रविवार, 13 सितंबर 2026

हिन्दी समाचारपत्र में अंग्रेजी शब्दों पर ‘लाल गोले’ लगाकर संपादक के पास पहुँच गए थे सुदर्शन जी

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन स्वभाषा के प्रबल पक्षधर थे, हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट वे पसंद नहीं करते थे


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन भाषा की शुद्धता और व्याकरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्तनी एवं व्याकरण की अशुद्धियों को वे कतई नजरअंदाज नहीं करते थे। भले ही उनकी अपनी मातृभाषा तमिल थी, लेकिन जन्मभूमि एवं कर्मभूमि हिन्दी भाषी क्षेत्र रहा। शायद इसलिए ही हिन्दी से उन्हें गहरा प्रेम था। हालांकि, सुदर्शनजी लगभग 12 भाषाओं पर अधिकार रखते थे। परिवार तमिल था लेकिन पूर्वज वर्षों पहले तमिलनाडु से स्थानांतरित होकर कर्नाटक में बस गए थे इसलिए कन्नड़ ही उनके परिवार की मुख्य भाषा बन गई थी। भाषा प्रेम को लेकर सुदर्शन जी के अनेक प्रेरक प्रसंग प्रचलित हैं। ऐसा ही एक किस्सा भोपाल का है, जब वे सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होकर ‘एक साधारण स्वयंसेवक’ की भाँति रह रहे थे। हिन्दी के हृदय प्रदेश, ‘मध्यप्रदेश’ से प्रकाशित हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में जब उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों की भरमार देखी, तो उन्हें क्षोभ हुआ। समाचारपत्र अपनी प्रतिष्ठा तो इस नाते करता है कि वह हिन्दी का सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रसारित समाचार पत्र है लेकिन हिन्दी भाषा के साथ न्याय नहीं करता है। उन्होंने लाल कलम से भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी के शब्दों पर गोले लगाए। उस रंगे-पुते समाचारपत्र को लेकर संपादक के कक्ष में भी पहुँच गए। सुदर्शनजी ने समाचारपत्र की वह प्रति संपादक की मेज पर रखकर उन्हें हिन्दी में अनावश्यक अंग्रेजी मिलावट के प्रति सचेत किया। यह बातचीत आक्रोश या अभिमान के साथ नहीं हो रही थी, बल्कि उसमें अपनत्व था। संपादक ने भी स्वीकार किया और विश्वास दिलाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों की मिलावट और वर्तनी की अशुद्धियों के प्रति सावधान रहेंगे। 

समाचारपत्र समाज को दिशा देने और भाषा का मानक तय करने का माध्यम होता है। यह प्रदेश उन किस्सों का भी साक्षी है, जब समाचारपत्र को पढ़कर लोग अपनी हिन्दी सुधारते और समृद्ध करते थे। इसलिए सुदर्शनजी की यह चिंता उचित ही थी कि यदि समाचारपत्र ही इस तरह की भाषाई और व्याकरण की गलतियाँ करेगा, तो नई पीढ़ी सही भाषा कैसे सीखेगी? एक बात यहाँ स्मरण रखें कि वे अंग्रेजी के विरोधी नहीं थे, केवल स्वदेशी, स्वभाषा और शुद्ध भाषा के आग्रही थे। सुदर्शनजी अंग्रेजी में भी धाराप्रवाह भाषण करते थे। लेकिन जब हिन्दी बोलते थे तब गलती से भी उनके बोलने में अंग्रेजी का शब्द नहीं आता था। मराठी, कन्नड़, तमिल, असमी, बंगाली, उड़िया भी वे धाराप्रवाह बोलते थे। नयी भाषा सीखने में उनका मुकाबला शायद ही कोई कर पाता। एक और बात याद रखें कि वे शुद्धता के आग्रही तो थे लेकिन कठिनता के आग्रही कतई नहीं थे। सुदर्शनजी क्लिष्ट या कठिन हिन्दी के बजाय ऐसी सहज और सरल हिन्दी के पक्षधर थे, जिसे देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग आसानी से समझ सकें। वे भाषा में शुद्धतावाद से ज्यादा उसकी पहुँच को महत्व देते थे।

आरएसएस के पांचवे सरसंघचालक केएस सुदर्शन जी

हम देख रहे हैं कि अंग्रेजी ने हमारी भाषाओं में किस प्रकार घुसपैठ कर ली है। कई बार तो प्रयासपूर्वक भी किसी अंग्रेजी शब्द का हिन्दी विकल्प दिखाई नहीं देता है। लेकिन, सुदर्शन जी ऐसी स्थिति में आखिरी क्षण तक प्रयास करते थे। संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रो. सदानंद सप्रे एक घटना को याद करते हैं, जो बताती है कि अंग्रेजी शब्द के सही विकल्प के लिए उनका प्रयास किस स्तर का रहता था। प्रो. सप्रे कहते हैं- “एक बार मैं एक अंग्रेजी शब्द का सही हिंदी अनुवाद खोज रहा था, परंतु वह नहीं मिल रहा था। इसलिए सुबह लगभग 11:00 बजे मैं सुदर्शन जी के पास गया और उनसे सहायता मांगी। उन्होंने कुछ शब्दकोशों में खोजा, परंतु उन्हें सही शब्द न मिला। चूँकि इसमें काफी समय लग रहा था, तो मैंने सुझाव दिया कि चलो, मैं एक शब्द का प्रयोग कर सकता हूँ, जो सही अनुवाद न भी हो, मगर लगभग उसके नजदीक होगा। चूँकि वे सही शब्द की तलाश में निमग्न थे इसलिए उन्होंने जोर दिया कि मुझे रुकना चाहिए। अब तक मैं परेशान होने लगा था, क्योंकि मुझे कहीं जाना था। मैंने उन्हें कहा कि मुझे कहीं बाहर जाना है। तब उन्होंने कहा कि आप चले जाओ और हम इसके बारे में बाद में कुछ-न-कुछ कर लेंगे। मैंने सोचा कि अब मामला समाप्त हो गया और मैं उसके बाद में भूल गया। उसी दिन दोपहर में लगभग 3:00 बजे मुझे एक फोन आया कि मैं उनसे जाकर मिलूँ। जब मैं वहाँ पहुँचा तो उन्होंने बड़े खुश होकर मुझे बताया कि मुझे सटीक हिन्दी शब्द मिल गया है, जिसकी आपको तलाश थी। तब उन्होंने एक नया शब्दकोश खोला और मुझे वह शब्द दिखाया। उनकी दिनचर्या के अनुसार दोपहर का यह समय उनके आराम के लिए नियत रहता था। मुझे बहुत दु:ख हुआ कि मेरे लिए शब्द ढूंढ़ने के चक्कर में आज वे आराम नहीं कर पाए थे। परंतु, उन्होंने सरलता से मुस्कुराते हुए मुझे कहा कि आप चिंता न करें, मुझे खुशी है कि कम से कम वह शब्द तो मिल गया, जिसकी आपको आवश्यकता थी”। 

