शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

‘जलकुंभी से भरी नदी में’ संवेदनाओं और सरोकारों का बोध

देखें वीडियो ब्लॉग : युवा कवि पुरु शर्मा के काव्य संग्रह की चर्चा

हिन्दी साहित्य के विस्तृत आकाश में जब कोई युवा हस्ताक्षर अपनी पहली कृति के साथ उपस्थित होता है, तो उससे कई उम्मीदें जुड़ जाती हैं। अशोकनगर, मध्यप्रदेश के युवा कवि पुरु शर्मा का पहला काव्य संग्रह ‘जलकुंभी से भरी नदी में’ उन उम्मीदों पर न केवल खरा उतरता है, बल्कि भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करता है। यह संग्रह एक ऐसे युवा मन का दर्पण है जो अपने अध्ययन और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता के धागों से बुना गया है। पुरु की कविताओं में कोमलता का अहसास है। अपने समय की पीढ़ी से जनसरोकारों पर सीधा संवाद है। पर्यावरण संरक्षण की चिंता उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। अपनी विरासत को लेकर गौरव की अनुभूति है। अपनी कविता के माध्यम से पुरु साहित्य के धुंरधरों से साहित्य के धर्म की बात करते हैं। कहना होगा कि पुरु शर्मा की कविताएँ केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों का बयान नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय, समाज, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति एक सजग नागरिक की चिंताएँ हैं। संग्रह के शीर्षक से ही पर्यावरण के प्रति कवि का गहरा सरोकार स्पष्ट होता है। एक युवा कवि का अपने देश और संस्कृति के प्रति ऐसा अनुराग देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

युवा कवि पुरु शर्मा की कविताओं का फलक विस्तृत है। इनमें गाँव की सोंधी महक है, तो शहर की दहलीज पर छूटती संवेदनाओं की कसक भी। इनमें विरासत का गौरव है, तो ‘नदियों का कत्ल करने वाली पीढ़ी’ के प्रति तीखा आक्रोश भी। सुप्रसिद्ध कवि डॉ. हरिओम पवार ने सही रेखांकित किया है कि पुरु प्रतिदिन के जिन विषयों को उठाते हैं, अपनी लेखनी से उन्हें ऐसा विस्तार देते हैं कि पाठक विस्मित होकर सोचने पर विवश हो जाता है। इस संग्रह की एक मुख्य अंतर्धारा ‘लौटने’ की है- गाँव की ओर, प्रकृति की ओर और अपने पुरखों के मूल्यों की ओर। जैसा कि राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष इंदुशेखर तत्पुरुष ने टिप्पणी की है- “यह लौटना केवल व्यक्तिगत नॉस्टेल्जिया नहीं है, बल्कि यह एक गहरी ‘आध्यात्मिक-सांस्कृतिक तृषा’ है, जो व्यक्ति, प्रकृति, समाज और परमात्मा के पारस्परिक सहज संबंधों के विच्छिन्न होने से उत्पन्न होती है”। 

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल में पुरु शर्मा की पुस्तक 'जलकुंभी से भरी नदी में' का विमोचन

कवि पुरु शर्मा स्वयं अपने आत्मकथ्य में मानते हैं कि कविता मात्र आत्माभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शताब्दियों के संचित ज्ञान और सांस्कृतिक मनीषा का निचोड़ है। उन्होंने लिखा है- “जब कोई कवि लिखता है तो मात्र आत्माभिव्यक्ति नहीं करता, कवि अपनी सांस्कृतिक मनीषा को, शताब्दियों के संचित ज्ञान और अनुभवों के निचोड़ को व्यक्त करता है। कविता मनुष्यता के पक्ष में ऐसी सशक्त आवाज है, जो निरंतर विद्रूप को तोड़कर उसे ज्यादा मानवीय और सुंदर बनाने का काम करती है”।

