शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

श्रीगणेश की दिव्य प्रतिमा, निरंतर बढ़ रहा आकार

अमरकंटक दर्शन : पुष्पराजगढ़ के जंगलों में कलचुरीकालीन भगवान श्रीगणेश की ऐतिहासिक प्रतिमा, इन्हें बटुक गणेश भी कहते हैं


अनूपपुर के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम धरहर कला में स्थापित प्राचीन एवं दिव्य श्रीगणेश प्रतिमा

अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के अंतर्गत ग्राम धरहरकला में भगवान श्रीगणेश की दिव्य एवं प्राचीन प्रतिमा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। इस स्थान को बहगड़नाला भी कहते हैं। अमरकंटक स्थित माँ नर्मदा मंदिर से उत्तर दिशा की ओर लगभग 35 किलोमीटर और पुष्पराजगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्रीगणेश की इस प्रतिमा को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा होने के साथ-साथ कौतुहल भी है। कहते हैं कि प्रतिवर्ष तिल-तिल करके प्रतिमा का आकार बढ़ रहा है। वर्तमान में प्रतिमा का आकार लगभग 8 फीट है। हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। लेकिन लोगों की श्रद्धा है। इस संदर्भ में यह भी जनश्रुति है कि जब प्रतिमा प्रकट हुई थी, तब इसका आकार केवल एक फीट था। इन्हीं जनश्रुतियों के कारण घने जंगल में, एकांत में विराजे धरहरकला भगवान श्रीगणेश की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर यहाँ तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है। श्रीगणेशोत्सव के दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए आते हैं। अमरकंटक में सदानीरा माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण भी श्रीगणेश के दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकंटक में माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल भक्तों को तभी मिलता है, जब धरहरकला आकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। इन्हीं कारणों से अमरकंटक आने वाले और वहाँ से लौटने वाले श्रद्धालु धरहर कला पहुंचकर श्री गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं।

धरहर में स्थापित श्रीगणेश प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग मानी जाती है। दक्षिण मुखी कलचुरी कालीन यह प्रतिमा दुनिया भर मे पाई जाने वाली सामान्य चतुर्भुज श्रीगणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देते हैं। बालस्वरूप होने के कारण यह प्रतिमा द्विभुज है, जिसके बाएं हाथ में एक पात्र है। प्रतिमा में श्रीगणेश को जनेऊ धारण किए हुए दिखाया गया है।  धार्मिक विषयों के जानकार इस स्वरूप को सनातन परंपरा में उपनयन संस्कार के बाद बटुक को शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजे जाने की परंपरा से जोड़कर देखते हैं। इसलिए इन्हे बटुक गणेश भी कहा जाता है।

दर्शन करें : अमरकंटक के जंगलों में करें फरस विनायक के दर्शन

श्रीगणेश मंदिर का यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। ऊंचे वृक्ष, हरे-भरे पहाड़, पक्षिओं का कलरव और सघन वन क्षेत्र की नैसर्गिक सुंदरता के कारण यहाँ आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। जब हम यहाँ पहुँचे तो किसी स्कूल के बच्चे पिकनिक के लिए यहाँ आए हुए थे। छोटे बच्चों की चहल-पहल ने शांत वातावरण में सुर-लहरियाँ उत्पन्न कर दी थीं। यहाँ मिले साधु-संन्यासी ने बताया कि भगवान शिव की तपस्या के लिए माता पार्वती इसी स्थान पर आई थीं। यहाँ एक बने एक कुण्ड और गुफा माता पार्वती के नाम पर है- गौरी कुण्ड और गौरी गुफा। गौरी कुण्ड में सदैव शीतल जल रहता है। श्रद्धालु भगवान श्रीगणेश की पूजा में इसी कुण्ड के जल का उपयोग करते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब इस स्थान को खोजा गया था, तब भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा खुले स्थान पर थी। बाद में, श्रद्धालुओं ने मंदिर का निर्माण कराया। प्राचीन प्रतिमा की सुरक्षा हो और अपने भगवान को छत मिल जाए, संभवत: यह विचार करके ही श्रद्धालुओं और ग्रामवासियों ने मंदिर बनाया था। 

श्रीगणेश मंदिर के पास ही एक प्राचीन खंडित मंदिर ने मुझे आकर्षित किया। गणेश जी के दर्शन कर मैं उस ओर बढ़ा। देखा तो पाया कि वह एक खंडित शिव मंदिर था, जो किसी समय में शिव भक्तों ने बनाया होगा। निश्चित ही यह घना और वीरान जंगल में शिव की साधना करने वाले साधु-संतों का तपस्थली रहा होगा। इसके साथ ही यहाँ ब्रह्मा और विष्णु की प्राचीन मूर्तियों भी मिली हैं। यह सब प्रतिमाएं कल्चुरीकालीन बताई जाती हैं। अमरकंटक के रंगमहला (प्राचीन मंदिर समूह परिसर) में बने शिव मंदिरों से इसका वास्तु मिलता है। चूँकि रंगमहला के मंदिर कल्चुरीकालीन हैं, इसलिए यह भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भी उसी काल में बनाया गया होगा। इसके निकट ही गौरी कुण्ड तथा गौरी गुफा है। गौरीगुफा का द्वार शिवदाबा (शिव पहाड़ी) में जाकर खुलता है। 

धरहर कला के भगवान श्रीगणेश की इस दिव्य प्रतिमा का दर्शन करके जब हम लौट रहे थे, तो मन में सुखद अनुभूति थी। एक सात्विक ऊर्जा का अनुभव हो रहा था।

देखें : अमरकंटक का प्रसिद्ध एवं प्राचीन मंदिर समूह- रंगमहला

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