कॉर्पोरेट चमक से दूर, जन-जन के विश्वास और आत्मनिर्भरता का उत्सव
झीलों की नगरी भोपाल को यदि मेलों का शहर कहा जाए, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस शांत और खूबसूरत शहर के किसी न किसी कोने में हमेशा कोई न कोई मेला अपनी रौनक बिखेरता मिल ही जाता है। विशेषकर मानसून की विदाई और गुलाबी ठंड की आहट के साथ ही समूचा भोपाल जैसे उत्सव के एक जीवंत कैनवास में बदल जाता है। भोपाल का आसमान अभी गणेश उत्सव और नवरात्रि के मेलों की रोशनी को समेट भी नहीं पाया था कि व्यापारिक मेलों ने अपनी आमद दर्ज करा दी है। मेलों की चमक-धमक में ‘स्वदेशी मेला’ अपने अलग ठाठ-बाट के साथ आकर विराजमान हो गया है। स्वदेशी मेला अपने आप में अनूठा है क्योंकि यह मेले की पारंपरिक भारतीय संकल्पना को सच्चे अर्थों में साकार करता है। स्वदेशी मेले के पीछे एक उदात्त भावना है। एक पवित्र विचार है। भारत को आत्मनिर्भर बनाने की संकल्पना है। भारतीय व्यावसायियों को पहचान दिलाने और उनके हाथ मजबूत करने का सपना है। यह स्वदेशी के विचार को जन-जन तक पहुँचाने का उत्सव है। यह मेला केवल खरीदारी का बाजार भर नहीं है, बल्कि अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपने कौशल से परिचित होने का एक संवेदनशील माध्यम है।
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कॉर्पोरेट चमक-दमक से परे, समाज का अपना मेला :
स्वदेशी जागरण मंच की पहल पर भोपाल में ही नहीं, अपितु देशभर में लगभग 130 स्वदेशी मेलों का आयोजन हो रहा है। स्वदेशी के विचार को जनांदोलन और भारत को आत्मनिर्भर बनाने के महान लक्ष्य के साथ वर्ष 1991 में स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की गई थी। उसके अलगे वर्ष से ही, यानी 1992 से ही मंच ने स्वदेशी मेलों का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। चूँकि मेला हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। मेलों के माध्यम से केवल व्यापार नहीं होता, अपितु विचार का भी प्रसार होता है। एक ओर कॉर्पोरेट घरानों के बड़े-बड़े मेले हैं, जिनकी चमक-दमक का वर्णन क्या ही किया जाए। वहीं दूसरी ओर, स्वदेशी मेला अपनी सादगी और उद्देश्य के कारण प्रतिष्ठित हो रहा है। स्वदेशी जागरण मंच और स्वदेशी के प्रति श्रद्धा रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के साझे प्रयासों से प्रारंभ हुए ये मेले अपनत्व के भाव की साकार अभिव्यक्ति हैं।
परंपरा, स्वाद और आधुनिकता का संगम :
शाम ढलते ही भोपाल का एम.वी.एम. कॉलेज ग्राउंड दूधिया रोशनी और रंग-बिरंगी झालरों से नहा उठता है। मेले में कदम रखते ही हवा में तैरती पारंपरिक व्यंजनों की सोंधी खुशबू बरबस ही अपनी ओर खींच लेती है। कहीं शुद्ध देसी घी की जलेबियां छन रही हैं, तो कहीं पारंपरिक क्षेत्रीय व्यंजनों के स्टॉल पर लोगों का तांता लगा है। मालवा के गराडू का स्वाद, बीकानेर के साबूदाने के बड़े एवं खिचड़ी और बनारस के मंगोड़े से लेकर टॉप एंड टाउन की आइसक्रीम के स्वाद का लुत्फ हम यहाँ उठा सकते हैं। उज्जैन की प्रसिद्ध तंदूरी चाय की तो बात ही अलग है। इसका स्वाद तो जितना लाजवाब है ही, उससे अधिक आकर्षण तंदूरी चाय को बनाने की प्रक्रिया है। मेले में उज्जैन की तंदूरी चाय का स्वाद तो अनिवार्य रूप से लेना ही चाहिए।
