शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

आतंक के निशाने पर राष्ट्रवादी

देश के दो अलग-अलग हिस्सों में मंगलवार को दो हमले हुए। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भारतीय जनता पार्टी के विधायक भीमा मंडावी पर नक्सल आतंकी हमला और जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा पर इस्लामिक आतंकी हमला। इन हमलों में भाजपा विधायक भीमा मंडावी और संघ के जम्मू-कश्मीर प्रांत के सह सेवा प्रमुख चंद्रकांत शर्मा का बलिदान हो गया। प्रश्न यह है कि देश के प्रत्येक हिस्से में नक्सली, माओवादी, कम्युनिज्म और इस्लामिक आतंकवाद के निशाने पर राष्ट्रवादी विचारधारा के कार्यकर्ता क्यों हैं? 
          संभव है कि बहुत लोगों को यह प्रश्न बेमानी और अतार्किक प्रतीत हो। किंतु, इस प्रश्न की गंभीरता को समझने के लिए हमें कर्नाटक, केरल, पंजाब, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश सहित दूसरे अन्य राज्यों की घटनाओं का अध्ययन कर लेना चाहिए। जहाँ भी भारत विरोधी ताकतों को अवसर मिला है, उन्होंने राष्ट्रीय विचार से जुड़े लोगों को समाप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लिया है। दरअसल, उधार के विचार से भारतीय विचार पर विजय प्राप्त करना उनके लिए मुश्किल होता है। भारत विरोधी ताकतों की राह में 'राष्ट्रत्व' अकाट्य चट्टान बन कर खड़ा है। राष्ट्रत्व से ओतप्रोत साधारण कार्यकर्ता भी 'भारत को हजार घाव देने की बुरी नीयत वाली ताकतों' के विरुद्ध दम-खम से खड़ा है। 'भारत के टुकड़े-टुकड़े' करने के उनके मंसूबों को पूरा होने में राष्ट्रत्व का मंत्र लेकर जीने वाले लोग बड़ी बाधा बन गए हैं। राष्ट्रत्व का भाव एवं विचार दिनों-दिन मजबूत हो रहा है। अपने मंसूबे पूरे नहीं होने से हताश कट्टर विचारधाराओं ने अब भारतीय विचार के कार्यकर्ताओं को भयभीत करने के लिए उनकी हत्याएं करने का षड्यंत्र रचा है। भारत से पहले अब वह भारत के विचार को परास्त करना चाहते हैं। किंतु, यह संभव नहीं है। 
चंद्रकांत शर्मा अपने परिवार के साथ
          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या उसके समविचारी संगठनों के कार्यकर्ता, मृत्यु से भयभीत होकर कभी अपने कर्मपथ से डिगे नहीं हैं। 'भारत में एक विधान, एक प्रधान और एक निशान' की माँग के साथ भारतीय संविधान एवं राष्ट्रध्वज तिरंगे के सम्मान में इन्हीं भारतीय विचार के कार्यकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर में अपना बलिदान दिया है। केरल में एक के बाद एक कार्यकर्ता भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट और तृणमूल कांग्रेस की हिंसा का सामना भी यही लोग डटकर कर रहे हैं। भारत की रक्षा के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व अर्पण करने का प्रण लिया हो, उन्हें हिंसा से डराना संभव नहीं। इन कार्यकर्ताओं का बलिदान देश को जगाने का काम करता है। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। भारत को हराने के लिए एकजुट ताकतें, निश्चित तौर पर राष्ट्रत्व से हारेंगी। 
          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से जारी शोक संदेश में कहा गया है- 'दंतेवाड़ा में बलिदान हुए भाजपा विधायक भीमा मंडावी जनजातीय समाज के सुख-दु:ख में समरस, सादगी और सरलतापूर्ण जीवन एवं आचरण के कारण संपूर्ण समाज में अत्यंत लोकप्रिय थे। वे अपने साहसी स्वभाव और देशभक्ति पूर्ण विचारों के कारण माओवादियों की निगाह में सदैव खटकते थे। वहीं, किश्तवाड़ में बलिदान हुए चन्द्रकांत शर्मा बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। उनका परिवार प्रारंभ से ही समाजसेवा के कार्यों में सक्रिय था। वह लोगों में देशभक्ति की भावना को जगा रहे थे। इस कारण वे लंबे समय से अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों के निशाने पर थे।' दोनों महानुभावों के बलिदान से एक विचार कुल के साथ-साथ देश को बड़ी क्षति हुई है। यह लोग समाज को बेहतर बनाने की दिशा में अग्रसर थे। इस क्षति को पूरा तो नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके छूटे कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए शेष समाज को आगे आना चाहिए। 
नक्सली हमले में शहीद हुए भाजपा नेता भीमा मंडावी

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति 102वां जन्म दिवस : वीनू मांकड़ और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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  2. राष्ट्रीय विचारधारा को कभी भी खंडित नहीं किया जा सकता..वीर शहीदों को सादर नमन..

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