‘जलकुंभी से भरी नदी में’ में कुल 47 कविताएँ विविध रंगों से सजी हैं। पर्यावरण संरक्षण पर उनकी चिंता ‘नदियों का कत्ल करने वाली पीढ़ी’ कविता में बहुत मारक ढंग से उभरती है- “पास कोई शहर है जो आहिस्ता-आहिस्ता निगल रहा है नदी को... दर्द में रेंग रही है नदी”। वहीं दूसरी ओर, यह संग्रह साहित्य और पुस्तकों के महत्व को बहुत खूबसूरती से स्थापित करता है। डिजिटल युग में ‘अदृश्य पुरखे’ और ‘किताबें’ जैसी कविताएँ पुस्तकों को हमारी सबसे विश्वसनीय शरणस्थली और रेगिस्तान में छांव के रूप में चित्रित करती हैं। ‘अदृश्य पुरखे’ में उनके भावों से जुड़कर किताबों के महत्व को समझने की कोशिश कीजिए- “हम जब भी कभी/ थककर, हताश या टूटकर गिरते हैं / हमेशा किताबों की हथेलियों में ही गिरते हैं। / किताबें हमारे लिए अदृश्य पुरखे हैं / उनकी ममत्व की गोदी / हमारे लिए सबसे विश्वसनीय शरणस्थली है।” इसी प्रकार ‘किताबें’ बाँचकर देखिए, वे हमसे क्या कहना चाहती हैं-  “रेगिस्तान में छांव-सी हैं किताबें / दिल में गाँव सी हैं किताबें / यादों के समंदर में / नाव सी हैं किताबें।” 

घोर निराशा के दौर में पुरु शर्मा की कविताएँ उम्मीद का दामन नहीं छोड़तीं। ‘उम्मीद का उजाला’ जैसी रचनाएँ उनके सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रमाण हैं- “माना रात घनी है, घोर तमस से भरी है / उजियारी भोर के सामने कई चुनौतियां धरी हैं। / तुम सूरज पर ऐतबार बनाए रखना / उम्मीदों के दीपक जलाए रखना।” एक ओर कविता को देखिए, कवि किस प्रकार विपरीत परिस्थितियों का सामना मुस्कुराकर करने का साहस अपने पाठकों के हृदय में उतार रहा है- “उजालों की निशानी संभाले रखना/ उम्मीदों की लौ जलाए रखना।/ गुजरेंगी मुश्किलों की हवाएं भी/ बस होठों पे मुस्कुराहट बनाए रखना”। आज के समय में व्यक्ति को सबसे अधिक आवश्यकता इसी भरोसे की है। चारों ओर से नकारात्मकता में घिरे मनुष्य के मन में आशा के कुछ बीज बोने का काम हम साहित्यकारों का धर्म है। अन्यथा मनुष्य टूटकर बिखर जाएगा और हम देखते रह जाएंगे। अगर हमारे कुछ शब्द और भाव, किसी को संभालने में सहयोगी होते हैं, तो यह हमारी कलम की सार्थकता है।

एक युवा मन प्रेम के अहसास से अछूता कैसे रह सकता है? पुरु शर्मा के इस काव्य संग्रह में प्रेम रस में पगी कविताएं भी पाठकों मन को सुकून देती हैं। ‘अधूरा प्रेमपत्र’ में प्रेम में इंतजार की मिठास को उन्होंने बहुत सहजता से व्यक्त किया है। ‘लास्ट बेंच’ पर बैठकर उन्होंने कभी ‘प्रेम की इबारत’ लिखी थी, उसे ‘मोहब्बत’ तक पहुँचाने का काम बहुत चातुर्य के साथ कवि ने किया है। ‘दिल की बातें’ कहने का सलीका ही तो कवि की ताकत है। ‘ख्वाहिशें’ हजार हों लेकिन उन्हें कहना न आया, तो क्या बात हुई। ‘अधूरे प्रेमपत्र’ में कवि प्रेम पर बहुत बड़ी बात कह गया है- “ताउम्र किसी के इंतजार में होना/ प्रेम में होने की पहली सीढ़ी है।”

