गुरुवार, 8 जनवरी 2026

हिन्दुओं के मानवाधिकारों पर वैश्विक चुप्पी

गरिमामयी जीवन जीने के लिए मनुष्य होने के नाते हमारे कुछ अधिकार हैं। वैश्विक स्तर पर मनुष्यों के अधिकारों की रक्षा हो सके, इस उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ की। यह दस्तावेज मानव जीवन, स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति, धर्म, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को परिभाषित करता है। भारत के संविधान में भी कई अनुच्छेद मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मानवाधिकारों का हनन रोकने, उनकी निगरानी करने एवं इससे जुड़े अन्य मामलों पर हस्तक्षेप करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ भी गठित की गई हैं। परंतु, विडंबना यह है कि इन संस्थाओं को अन्य समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता तो होती है, लेकिन हिंदुओं के मानवाधिकार इन्हें संभवतः दिखाई ही नहीं देते। विश्व के विभिन्न देशों में हिंदुओं के मानवाधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है, लेकिन कहीं कोई घोर आपत्ति सुनाई नहीं देती। एक प्रकार से वैश्विक चुप्पी छाई हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। यह चुप्पी हिंदू समाज के मन में आक्रोश पैदा करती है और सांप्रदायिक भेद भी बढ़ाती है।

दुनिया के कई देशों में जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हैं, वहाँ उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और जीवन के मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। भारत के पड़ोसी देशों, विशेषकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में स्थिति बहुत चिंताजनक है। इन देशों में इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों ने प्रारंभ से ही हिंदुओं को अपने निशाने पर लिया है, जिसका परिणाम यह है कि यहाँ हिंदुओं की संख्या में तेजी से कमी आई है। हिंदुओं की बड़ी संख्या का धर्मांतरण करा लिया गया है या फिर उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है।

बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से हिंदुओं पर हमलों के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। तख्तापलट के बाद वहाँ कट्टरपंथी समूह सत्ता के करीब आ गए हैं, जिसके कारण अतिवादी ताकतों ने हिंदुओं पर हमले तेज कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में हिंदुओं के घरों, संपत्ति और मंदिरों पर व्यापक हमले, तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। इस्कॉन मंदिर जैसी पवित्र जगहों को भी निशाना बनाकर आग लगा दी गई। कट्टरपंथी समूहों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदुओं पर जानबूझकर देशद्रोह और हिंसक प्रदर्शन जैसे गंभीर मामलों के फर्जी केस दर्ज करवाए जाते हैं, ताकि उन्हें कानूनी उलझनों में फंसाया जा सके।

चूँकि भारत में हिंदुओं के हितों की चिंता करने वाली केंद्र सरकार है, इसलिए सरकार ने बांग्लादेश के हालात पर तत्काल संज्ञान लेकर वहाँ की सरकार पर दबाव बनाया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में अगस्त 2024 से मार्च 2025 तक हिंसा की 2400 से अधिक घटनाएँ दर्ज हुई हैं। भारत ने उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच करेगा और हत्या, आगजनी व हिंसा के सभी दोषियों को सजा देगा। हालांकि, इसकी उम्मीद कम ही है कि बांग्लादेशी प्रशासन हिंदुओं के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा।

इसी प्रकार, पाकिस्तान में भी हिंदू समुदाय प्रारंभ से ही उत्पीड़न का सामना कर रहा है। वहाँ की बिगड़ती अर्थव्यवस्था, सांप्रदायिक ताकतों और सेना के बढ़ते प्रभुत्व के बीच तथाकथित लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर हो गई हैं। पाकिस्तान में हिंदू और अन्य गैर-इस्लामिक समुदायों की युवतियों और लड़कियों का जबरन धर्मांतरण, अपहरण, तस्करी और बाल विवाह की घटनाओं में वृद्धि हुई है। विडंबना यह है कि पुलिस अक्सर अपहरण के मामलों को ‘प्रेम विवाह’ बताकर खारिज कर देती है। अदालतों द्वारा भी जबरन विवाह को अक्सर धार्मिक कानूनों का सहारा लेकर वैध करार दिया जाता है। पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपों का उपयोग हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता है; भीड़ महज आरोप के आधार पर हत्या कर देती है और दोषियों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होती।