हिन्दी के प्रति सुदर्शनजी के प्रेम की अनुभूति करने के लिए एक और प्रसंग से होकर गुजरना आनंददायक रहेगा। तिब्बत के विषय में सुदर्शनजी की गहरी रुचि थी। श्रीगुरुजी के जन्मशताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 2006 में उन्होंने तिब्बतियों के धार्मिक गुरु दलाई लामा से हिमाचल प्रदेश जाकर भेंट की। विजयादशमी के उत्सव में तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि के रूप में नागपुर आमंत्रित किया। तिब्बत के समर्थकों के साथ उनका आत्मीय जुड़ाव था। एक बार भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री प्रो. सामधोंग रिनपोच मुख्य वक्ता के रूप में आए थे। सुदर्शनजी भी उनको सुनने पहुँचे थे। दोनों मित्र थे। इसलिए भाषण के पूर्व उन्होंने रिनपोच से पूछा कि आप अंग्रेजी में बोलेंगे या हिन्दी में? प्रधानमंत्री रिनपोच ने कहा कि वे सोच रहे हैं कि अंग्रेजी में बोलें। तब सुदर्शनजी ने कहा कि मुझे मालूम है कि आप अच्छी हिन्दी बोलते हैं। इसलिए मैं चाहूँगा कि आप अपना भाषण हिन्दी में दें। आप हिन्दी में बोलेंगे तो यहाँ सबको अच्छा लगेगा। प्रधानमंत्री रिनपोच ने सुदर्शनजी के आग्रह को स्वीकार किया और हिन्दी में बोलना शुरू किया, जिस पर श्रोताओं ने करतल ध्वनि से उनका हार्दिक स्वागत किया। 

सुदर्शनजी को जब भी अवसर मिलता वे हिन्दी के विस्तार के लिए प्रयास करते। हिन्दी को वे भारत की संपर्क भाषा के तौर पर देखते थे। इसलिए वे चाहते थे कि अंग्रेजी की बजाय हम हिन्दी को आगे बढ़ाएं। गैर-हिन्दी भाषी होकर भी उन्होंने हिन्दी के विस्तार में अपना योगदान दिया।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : ‘रज्जू भैया’ को न्यूक्लियर फिजिक्स पर शोध के लिए अपने साथ लेकर जाना चाहते थे नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सीवी रमन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ के बारे में कहा जाता है कि यदि वे संघ के प्रचारक नहीं होते तो निश्चित ही देश के महान वैज्ञानिक होते। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती है अपितु इसके पीछे ठोस आधार है। रज्जू भैया की वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचान कर ही भारत के महान वैज्ञानिक एवं भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (सीवी रमन) उन्हें अपने साथ न्यूक्लियर फिजिक्स में शोध कार्य के लिए बेंगलूरु ले जाना चाहते थे। जब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा भारत के उभरते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए देश के शीर्ष भौतिकशास्त्रियों को जोड़ रहे थे, तब भी सर सीवी रमन ने उन्हें रज्जू भैया का नाम सुझाया था। डॉ. भाभा ने भी रज्जू भैया से अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ जुड़ने का आग्रह किया। परंतु, रज्जू भैया तो पहले ही भौतिक वैज्ञानिक नहीं अपितु समाज वैज्ञानिक बनने का विचार पक्का कर चुके थे। प्रसिद्ध लेखक देवेन्द्र स्वरूप और बृजकिशोर शर्मा द्वारा लिखित रज्जू भैया की जीवनी ‘हमारे रज्जू भैया’ में उल्लेख आता है कि मुंबई प्रवास के दौरान जब डॉ. होमी भाभा की भेंट श्री गुरुजी से हुई, तो उन्होंने यह उलाहना देते हुए कहा था- “गुरुजी, आपके कारण भारत ने एक शीर्ष न्यूक्लियर फिजिसिस्ट (परमाणु वैज्ञानिक) खो दिया”। इस पर श्री गुरुजी ने सहज भाव से उत्तर दिया था- “डॉ. भाभा, रज्जू भैया ने वैज्ञानिक बनना नहीं छोड़ा है; अंतर केवल इतना है कि वह अब भौतिक प्रयोगशाला के बजाय ‘समाज की प्रयोगशाला’ में मनुष्यों को गढ़ने का वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं”।

आरंभ से ही रज्जू भैया की रुचि विज्ञान में थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन्होंने भौतिकी का अध्ययन किया। कठिन से कठिन वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने की उनकी क्षमता और प्रयोगों के प्रति उनकी गहरी रुचि उन्हें अपने सहपाठियों से अलग करती थी। उनके लिए भौतिकी केवल पाठ्यक्रम का विषय नहीं थी। वह प्रकृति के रहस्यों को समझने की एक भाषा थी। प्रकाश, ध्वनि, पदार्थ और ऊर्जा के पीछे छिपे नियम उन्हें आकर्षित करते थे। विज्ञान की यही जिज्ञासु दृष्टि आगे चलकर उनके अध्यापन की सबसे बड़ी शक्ति बनी। 