पुरु शर्मा की भाषा बेहद सहज और सरल है, जो सीधे पाठक के दिल में उतरती है। उनमें युवा मन का अल्हड़पन और एक गंभीर अध्ययेता की परिपक्वता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे अपनी बात कहने के लिए आडंबर का सहारा नहीं लेते, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर अलंकृत भाषा-शैली का कौशल दिखाने से भी नहीं चूकते। कुल मिलाकर, ‘जलकुंभी से भरी नदी में’ एक समर्थ युवा कवि का दमदार आगाज है। यह काव्य संग्रह बताता है कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी नहीं है, बल्कि वह आधुनिकता के शोर में अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय तलाश रही है। साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के सहयोग से प्रकाशित यह 74 पृष्ठीय पुस्तक हिन्दी काव्य प्रेमियों के लिए पठनीय और संग्रहणीय कृति है। यदि यह पुस्तक आपके संग्रह में रहेगी तो जब-तब आप इन कविताओं को गुनगुना सकते हैं। इन्हें पढ़कर आनंदित हो सकते हैं। 


पुस्तक : जलकुंभी से भरी नदी में (काव्य संग्रह) 

कवि : पुरु शर्मा 

प्रकाशक : संदर्भ प्रकाशन, भोपाल (साहित्य अकादमी म.प्र. के सहयोग से) 

पृष्ठ : 74

मूल्य : ₹250

स्वदेश ज्योति में 31 जनवरी को प्रकाशित पुरु शर्मा की पुस्तक 'जलकुंभी से भरी नदी में' की समीक्षा

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

शाखा में नित्य आने से होता है समग्र व्यक्तित्व विकास

संस्कार केंद्र है संघ शाखा : खेल-खेल में स्वयंसेवक सीख जाते हैं प्रबंधन के सूत्र, संगठन शास्त्र, परोपकार, सेवाभाव, पारिवारिक आत्मीयता, सामुहिकता और समन्वय जैसे गुण


संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण के लिए शाखा के रूप में अनूठी कार्यपद्धति दी है। शाखा की सामान्य-सी दिखनेवाली गतिविधियों में वह जादू है कि नित्य शाखा आने वाले स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व में व्यापक परिवर्तन आता है। स्वयंसेवक का समग्र व्यक्तित्व विकास होता है। शाखा के संस्कार से स्वयंसेवकों के मन में पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक उत्तरदायित्व, परोपकार, देशभक्ति, संवेदनशीलता, साहस, सेवा और प्रबंधन जैसे अनेक गुण विकसित होते हैं। संघ विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में लिखते हैं- “संघशाखा पर प्रतिदिन एकत्रीकरण, यह अपनी कार्यपद्धति के संगठनसूत्र का बुनियादी पहलू है। उसमें से ही, आनेवाले स्वयंसेवकों के मन में एक पारिवारिक आत्मीयता का भाव विकसित होता है। इस पारिवारिकता के कारण ही एकसाथ काम करने की उमंग मन में पैदा होती है। सामूहिक कार्यक्रमों के माध्यम से ही सामूहिक मानसिकता का निर्माण होता है, इस मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के प्रकाश में सामूहिक कार्यक्रम हम करते हैं। संघशाखा यह एक संस्कार केंद्र है”। 

सामान्यतौर पर संघ की शाखा 60 मिनट की रहती है। यह 60 मिनट स्वयंसेवक एक अनुशासित व्यवस्था में व्यतीत करते हैं। शाखा पर होने वाले सभी शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रमों का पूर्व नियोजन होता है। प्रत्येक कार्यक्रम के लिए कालखंड विभाजित हैं। ऐसा नहीं होता कि स्वयंसेवकों को खेलने में आनंद आ रहा है, तो उस दिन शाखा पर केवल खेल ही होंगे। सामान्यतौर पर 40 मिनट शारीरिक, 10 मिनट बौद्धिक और शेष 10 मिनट शाखा लगाने एवं विकिर (शाखा छोड़ने) के लिए तय रहते हैं। सबसे पहले स्वयंसेवक संघस्थान पर एकत्र होते हैं। उसके पश्चात आचार पद्धति से शाखा लगाने का कार्य मुख्य शिक्षक सम्पन्न करता है। पहले स्वयंसेवक गुरु ‘भगवा ध्वज’ को प्रणाम करते हैं, उसके बाद ही शाखा में शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रमों की रचना होती है। प्रारंभ में शाखा पर उपस्थित स्वयंसेवकों की उम्र को ध्यान में रखकर व्यायाम, सूर्यनमस्कार, योग एवं आसान कराए जाते हैं। उसके बाद, लगभग 15 मिनट विभिन्न प्रकार के खेल खिलाए जाते हैं। शारीरिक कार्यक्रमों में समता, दंड संचालन, नियुद्ध इत्यादि भी शामिल रहते हैं। उसके बाद 10 मिनट बौद्धिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन, समाचार समीक्षा इत्यादि) सम्पन्न कराए जाते हैं। सबसे अंत में, सभी स्वयंसेवक प्रार्थना करते हैं और ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारे गुणों को अपने साथ लेकर समाज में जाते हैं।


