मंगलवार, 18 नवंबर 2014

मध्यप्रदेश की धड़कन है माण्डू

जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
 जि सने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश में देखा क्या? इसलिए भारत का दिल देखने निकलो तो माण्डव जाना न भूलिएगा। बादशाह अकबर हो या जहांगीर, सबको यह ठिया पसंद आया है। अबुल फजल तो सम्मोहित होकर कह गया था कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू प्रकृति की गोद में खूब दुलार पा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु तो माण्डू का सोलह श्रंगार करने के लिए ही यहां आती है। बारिश में तो यह अल्हड़ नवयौवन की तरह अंगड़ाई लेता नजर आता है। यहां आकर आपका दिल भी आशिक मिजाज हो ही जाएगा। रानी रूपमति के महल से दिखने वाला नैसर्गिक सौंदर्य आपको प्रेम सिखा ही देगा। जहाज महल पर खड़े होकर आप असीम सुकून की अनुभूति करेंगे। हिन्डोला महल में आपका मन डोले बिना नहीं रहेगा। होशंगशाह का मकबरा मन को मोह लेगा और ताजमहल की याद दिलाएगा। आल्हा-ऊदल की कथाएं रोमांच बढ़ा देंगी, आपकी भुजाओं की मछलियां बाहर आने को मचल उठेंगी। ईको प्वाइंट पर खड़े होकर जब आप जोर से अपना नाम पुकारेंगे तो लगेगा कि दुनिया आपको सुन रही है। अद्भुत है माण्डू। रानी रूपमति और बाज बहादुर की खूबसूरत मोहब्बत की तरह माण्डू भी बेहद हसीन है।
  मालवा के परमार राजाओं के बसाए माण्डू को देखने के लिए अपने मित्र मनोज पटेल और गजेन्द्र सिंह अवास्या के साथ जाना हुआ। सुबह करीब 8 बजे राजेन्द्र नगर, इंदौर से कार से रवाना हुए और करीब दो घंटे में 100 किलोमीटर दूर स्थित माण्डू पहुंच गए। विंध्याचल की पहाड़ी पर करीब 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित माण्डू दुर्ग में प्रवेश से पहले एक गहरी खाई कांकडा खो है। थोड़ी देर यहां फोटो सेशन हुआ। इसके बाद अपनी समृद्धि, अपने सौंदर्य और रूपमति-बाज बहादुर के प्रेम के लिए मशहूर माण्डू के परकोटे में आलमगीरी और भंगी दरवाजे से प्रवेश किया। माण्डू दुर्ग का विस्तार बहुत अधिक है। इसके अलग-अलग हिस्सों में स्थित ऐतिहासिक इमारतें, भवन, धार्मिक स्थल और तालाब-बावड़ी किसी बड़े मैदान में बिखरे पड़े नायाब मोतियों, हीरे, जवाहरातों की तरह हैं। आधे दिन में सब कीमती मोतियों को निहारना मुमकिन नहीं था। इसलिए सबसे पहले हम किले पर बसाहट के बीच से कच्चे-पक्के रास्ते से होते हुए तारापुर दरवाजे पर पहुंचे। तारापुर दरवाजा माण्डू दुर्ग का एक छोर है। रास्ते में 'माण्डू की इमली' के पेड़ देखे। इसका स्वाद और आकार सामान्य इमली से अलग है। यह लगभग गोलाकार होती है। आप जब माण्डू जाएं तो 'माण्डू की इमली' जरूर चखें। मालवा अंचल में इसे 'खुरासिनी इमली' भी कहा जाता है। खुरासिनी इमली के पेड़ भी बरबस ही आपको अपनी ओर खींचते हैं। इनका तना काफी मोटा होता है। असल में ये पेड़ भारतीय मूल के नहीं हैं। सुल्तान होशंगशाह ने अफ्रीका से खुरासिनी इमली का बीज मंगाया था। अफ्रीका में इन्हें 'बाओबाब' के नाम से जाना जाता है। माण्डू के अनुकूल वातावरण पाकर यहां ये खूब फल रहे हैं। माण्डू  के सीताफल और रेत ककड़ी भी खास हैं। 