एमएससी की पढ़ाई पूरी करते समय उनके सामने वह अवसर आया, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। उनकी प्रायोगिक परीक्षा का दिन था। उन्होंने सीवी रमन प्रभाव पर भी अपना प्रयोग किया था। संयोग से उनका मूल्यांकन करने के लिए बाह्य परीक्षक के रूप में स्वयं सर सीवी रमन आए थे। उल्लेखनीय है कि रमन तब केवल भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक नहीं थे अपितु प्रकाश के प्रकीर्णन पर उनके ऐतिहासिक अनुसंधान ने उन्हें विश्व-विज्ञान के शिखर पर पहुँचा दिया था। 1930 में उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। उनके सामने परीक्षा देना किसी युवा विद्यार्थी के लिए असाधारण अनुभव रहा होगा। 

रज्जू भैया ने अपने प्रयोग सफलतापूर्वक करके दिखाए और तर्क सहित उत्तर दिए। सर रमन ने रज्जू भैया के उत्तरों और प्रयोगात्मक समझ को ध्यान से परखा। उनके भीतर उन्हें केवल पाठ्यक्रम याद कर लेने वाला विद्यार्थी नहीं, बल्कि तर्क करने, प्रश्न पूछने और वैज्ञानिक ढंग से सोचने वाला मस्तिष्क दिखाई दिया। रज्जू भैया की प्रतिभा से प्रभावित सर सीवी रमन ने उन्हें न्यूक्लियर फिजिक्स में शोध के लिए अपने साथ जुड़ने का अवसर दिया। इस प्रायोगिक परीक्षा के बाद रज्जू भैया के हाथ में बेंगलुरु स्थित सर रमन की प्रयोगशाला में काम करने का प्रस्ताव था। परमाणु भौतिकी जैसे उभरते हुए क्षेत्र में सीवी रमन के साथ काम करने का यह अवसर किसी युवा वैज्ञानिक के लिए किसी सपने से कम नहीं था। 

लेकिन राजेन्द्र सिंह के जीवन की दिशा कुछ और थी। रज्जू भैया ने बेंगलुरु जाने के बजाय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही अपने शैक्षणिक जीवन को आगे बढ़ाने का निर्णय किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भारत के शीर्ष वैज्ञानिक एवं अपने गुरु डॉ. केएस कृष्णन (जो सर सी.वी. रमन के निकट सहयोगी थे) के मार्गदर्शन में स्पेक्ट्रोस्कोपी और न्यूक्लियर फिजिक्स पर कार्य किया। इसके साथ ही वहीं अध्यापन कार्य से जुड़ गए। अध्यापन करते हुए वे संघ कार्य के लिए समय दे पाते थे।

जीव विज्ञान छोड़कर भौतिकी को क्यों चुना :

विज्ञान के अध्ययन की गहरी ललक के साथ-साथ उनके भीतर एक अत्यंत कोमल एवं संवेदनशील हृदय भी था। मसूरी के एक स्थानीय स्कूल में नौवीं कक्षा के दौरान जब वे जीव विज्ञान का अध्ययन कर रहे थे, तब मेढ़क के विच्छेदन (चीरा लगाने) से उनका मन व्यथित हो उठा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपने पिता से कहा कि वे परीक्षण हेतु मेढ़क को मूर्च्छित तो कर सकते हैं, किंतु उसे चीरा नहीं लगा सकते। इस संवेदना ने उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र से मोड़कर भौतिक और गणितीय विज्ञान के गहन अनुसंधान की ओर अग्रसर कर दिया।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 06 सितंबर, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष'

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

समर्पण और सादगी के प्रतीक: प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया संघ में आने से पहले 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हुए थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालकों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य ‘रज्जू भैया’ की चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में घोषणा की। देवरस जी का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था। संघ कार्य के लिए प्रवास करना कठिन हो गया था। संघ कार्य की गति रुके नहीं, इसलिए उन्होंने सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया। 11 मार्च, 1994 का दिन है, जब बालासाहब देवरस जी ने रज्जू भैया को संघ का नेतृत्व सौंपा था। उस दिन नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार सभागार में संघ की निर्णायक सर्वोच्च इकाई ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक चल रही थी। देशभर से लगभग एक हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे और सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि संघ कार्य का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत कर रहे थे। ठीक उसी समय, सरसंघचालक बालासाहब व्हीलचेयर से बैठक में आते हैं। उन्होंने अत्यंत शांत और भावुक वातावरण में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “पूजनीय गुरुजी ने मुझ पर यह जिम्मेदारी 1973 में सौंपी थी। आप सबके सहयोग और समर्थन से मैं अब तक उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा पाया, लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण मेरे लिए अब यात्रा करना संभव नहीं रह गया है। इस कारण सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ परामर्श के बाद मैंने यह निर्णय लिया है कि यह जिम्मेदारी अब प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) अपने कंधों पर लें। मुझे पूरा भरोसा है कि रज्जू भैया को भी इसी प्रकार का सहयोग और समर्थन मिलता रहेगा। मैं भी एक स्वयंसेवक की भाँति अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहूँगा”। सुबह ठीक 10:40 बजे बालासाहब देवरस जी ने पुष्प गुच्छ और नारियल भेंट कर रज्जू भैया को संघ के चतुर्थ सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। 72 वर्ष की उम्र में सरसंघचालक बने रज्जू भैया ने 1994 से 2000 तक, अर्थात् 6 वर्ष इस दायित्व का निर्वहन किया। 

