गुरुवार, 6 सितंबर 2012

इश्क के सिक्के

Lokendra singh
सुनहरा समय सरक गया हाथों से
हम बाहर हो गए उसके ख्वाबों से।

निकले थे सफर पर वो हाथ थामकर
मृग मरीचिका ने भटका दिया राहों से।

जिसके दिल-ओ-दिमाग में थे हरदम
अब हम निकल गए उनकी यादों से।

यादों के ठूंठ रह गए जिन्दगी में
महकते सब फूल टूट गए बागों से।

साथ देने की कसम ली थी मुझसे
आज वो ही मुकर गए अपने वादों से।

पहुंच न सकूं उसके आंगन तक
पैरों के निशां मिटाते चले वो राहों से।

ठन-ठन गोपाल रह गए जिन्दगी के मेले में
इश्क के सिक्के सब टपक गए फटी जेबों से।
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)



17 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  2. सिक्कों का टपक जाना सबसे बडा नुक्सान है। इसकी भरपाई नही होती कभी । बहुत अच्छी भाव पूर्ण रचना ।

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  3. सिक्कों का टपक जाना सबसे बडा नुक्सान है। इसकी भरपाई नही होती कभी । बहुत अच्छी भाव पूर्ण रचना ।

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  4. हृदय के वेदना को प्रकट करती भावपूर्ण रचना |

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  5. इश्क के सिक्को को संभालकर रखना चाहिए..
    ये जो खो गए तो वेदना गहरी होती है..
    संवेदनशील रचना..
    :-)

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    1. कोशिश तो यही थी और है... सिक्के संभल कर रखे जायें...

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  6. कारवाँ गुज़र गया ... सुन्दर रचना, सिक्कों की उपमा अच्छी लगी
    जेब सदियों से मेरी खाली थी, अपना क्या था जो अब गँवाना था।

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  7. लोकेन्द्र जी, आपका यह रूप भी बहुत पसंद आया!!

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  8. ये रिवर्स गियर कैसे लग गया भाईजान?
    वैसे फोटो एकदम पोस्ट के साथ मैच करती है, विरह ग्रस्त :)

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    1. आत्मीय संजय जी, अतीत को वर्तमान में खींच कर लाने की कोशिश की है.... हा हा हा

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  9. बहत की तकलीफदेह स्तिथि होती है यह ......बचे खुचे रीतेपन को बहुत सुन्दरता से दर्शाती हुई रचना

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  10. सिक्के है तो हाथ में कहाँ टिकेंगे..बढ़िया रचना है जी..साधुवाद

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