सोमवार, 5 सितंबर 2016

डिजिटल इंडिया : जीवन होगा सुगम

यह आलेख मीडिया विमर्श के सितंबर-2016 के अंक में प्रकाशित हुआ है।

नरेन्द्र मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है, डिजिटल इंडिया। इस परियोजना का मूल उद्देश्य है 'भारत को डिजिटली सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था के रूप में परिवर्तित करना।' डिजिटल इंडिया के जरिए सरकार पारदर्शी व्यवस्था कायम करना चाहती है। यानी सुशासन। सरकार के लिए यह सिर्फ नारा नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन को सुगम बनाने का दृढ़ संकल्प है। यह इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि सरकार ने इस लोक कल्याणकारी उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक चरणबद्ध योजना भी तैयार की है। 21 अगस्त, 2014 से प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम को केंद्र सरकार ने अगले पाँच वर्ष में पूरा करने की योजना बनाई है। यह उम्मीद की जा रही है कि डिजिटल इंडिया कार्यक्रम 2019 तक गाँवों समेत देशभर में पूरी तरह से लागू हो जाएगा। सरकार इस दिशा में प्रभावी ढंग से कदम बढ़ा रही है। अनेक मोर्चों पर सरकार सफल भी हुई है। फिर भी कहना होगा कि मंजिल अभी दूर है। दरअसल, गाँव में बसने वाले भारत के प्रत्येक क्षेत्र में अभी इंटरनेट ही नहीं पहुँचा है। जहाँ पहुँचा भी है, वहाँ इंटरनेट की गति (डाउनलोड-अपलोड स्पीड) ही इतनी धीमी है कि उपयोगकर्ता उदासीन हो जाता है।

डिजिटल भारत का विचार वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नवाचारी सोच से आया है। चूँकि प्रधानमंत्री स्वयं तकनीक के उपयोग में सिद्धहस्त हैं और वे जानते हैं कि भविष्य डिजिटल भारत का ही है। शिक्षित हो रहे भारत में डिजिटल क्रांति के महत्त्व को भी प्रधानमंत्री बखूबी समझते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री कहते हैं कि 'समय तेजी से बदल चुका है। पहले आप घरों में जाते थे, तब उस घर के बच्चे आपका पेन खींचते थे, चश्मा खींचते थे। लेकिन अब वह सबसे पहले मोबाइल छीनने लगे हैं। वह बाकी कुछ समझें न समझें, डिजिटल ताकत को समझते हैं। समय की मांग है कि हम इस बदलाव को समझें। अगर हम इसे नहीं समझेंगे तो हम देखते रह जाएंगे और दुनिया कहीं दूर निकल जाएगी।' डिजिटल इंडिया को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की अवधारणा है कि इसके जरिए गाँव-शहर के अंतर को पाटा जा सकता है। लोगों को पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था दी जा सकती है। अनेक बुनियादी आवश्यकताओं को बिना किसी झंझट के त्वरित उपलब्ध कराया जा सकता है। प्रधानमंत्री डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को लोगों के जीवन को सुगम बनाने के लिए क्रांतिकारी कदम मानते हैं। उनका सोचना सही भी है। जब से इंटरनेट बैंकिंग का चलन आया है, तब से कई लोग अपने बैंक का रास्ता भूल गए हैं। आपको अनेक लोग ऐसे मिल जाएंगे, जो रेल का टिकट आरक्षित कराने के लिए वर्षों से कतार में नहीं लगे होंगे। गैस सिलंडर और उसकी सब्सिडी लेने के लिए भी अब कहीं जाना नहीं पड़ता। विभिन्न प्रकार के प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया भी अब ऑनलाइन हो गई है। इस योजना का एक लक्ष्य कागजी कार्रवाई को कम-से-कम करके सभी सरकारी सेवाओं को आम जनता तक डिजिटली रूप से सीधे पहुचाना है। मोदी सरकार चाहती है कि तमाम सरकारी विभाग और देश की जनता एक-दूसरे से डिजिटल रूप से जुड़ जाएं ताकि वे सभी तरह की सरकारी सेवाओं से लाभ उठा सकें और देश भर में सुशासन सुनिश्चित किया जा सके। चाहे किसी गाँव में रहने वाला व्यक्ति हो या फिर शहर में रहने वाला, दोनों को ही सभी सरकारी सेवाएं समान रूप से ऑनलाइन हासिल हों। किसी भी सरकारी सेवा के ऑनलाइन उपलब्ध होने पर वह आम आदमी की सीधी पहुँच में होगी। बिचौलियों का खेल खत्म हो जाएगा। जाहिर है, ऐसे में सरकारी सेवाओं के मामले में होने वाली लेट लतीफी और भ्रष्टाचार पर कारगर ढंग से लगाम लग सकेगी। यानी यह मानने में कोई गुरेज नहीं कि डिजिटल इंडिया योजना हमारी जिंदगी को बेहतर और आसान बना देगी। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद भी मानते हैं कि डिजिटल इंडिया योजना इस तरह से डिजाइन की गई है कि इसके क्रियान्वयन से देश की तस्वीर बदल सकती है। 