इस अवसर पर सरसंघचालक के रूप में रज्जू भैया ने संक्षिप्त उद्बोधन दिया। अपने इस भाषण में उन्होंने संघ में अपनी नयी भूमिका और जिम्मेदारी को निभाने के लिए सबसे सहयोग और समर्थन की अपेक्षा की। उल्लेखनीय है कि रज्जू भैया संघ के इतिहास में पहले ऐसे सरसंघचालक थे, जिन्होंने संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के साथ प्रत्यक्ष रूप से कार्य नहीं किया था। जबकि उनसे पहले सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी के लिए तो कहा जाता था कि ‘जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें’। वहीं, श्रीगुरुजी ने भी आद्यसरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के साथ लंबे समय तक काम किया और द्वितीय सरसंघचालक के रूप में उनके नाम की घोषणा भी स्वयं डॉक्टरजी ने की। वर्ष 1940 में डॉक्टरजी का निधन हुआ। वर्ष 1942 में रज्जू भैया संघ के संपर्क में आए। यहाँ उल्लेखनीय है कि संघ में प्रवेश से पूर्व रज्जू भैया ने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया था। इस दौरान बड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ उनका संपर्क आया, जो जीवनभर बना रहा।

बापूराव मोघे से प्रभावित होकर संघ से जुड़े :

एमएससी की पढ़ाई के दौरान रज्जू भैया अपने सहपाठी श्यामनारायण श्रीवास्तव और पड़ोसी छात्र शांताराम के माध्यम से प्रयाग के विभाग प्रचारक बापूराव मोघे के संपर्क में आए। मोघे जी के व्यक्तित्व, उनकी तार्किक शैली और संघ के सिद्धांतों की स्पष्ट व्याख्या ने रज्जू भैया को अत्यंत प्रभावित किया। रज्जू भैया ने अपने घर के पास लगने वाली शाखा में नियमित जाना प्रारंभ कर दिया।

रज्जू भैया के मन में राष्ट्रीयता और गांधीवादी साहित्य से उपजे जो भी प्रश्न व संशय थे, उनका समाधान बापूराव मोघे जी ने किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूलभूत सिद्धांतों को समझने के लिए उन्होंने मोघे जी के सुझाव पर कई पुस्तकों का अध्ययन किया, जिनमें प्रमुख हैं– डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी की ‘फंडामेंटल यूनिटी ऑफ इंडिया’, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल की ‘भारत की एकता के आधारभूत सिद्धांत’, सखाराम गणेश देउस्कर की ‘देश की बात’ और स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की ‘हिंदू पदपादशाही’। इन पुस्तकों के अध्ययन से उनके मन के सारे संशय दूर हो गए और उन्हें दृढ़ विश्वास हुआ कि उनका जीवन राष्ट्र और समाज सेवा के लिए ही समर्पित होना चाहिए।

पहले बने सरकार्यवाह फिर सह–सरकार्यवाह :

रज्जू भैया की संगठन क्षमता को देखकर उन्हें वर्ष 1977 में सह–सरकार्यवाह बनाया गया। एक वर्ष बाद ही उन्हें सरकार्यवाह की जिम्मेदारी सौंप दी गई। सरकार्यवाह के रूप में रज्जू भैया ने 9 वर्ष तक कार्य किया। देशभर में प्रवास कर संगठन के कार्य को मजबूत किया। स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने 1987 में सरकार्यवाह का दायित्व छोड़ दिया और नये सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि के सहयोगी के रूप में सह–सरकार्यवाह बनकर संघकार्य किया। उन्होंने स्वयंसेवकों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया– प्रत्येक भूमिका में रहकर संघकार्य करना है। 

भारत के बाहर प्रवास पर जाने वाले पहले सरसंघचालक : 

देशभर में संघकार्य का विस्तार हो, काम की व्यापकता बढ़े और वह सुदृढ़ हो– इसके लिए अधिकारियों के प्रवास की व्यवस्था है। सभी सरसंघचालकों ने संघ कार्य के विस्तार के लिए देशभर में व्यापक प्रवास किए थे। श्रीगुरुजी के लिए तो कहा जाता था कि उनका दूसरा घर रेलगाड़ी है। स्वास्थ्य से संबंधित चुनौतियों का सामना करते हुए रज्जू भैया ने भी खूब प्रवास किए। रज्जू भैया ऐसे सरसंघचालक भी बने, जिन्होंने भारत के बाहर भी प्रवास किए। उनसे पहले कोई भी सरसंघचालक विदेश यात्रा पर नहीं गए थे। परंतु रज्जू भैया ने उन देशों में प्रवास किया, जहाँ भारत से गए स्वयंसेवक ‘हिन्दू स्वयंसेवक संघ’ के बैनर तले काम कर रहे थे। उन्होंने अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, अफ्रीका और दक्षिण–पूर्व एशिया में हिन्दू समाज के बंधुओं के साथ संवाद किया। उन्होंने लगभग 40 देशों की व्यापक यात्राएँ कीं। जापान की उनकी अंतिम विदेश यात्रा का उद्देश्य हिन्दू और बौद्ध परंपराओं के बीच संबंधों को मजबूत करना था, और तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में उनके संभावित वैश्विक महत्व को रेखांकित करना था।

प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ (1993-2000) : 

  • रज्जू भैया का जन्म 1922 में हुआ। उनके पिताजी श्री कुंवर बलवीर सिंह उत्तर प्रदेश शासन के सिंचाई विभाग में अभियन्ता थे। 
  • उनकी प्राथमिक पढ़ाई नैनीताल में हुई। बाद की शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। केवल 21 वर्ष की आयु में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र में एम.एस.सी. की पदवी प्राप्त की। पूरे विश्वविद्यालय में उनका द्वितीय क्रमांक था। तुरन्त ही वे विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त किए गए।
  • नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक डॉ. सीवी रमन एमएससी अन्तिम वर्ष की परीक्षा लेने प्रयाग आये तो वे रज्जू भैया की प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें बंगलूरू चलकर अपने साथ शोध कार्य में सहायक बनने का निमंत्रण दिया।
  • उत्तर प्रदेश में संघ कार्य की बढ़ती आवश्यकता को देखकर सन् 1966 में रज्जू भैया ने स्वेच्छा से भौतिक शास्त्र विभागाध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया और वे संघ के प्रचारक बने। 
  • आपने स्वास्थ्य कारणों से अपने दायित्व को छोड़ते हुए 10 मार्च, 2000 को नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री के.एस. सुदर्शन की सरसंघचालक के नाते घोषणा की।
  • 14 जुलाई, 2003 को रज्जू भैया जी का पुणे में स्वर्गवास हो गया।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 30 अगस्त, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ 'साधना के सौ वर्ष'