  तारापुर दरवाजे पर प्राकृतिक छटा का आनंद लेने के बाद हम लोग रानी रूपमति के महल पहुंच गए। अक्टूबर का महीना था। थोड़ी तीखी धूप तो थी। इसलिए हम चाह रहे थे कि कहीं से भी बादल घिर आएं, हल्की बारिश हो जाए तो माण्डू की अंगड़ाई का लुत्फ इत्मिनान से ले सकेंगे। कहते हैं न कि तुम जिस चीज को दिल से चाहो, तुम्हें उससे मिलाने में पूरी कायनात जुट जाती है। हुआ भी यही। कायनात खुद हाजिर हो गई हमारी ख्वाहिश पूरी करने के लिए। माण्डू आए थे तो दूर-दूर तक कहीं भी बादलों का नामोनिशान नहीं था लेकिन जैसे ही हल्की बारिश में उसका सौंदर्य देखने की हूक मन में उठी तो बादल भी घिर आए और बारिश भी हो गई। रानी रूपमति के महल में ठण्डी हवाएं संगीत सुनाने लगीं। महल की ऊपरी मंजिल में दो मण्डप हैं। बाज बहादुर यहां रूपमती से संगीत सुना करता था। वह रानी रूपमती के रूप के साथ-साथ उसके संगीत और नृत्य पर मुग्ध था। दोनों ही एक-दूजे से निश्छल प्रेम करते थे। बाजबहादुर और रूपमती की प्रेमकथाएं आज भी मालवा के लोकगीतों में गूंजती हैं। कहते हैं रानी रूपमती मां नर्मदा के दर्शन किए बिना अन्न ग्रहण नहीं करती थीं। इसलिए बाज बहादुर ने माण्डू में सबसे ऊंचे स्थान पर रूपमती महल का निर्माण कराया था। रानी रूपमती यहां से नित्य नर्मदा के दर्शन करती थीं। दूसरे मण्डप से रानी बाज बहादुर के महल को भी निहारती थीं। रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेमकथा माण्डू की स्थायी और विशेष पहचान बन गई है।
  रानी रूपमती के महल से निकलकर हम माण्डू के आकर्षण के केन्द्रों में शुमार जहाज महल और हिन्डोला महल को देखने चल दिए। पानी से घिरा होने के कारण यह महल ऐसा लगता है जैसे लंगर डालकर पानी में कोई विशाल जहाज खड़ा हो। जहाज महल करीब 120 मीटर लंबा, 15 मीटर चौड़ा और दो मंजिला है। यह मुंज तालाब और कपूर तालाब के बीच है। महल का वास्तु राजसी वैभव को बयां है। इसकी छत पर बने मण्डप में बैठकर मनोहारी दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। जहाज महल का निर्माण गयासुद्दीन खिलजी ने कराया था। सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने इसका उपयोग अपने विशाल हरम के रूप में किया था। कहते हैं कि उसके हरम में पन्द्रह हजार सुन्दर महिलाएं थीं। जहाज महल के पास ही गयासुद्दीन ने अपने सभा मण्डप के लिए हिंडोला महल का निर्माण कराया था। अपनी ढलानदार दीवारों के कारण यह झूलता हुआ-सा दिखाई देता है। महल की बाहरी दीवारें 77 डिग्री के कोण पर झुकी हुई हैं। बलुआ पत्थर से निर्मित इसकी सुंदर जालीदार नक्काशी और शानदार ढले हुए स्तम्भ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। हिंडोला महल के पीछे खूबसूरत चम्पा बावड़ी है। यहां कभी ठंडे और गर्म पानी का प्रबंध रहता था। चंपा बावड़ी जमीन के नीचे बनाए गए मेहराबदार तहखाने से जुड़ी है। माण्डू की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अंत:भूगर्भीय संरचना है। माण्डू का फैलाव जितना ऊपर है उतना ही नीचे है। शत्रु के आक्रमण के समय यह भूगर्भीय रचना सुरक्षा का एक साधन भी थी। रानियां और सैनिक चम्पा बावड़ी में छलांग लगाते थे और तहखानों के रास्ते सुरक्षित निकल जाते थे जबकि शत्रु को लगता था कि सब बावड़ी में डूबकर मर गए। यहीं आस-पास अनेक खण्डर राजसी वैभव और भव्यता की कहानी कहते नजर आते हैं। यहां दिलावर खान की मस्जिद, नाहर झरोखा, तवेली महल, उजली और अंधेरी बावड़ी और गदाशाह का घर भी देखना चाहिए। 