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तीन प्रमुख अवयव हैं- प्रत्येक नागरिक को सुविधा/उपयोगिता के रूप में डिजिटल बुनियादी ढ़ांचा, माँग पर आधारित सेवाएँ और नागरिक की डिजिटल अधिकारिता। सरकार का मानना है कि एक अच्छी तरह संयोजित राष्ट्र ही अच्छी सेवा प्रदान करने वाला राष्ट्र बन सकता है। दूरस्थ भारतीय ग्रामीण डिजिटल ब्रॉडबैंड और उच्च गति के इंटरनेट के माध्यम से जुड़े हुए हों, तभी हर नागरिक को इलेक्ट्रॉनिक सरकारी सेवाएं, लक्षित सामाजिक लाभ और वित्तीय समावेशन का तत्कालीन वितरण हो सकता है। डिजिटल इंडिया का प्रमुख ध्यान जिन क्षेत्रों पर केंद्रित है उनमें से एक 'प्रत्येक नागरिक को उपयोगिता के रूप में डिजिटल बुनियादी ढ़ांचा' है। इसके लिए सरकार का ध्यान उच्च गति इंटरनेट उपलब्ध कराने पर है। ताकि सभी सेवाओं को निर्बाध सब तक पहुँचाया जा सके। डिजिटल पहचान, वित्तीय समावेशन और आम सेवा केन्द्रों की आसान उपलब्धता को सक्षम करने के लिए बुनियादी सुविधाओं की स्थापना करने की योजना बनाई गयी है। वहीं, सरकार डिजिटल इंडिया के तहत माँग आधारित सेवाओं को विस्तार देने की योजना है। इसके लिए ऑनलाइन और मोबाइल प्लेटफार्मों के माध्यम से वास्तविक समय पर सेवाएँ उपलब्ध कराना, नागरिकों के सभी अधिकार पोर्टेबल और क्लाउड पर उपलब्ध कराना और वित्तीय लेनदेन को इलेक्ट्रॉनिक एवं नगद रहित बनाने की योजना है। इसके अलावा नागरिकों की डिजिटल अधिकारिता तय करने के लिए भी सरकार प्रतिबद्ध है। सहभागी शासन के लिए सहयोगात्मक डिजिटल प्लेटफॉर्म डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का ध्यान डिजिटल साक्षरता, डिजिटल संसाधनों और सहयोगात्मक डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से भारत को डिजिटल सशक्त समाज में बदलने पर केंद्रित है। इसके साथ ही यह यूनिवर्सल डिजिटल साक्षरता और डिजिटल संसाधनों/सेवाओं की उपलब्धता को भारतीय भाषाओं में प्रदान करने पर जोर देता है।