प्रधानमंत्री मोदी का युवाओं से जुड़ाव

राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को भांपकर अपनी रणनीति ढाल लेना ही किसी राजनेता की सबसे बड़ी ताकत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार अपनी ऊर्जावान सक्रियता और अप्रत्याशित पहलकदमी से चौंकाते हैं। वडोदरा में ‘जेन-जी’ के छह हजार युवाओं के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी महज एक सरकारी या औपचारिक संवाद नहीं थी, बल्कि यह बदलते भारत की नब्ज पर हाथ रखने की एक सोची-समझी राजनीतिक और विकासात्मक कवायद थी। मंच पर क्वीन का कालजयी गीत ‘वी विल रॉक यू’ और ‘आरी आरी’ की गूंज के बीच वाई-आकार के रैंप पर चलकर युवाओं के करीब पहुंचना यह साबित करता है कि वे आज की युवा संस्कृति और उनके तेवर को बखूबी समझते हैं।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

‘तत्त्वमसि’: संघ दर्शन और प्रचारक जीवन की कथा-यात्रा

देखें यह वीडियो : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रचारक जीवन, संघ से जुड़े प्रश्नों एवं दृष्टिकोण पर केन्द्रित वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराडकर जी का उपन्यास


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष एवं प्रतिपक्ष में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन ‘तत्त्वमसि’ मुझे बाकी सब पुस्तकों से अलग लगती है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसका कथानक संघ के प्रचारक को केंद्र में रखकर बुना गया है। ‘तत्त्वमसि’ कथा-साहित्य के माध्यम से संघ की आंतरिक कार्यप्रणाली और दर्शन को प्रस्तुत करने का एक रोचक प्रयास है। वरिष्ठ प्रचारक एवं साहित्यकार श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास प्रचारक जीवन, उसके त्याग और समाज-केंद्रित अध्यात्म को रेखांकित करता है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

विश्व बंधुत्व का संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर पहुँचे सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अमेरिका के बाद कनाडा में भारतीय विचार को दुनिया के सामने रखा है। जिस प्रकार न्यूयॉर्क में उन्होंने दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व के साथ चलने की राह दिखायी, उसी प्रकार उन्होंने टोरंटो में भारत के उदात्त विचार को सबके साथ साझा किया। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जब भू-राजनीतिक तनावों, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब भारत का विचार ही सही राह दिखा सकता है। प्रारंभ से लेकर आज तक विश्व में भारत की प्रतिष्ठा भी उसके दर्शन को लेकर रही है। कहना होगा कि टोरंटो में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का ‘हिंदू विश्व बंधु’ संबोधन केवल एक सांस्कृतिक व्याख्यान नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका यह कथन कि विविधता एकता की विरोधी नहीं बल्कि उसकी स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति है, भारतीय चिंतन के उस मूल तत्त्व को रेखांकित करता है जिसे आज की खंडित दुनिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने विविधता को कभी संकट या विभाजन के स्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक ही चेतना के बहुरंगी स्वरूप के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया है।

सोमवार, 31 अगस्त 2026

वैश्विक पटल पर आरएसएस

न्यूयॉर्क व्याख्यान : ‘साझा मानवता’ का व्यावहारिक मार्ग

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेसन' (Universal Oneness Celebration) कार्यक्रम को संबोधित किया 

न्यूयॉर्क की ऐतिहासिक धरा पर ‘एक विश्व : एक मानवता शिखर सम्मेलन’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन वस्तुतः भारत के शाश्वत आध्यात्मिक बोध और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की युगीन अभिव्यक्ति है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जहाँ भौतिकवादी होड़, वैचारिक संकीर्णता, युद्ध की विभीषिका और अविश्वास का अंधकार संपूर्ण मानवता को ग्रस रहा है, वहाँ यह कार्य-आह्वान विश्व को विनाश के गर्त से निकालकर एकात्मता के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक सिद्ध होगा। भारत की यह सनातन परंपरा रही है कि जब-जब संसार में घृणा, विभाजन और संघर्ष की लहरें उठी हैं, तब-तब यहाँ के ऋषियों, मनीषियों और विचारकों ने संपूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानकर शांति और एकात्मता का संदेश दिया है। ऐसे में याद आता है स्वामी विवेकानंद का शिकागो व्याख्यान। विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने रक्त रंजित और युद्धरत विश्व को शांति एवं सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। आज जब आधुनिक सभ्यता तकनीक की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब सरसंघचालक जी का यह उद्बोधन वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करता है।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रक्षाबंधन : समाज की एकता, समरसता और राष्ट्र-रक्षा का पावन संदेश

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बस्तियों में जाकर वंचित वर्ग के बंधुओं को रक्षासूत्र बाँधकर अपनेपन की भावना को करते हैं प्रकट

भारत में उत्सव की अनूठी परंपरा है। ये उत्सव हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोने और जीवन मूल्यों को जगाए रखने का काम करते हैं। हमारे प्रत्येक उत्सव की रचना में समाज के लिए जरूरी संदेश हैं। ऐसा ही एक उत्सव है- रक्षाबंधन, जो हमें सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आमतौर पर हम इसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसका वास्तविक विचार इससे कहीं अधिक बड़ा और गहरा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रक्षाबंधन को अपने छह उत्सवों में शामिल किया है। संघ ने इस पर्व को संपूर्ण समाज को एकजुट करने, आपस में प्रेम-भाव बढ़ाने और देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले महापर्व के रूप में देखा और उसे उसी ढंग से मनाना शुरू किया। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने समाज, संस्कृति और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें। संघ ने समाज को स्मरण कराया कि रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने की रस्म नहीं है। हमारे यहाँ संबंधों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह धागा उसी विश्वास की डोर है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस तरह एक धागा बिखरे हुए अनगिनत मोतियों को जोड़कर एक सुंदर माला बना देता है, ठीक वैसे ही यह रक्षासूत्र भी समाज के अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। पुराने समय में यह पर्व सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित नहीं था। जब भी समाज या देश पर कोई संकट आता था, तो लोग एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर साथ खड़े रहने और मदद करने का भरोसा दिलाते थे।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आरएसएस बदल रहा है अपना ढांचा