  सीरिया की राजधानी दमिश्क की विशाल मस्जिद से प्रेरित होकर बनाई गई जामी मस्जिद भी अपने महराबों, स्तम्भों और गुम्बदों के लिए चर्चित है। जामी मस्जिद के सामने अशरफी महल है। यह सोने के सिक्कों के महल के नाम से भी मशहूर है। इसे होशंगशाह के उत्तराधिकारी मोहम्मद शाह खिलजी ने बनवाया था। इसका उपयोग मदरसे के रूप में किया जाता रहा। खिलजी ने इस महल के प्रांगण में मेवाड़ के राणा कुंभा पर अपनी जीत की यादगार में एक सात मंजिला मीनार बनवाई थी। अब इसकी एक ही मंजिल बची है। हालांकि इतिहासकार बताते हैं कि युद्ध में राणा कुंभा ने खिलजी को परास्त किया था और चित्तौड़ में विजय स्तम्भ का निर्माण कराया था, जो आज भी शान से खड़ा है। 
  नीलकण्ठ महादेव मंदिर और नीलकण्ठ महल प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से शामिल हैं। नीलकण्ठ मंदिर एक पुराना शिव मंदिर है। जहां लोग आज भी पूरी आस्था के साथ जाते हैं। महल में एक कुण्ड है, जिसमें पहाड़ी झरने से पानी आता है। मंदिर के समीप ही महल का निर्माण मुगलकाल के मुस्लिम गवर्नर शाह बादशाह खान ने अकबर की हिन्दू पत्नी के लिए कराया था। यहां की दीवारों पर अकबर के समय के कुछ ऐसे शिलालेख हैं जो सांसारिक वैभव और समृद्धि की निस्सारता की ओर संकेत करते हैं। इसके अलावा होशंगशाह का मकबरा, रेवा कुण्ड, बाज बहादुर महल, हाथी महल, दरयाखान का मकबरा, दाई का महल, दाई की छोटी बहन का महल और जाली महल भी माण्डू की शान हैं। इन्हें भी देखा जाना चाहिए। शाम हो गई है अब हमें अगले पड़ाव पर निकलना है। हम तीनों मित्र जामी मस्जिद के सामने चाय पी रहे हैं तब तक आप माण्डू की कहानी सुनिए।
माण्डू का प्राचीन नाम मण्डप दुर्ग या माण्डवगढ़ है। माण्डू की आधारशिला रखने का प्रथम श्रेय परमार राजाओं को है। हर्ष, मुंज, सिंधु और राजा भोज इस वंश के चर्चित शासक रहे। लेकिन, इनका ध्यान माण्डू की अपेक्षा धार पर ज्यादा था। 12वीं-13वीं सदी में जैन मंत्रियों ने मांडवगढ़ को ऐश्वर्य की चरम सीमा तक पहुंचाया। अलाउद्दीन खिलजी के माण्डू पर आक्रमण के बाद से यहां हिन्दू शासन खत्म हो गया। हालांकि मुगल साम्राज्य के पतन के बाद माण्डू पर कुछ दिनों तक पेशवाओं का अधिकार रहा। इसके बाद यह इंदौर की मराठा रियासत में शामिल हो गया। 1401 ई. में माण्डू दिल्ली के तुगलकों के आधिपत्य से आजाद हो गया। मालवा के पठान शासक दिलावर खां गोरी का पुत्र होशंगशाह 1405 ई. में अपनी राजधानी धार से उठाकर माण्डू में ले आया। बाद में सत्ता गयासुद्दीन के हाथ में आई। गयासुद्दीन ने विलासता का वह दौर शुरू किया जिसकी चर्चा उस समय भारत में चारों ओर थी। 1531 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने माण्डू पर हमला किया। 1534 ई. में हुमायूं ने यहां अपना आधिपत्य स्थापित किया। 1554 ई. में माण्डू बाजबहादुर के शासनाधीन हुआ। किन्तु 1570 ई. में अकबर के सेनापति आदम खान और आसफ खान ने बाजबहादुर को परास्त कर माण्डू पर अधिकार कर लिया। कहा जाता है कि रूपमती पर आदम खान की गन्दी नजर थी। अपने सम्मान की रक्षा के लिए रूपमती ने विषपान करके अपने जीवन का अन्त कर लिया था। माण्डू की लूट में आदम खान ने बहुत सी धनराशि अपने अधिकार में कर ली और उसने अकबर के कार्यवाहक वजीर को छुरा घोंप दिया। जिससे नाराज होकर अकबर ने आदम खान को आगरा के किले की दीवार से दो बार नीचे फिकवाकर मरवा दिया था।