बिना बताए होता है प्रशिक्षण :

विद्वान मानते हैं कि अच्छी शिक्षण प्रणाली वही है, जिसमें बच्चे को बताना न पड़े कि उसे क्या सिखाया जा रहा है। संघ शाखा व्यक्ति निर्माण का ऐसा ही केंद्र है, जहाँ स्वयंसेवक खेल-खेल में साहस, अनुशासन, कर्तव्य परायणता, गीत गाते-गाते देशभक्ति, आपस में मेलजोल से एकजुटता सीख जाता है। संघ की शाखा पर ऐसी ही शिक्षण प्रणाली अपनायी जाती है, जहाँ किसी को बताया नहीं जाता कि आज तुम्हें देशभक्ति, सामाजिक समरसता, सद्भाव या सेवा का गुण सिखाया जाएगा। श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी लिखते हैं कि “देशभक्तिशून्य, जातिभेदग्रस्त, स्वार्थपरायण हिन्दू समाज को डॉक्टर हेडगेवार यदि ऐसा आह्वान करते कि हिन्दुओं, आप में इतने दोष हैं, आइये हमारी शाखा में, मैं आपके दोष हटाकर, आपको देशभक्तिपरिपूर्ण, समतायुक्त और नि:स्वार्थ सेवक के रूप में परिवर्तित करने का दावा करता हूँ तो एक भी व्यक्ति संघस्थान पर कदम नहीं रखता। उलटा उलाहना देता कि भले आए हमें देशभक्ति और निःस्वार्थ सेवाभाव सिखाने वाले। डॉक्टर हेडगेवार समाज का यह मानसशास्त्र जानते थे। अतः उन्होंने लोगों को खेलने के लिए बुलाया। दण्डादि शारीरिक कार्यक्रम करने की शिक्षा दी और इन कार्यक्रमों की ऐसी रचना की कि संघ के इन सामान्य कार्यक्रमों से देवदुर्लभ कार्यकर्ता तैयार हुए”। 

खेलों में छिपा है समाजजीवन का संस्कार :

शाखा के खेल केवल मनोरंजन या व्यायाम के लिए नहीं होते। उनमें संस्कार देने की क्षमता है। शाखा के खेल स्वयंसेवक के मन पर संस्कार डालते हैं, जो उसकी वाणी, विचार और व्यवहार में सदा दिखायी देते हैं। एक बार जब श्री गोलवलकर केरल की यात्रा पर थे, तब कुछ किशोर स्वयंसेवकों ने उनकी उपस्थिति में एक खेल खेला। बाद में उन्होंने स्वयंसेवक से पूछा- “इस खेल का नाम क्या है?” लड़के ने जवाब दिया- “दीपक बुझाना”। इस पर श्रीगुरुजी ने एक बड़े स्वयंसेवक से पूछा- “क्या लड़के ने सही नाम बताया?” जब उसने हां में उत्तर दिया तो श्रीगुरुजी ने कहा- “किसी भी खेल का नाम ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारी संस्कृति में दीपक बुझाना अशुभ माना जाता है। यहां हम कहते हैं कि ज्ञान का दीपक चमकता रहे। खेलों में भी नाम ऐसे होने चाहिए जो अच्छे संस्कार पैदा करें’’। उसके बाद स्वयंसेवकों ने उस खेल का नाम बदल लिया। इसी प्रकार, एक बार श्रीगुरुजी को सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पूछा कि जो साहस का कार्य करने के लिए हमारे पेशेवर सैनिक भी कतराते हैं, वह आपके स्वयंसेवक कैसे कर जाते हैं, आप उन्हें कौन सी शिक्षा देते हैं; तो श्रीगुरुजी ने उत्तर दिया- “हमारी कबड्डी से यह साहस आता है। संघ की कार्यपद्धति की विशेषता यह है कि यहाँ मैन विथ कैपिटल एम बन जाता है”। संघ की शाखा पर जब स्वयंसेवक एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खेलता है, तब उसके भीतर पारिवारिक आत्मीयता की भावना पैदा होती है। 