संघ शताब्दी वर्ष : मध्यप्रदेश में अब तीन प्रांत (मध्यभारत , मालवा और महाकौशल) की जगह होंगे 7 संभाग, मध्य भारत में भोपाल एवं ग्वालियर संभाग, मालवा की जगह इंदौर और उज्जैन संभाग, महाकौशल की जगह सागर, रीवा और जबलपुर संभाग

यह आलेख 'आयुध Updates' के मार्च-अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में अब स्वीकार्यता के साथ-साथ एक विश्वास भी बन गया है। सज्जनशक्ति संघ के साथ मिलकर समाज परिवर्तन के आंदोलन से जुड़ना चाहती है, वहीं संघ भी अपने लक्ष्य यानी समाज के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ना चाहता है। हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष के बाद अपने अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ा रहा है। शताब्दी वर्ष में अब तक आयोजित कार्यक्रमों में समाज ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है। समाज की बड़ी ताकत संघ के संपर्क में आई है। इसलिए अपने अगले पड़ाव में संघ समाज की सज्जन शक्ति को साथ लेकर भारत के निर्माण की नयी कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है। इसकी एक झलक हरियाणा के पट्टीकल्याणा (समालखा) में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों एवं भविष्य की रणनीति में देखी जा सकती है। पिछले कुछ समय से एक चर्चा बहुत जोरों से थी कि संघ अपनी भौगोलिक संरचना में बदलाव करने जा रहा है, संघ की प्रांत रचना खत्म हो जाएगी, क्षेत्र रचना में भी बदलाव होगा। इस चर्चा पर अब प्रतिनिधि सभा में मुहर लग गई है। हाँ, संघ की भौगोलिक संरचना में बदलाव हो रहा है। अब चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि आखिर संघ को इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

रविवार, 9 अगस्त 2026

श्रीगुरुजी के ऐतिहासिक ‘तीन पत्र’

संघ शताब्दी वर्ष : गोलवलकर जी ने अपनी देह छोड़ने के पूर्व संघ की आगे की व्यवस्था और स्वयंसेवकों को संदेश देने के लिए तीन पत्र लिखे थे, जो उनके देवलोकगमन के बाद पढ़े गए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ पत्र लिखने के अभ्यासी थे। पत्रों के माध्यम से श्रीगुरुजी का कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह, राष्ट्रप्रेम और हिन्दू समाज की एकात्मता के प्रति उनका संकल्प स्पष्ट झलकता है। उनके पत्रों में संघ कार्य के विस्तार, वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया है। कार्यकर्ताओं, सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व को लिखे उनके अनेक पत्र चर्चित हैं परंतु उनके ‘तीन पत्र’ अत्यंत महत्व के हैं। संघ को जानने-समझने की रुचि रखनेवाले बंधुओं को श्रीगुरुजी के ये तीनों पत्र अवश्य पढ़ना चाहिए। ये पत्र उन्होंने अपनी देह त्यागने से पूर्व लिखे थे। वर्ष 1972 में श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरना शुरू हो गया था। परंतु, उसके बाद भी उन्होंने क्षणभर भी स्वयं को संघकार्य से अलग नहीं किया। वर्ष 1973 में जब उन्हें यह आभास होने लगा कि अब भौतिक देह से विश्राम लेने का समय आ गया है, तब उन्होंने अपने देहावसान के बाद संघ कार्य की समुचित व्यवस्था के बारे में विचार प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में ये तीन ऐतिहासिक पत्र लिखे गए। श्रीगुरुजी ने 2 अप्रैल 1973 को अपने हाथ से तीन पत्र लिखे और अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिए। उन्होंने क्षीरसागर जी को निर्देश दिए कि ये पत्र मेरे जाने के बाद सार्वजनिक रूप से पढ़े जाएं, जिनमें से दो पत्र बालासाहब देवरस पढ़ें। श्रीगुरुजी की इच्छा के अनुरूप तीनों पत्र सुरक्षित रख दिए गए। 5 जून 1973 को श्रीगुरुजी ने अपनी देह का त्याग किया। अगले दिन यानी 6 जून को इस पुण्य आत्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येयात्रा प्रारंभ होने के पूर्व इन पत्रों को पढ़कर सुनाया गया। एक पत्र में उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। दूसरे पत्र में आग्रह किया कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। वहीं, तीसरे पत्र में उनके हृदय की उदारता एवं व्यक्तित्व की महानता के दर्शन होते हैं, जिसमें वे विनयभाव से क्षमायाचना करते हैं कि उनके व्यवहार से कभी किसी का हृदय दु:खी हुआ हो, तो क्षमा करें। श्रीगुरुजी के ये तीन पत्र ‘बीज’ थे, जिन्होंने आगे चलकर संघ की कार्यपद्धति एवं संस्कृति को समृद्ध किया।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

भगवा रंग से चिढ़ क्यों?

