सोमवार, 17 नवंबर 2014

दर्द का बयान

 उ नका बचपन गरीबी में बीता। वे मेरठ में रहते थे। मिट्टी का कच्चा घर था। एक बरसात में उनका मकान गिर गया। उनके पास इतने भी पैसे न थे कि उनकी मुरम्मत करा पाते। समाज के वंचित वर्ग का हिस्सा होने के कारण उन्हें हर कदम पर समूची मानवता को लजाने वाला अपमान भी झेलना पड़ता था। उनके हौसले को सलाम है कि इस गरीबी और संघर्ष के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। चप्पल-जूते भी नहीं थे, उनके पास। स्कूल के लिए नंगे पैर ही आना-जाना पड़ता था। अच्छे कपड़े तो बहुत दूर की बात है, उनके पास स्कूल की गणवेश सिलवाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। दो-दो साल पुराने, फटे और छोटे हो गए कपड़े पहनकर वे स्कूल जाते थे। यहां पर भी संघर्ष ही उनका स्वागत करता था। शिक्षा के मंदिर में उन्हें शिक्षक ही अपमानित करते थे। उन्हें कहा जाता था कि क्या करोगे पढ़-लिखकर जूते-चप्पल ही तो बनाना है। लेकिन, धुन के पक्के मोहनदास नैमिशराय ने हार नहीं मानी। आग से तपकर निकले मोहनदास नैमिशराय आज दलित पत्रकारिता और साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।  
      उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर में 5 सितंबर 1949 को जन्मे बेहद मृदुभाषी, सहज और सरल व्यक्ति के धनी मोहनदास नैमिशराय सामाजिक सरोकारों और वंचित समूह के लिए समर्पित चर्चित पत्रिका 'बयान' के सम्पादक हैं। उन्होंने पांच वर्ष तक भारत सरकार के डॉ. आम्बेडकर प्रतिष्ठा, नई दिल्ली को बतौर सम्पादक और मुख्य सम्पादक अपनी सेवाएं दीं। प्रिंट पत्रकारिता, रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म और नाटक आदि में भी उन्होंने अपने लेखन कार्य से अमिट छाप छोड़ी है। संघर्षशील जीवन में भोगा गया यथार्थ, गरीबी का दंश और तिरस्कार से उपजी वेदना को श्री नैमिशराय ने अपने लेखन में उतारा है। उनका यह दर्द सम्पूर्ण दलित समाज का है। उनका चर्चित उपन्यास 'जख्म हमारे' इसकी बानगी है। उनके लेखन की विशेषता है कि समाज के दु:ख के साथ अपने दु:ख को जोड़ते हैं। वे सार्थक बदलाव की बात करते हैं, भविष्य की बात करते हैं, अतीत को पकडक़र रोते नहीं है, अमानवीय व्यवहार के लिए सवर्णों की भूल पर उन्हें कोसते भी नहीं हैं। 
      महानायक बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर पर पहला ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले मोहनदास नैमिशराय की करीब पचास कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कहानी संग्रह, कविता संग्रह, विचार-सार, अनुवाद, आत्मकथा, उपन्यास सहित अन्य विद्याओं की कृतियां शामिल हैं। उन्होंने भारतीय दलित आंदोलन का इतिहास चार भागों में लिखा है। 
     हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के गौरव मोहनदास नैमिशराय को कास्ट एण्ड रेस पुस्तक के लिए डॉ. आम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन पुरस्कार, कनाडा से सम्मानित किया जा चुका है। हिन्दी साहित्य के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्री नैमिशराय को पत्रकारिता के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी नवाजा गया है।
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"मोहनदास नैमिशराय आम्बेडकरवादी धारा के ऐसे लेखक हैं जिनके समूचे लेखन से सामाजिक समरसता की भावना को शक्ति मिलती है।"  
- संजय द्विवेदी, कार्यकारी संपादक, मीडिया विमर्श
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

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