मोदी सरकार ने पड़ोसी देशों में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हिंदुओं एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को स्वाभिमान से जीवन देने के लिए ‘नागरिकता संशोधन कानून’ लागू किया था, लेकिन भारत के तथाकथित प्रगतिशील मानवतावादियों को ही यह पहल चुभ गई। रोहिंग्या जैसे समुदायों की अवैध घुसपैठ के लिए विलाप करने वाले इन 'सेकुलर' धुरंधरों को हिंदुओं के मानवाधिकारों की चिंता नहीं है। यह साबित करता है कि वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि भारत में भी कई ऐसे समूह हैं जो हिंदुओं के मानवाधिकारों की जानबूझकर अनदेखी करते हैं।

पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक हिंदुओं के उत्पीड़न पर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और संस्थाएँ चुप्पी साधे रहती हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की जाँच के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया था। आयोग ने स्पष्ट कहा कि राज्य में “कानून का शासन नहीं, बल्कि शासक का कानून चल रहा है”। यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या हिंदुओं के कोई मानवाधिकार नहीं हैं? उनकी चिंता कौन करेगा?

हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानवाधिकारों का संरक्षण एक सार्वभौमिक प्रतिबद्धता है। अन्य समाजों की तरह ही हिंदू समुदाय को भी भय और उत्पीड़न से मुक्त जीवन जीने की गारंटी मिलनी चाहिए। यह केवल संबंधित सरकारों की ही नहीं, बल्कि वैश्विक बौद्धिक समुदाय का भी नैतिक दायित्व है कि मानवाधिकारों के सिद्धांतों को हर जगह निष्पक्षता से लागू किया जाए। जहाँ भी हिंदुओं के मानवाधिकारों का हनन हो, वहाँ भी उनके पक्ष में आवाज बुलंद की जानी चाहिए ताकि वैश्विक संस्थाओं पर दबाव बने। याद रहे कि “मानवाधिकार कोई चुनिंदा अधिकार नहीं हैं जिन्हें सुविधानुसार लागू किया जाए; यदि ये ‘सार्वभौमिक’ हैं, तो इनमें हिंदू समाज की पीड़ा को भी समान स्थान मिलना चाहिए”।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बांग्लादेश में निशाने पर हिन्दू

बांग्लादेश से आ रहे समाचार न केवल विचलित करने वाले हैं, बल्कि पड़ोसी देश में कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और विशेष रूप से हिन्दू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। बांग्लादेश के जेस्सोर जिले में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या और अगले ही दिन एक हिन्दू दुकानदार शरत चक्रवर्ती मणि की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। 18 दिन में 6 हिन्दुओं की हत्याओं की घटनाएं सामने आई हैं। मारपीट और शोषण के मामले भी सामने आ रहे हैं। ये घटनाएं महज आंकडे नहीं हैं, बल्कि उस सांप्रदायिक सोच के गवाह हैं, जिसने पिछले कुछ हफ्तों में वहां के हिन्दू समुदाय को दहशत के साये में जीने को मजबूर कर दिया है। घटनाओं की प्रकृति और उनमें अपनाए गए तरीके अत्यंत बर्बर और अमानवीय हैं। एक तरफ जहां राणा प्रताप को सरेआम गोली मारी गई, वहीं शरीयतपुर में व्यापारी खोकन चंद्र दास के साथ जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला है। धारदार हथियारों से हमला करना और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला देना, अपराधियों के मन में बैठे गहरे सांप्रदायिक जहर को दर्शाता है।

रविवार, 4 जनवरी 2026

किसी की प्रतिक्रिया या विरोध में शुरू नहीं हुआ संघ

संघ शताब्दी वर्ष : संपूर्ण हिन्दू समाज को एकजुट कर, भारत को परमवैभव पर पहुँचाने के संकल्प से जन्मा है संघ 