राष्ट्रध्वज तिरंगा में सबसे ऊपर है भगवा, भारतीय संस्कृति का का परिचायक, त्याग, वैराग्य, साहस, बलिदान और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है भगवा

खेल मैदान में राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का समावेश कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति में जब भी केसरिया या नारंगी रंग की बात आती है, एक खास राजनीतिक वर्ग में असहजता साफ दिखने लगती है। आगामी हॉकी विश्व कप 2026 के लिए भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की नई जर्सी लॉन्च हुई है। पारंपरिक नीले रंग की जगह इस बार नारंगी रंग को प्राथमिक किट के रूप में चुना गया है। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व दिग्गज खिलाड़ी दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया कि नीले टर्फ पर नीले रंग की जर्सी के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) की व्यावहारिक समस्या आ रही थी और यह सुझाव सीधे खिलाड़ियों एवं कोचिंग स्टाफ की तरफ से आया था। इसके बावजूद, सुदीर्घ अनुभव रखनेवाले राजनीतिक दल के नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया है। हिन्दू पहचान से चिढ़ने वाले नेताओं का यह बयान आया है कि “देश की पहचान अहिंसा, सत्य और भाईचारे से जुड़ी है और इन्हें बदला नहीं जा सकता”। यह बयान इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक विशुद्ध रूप से तकनीकी और खेल संबंधी फैसले को जबरन वैचारिक संघर्ष में घसीटा जा रहा है।

रविवार, 2 अगस्त 2026

गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’

संघ शताब्दी वर्ष : गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ के समक्ष गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं और संघकार्य के प्रति अपना समर्पण बढ़ाने का संकल्प लेते हैं

एआई से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शोर-शराबे में गुम हुआ छात्रों का हित, विपक्ष के निशाने पर रही हिन्दू मान्यताएं

लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार चर्चा के बीच आखिरकार परीक्षा सुधार का विधेयक ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो गया। देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के भविष्य को देखते हुए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा था। उम्मीद यह थी कि जब प्रश्न पत्र लीक जैसे गंभीर विषय पर संसद में बहस होगी, तो देश को एक ठोस और सर्वसम्मति वाला समाधान देखने को मिलेगा। लेकिन संसद के दोनों सदनों में जो दृश्य देखने को मिला, वह बेहद निराशाजनक रहा। जो विपक्ष कल तक पर्चा लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हो-हल्ला मचा रहा था, जब विधेयक पर रचनात्मक चर्चा और सुझाव देने का सही समय आया, तब वह पूरी तरह दिशाहीन नजर आया। बहस का रुख परीक्षा प्रणाली के तकनीकी एवं प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित रहने के बजाय ऐसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया, जिनका आम छात्रों की समस्याओं और उनके भविष्य से कोई दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था। विशेष रूप से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास यह एक बड़ा अवसर था कि वह परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लीक-मुक्त बनाने के लिए अपने ठोस और व्यावहारिक सुझाव पटल पर रखती। इससे देश की जनता और युवाओं के बीच यह संदेश जाता कि विपक्ष के पास महज विरोध करने के बजाय समस्याओं का समाधान करने का एक स्पष्ट एजेंडा भी है। परंतु इस रचनात्मक भूमिका को निभाने के स्थान पर बहस को धार्मिक प्रतीकों, गोमूत्र और मनुस्मृति जैसे विषयों पर लाकर खड़ा कर दिया गया।

सावधान! अब ई20 पर भड़काने की तैयारी

नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की गर्मी अभी शांत भी नहीं हुई है कि आंदोलनजीवियों ने जनता को भ्रमित करने एवं भड़काने के लिए दूसरा विषय खोजना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों से एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप, एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर उठ रही आपत्तियों और राजनीतिक बयानों ने एक बार फिर ऊर्जा संक्रमण की इस प्रक्रिया को व्यापक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक तरफ जहां सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने वाले दूरगामी कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों, ट्रांसपोर्ट यूनियनों और आम वाहन चालकों के विरोध प्रदर्शनों ने नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

“यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है” – बालासाहब देवरस

संघ शताब्दी वर्ष : हिन्दू एकता एवं समरसता पर बालासाहब के क्रांतिकारी विचार


हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के विचार अत्यंत स्पष्ट, प्रखर और क्रांतिकारी थे। ‘वसंत व्याख्यानमाला’ का उनका भाषण विश्व के ऐतिहासिक एवं महान भाषणों में शामिल किया जा सकता है। 8 मई, 1974 में पुणे में हुए अपने इस भाषण में छुआछूत (अस्पृश्यता) को लेकर बालासाहब ने जो कहा, वैसा खरा-खरा शायद ही किसी ने बोला हो। अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध विचार- “अगर गुलामी अनैतिक या गलत नहीं है, तो फिर कुछ भी गलत नहीं है”- का उल्लेख करते हुए बालासाहब ने कहा- “अगर छुआछूत गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है”। जातिगत भेदभाव के निर्मूलन के लिए काम करने वाले महानुभाव अक्सर इस ओर या उस ओर खड़े दिखाई देते हैं। उनके विचारों में राजनीति, परस्पर द्वेष और कटुता रहती है। लेकिन बालासाहब के विचारों में स्पष्टता के साथ-साथ आत्मीयता और बंधुता की झलक दिखाई देती है। सामाजिक समरसता पर उनके विचार समाधानमूलक और व्यावहारिक हैं। बालासाहब जी का मानना था कि “विषमता नष्ट करने के प्रयासों में सभी का सहभाग अपेक्षित है। संयम के साथ उत्तम व्यवहार के द्वारा यह प्रयास होंगे तभी उसमें सफलता मिलेगी”।

बुधवार, 22 जुलाई 2026

आंदोलन को बदनाम करते हिंसक प्रदर्शन

अराजक तत्वों ने हड़प लिए छात्रों के जरूरी मुद्दे, उनके मंच पर कब्जाकर अपना नैरेटिव चलाने का किया प्रयास


देश में प्रमुख परीक्षाओं की पारदर्शिता और लाखों युवाओं का भविष्य अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। परीक्षाओं के आयोजन में लगातार हो रही गड़बड़ियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर कोई ठोस रणनीति बनानी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि नीट परीक्षा को लेकर उठी चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। एक अभिभावक की भाँति उन्होंने युवाओं को आश्वस्त किया है कि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर संज्ञान लेकर उसका फिर से व्यवस्थित आयोजन कराया है। इसके बावजूद, इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में जिस तरह दिल्ली की सड़कों पर हिंसा, उपद्रव और ‘चलो संसद’ के नाम पर अराजकता फैलाई गई, वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