नारों में जीवन का संदेश :

खेल खेलते समय स्वयंसेवक जोश का संचार करने के लिए नारे लगाते हैं- भारत माता की-जय, वन्दे-मातरम्, जय शिवाजी-जय भवानी, अलग है भाषा, अलग है वेश-फिर भी अपना एक देश, संगठन में-शक्ति है, हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, छुआछूत को-नहीं सहेंगे, हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, भेदभाव को-दूर करेंगे, अन्न जहां का हमने खाया, वस्त्र जहां के हमने पहने, उसकी रक्षा कौन करेगा-हम करेंगे हम करेंगे इत्यादि। ये नारे स्वयंसेवकों के मन में देश-समाज के प्रति समर्पण की भावना जगाते हैं। आपसी भेदभाव मिटाकर सबको एकसूत्र में बांधते हैं। यही कारण है कि जब महात्मा गांधी संघ की शाखा में पहुँचते हैं तो यह कहे बिना नहीं रहते कि “स्वयंसेवकों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ”। यह अनुभूति बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी होती है- “मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि यहाँ पर स्वयंसेवक किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना, एक-दूसरे की जाति जाने बगैर परस्पर भाईचारे से रह रहे हैं”। 

गीत, कथा, अमृतवचन से बौद्धिक विकास :

शारीरिक के साथ-साथ स्वयंसेवक का बौद्धिक विकास हो, शाखा के कार्यक्रमों में इसका पाठ्यक्रम भी शामिल है। एकात्मता स्रोत के माध्यम से स्वयंसेवक भारत की गौरवशाली परंपरा का स्मरण करते हैं। महान नायकों के आदर्श को अपने आचरण में उतारने का संस्कार इससे मिलता है। बोध कथा, बड़ी कहानी, प्रेरक प्रसंग इत्यादि से सत्यनिष्ठा, लोक व्यवहार, संवेदनशीलता, परोपकार जैसे गुण स्वयंसेवक के भीतर विकसित होते हैं। संघ के गीतों की रचना भी समयानुकूल होती है। जिस प्रकार का भाव स्वयंसेवकों के मन में चाहिए, वैसे ही गीत रचे एवं गाए जाते हैं। संघ के गीत केवल देशभक्ति का ज्वार पैदा नहीं करते हैं अपितु सामाजिक मुद्दों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी जगाते हैं। बौद्धिक कार्यक्रमों का बारीकी से अध्ययन करें, तो ध्यान आएगा कि ये कार्यक्रम स्वयंसेवकों को अपनी विरासत से जोड़कर, उस पर गौरव की अनुभूति करना सिखाते हैं। स्वयंसेवकों का इस प्रकार का व्यक्तित्व संघशाखा के विविध शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रमों से ही बनता है। इसलिए कहा जाता है कि व्यक्ति निर्माण के लिए शाखा जैसी कोई दूसरी पद्धति है ही नहीं। 

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व्यक्ति निर्माण का केंद्र है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 1 फरवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

भावाक्षर : संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ की काव्यात्मक अभिव्यक्ति

यह वीडियो ब्लॉग भी देखें : युवा कवि डॉ. कपिल भार्गव के काव्य संग्रह 'भावाक्षर' की समीक्षा


