भारतीय सिनेमाई परिदृश्य में जब भी किसी फिल्म की सफलता का आकलन होता है, तो अमूमन भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारे और आक्रामक प्रचार तंत्र का उल्लेख किया जाता है। बड़े प्रोडक्शन हाउस अक्सर औसत दर्जे की कहानियों को भी पीआर रणनीतियों और मल्टी-सिटी टूर के शोर में ‘ब्लॉकबस्टर’ का चोगा पहनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन नीम करोली बाबा के जीवन और दर्शन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने स्थापित व्यावसायिक नैरेटिव्स को ध्वस्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि जब कथ्य में आत्मीयता, सांस्कृतिक जुड़ाव और सादगी हो, तो समाज उसे न केवल स्वीकारता है, बल्कि सिर-आंखों पर बिठाता है। रिलीज के सातवें सप्ताह और 47वें दिन के बाद भी सिनेमाघरों में दर्शकों की बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह कोई क्षणिक कौतूहल नहीं, बल्कि भारतीय दर्शकों के अंतर्मन का सच्चा प्रकटीकरण है।
केवल दो करोड़ रुपये के सीमित बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने देश-विदेश मिलाकर 366 करोड़ रुपये से अधिक का धन संग्रह कर 13 हजार प्रतिशत से अधिक का लाभ कमाया है। जिस दौर में बड़े सितारों एवं बड़े प्रोडक्शन हाउस की फिल्में एक सप्ताह में पर्दे से उतर जा रही हों, तब अनाम कलाकारों के अभिनय से सजी, सार्थक संदेश देने वाली यह फिल्म हर दिन एक नया कीर्तिमान रच रही है। इसी मंगलवार (22 सितंबर) को ही सोमवार के मुकाबले 18 प्रतिशत से अधिक का उछाल और शो की संख्या का 7,700 के पार पहुंच जाना, भारतीय बॉक्स ऑफिस के इतिहास की दुर्लभतम घटनाओं में से एक है।
हनुमान अंश की इस अभूतपूर्व सफलता का सबसे उजला पक्ष इसका प्रचार तंत्र रहा। निर्माताओं ने किसी भारी-भरकम बजट के आक्रामक प्रचार का सहारा नहीं लिया; फिल्म के वास्तविक प्रचारक खुद आम दर्शक बने। दर्शक जब भाव-विभोर होकर थियेटर से बाहर निकले, तो उन्होंने ‘माउथ पब्लिसिटी’ के जरिए इस फिल्म को घर-घर पहुंचा दिया। फिल्म का सुरीला, अर्थपूर्ण गीत-संगीत जनमानस की जुबान पर चढ़ गया। यह इस बात का स्पष्ट संदेश है कि भारतीय समाज आज भी अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से बेहद मजबूती से जुड़ा हुआ है। यह बात अन्य फिल्म निर्माता जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा।
कहना होगा कि ‘हनुमान अंश’ की सफलता ने पूरे फिल्म उद्योग को आईना दिखाया है। अब तक मुख्यधारा का सिनेमा जिस आस्था और अध्यात्म को हाशिए पर रखता आया था, वही आज मुख्यधारा का केंद्र बनने जा रहा है। इस फिल्म की गूंज का ही परिणाम है कि ‘रामायण’, ‘चिरंजीवी हनुमान’, ‘महा अवतार परशुराम’, ‘श्रीमद् भागवतम’ और संत प्रेमानंद महाराज पर केंद्रित ‘राधा अंश’ जैसी कृतियों पर काम तेज हो गया है। छठी मैया, साईं बाबा, खाटूश्याम और महाकाली पर बनने वाली आगामी फिल्में यह दर्शाती हैं कि भक्ति और सांस्कृतिक सिनेमा अब कोई उप-धारा नहीं, बल्कि एक सशक्त सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बन रहा है।
फिल्मकारों के लिए ‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी सीख यही है कि भारत की कहानी को भारत के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए। जब तक सिनेमा आयातित विचारों और सतही चमक-दमक के सहारे अपनी ही संस्कृति से विमुख होकर रचा जाएगा, वह जनसाधारण के दिल तक नहीं पहुंच सकता। ‘हनुमान अंश’ ने यह भरोसा लौटाया है कि सच्चाई और निष्ठा से गढ़ी गई एक छोटी सी कहानी भी बड़े-बड़े मिथकों को तोड़कर इतिहास रच सकती है। भारतीय सिनेमा के लिए यह समय अपनी जड़ों की ओर लौटने का है।


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