“जिन्होंने हेडगेवारजी को नहीं देखा, वे बालासाहब को देख लें”

संघ शताब्दी वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के लिए कहा जाता था कि वे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमूर्ति थे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस संघ की पहली शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर के मोहिते बाड़े में जो शाखा लगाई थी, बालासाहब उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। डॉक्टर साहब के संपर्क में आने के बाद 1927 में केवल 11 वर्ष की आयु में बालासाहब देवरस ने शाखा जाना प्रारंभ कर दिया। संघ शिल्पी डॉक्टर साहब ने स्वयं अपने हाथों से बालासाहब के व्यक्तित्व को गढ़ा और उन्हें प्रशिक्षित किया। उन्होंने संघ रूपी बीज बालासाहब के हृदय में बोया। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना अपने मित्रों के हृदय में जैसे का तैसा उतार दिया था, उसी प्रकार डॉक्टर साहब ने भी स्वयंसेवकों के पहले समूह के मन-मस्तिष्क में संघ की विराट अवधारणा को उतार दिया था। देवरस जी ने डॉक्टर साहब की आँखों से ही संघ को देखा, उनकी दृष्टि के अनुरूप ही संघ की सृष्टि का विकास एवं विस्तार किया। 12 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की आयु तक बालासाहब ने एक तपस्वी और सच्चे स्वयंसेवक की भाँति अपना जीवन जिया। उन्होंने सबके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया कि राष्ट्र के लिए किस प्रकार जिया जाता है। संघ के स्वयंसेवक बालासाहब में संघ सृष्टि के निर्माता डॉक्टर साहब की छवि देखते थे। वर्ष 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण शिविर (संघ शिक्षा वर्ग) पुणे में चल रहा था, जहाँ एक दिन बालासाहब देवरस का बौद्धिक होना था। बौद्धिक से पहले वक्ता का परिचय कराने के लिए तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ खड़े हुए। बालासाहब के परिचय में उन्होंने कहा कि “आपमें से कइयों ने डॉ. हेडगेवारजी को नहीं देखा होगा। अगर आप बालासाहब देवरस को देखेंगे तो आपके सामने डॉ. हेडगेवारजी खड़े नजर आएंगे”।

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मातुश्री का दर्शन है ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’

पुस्तक चर्चा : पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए पढ़ें यह पुस्तक


“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है”। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।

सोमवार, 13 जुलाई 2026

बालासाहब ने शाखा को बनाया ‘अखंड साधना’ का केंद्र

संघ शताब्दी वर्ष : संघ कार्य के विस्तार और शाखाओं के सुदृढ़ीकरण के शिल्पी थे बालासाहब देवरस, उनकी पहल पर ही सातों दिन शाखा लगना शुरू हुई, सुबह की शाखा भी उनकी देन है


संघ कार्य के विस्तार, शाखाओं के विकास एवं सुदृढ़ीकरण में तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस (मधुकर दत्तात्रेय देवरस) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अकसर स्वयंसेवकों से कहते थे कि शाखा अच्छी चलेगी तो समाज के सब काम होंगे। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में काम करने के लिए राष्ट्रीय विचार से ओत-प्रोत कार्यकर्ता शाखा से ही तैयार होंगे। इसलिए अच्छी शाखा चलना जरूरी है। एक बार युवकों के साथ बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने प्रश्न किया कि “आदर्श शाखा का लक्षण क्या है?” इसके उत्तर में बालासाहब ने जो कहा, वह उनके विचारों की स्पष्टता को दर्शाता है। उन्होंने कहा- “संघ कार्य को अपना जीवित कार्य समझकर, संघ कार्य के लिए सारा समय लगाने के लिए प्रस्तुत युवक जिस शाखा से विपुल संख्या में खड़े होंगे, ऐसी शाखा को मेरी दृष्टि से ‘आदर्श शाखा’ कहना उचित होगा”। संघ कार्य को राष्ट्रव्यापी बनाना है, तो उसके लिए जरूरी है कि आदर्श शाखाएं खड़ी हों। डॉक्टर साहब की शाखाओं की संकल्पना को धरातल पर उतारने और शाखाओं का व्यापक नेटवर्क खड़ा करने में बालासाहब देवरस ने जो संगठनात्मक कौशल दिखाया, वह अनुकरणीय है। बालासाहब की संगठन कुशलता से डॉक्टर साहब भली प्रकार परिचित थे। इसलिए उन्होंने नागपुर में संघ कार्य की जिम्मेदारी बालासाहब को सौंपी थी। संघ के कार्य को नागपुर से बाहर लेकर जाने के लिए यह आवश्यक था कि नागपुर में अच्छा काम चले। नागपुर के कार्यवाह के रूप में बालासाहब ने जिस प्रकार से संघ कार्य को आधार दिया, उस आधार पर ही आगे चलकर संघ कार्य राष्ट्रव्यापी हुआ। 

देखें यह वीडियो - आरएसएस और राजनीति पर सटीक विश्लेषण

शनिवार, 11 जुलाई 2026

तीजन बाई: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की राजदूत

भारत की सांस्कृतिक विरासत की सशक्त पहचान और पंडवानी गायन की जादुई आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में 5 जुलाई, 2026 को रायपुर एम्स में निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक सुनहरे अध्याय का विश्राम लेना है। अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनकर बड़ी हुई तीजन बाई ने जब तंबूरा हाथ में थामा, तो उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि महाभारत के चरित्रों को अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी कला और जीवन यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो संघर्षों से पार पाना चाहता है। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं का मंच पर आकर तेज स्वर में गाना और अभिनय करना आसान नहीं था, उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह न करते हुए अपनी राह चुनी।