साहित्य का मूल उद्देश्य मनुष्य की संवेदनाओं को शब्द देना है। जब एक संवेदनशील मन अपने परिवेश, राष्ट्र, समाज और निजी अनुभूतियों को शब्दों के धागे में पिरोता है, तो ‘भावाक्षर’ जैसा संग्रह जन्म लेता है। युवा कवि और संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. कपिल भार्गव का काव्य संग्रह ‘भावाक्षर’ महज कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों का एक कोलाज है। जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने भावों को काव्य के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। कुल 77 कविताओं के इस गुलदस्ते में कवि ने सामाजिक सरोकारों से लेकर मानवीय पहलुओं, और राष्ट्रभक्ति से लेकर पर्यटन तक के विषयों को स्पर्श किया है। संस्कृत के विद्वान होने के नाते डॉ. कपिल की भाषा में सहज संयम और संस्कार दिखाई देता है। उन्होंने समाचारपत्र में प्रकाशित बुजुर्ग की तस्वीर पर कविता लिखी है तो प्रकृति पर हो रहे आघात पर अपनी पीड़ा को शब्द दिए हैं, यह उनके संवेदनशील कवि होने का प्रमाण है। ‘महानायक चार्ली चैपलिन’ और ‘विवाह की तृतीय वर्षगाँठ’ जैसी कविताएं बताती हैं कि कवि का मन छोटी-बड़ी हर घटना से प्रभावित होता है।

शनिवार, 31 जनवरी 2026

सबके लिए है संघ की शाखा

संघ शताब्दी वर्ष : जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक कहते हैं कि संघ को समझना है तो शाखा में आइए। प्रश्न है कि शाखा कहाँ लगती है और किस शाखा में जाना चाहिए? एक बात तो सभी जानते हैं कि सामान्यतौर पर संघ की शाखा खुले मैदान/स्थान पर लगती है। वरिष्ठ प्रचारक मधुभाई कुलकर्णी लिखते हैं- “जिस स्थान पर शाखा लगती है उसे हम संघस्थान कहते हैं, खेल का मैदान नहीं। संघस्थान तैयार करना पड़ता है। संघ में शाखा यानी भारत माता की आराधना ही है। वह स्थान, जहां भारत माता की प्रार्थना होती है तथा जहां अज्ञान का अंधकार दूर करने वाले भगवा ध्वज की स्थापना होती है, वह स्थान कैसा होना चाहिए? वह स्थान होना चाहिए मंदिर के समान स्वच्छ, पानी से धोकर साफ किया, रेखांकन (रंगोली) से सजा-धजा”।  ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो पार्क या मैदान किसी समय में ऊबड़-खाबड़ थे, संघ की शाखा शुरू होने के बाद स्वयंसेवकों के परिश्रम ने उन्हें व्यवस्थित कर दिया। एक विद्यालय के संचालक संघ शिक्षा वर्ग के लिए स्थान देने को तैयार नहीं थे लेकिन बाद में बहुत आग्रह के बाद उन्होंने स्थान दे दिया। सात दिन के प्राथमिक शिक्षा वर्ग के समापन कार्यक्रम में जब स्कूल संचालक आए और उन्होंने मैदान का कायाकल्प देखा तो हैरान रह गए। बहरहाल, शाखा को संघ की आत्मा कहा जाता है। संघ कार्य का आधार यही शाखाएं हैं, जो खुले मैदान में लगती हैं। यानी संघ का बुनियादी कार्यक्रम एकदम पारदर्शी है। 

अब प्रश्न आता है कि संघ की शाखा में कौन आ सकता है? संघ की शाखा में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार की विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। किसी भी जाति, संप्रदाय और आयुवर्ग का व्यक्ति संघ की शाखा में आ सकता है। संघ की शाखा सबके लिए है। संघ में किसी प्रकार का पंजीयन नहीं किया जाता है और न ही किसी प्रकार की सदस्यता शुल्क लगती है। संघ का ‘घटक’ बनने के लिए शाखा ही एकमात्र स्थान है। निकटतम स्थान पर लगने वाली शाखा में आकर ही कोई व्यक्ति संघ का स्वयंसेवक बन सकता है। संघ से जुड़ने की प्रक्रिया इतनी ही सरल है। यदि आपको यह जानकारी नहीं है कि आपके आसपास संघ की शाखा कहाँ लगती है, तब आप आरएसएस की अधिकृत वेबसाइट ‘आरएसएस डॉट ओआरजी’ पर जाकर ‘ज्वाइन आरएसएस’ का ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं। संघ के स्थानीय कार्यकर्ता आपसे संपर्क कर लेंगे। 

