बुधवार, 6 जून 2018

प्रणब दा और संघ का सर्वसमावेशी स्वरूप


- लोकेन्द्र सिंह
भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं वर्तमान समय के सर्वाधिक सम्मानित राजनेता प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जाने की बात से ही कांग्रेस और तथाकथित सेकुलर बिरादरी में खलबली मच गई है। स्वयं को लोकतांत्रिक, सेकुलर और सहिष्णु कहने वाली इस जमात की प्रतिक्रियाएं आश्चर्य तो कतई उत्पन्न नहीं करती, बल्कि उसके अलोकतांत्रिक, संकुचित और असहिष्णु चरित्र को जरूर उजागर करती हैं। अलगाववादी समूहों, नक्सलियों और आतंकियों तक से संवाद की पक्षधर यह जमात संघ से संवाद पर अकसर बिदक जाती है। इसके उलट संघ सबसे संवाद का पक्षधर दिखाई देता है। संघ इन सेकुलर समूहों से अधिक सर्वसमावेशी दिखाई देता है। संघ ने सदैव इस परंपरा का पालन किया है कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों के ज्ञान एवं अनुभव का लाभ समाज तक पहुँचाए।
          राजनीति में सुदीर्घ एवं शुचितापूर्ण जीवन जीने वाले प्रणब दा को समझाने का प्रयास कर रहे कांग्रेसी नेताओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों को अब तक उन्होंने अनदेखा ही किया है। संघ के कार्यक्रम को लेकर उन्होंने बंगाली समाचार-पत्र आनंद बाजार पत्रिका को दिए गए साक्षात्कार में इतना जरूर कहा है- 'जो कुछ भी मुझे कहना है, मैं नागपुर में कहूंगा। मुझे कई पत्र आए और कई लोगों ने फोन किया, लेकिन मैंने किसी का जवाब नहीं दिया है।' पूर्व राष्ट्रपति को समझाने का प्रयास कर रहे लोगों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश, पी. चिदंबरम और सीके जाफर जैसे नेता शामिल हैं। 
           आश्चर्य इस बात का जरूर है कि जयराम रमेश जैसे प्रबुद्ध नेता ने अपने पत्र में यह लिखा है कि यदि प्रणब मुखर्जी संघ के कार्यक्रम में जाते हैं तो उनके समूचे राजनीतिक जीवन पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। यह आश्चर्यजनक ही है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भारत में आतंकी गतिविधियों का संचालन करने वाली पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी की किताब का विमोचन करने पर भी निश्कलंक रहते हैं, वहीं पूर्व राष्ट्रपति का उज्ज्वल राजनीतिक जीवन इसलिए प्रश्रांकित हो जाएगा कि वह संघ के कार्यक्रम में गए। फिर तो जयराम रमेश को महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, महामना डॉ. मदनमोहन मालवीय, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के राजनीतिक जीवन को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए। 
            पूर्व राष्ट्रपति प्रणब दा को संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय वर्ष में जाने से रोकने की बलात् हठ करने वाले कांग्रेसी नेताओं को इतिहास के पन्ने पलटने चाहिए। उन्हें यह पढऩा चाहिए कि जिस संगठन के कार्यक्रम में जाने से वह प्रणब दा को रोक रहे हैं, वर्धा में आयोजित उसके एक शिविर में स्वयं महात्मा गाँधी गए, जिनकी हत्या का झूठा आरोप अब तक कांग्रेस के नेता संघ पर लगाते रहते हैं। जबकि संघ में अनुशासन, आत्मसंयम, जातीय अस्पृश्यता की समाप्ति को देखकर महात्मा गाँधी प्रभावित हुए थे और उन्होंने दिल्ली की एक भंगी कॉलोनी में 19 सितंबर, 1947 को स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रशंसा की थी। इसी तरह, डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर भी संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के संपर्क में थे और वह 1935 एवं 1939 में संघ शिक्षा वर्ग में गए थे। 1937 में उन्होंने कतम्हाडा में विजयादशमी के उत्सव पर शाखा में संबोधित भी किया था। सन् 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान संघ के स्वयंसेवकों का देश के प्रति समर्पण देख संघ के धुर विरोधी पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी प्रभावित हुए थे। इसी कारण उन्होंने 1963 के गणतंत्र दिवस समारोह की परेड में भाग लेने के लिए संघ को आमंत्रित किया था। कांग्रेस की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब लोकतंत्र की हत्या कर देश में आपातकाल लागू किया, तो उसके विरुद्ध संघ ने प्राणपण से संघर्ष किया। लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना में संघ के योगदान ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को बहुत प्रभावित किया। श्री नारायण ने 3 नवंबर, 1977 में पटना में संघ के एक शिक्षा वर्ग को संबोधित किया और समाज में संघ के योगदान की सराहना की। पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री भी संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर को परामर्श के लिए आमंत्रित करते रहे थे। कठिन परिस्थितियों में उन्होंने संघ की मदद भी ली। 
          इस महत्वपूर्ण अवसर पर अनावश्यक विवाद खड़ा करने की जगह कांग्रेसी नेताओं को आत्मसंयम का परिचय देना चाहिए और इतिहास का सिंहावलोकन करना चाहिए। संघ कोई अछूत संगठन नहीं है, वह राष्ट्रभक्त संगठन है। दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन। जो भी संघ के नजदीक आया, वह उसका प्रशंसक ही बन गया। निश्चित ही पूर्व राष्ट्रपति प्रणब दा संघ के और अधिक नजदीक जाएंगे, तो उनकी वह सब धारणाएं बदल जाएंगी, जो कांग्रेस के वातावरण में रहते हुए बनी और बनाई गई थीं। संघ की प्राथमिकता में राष्ट्र है। जिनके लिए भी 'राष्ट्र सबसे पहले' है, वैचारिक मतभेद होने पर भी संघ उनके साथ संवाद स्थापित करता है। संघ की अविरल यात्रा इसी बात के साक्ष्य देती है। अब सबके कान इस पर हैं कि 7 जून को अर्थात कल संघ की जन्मस्थली नागपुर में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी क्या संबोधन देंगे?

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन उपग्रह भास्कर एक और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    उत्तर देंहटाएं

पसंद करें, टिप्पणी करें और अपने मित्रों से साझा करें...
Plz Like, Comment and Share

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails