आखिर  शिवराज सिंह चौहान का वरदहस्त पाकर नरेन्द्र सिंह तोमर प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं। हालांकि इसके पीछे राजनीति की लंबी कहानी है, जिसके बीज उत्तरप्रदेश के चुनावी संग्राम के समय ही बोए जा चुके थे। इसकी फसल नरेन्द्र सिंह तोमर काटेंगे। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में २०१३ के चुनाव जीतना तय बात है। यह भी तय बात है कि शिवराज सिंह चौहान की मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी होगी। लेकिन, यह बात भी गांठ बांध ली जाए कि शिवराज सिंह चौहान अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई और ही सुशोभित होगा। शिवराज सिंह चौहान जिस नरेन्द्र सिंह तोमर को अपना हितैषी और खास समझ रहे हैं तो उन्हें करीब तीन साल पुराना घटनाक्रम याद करना होगा। ये वही ठाकुर नरेन्द्र सिंह तोमर हैं जो शिवराज सिंह चौहान को ओबीसी कैटेगिरी का ठाकुर समझते हैं। उन्हें अपने से कमतर आंकते हैं। ये वही नरेन्द्र सिंह तोमर हैं जिन्होंने ग्वालियर में स्थापित महाराजा मानसिंह प्रतिमा को इसलिए दूध से धुलवा दिया था क्योंकि उसका अनावरण पिछड़ा वर्ग के शिवराज सिंह चौहान ने किया था। खैर, राजनीति में कब अपने पराए हो जाते हैं और पराए अपने, कहा नहीं जा सकता। फिलहाल तो यही कहना होगा कि भाजपा तमाम खामियों के बाद भी सच्ची लोकतांत्रिक पार्टी है। यही कारण है कि एक ऐसा आदमी जो स्वदेश के दफ्तर में जिस टेबल पर अपनी खबर लिखता था, रात में उसी टेबल पर सो जाता था, भारतीय राजनीति में उत्तरोत्तर सोपान चढ़ रहा है। प्रभात झा ने सिद्धांत, मूल्यपरक और स्वस्थ राजनीति की जो लकीर खींची है, उम्मीद है भाजपा उस पर आगे बढ़े। प्रभात झा ने यही किया, भाजपा को कांग्रेस संस्कृति से बाहर निकालकर सादगी, शुचिता और मूल्यों की राजनीति की धारा में लाए। 
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