बुधवार, 13 अगस्त 2025

कुत्तो की चिंता परंतु गो-हत्या पर चुप्पी, क्यों?

आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर आश्रय स्थल भेजने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद कुछ लोगों का श्वान प्रेम अचानक से जाग गया है। जरा सोचिए, इन लोगों का यह प्रेम / चिंता / संवेदना गाय के प्रति क्यों नहीं जागती... अपितु गो-संरक्षण के मुद्दे पर इनके तर्क ठीक उलट होते हैं। गाय के प्रति इनकी सोच इतनी निर्दयी है कि ये लोग गाय को कसाई के हाथों काटे जाने के पक्षधर दिखाई पड़ते हैं। इनके लोग स्वयं भी गाय काटकर सड़क/चौराहों पर उसके रक्त/मांस भक्षण का उत्सव मनाते हैं।

आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर आश्रय स्थल में भेजने के निर्णय का विरोध करने जो 'डॉग लवर्स' सोशल मीडिया/सड़कों पर मोमबत्ती लेकर उतरे हैं, उनमें से कई लोग कई जीवों का भक्षण बहुत स्वाद से करते होंगे। जब ये लोग बोटी/हड्डी को चटकारे लेकर चबाते हैं तब क्या इनके भीतर से आवाज नहीं आती कि अपने स्वाद के लिए किसी के प्राण ही ले लिए? यहां तो कुत्तों को मारा नहीं जा रहा है, उन्हें केवल सड़क से शेल्टर में शिफ्ट किया जा रहा है। कभी सोचा है कि आप लोग तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए कितने की बकरों/मुर्गों की हत्या के कारण बन चुके हो?

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

डॉ. देवेन्द्र दीपक जी : जिन्होंने अपनी मेधा से राष्ट्रीयता के दीपक को प्रज्वलित रखा

श्री देवेन्द्र दीपक जी को प्रो. संजय द्विवेदी पर एकाग्र पुस्तक 'लोगों का काम है कहना' भेंट करते लोकेन्द्र सिंह

वरिष्ठ साहित्यकार श्रद्धेय देवेंद्र दीपक जी का सुखद सान्निध्य प्राप्त हुआ। निमित्त बने युवा पत्रकार आयुष पंडाग्रे। आयुष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गीतों की पुस्तक देवेंद्र दीपक जी को भेंट करने के लिए जाने वाले थे, तब मैंने उनसे कहा कि "साथ चलते हैं। मुझे भी जाना है।" लगभग डेढ़ घंटे हम श्रद्धेय दीपक जी के पास रहे। घड़ी की सुइयों पर कौन ध्यान देता, हम तो बस उनको सुनते जा रहे थे। बाहर सावन की रिमझिम थी और भीतर नेह की बारिश। हम एक विरले साहित्यकार की बौद्धिक यात्रा में गोते लगा रहे थे। राष्ट्रीय विचार की पगडंडी पर उनके जीवन में जो संघर्ष आए, उनके समाधान कैसे निकाले, वह सब हमारे सामने आ रहा था। डॉ. दीपक जी ने काव्य विधा में अद्भुत काम किया है। हमें आठ पंक्ति की कविता लिखने में जोर लगाना पड़ना है, आपने कई काव्य नाटक लिखे हैं। नि:संदेह आप पर माँ सरस्वती की विशेष कृपा है। आपने अपनी मेधा राष्ट्रीय चेतना के जागरण में समर्पित की है। आप राष्ट्रीय धारा के यशस्वी साहित्यकारों की माला के चमकते मोती हैं।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

कविताओं से आती गाँव-माटी-अपनत्व की महक

पुस्तक चर्चा : ‘चलो! चलते हैं अपने गाँव’ (काव्य संग्रह)


मन की भाव-भूमि उर्वर होती है, तब उससे काव्यधारा बह निकलती है। कविता की महक बताती है कि वह किस वातावरण में पल्लवित हुई है। युवा कवि कृष्ण मुरारी त्रिपाठी ‘अटल’ की कविताओं में गाँव, घर, समाज और देश के प्रति अपनत्व की खुशबू है। कर्तव्य का भाव है। अभिमान की अभिव्यक्ति है। उनके मन की पीड़ा भी कभी-कभी कविता का रूप धरकर प्रकट हुई है। कवि ने स्वयं माना है कि “गाँव-माटी, परम्पराएं, अपनापन और निश्छल मन मेरे हृदय तथा भावनाओं में बसता है। जो मेरी लेखनी को कागज के पन्नों में किसी न किसी रचना के रूप में उतारता रहता है”। जैसे अपने काव्य संग्रह ‘चलो! चलते हैं अपने गाँव’ की प्रतिनिधि कविता में अटल अपने गाँव को विविध रूपों में याद करते हैं। उन्हें गाँव की गलियां याद आती हैं, आँगन बुलाते हैं। गाँव का आध्यात्मिक वातावरण उनको राम की भक्ति से सरोबोर करता है। दादी-नानी के किस्से, अम्मा की लोरी, कक्कू की डांट, सब उन्हें अपने गाँव बुलाते हैं। अपनी इस कविता में जहाँ उन्होंने निर्दोष गाँव की उजली तस्वीर हमारी आँखों में उतारने की कोशिश की है, वहीं अपने काव्य संग्रह की आखिरी कविता ‘कोई लौटा दो- मेरा वही पुराना गाँव’ में वह गाँव के उस वातावरण को पुन: पाना चाहते हैं, जो गाँव को गाँव बनाता है। अपने गाँव, गाँव के बाशिदों एवं गाँव की प्रकृति को अटल ने अपनी कविताओं में खूब चित्रित किया है। अपनी लेखनी से वह अपनी जड़ों से जुड़े रहने का अनथक प्रयास करते हैं और पाठकों को भी प्रेरित करते हैं कि वे भी अपनी जड़ों की ओर लौटें।