सरकार का यह कार्यक्रम नि:संदेह क्रांतिकारी है। जैसा कि हम जानते हैं कि भारत को डिजिटल बनाना बंद आँखों से देखा जाने वाला सपना नहीं है। सरकार ने इसे साकार करने के लिए जो योजना बनाई है, उस पर कठोरता और शीघ्रता से पालन करना होगा। इसके साथ ही कुछ बुनियादी और ठोस प्रयासों की ओर ध्यान देना होगा। यथा- 

इंटरनेट की पहुँच को व्यापक किया जाए :  बेशक भारत इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की दृष्टि से विश्व में  तीसरा स्थान रखता है, लेकिन देश की आबादी के हिसाब से केवल 20 फीसदी लोग ही इंटरनेट से जुड़े हैं और इसमें भी अधिकतर उपभोक्ता शहरों से हैं। उम्मीद है कि 2020 तक भारत में 70 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट उपभोक्ता हो जाएंगे, जबकि 2013 तक यह संख्या महज 11 करोड़ थी। वहीं, 90 करोड़ से अधिक मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं के साथ दुनिया के सबसे बड़े टेलीकॉम बाजारों में से एक होने बावजूद भारत के पास ग्लोबल कंपनियों के मुकाबले बहुत कम स्पेक्ट्रम है। इसलिए अगर भारत सरकार डिजिटल इंडिया का अपना सपना साकार करना चाहती है तो उसे अधिक से अधिक स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराना चाहिए। सच तो यह भी है कि ब्रॉडबैंड कमीशन फॉर डिजिटल डेवलेपमेंट रिपोर्ट में भारत को 200 देशों में से 145वें क्रमांक पर रखा है। भारत को कम से कम कनेक्टेड देशों के 39 के समूह में स्थान दिया गया है। इस 39 देशों के समूह में अधिकतर अफ्रीकी देश हैं।

इंटरनेट की गति ठीक हो : जहां तक इंटरनेट गति की बात है तो भारत दुनिया में इंटरनेट गति के मामले में 118वें नंबर पर है। भारत से बेहतर इंटरनेट गति थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम की है। केवल 0.7 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं को ही भारत में 10 एमबीपीएस गति नसीब है। जबकि 4.9 प्रतिशत लोगों को 4 एमबीपीएस की स्पीड मिलती है। बाकि ज्यादातर उपयोगकर्ता गति के कारण काफी परेशान रहते हैं। हालात यह हैं कि 3जी और 4जी भी 'रो-रो कर' चलते हैं। डिजिटल भारत की उड़ान को ऊंचाई देने के लिए उसकी इंटरनेट की रफ्तार को ताकत देना आवश्यक है। टेलीकॉम विभाग ने भी अपनी एक बैठक में माना था कि कम से कम 2 एमबीपीएस डाउनलोड स्पीड की ब्रॉडबैंड सुविधा होनी ही चाहिए। 

इंटरनेट सेवा सस्ती हो : दुनिया के अन्य देशों से तुलना करते वक्त हम कह सकते हैं कि भारत में इंटरनेट सेवा सस्ती है। लेकिन, हम जानते हैं कि भारत की बहुसंख्यक आबादी के लिए इंटरनेट की कम दरें भी महंगी हैं। इंटरनेट का उपयोग बढ़ाने के लिए और सबको डिजिटली जोडऩे के लिए इंटरनेट की दरें कम करने की जरूरत है। अधिक अच्छा होगा कि अनेक स्थानों पर नि:शुल्क वाई-फाई की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