सबकी रुचि, प्रकृति और अवस्था को ध्यान में रखते हुए संघ में अलग-अलग प्रकार की शाखाएं लगती हैं। वैसे तो हम किसी भी शाखा में जा सकते हैं। लेकिन यदि हम उचित शाखा का चुनाव करेंगे, तो अधिक आनंद आएगा। ये शाखाएं सामान्यतौर पर आयुवर्ग के आधार पर हैं। इसी आधार पर उन शाखाओं का पाठ्यक्रम है। हमारी आयु अधिक है और हम बच्चों की शाखा में चले गए, तब थोड़ा सामंजस्य बैठाने में कठिनाई आएगी ही। हाँ, उसी शाखा में अधिक आयु के लोगों की संख्या 15-20 है और बच्चों की संख्या भी 15-20 है, तब दोनों आयुवर्ग के अलग-अलग गण बनाकर शाखा के कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। संघ ने शाखाओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया है-

बुधवार, 28 जनवरी 2026

1963 गणतंत्र दिवस परेड की अनसुनी कहानी, जब राजपथ पर गूंजे संघ के कदम

गणतंत्र दिवस की परेड और आरएसएस : 26 जनवरी, 1963 को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का प्रदर्शन किया 


आज भी हम 1962 के भारत-चीन युद्ध को भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के हमारे नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को राजपथ पर आमंत्रित किया। संघ के स्वयंसेवकों ने गणवेश पहनकर जब राजपथ पर राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लिया, तब स्वयंसेवक न केवल सबके बीच आकर्षण का केंद्र बने अपितु उन्होंने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश भी दिया।

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

आरएसएस और संविधान : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए सर्वोच्च है संविधान का सम्मान

संघ शताब्दी वर्ष : ऐतिहासिक तथ्य और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयान बताते हैं कि स्वयंसेवकों ने न केवल संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष किया है अपितु बलिदान भी दिया है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रारंभ से ही भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। संविधान भी ऐसा ही एक प्रतीक है, जिसका सम्मान एवं सुरक्षा संघ के लिए प्राथमिक है। हालांकि, आरएसएस और संविधान के रिश्तों को लेकर अकसर राजनीतिक विमर्श में कई तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह सवाल ज्यादातर उनकी ओर से उठाया जाता है, जिन्हें संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही संविधान विरोधी कहा था। संविधान सभा में अपने आखिरी भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कम्युनिस्टों और समाजवादियों को संविधान की निंदा करने वाला बताया था। उन्होंने कहा था कि कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अपने सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहती है और वे संविधान की निंदा करते हैं क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संविधान के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बयानों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि संघ ने सदैव ही संविधान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत में आरएसएस ऐसा संगठन है, जिसने संविधान की सुरक्षा एवं सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष भी किया और बलिदान भी दिया है।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

रहमान का ‘सांप्रदायिक सुर’

भारत के लोगों ने संगीतकार एआर रहमान को वर्षों बिना किसी भेदभाव के अथाह प्रेम दिया है, जबकि सबको पता है कि रहमान कन्वर्टेड मुसलमान हैं। आज तक किसी ने भी रहमान को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है। परंतु, रहमान ने खुद ही स्वयं को लेकर विवाद खड़ा कर लिया है। एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार में उनका यह कहना कि बॉलीवुड में उन्हें काम न मिलने की वजह ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। जिस कलाकार को पूरे देश ने बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के, आंखों पर बिठाया हो, ऐसी विक्टिम हुड (पीड़ित भाव) की बातें करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक प्रकार से कहना होगा कि रहमान के मन में ही कहीं सांप्रदायिक सोच बैठी हुई थी, जो अब जाकर सामने आई है। रहमान जैसे लोगों को इसका जवाब भी देना चाहिए कि अनेक हिन्दू संगीतकार भी बॉलीवुड से बाहर हो चुके हैं, उसका कारण क्या है? क्या उन्हें भी मुस्लिम गिरोहबंदी के कारण काम मिलना बंद हुआ है? भारतीय सिनेमा में मुस्लिम कलाकारों का जिस प्रकार का वर्चस्व है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी रहमान हिन्दुओं के माथे पर सांप्रदायिका का लेबल चस्पा करने की कोशिश करे रहे हैं, तो इसे एक प्रकार से बेईमानी ही कहना चाहिए।