गुरुवार, 24 जुलाई 2025

उपराष्ट्रपति के त्याग-पत्र ये सियासी प्याली में आया तूफान

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के त्यागपत्र ने सियासी प्याली में तूफान ला दिया है। विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष तक उनके अचानक त्यागपत्र देने के निर्णय से आश्चर्यचकित है। त्यागपत्र के पीछे की वजह उन्होंने अपने स्वास्थ्य को बताया है, लेकिन उनकी इस बात पर कोई भी सहज विश्वास करने को तैयार नहीं है। राजनीतिक गलियारे से बाहर निकलकर देखते हैं तो सामाजिक क्षेत्र से विशिष्ट एवं आमजन भी हैरान है। दरअसल, उपराष्ट्रपति के रूप में जगदीप धनखड़ ने अपनी एक अलग छवि बनायी थी। उनकी अपनी विशिष्ट शैली थी। स्वभाव से विनम्र थे लेकिन अपनी बात को कहने में कभी कोई संकोच नहीं किया। विपक्ष के नेता उनसे इसलिए परेशान रहते थे क्योंकि सदन को नियमों से चलाने में वे कतई कोताही नहीं बरतते थे। विपक्ष को खरी-खरी सुनाने में और सत्ता पक्ष को चेतावनी देने का कार्य वे बराबर करते थे।

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

पाठ्यक्रम से साफ हुई कम्युनिस्टों की दूषित सोच

अब पढ़ाया जाएगा- भारत का सच्चा और संतुलित इतिहास


राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने अपनी पाठ्य पुस्तकों को संशोधित करने का बहुप्रतीक्षित काम किया है। देश में लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि पाठ्य पुस्तकों में भारत का संतुलित इतिहास क्यों नहीं पढ़ाया जाता है? आखिर वह क्या सोच रही होगी जिसने भारतीय नायकों को इतिहास में न केवल सीमित स्थान दिया, अपितु उनको पराजित राजा की तरह ही प्रस्तुत किया? वहीं, भारत को लूटने के उद्देश्य से आए मुगल आक्रांताओं का न केवल महिमामंडन किया अपितु इतिहास की पुस्तकों में उन्हें सर्वाधिक स्थान देकर यह स्थापित करने का प्रयास किया कि मुगल काल ही भारत का वास्तविक इतिहास है। बौद्धिक चतुराई दिखाकर मुगलिया शासन की क्रूरताओं पर पर्दा डाल दिया गया। अब जबकि एनसीईआरटी ने भारत के इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की दिशा में जनाकांक्षाओं के अनुरूप पहल की है, तब यही सोच विरोध कर रही है।

विपक्ष को चर्चा नहीं… हंगामा चाहिए

जैसा कि अपेक्षित था कि संसद के मानसून सत्र की शुरुआत में विपक्ष हंगामा करेगा, वही हुआ। विपक्ष का आरोप है कि सरकार चर्चा से भागती है, जबकि सरकार का कहना है कि वह हर प्रकार से चर्चा के लिए तैयार है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए? मानसून सत्र की शुरुआत होने से पहले ही हंगामा करना, यही संकेत देता है कि विपक्ष को चर्चा नहीं अपितु हंगामा चाहिए। दरअसल, विपक्ष की कोशिश है कि वह यह वातावरण बना दे कि सरकार ऑपरेशन सिंदूर पर जवाब देने में असमर्थ है। इसलिए विपक्षी नेता अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध विराम कराने के दावों की गिनती भी करते रहते हैं। उन्हें अपने देश की सेना और जिम्मेदार अधिकारियों पर विश्वास नहीं है। याद हो, भारतीय सेना स्पष्ट कह चुकी है कि पाकिस्तान की सेना की ओर से युद्ध विराम का प्रस्ताव आया था, जिसे भारतीय सेना ने इसलिए भी मान लिया क्योंकि हम जो चाहते थे, वह प्राप्त कर लिया था। लेकिन विपक्ष के नेताओं को ट्रंप के दावों पर विश्वास है, जो स्वयं ही अपनी बातों से कई बार पलट जाते हैं।

सोमवार, 21 जुलाई 2025

न्यायालय की सुने समाज- लव जिहाद के विरुद्ध भय और संकोच छोड़कर सच बोलना ही होगा

लव जिहाद की साजिश जिस तरह सामाजिक संरचना को चोट पहुँचा रही है, उसे देखकर अब न्यायालय भी चिंतित दिखायी देने लगा है। हरियाणा के एक प्रकरण में ‘लव जिहाद’ के दोषी मुस्लिम युवक को सजा सुनाते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट की न्यायमूर्ति रंजना अग्रवाल ने जो चिंता व्यक्त की है, उसे समाज के प्रबुद्ध वर्ग को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए। लव जिहाद पर न्यायालय की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि “यह भी प्रामाणिक तथ्य है कि पिछले कई वर्षों से मुस्लिम पुरुष प्रेम के नाम पर भोली-भाली हिंदू लड़कियों को किसी न किसी तरह से बहकाकर उनसे विवाह कर लेते हैं और फिर इस्लाम में मतांतरित कर लेते हैं। यदि इस प्रक्रिया को उदार दृष्टिकोण अपनाकर जारी रहने दिया गया तो यह हमारे देश की सुरक्षा और अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएगा। यह मामला दर्शाता है कि हरियाणा में लव जिहाद एक वास्तविकता है”। न्यायालय की यह टिप्पणी उन सबको सुननी चाहिए, जो स्वयं को सेकुलर दिखाने के चक्कर में लव जिहाद की घटनाओं को स्वीकार ही नहीं करना चाहता है।