गाँव-कस्बों में इंटरनेट सेवा केंद्र स्थापित किए जाएं : हमें यह स्वीकार करना होगा कि गाँव और दूर-दराज के इलाकों में शत-प्रतिशत लोग इंटरनेट के उपभोक्ता नहीं बन सकते। यह उनके लिए बुनियादी जरूरत नहीं है। गाँवों में ही क्यों, शहरों में भी हमें अनेक लोग ऐसे मिल जाएंगे, जिनके घर या मोबाइल पर इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता। आवश्यकता के हिसाब से वह साइबर या ऑफिस या फिर अपने मित्र के यहाँ इंटरनेट सेवा का उपयोग कर लेते हैं। ऐसे में गाँव में प्रत्येक घर इंटरनेट कनेक्शन की कल्पना ही उचित नहीं होगी। इसके लिए सरकार गाँव-कस्बों में इंटरनेट सेवा केंद्र स्थापित करने चाहिए। गाँव में पंचायत भवनों और स्कूलों में इस तरह के सेवा केंद्र शुरू किए जा सकते हैं, जहाँ नागरिक डिजिटल उपलब्ध सेवाओं का लाभ ले सकें। 

डिजिटल साक्षरता बढ़ाई जाए : सरकार यह मान रही है कि सेवाओं के डिजिटली उपलब्ध होने से बिचौलियों का खेल खत्म हो जाएगा, तब वह हकीकत से रूबरू नहीं है। आज भी अनेक लोगों की स्थिति वैसी है, जैसी कि निरक्षर होने के कारण कभी उनके नाम आई चिट्ठी डाकिया पढ़कर सुनाया करता था। ऑनलाइन आवेदन करने से लेकर ऑनलाइन उपलब्ध सेवाओं को प्राप्त करने का तकनीकी ज्ञान अभी अनेक लोगों को नहीं है। उसका बहुत बड़ा कारण है कम्प्यूटर निरक्षरता। इसलिए सरकार का अधिक से अधिक जोर डिजिटल साक्षरता बढ़ाने पर भी होना चाहिए। इसके लिए सरकार ने डिजिटल साक्षरता अभियान 'दिशा' शुरू कर दिया है। 

केंद्र सरकार यदि ईमानदारी से इस कार्यक्रम को पूरी करती है, तब निश्चित ही 'अच्छे दिन' का नारा साकार हो जाएगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में वाकई यह क्रांतिकारी बदलाव होगा, जब आम आदमी और सरकार एक-दूसरे से सीधे जुड़े होंगे। सामान्य जन अपनी बात बिना किसी अवरोध के सरकार तक पहुँचा सकेगा और सरकार बिना किसी 'कम्युनिकेशन गैप' के उसकी आवाज को सुन सकेगी। दोनों के बीच डिजिटली संबंध-संपर्क स्थापित होने पर वह स्थिति नहीं रहेगी, जब सरकार की और से सामान्य जन के लिए एक रुपया जारी किया जाता है, लेकिन उस तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुँचते हैं। लोक और तंत्र जब सीधे जुड़े होंगे तब सुविधा अपने पूरे रूप में आखिरी आदमी तक पहुँचेगी। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि पहले व्यक्ति से लेकर अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से पहुँचेगी। इसका उदाहरण है-गैस सबसिडी, पेंशन और छात्रवृत्ति जैसी सुविधाओं का सीधे लाभान्वित के बैंक खाते में पहुँचना। डिजिटल भारत कार्यक्रम जब पूरी तरह लागू हो जाएगा, तब निश्चित ही सुशासन दिखाई देगा। इसलिए भारत के इस सपने को साकार करने में सरकारी एजेंसियों को ही नहीं, बल्कि गैर-सरकारी संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और राष्ट्र निर्माण का ध्येय लेकर चलने वाले लोगों को अपनी भूमिका का निर्वाहन करना चाहिए। यह बदलाव का समय है और हम सबको इस महत्त्वपूर्ण बदलाव का वाहक बनना चाहिए। 

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के नौ प्रमुख उद्देश्य :

1. ब्रॉडबैंड हाईवेज : इनके जरिए एक तय समय सीमा में बड़ी संख्या में सूचनाओं को प्रेषित किया जा सकता है। 

2. सभी को मोबाइल कनेक्टिविटी सुलभ कराना : शहरी इलाकों में भले ही मोबाइल फोन पूरी तरह से सुलभ हो गया हो, लेकिन देश के अनेक ग्रामीण इलाकों में अभी इस सुविधा का जाल वैसा नहीं हो पाया है। इससे ग्रामीण उपभोक्ताओं को इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग के इस्तेमाल में आसानी होगी। 

3. पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम : इस कार्यक्रम के तहत पोस्ट ऑफिस को मल्टी-सर्विस सेंटर के रूप में विकसित किया जाएगा। नागरिकों को विभिन्न सरकारी सेवाएं मुहैया कराने के लिए वहां अनेक तरह की गतिविधियों को अंजाम दिया जायेगा। 

4. ई-गवर्नेंस प्रौद्योगिकी के जरिए शासन में सुधार : इसके तहत विभिन्न विभागों के बीच सहयोग और आवेदनों को ऑनलाइन ट्रैक किया जाएगा। इसके अलावा स्कूल प्रमाण पत्रों, वोटर आईडी कार्ड्स आदि की जहां भी जरूरत पड़े, वहां उसका ऑनलाइन इस्तेमाल किया जा सकता है। 

5. ई-क्रांति - सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी : ई-एजुकेशन के तहत सभी स्कूलों को ब्रॉडबैंड से जोडऩे, सभी स्कूलों (ढाई लाख) में वाई-फाई की नि:शुल्क सुविधा मुहैया कराने और डिजिटल साक्षरता सुनिश्चि?त करने की योजना है। किसानों को वास्तविक समय में मूल्य संबंधी सूचना, मोबाइल बैंकिंग आदि की ऑनलाइन सेवा प्रदान करना भी इनमें शामिल है। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में ऑनलाइन मेडिकल परामर्श, रिकॉर्ड और संबंधित दवाओं की आपूर्ति समेत लोगों को ई-हेल्थकेयर की सुविधा देना भी इनमें शामिल है। 

6. सभी के लिए सूचना : इस कार्यक्रम के तहत सूचनाओं और दस्तावेजों तक ऑनलाइन पहुंच कायम की जाएगी। इसके लिए ओपन डाटा प्लेटफॉर्म मुहैया कराया जाएगा। 

7. इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में आत्मनिर्भरता : इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र से जुड़े तमाम उत्पादों का निर्माण देश में ही किया जाएगा। इसके तहत 'नेट जीरो इंपोर्ट्स' का लक्ष्य रखा गया है, ताकि वर्ष 2020 तक इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में देश आत्मनिर्भरता हासिल कर सके। 

8. रोजगार के लिए सूचना प्रौद्योगिकी : कौशल विकास के मौजूदा कार्यक्रम को इस प्रौद्योगिकी से जोड़ा जाएगा। गांवों व छोटे शहरों में लोगों को आईटी से जुड़ी नौकरियों के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। 

9. अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम्स : डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को लागू करने के लिए पहले कुछ बुनियादी ढांचागत सुविधाएं स्थापित करनी होंगी। 

अब तक की उपलब्धियाँ :

1. दूरसंचार का विस्तार : फरवरी 2016 तक भारत में टेलीफोन की पहुंच 82.93 प्रतिशत लोगों तक हो चुकी है। जिससे ग्रामीण इलाकों में टेलीफोन की पहुंच बढ़कर 50.63 प्रतिशत हो गई है। दूर-दराज के इलाकों तक पहुंची टेलीफोन सेवा ने उन्हें आपस में जोड़कर डिजिटल फासलों को मिटाने का काम किया है। ग्रामीण इलाकों में टेलीफोन सेवा की पहुंच का और अधिक विस्तार करने के लिए सरकार बीबीएनएल (भारत ब्रॉडबैंड निगम लिमिटेड) के जरिये 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को हाई स्पीड इंटरनेट प्रदान करने के लिए वचनबद्ध है।