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा का अवलोकन करने पर बहुत रोचक और आश्चर्यजनक बातें सामने आती हैं। संघ को लेकर जितने प्रकार के नैरेटिव समाज में चलते हैं, उनमें से ज्यादातर संघ विरोधियों ने फैलाए हैं। यानी जो संघ को जानते नहीं है, मानते नहीं हैं, उन्होंने समाज को बताने का प्रयास किया कि संघ क्या है और कैसा है। अनेक अवसरों पर संघ के हितैषी भी संघ की वास्तविक प्रतिमा समाज के सामने रखने में चूके हैं। शताब्दी वर्ष के प्रसंग को निमित्त मानकर संघ ने तय किया है कि समाज के सामने संघ को संघ के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए। संघ के बारे में वास्तविक और अधिकृत जानकारी रखी जाए, ताकि समाज पर छाए भ्रम के बादल कुछ हद तक छंट जाएं। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक एवं सरकार्यवाह के प्रवास देशभर में हो रहे हैं। देश के चार प्रमुख केंद्रों- दिल्ली, बेंगलुरू, कोलकाता और मुम्बई में तो सरसंघचालक जी की विशेष व्याख्यानमालाएं हो रही हैं। इसके अलावा अन्य स्थानों पर भी समाज के विभिन्न वर्गों के साथ उनका संवाद हो रहा है। इसी क्रम में 2-3 जनवरी, 2026 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का प्रवास हुआ। इस अवसर पर वे चार कार्यक्रमों- युवा संवाद, प्रमुख जन गोष्ठी, सामाजिक सद्भाव बैठक और शक्ति संवाद में सम्मिलित हुए। अपने इस प्रवास में उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्य समाज के सामने रखे, जो निश्चित ही संघ के बारे में देखने का नया नजरिया देते हैं। 

संघ विरोधियों ने एक भ्रम पैदा किया कि संघ प्रतिक्रियावादी संगठन है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संघ किसी की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ संगठन नहीं है। संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा भी नहीं है। संघ का जन्म क्यों हुआ? उन्होंने बताया कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने देश-समाज के हित में चलने वाले सभी प्रकार के कार्यों में सहभागिता की। क्रांतिकारी संगठन में शामिल हुए। क्रांतिकारियों से जुड़ने के लिए डॉक्टर साहब योजनापूर्वक कोलकाता पढ़ने गए क्योंकि उस समय कोलकाता क्रांतिकारियों का गढ़ था। वहाँ से लौटकर उन्होंने राजनीतिक आंदोलनों का अनुभव भी लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया। यह सब काम करते हुए वे भारत की स्थितियों को लेकर चिंतन-मंथन करते थे। 

बालगंगाधर तिलक, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय और डॉ. भीमराव अंबेडकर सहित उस समय के कई महापुरुषों के साथ देश की परिस्थितियों को लेकर उनकी चर्चा हुई है। उनको ध्यान आया कि बाहर से आने वाले मुट्ठीभर लोग, जो हमसे कमतर हैं, इसके बाद भी हमको, हमारे घर मे आकर ही पराजित कर देते हैं। हम स्वतंत्र होने ही वाले हैं लेकिन फिर से पराधीन नहीं होंगे, इसकी क्या गारंटी है। उन्होंने भारतीय समाज की नब्ज को पकड़ा। हजार वर्षों के संघर्ष के कारण भारतीय समाज मानसिक दासता का शिकार हो गया था। जब तक भारत के मूल समाज को आत्मदैन्य की स्थिति से बाहर निकालकर उसके मन में आत्मगौरव का भाव नहीं जगाएंगे, तब तक हम कमजोर ही रहेंगे। स्वाधीनता को सुनिश्चित और स्थायी करने के लिए समाज को ‘स्व’ का बोध कराना आवश्यक होगा। भारत के भाग्य को बदलना है तो इस समाज को ठीक करना होगा। यह सब विचार करके ही डॉ. हेडगेवार ने तय किया कि समाज में एकता और गुणवत्ता स्थापित करने के लिए संघ का कार्य प्रारंभ करना चाहिए। उन्होंने संघ की घोषणा करने के बाद कई प्रयोग किए। लगभग 14 वर्ष कार्य के बाद संघ की विशिष्ट कार्य पद्धति विकसित हुई। इस कार्यपद्धति में किसी का विरोध और किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं अपितु स्वाभाविक रूप से हिन्दू समाज के स्वाभिमान को जगाने का अभ्यास है। 