  आल्हा-ऊदल के बिना माण्डू का वर्णन अधूरा माना जाता है। आल्हाखण्ड में महाकवि जगनिक ने 52 लड़ाइयों का जिक्र किया है। उसमें पहली लड़ाई माड़ौगढ़ की मानी जाती है, जिसका साम्य इसी माण्डू से किया जाता है। इसलिए आल्हा गायकों के लिए माण्डू एक तीर्थस्थल सरीखा है। बुंदेलखंड के लोग यहां इस लड़ाई के अवशेष देखने आते हैं। राजा जम्बे का सिंहासन, आल्हा की सांग, सोनगढ़ का किला, जहां आल्हा के पिता और चाचा की खोपडिय़ां टांगी गई थी और वह कोल्हू जिसमें दक्षराज-वक्षराज को करिंगा ने पीस दिया था। ये सब आज भी आल्हा के मुरीदों को आकर्षित करते हैं। 
  मध्यप्रदेश अगर भारत का दिल है तो मांडू उस दिल की धड़कन है। अगर आप घुमक्कड़ी के शौकीन हो, इतिहास को उसके गवाहों से सुनना चाहते हो तो, राजसी वैभव की कल्पना करना चाहते हो, आपका मन कोमल है, प्राकृतिक सौंदर्य आपको आल्हादित करता है, किलों में दिलचस्पी है तो एक बार जरूर आइये माण्डू। बारिश के मौसम में जवान हुआ माण्डू निश्चित ही आपको बार-बार बुलाएगा और आप माण्डू बार-बार आने को मजबूर हो जाएंगे। तो एक दिन तो गुजारो गजब एमपी के अजब माण्डू में।
      कब और कैसे पहुंचे माण्डू : माण्डू की इंदौर से दूरी करीब 100 किलोमीटर है। महू, इंदौर और खंडवा निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। 30 किमी दूर स्थित धार से प्रत्येक आधे घंटे पर बस सेवा है। इसके अलावा इंदौर, खंडवा, रतलाम, उज्जैन और भोपाल से भी नियमित बस सेवा है। माण्डू घूमने का सबसे उचित समय जुलाई से मार्च तक है। एक-दो बारिश के बाद तो यहां पर्यटकों का हुजूम उमड़ पड़ता है। माण्डू में रात्रि विश्राम के लिए अनेक निजी और सरकारी होटल हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन के होटल मालवा रिसॉर्ट और मालवा रीट्रीट में भी ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। 
हिंडोला महलजहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह

खुरासिनी इमली का पेड़जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह

रानी रूपमती का महलजहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह

कांकडा खो पर तीन घुमक्कड़ी- लोकेन्द्र सिंह, गजेन्द्र सिंह और मनोज पटेल 
रानी रूपमती महज का बुर्ज, यहाँ से बाज बहादुर का महल दिखता है फोटो : लोकेन्द्र

रानी रूपमती के महल से बाज बहादुर के महल का नजारा फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
तारा पुर दरवाजे के नजदीक फोटो : गजेन्द्र सिंह 


जामी मस्जिद के भीतर गलियारे में अपुन फोटो : गजेन्द्र सिंह 

जहाज महल के सामने का कुंड फोटो : लोकेन्द्र सिंह 


7 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया !
    हम भी जा रहे अगले महीने

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    1. पाबला जी जरूर जाईये... शानदार जगह है

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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    1. शुक्रिया रविकर जी... आभार आपका

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  3. bahut sundar yatra . khusurat photo .idhar me bhi sikkim gaee thi samay mile tab dekhana .

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  4. बहुत बारीखी से वर्णन किया है वहां का |आँखों के आगे सभी चित्र सजीव हो उठाते हैं |

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