फूड कोर्ट के पास ही झूलों की दुनिया आपकी बाट जोह रही है। चरखी, नाव और जाइंट व्हील पर बैठकर भोपाल की ठंडी हवा का लुत्फ उठाना हर किसी के चेहरे पर खिलखिलाहट बिखेर देता है। कुछ नये ढंग के झूले भी यहाँ आए हैं। झूला झूलना आसान काम नहीं है।
कौशल को सम्मान, संस्कृति को पहचान :
मेले के सांस्कृतिक मंच पर हर शाम एक नया रंग बिखरता है। कभी स्थानीय लोकनृत्यों की थाप पर दर्शक झूमते हैं, तो कभी हमारे आसपास की बस्तियों के बाल कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। इसी मंच पर उन प्रतिभाओं और कर्मठ हाथों का सम्मान भी किया जाता है, जिन्होंने स्वदेशी उत्पादन और सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य किया है। हथकरघा के बने कपड़े, मिट्टी के नक्काशीदार बर्तन, जैविक उत्पाद, हस्तनिर्मित साज-सज्जा की वस्तुएं और घरेलु मसाले, मेले का हर स्टॉल किसी भारतीय कारीगर के श्रम और स्वाभिमान की कहानी कहता है।
उपभोक्ता और विक्रेता के बीच आत्मीय रिश्ता :
स्वदेशी मेले में खरीदारी करते समय उपभोक्ता और विक्रेता के बीच केवल पैसों का लेन-देन नहीं होता, बल्कि एक आत्मीय रिश्ता बनता है। एक युवा ने यहाँ बुक स्टॉल लगाया है। वह अकेला ही अपने स्टॉल पर इधर से उधर भाग रहा है। मैंने उससे पूछा कि तुम सब ग्राहकों पर नजर कैसे रखते होगे, कुछ लोग तो बिना पैसा दिए ही किताबें ले जाते होंगे? उसका उत्तर बहुत प्रेरक और आत्मीयता भरा था- “भाई साहब, किताबें कौन चुराकर ले जाता है। अगर कोई ले भी जाएगा, तो अच्छा है। कुछ अच्छा पढ़ लेगा”। पंजाब से आए अचार-पापड़ वाले एक बंधु प्रत्येक ग्राहक को प्रेम से अपने विशिष्ट पापड़ों का स्वाद चखा रहे थे। उनके मन में यह भेद नहीं था कि जो खरीदने का इच्छुक होगा, उसे ही अपने उत्पाद चखने के लिए दिए जाएं। सेवा भारती के स्टॉल पर दीपावली और घर की सजावट का सामान था। यह स्टॉल महिलाओं के सशक्तिकरण का साक्षी था। सेवा भारती के प्रयासों से भोपाल के अलग-अलग हिस्सों में घरेलु महिलाएं अपने घर पर ही लाइट, दीपक, रूई की बाती और खिलौने इत्यादि बना रही हैं।
आत्मनिर्भर भारत की जीवंत धड़कन :
भोपाल का यह स्वदेशी मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक आंदोलन का उत्सव है। यह इस बात का प्रमाण है कि विकास और आधुनिकीकरण के दौर में भी हम अपनी जड़ों, अपनी परंपराओं और अपने देशवासियों के श्रम का सम्मान करना नहीं भूले हैं। रोशनी, स्वाद, उल्लास और वैचारिक संकल्प की इस त्रिवेणी में भोपाल का यह मेला हर शाम खुशियों का एक नया रंग भर रहा है।
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| भोपाल में आयोजित स्वदेशी मेला में 1 नवंबर, 2026 को दिए गए भाषण पर आधारित समाचार |


