सोमवार, 12 सितंबर 2016

अब सुशासन बाबू नहीं रहे नीतीश कुमार

 बिहार  के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कल तक 'सुशासन बाबू' के तौर पर पहचाने जाते थे, लेकिन अब उनकी यह छवि पीछे छूटने लगी है। बिहार में अब सुशासन नहीं बल्कि अपराध की बहार है। शहाबुद्दीन की वापसी ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि बिहार में अपराध पर लगाम लगाने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नाकामयाब साबित हो रहे हैं। बिहार सरकार में शामिल राजद के विधायकों/मंत्रियों ने जिस तरह उसका स्वागत किया है और फूल बरसाए हैं, उससे भी जाहिर होता है कि भाजपा विरोध की राजनीति का हिस्सा बनकर नीतीश कुमार गलत जगह फंस गए हैं। बिहार सरकार के पिछले एक-डेढ़ साल के कार्यकाल से साबित होता है कि नीतीश कुमार 'सुशासन बाबू' भारतीय जनता पार्टी के कारण बन पाए थे। जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार के वक्त नीतीश कुमार के सुशासन को भाजपा का समर्थन था। जदयू और भाजपा दोनों का मुख्य एजेंडा विकास था। यानी सुशासन की प्रमुख हिस्सेदार भाजपा थी। लेकिन, इस बार नीतीश कुमार अपनी महत्वाकांक्षाओं (स्वयं को तीसरे मोर्चे का नेता प्रस्तुत कर प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब) के कारण भाजपा विरोध की राजनीति में शामिल हुए और भाजपा से रिश्ता तोड़कर राजद एवं कांग्रेस के साथ महागठबंधन का हिस्सा बन गए। चुनाव परिणाम महागठबंधन के पक्ष में आया, जिसमें लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने सबसे ज्यादा सीटें जीतीं। इस परिणाम से ही तय हो गया था कि नीतीश के लिए मुख्यमंत्री का ताज काँटों भरा रहेगा, जो बार-बार उन्हें पीड़ा देगा। संभव है कि यह गठबंधन पाँच साल पूरे न कर पाए। जदयू के नेता और पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर निकलते ही कहा भी है कि नीतीश कुमार परिस्थितियों के कारण मुख्यमंत्री हैं। नीतीश जनता के नेता (मास लीडर) भी नहीं हैं। उनके नेता सिर्फ लालू प्रसाद यादव हैं और वह लालू की राजनीति करते हैं।
           नीतीश कुमार को अंदाजा नहीं रहा होगा कि इतनी जल्द ही उनकी सुशासन की छवि धूमिल हो जाएगी। उन्हें समझना चाहिए था कि लालू प्रसाद यादव का शासनकाल 'जंगलराज' के लिए कुख्यात रहा है। ईमानदारी से 'जंगलराज' और 'सुशासन' का कोई मेल होता नहीं हैं। इनमें से एक ही संभव है। इसलिए जिसकी ताकत अधिक है, बिहार में उसी का शासन दिख रहा है। नीतीश के सुशासन पर लालू का जंगलराज भारी पड़ रहा है। भले ही जदयू और नीतीश कुमार ने शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आने के मामले से दूरी बनाकर रखी हो, लेकिन प्रदेश के मुखिया होने के नाते अपनी जवाबदेही से कैसे मुँह चुरा सकते हैं? बिहार ही नहीं, बल्कि पूरा देश शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आने की घटना को शुभ संकेत नहीं मान रहा है। उल्लेखनीय है कि शहाबुद्दीन के खिलाफ हत्या, अपहरण, लूट और डकैती जैसे ३६ आपराधिक मामले दर्ज हैं। वह बेगुनाह साबित होकर जेल से बाहर नहीं निकला है, लेकिन सरकार में शामिल राजद शहाबुद्दीन को हीरो की तरह प्रस्तुत कर रहा है। जेल से बाहर आने के लिए शहाबुद्दीन का रास्ता साफ करने में सरकार ने जिस तरह की भूमिका निभाई है, उस पर निश्चित ही नीतीश कुमार को जवाब देना चाहिए। बहरहाल, बिहार में बने राजनीतिक परिदृश्य को देखकर कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार अब सुशासन बाबू नहीं रहे हैं। उन्होंने जंगलराज के सामने हथियार डाल दिए हैं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-09-2016) को "हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-2465) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’हौसलों की उड़ान - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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