2. प्रमुख भारतीय टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल का पुनर्जीवन : बीएसएनएल और एमटीएनएल का ब्रॉडबैंड नेटवर्क भारत में सबसे बड़ा है। कई तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए वर्ष 2014-15 के दौरान बीएसएनएल ने सेवाओं से होने वाली अपनी आय में 4.16 प्रतिशत की वृद्धि की है और घाटे में कारोबार करने की अपनी पुरानी पहचान को बदला है। जहां बीएसएनएल ने अपने ग्राहकों के लिए जुलाई, 2015 से मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा की शुरुआत की, वहीं एमटीएनएल ने ग्राहक केंद्रित दृष्टिकोण अपनाकर फिर से अपनी पुरानी साख हासिल की है। कंपनी ने अपने मौजूदा ब्रॉडबैंड ग्राहकों की इंटरनेट स्पीड को बिना कोई अतिरिक्त शुल्क लिए 2 एमबीपीएस तक बढ़ा दिया है। इसके अलावा एमटीएनएल ने अपने मौजूदा वॉइस ग्राहकों को एक महीने तक मुफ्त ब्रॉडबैंड सेवा देने की स्कीम शुरू की है। सभी के लिए इंटरनेट उपलब्ध कराने के लिए बीएसएनएल द्वारा 40 हजार वाईफाई हॉट स्पॉट लगाने की योजना है। वर्तमान में 1227 स्थानों पर 2504 वाईफाई हॉट स्पॉट काम कर रहे हैं।

3. डाक विभाग : पिछले दो सालों में डाक विभाग ने एक के बाद एक कई पड़ावों को पार करते हुए नई बुलंदियों को छुआ है। डाक विभाग की उपलब्धियों में कोर बैंकिंग सॉल्यूशन उपलब्ध कराना और कॉमन सर्विस सेंटर की सुविधाएं जैसे पेंशन तथा बीमा सेवा को ऑनलाइन उपलब्ध करवाना है। बैंकिंग सेवाएं, जैसे- धनराशि जमा करना, धनराशि भेजना, सेवा प्रदाताओं को ऑनलाइन भुगतान करना, डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर आदि प्रक्रियाओं को पोस्टल बैंकिंग सिस्टम के जरिए पूरा किया जा रहा है। डाक विभाग ने ई-कॉमर्स सेवाओं को काफी बढ़ावा दिया है। अमेजॉन, फ्लिपकार्ट, येप-मी, शॉपक्लूज और नापतोल आदि जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों और 800 अन्य कंपनियों ने सुचारू वितरण प्रक्रिया के लिए पोस्टल नेटवर्क के साथ हाथ मिलाया है। 

4. डिजिटल सेवा (सार्वजनिक सेवा केंद्र) : सार्वजनिक सेवा केंद्र (सीएससी) दरअसल आईसीटी समर्थित एक्सेस ऐसे प्वाइंट हैं, जिसके जरिए विभिन्न सरकारी और व्यावसायिक सेवाओं को जनता तक पहुंचाने का कार्य किया जाता है। सीएससी ग्रामीण भारत में कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता, स्वास्थ्य और वित्तीय सेवाएं प्रदान करने का कार्य करेंगे। वर्तमान में 1.66 लाख सीएससी का संचालन किया जा रहा है। दिसंबर, 2016 तक सभी 2 लाख 50 हजार ग्राम पंचायतों में सीएससी होंगे

5. डिजिलॉकर : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल लॉकर जैसी अनूठी और जरूरी सुविधा का लोकार्पण जुलाई 2015 में किया गया। उसी डिजिलॉकर पर करीब एक साल में 10 लाख से अधिक पंजीयन किए जा चुके हैं, 20 लाख दस्तावेज अपलोड किए गए हैं और करीब 90 लाख जारी किए गए हैं। यह प्रोजेक्ट अपनी सफलता के किस्से लगातार लिख रहा है। डिजिलॉकर की सुविधा के बाद दस्तावेजों के डुप्लीकेट/फोटोकॉपी का झंझट खत्म हो गया है। अब कोई भी व्यक्ति अपने दस्तावेजों को स्वहस्ताक्षरित कर सकता है और उन्हें डिजिलॉकर पर अपलोड कर सकता है।

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