संघ के स्वयंसेवक जो प्रतिज्ञा करते हैं, उसमें किसी का विरोध नहीं अपितु सबके कल्याण की बात है। संघ भारत के उस विचार को जीता है, जो विश्व को परिवार मानकर सबके हित की चिंता करता है। संघ अपने जन्म से ही एक लक्ष्य लेकर चल रहा है कि संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन कर, अपने धर्म-संस्कृति का संरक्षण कर, अपने भारत को परम वैभव पर लेकर जाना है। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक यह प्रतिज्ञा करता है।

संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर 'स्वदेश ज्योति' में 4 जनवरी, 2026 रविवार को प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ

संघ इसलिए भी प्रतिक्रियावादी संगठन नहीं हो सकता क्योंकि यह समाज में अपनी अलग पहचान नहीं देखता है। सरसंघचालक डॉ. भागवत जी ने इस संदर्भ में कहा कि संघ ने प्रारंभ से तय किया कि हमें समाज में ‘दबाव समूह’ के तौर पर संगठन खड़ा नहीं करना है। अपितु सम्पूर्ण हिन्दू समाज का ही संगठन करना है। कहने का अर्थ है कि संघ, समाज में अलग से संगठन के तौर पर अपनी पहचान नहीं चाहता है। याद रखें कि जो संस्थाएं या संगठन किसी प्रतिक्रिया में शुरू होते हैं, वे अपनी पहचान भी चाहते हैं और समाज में दबाव समूह के रूप में भी काम करते हैं। 

सरसंघचालक जी ने कितनी महत्वपूर्ण बात कही कि किसी देश के भाग्य का निर्धारण वहाँ के नेता, नीति, सरकार, अवतार तय नहीं कर सकते। देश को बड़ा बनाने का काम तो वहाँ का गुण सम्पन्न समाज ही करता है। नेता, नीति और सरकार तो इस कार्य में सहायक भर हो सकते हैं। यदि समाज योग्य नहीं है, तब वह अच्छे नेताओं का भी उपयोग नहीं कर सकता। इसलिए समाज को गुण सम्पन्न बनाना सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए। संघ, शाखा के माध्यम से ऐसे कार्यकर्ताओं का समूह खड़ा करने का काम कर रहा है, जो इस प्रकार का समाज बनाएंगे। संघ की 100 वर्षों की यात्रा को देखें तो यह व्यक्ति निर्माण से समाज और राष्ट्र निर्माण का स्वाभाविक आंदोलन है।

शनिवार, 3 जनवरी 2026

भावनाओं और संस्कृति की संवाहिका है हिन्दी

भावनाओं को बताने में हिन्दी के सामने कहाँ ठहर पाती है अंग्रेजी

हिन्दी विश्व की सबसे समृद्ध भाषाओं में से एक है। हिन्दी के पास अपना विशाल शब्दकोश है, जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के अनूठे शब्द हैं। बोलियां भी हिन्दी के शब्दकोश और सौंदर्य में वृद्धि करती हैं। अपने सर्वसमावेशी स्वभाव के चलते हिन्दी ने बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने आँचल में स्थान दिया है, जिससे हिन्दी का शब्द भंडार और अधिक समृद्ध हुआ है। हिन्दी की एक और सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके शब्दकोश में अलग-अलग भाव, स्थिति, संबंध को व्यक्त करने के लिए एक ही शब्द के पर्यायवाची शब्द भी हैं। यह विशेषता अन्य भारतीय भाषाओं में भी है। परंतु, जिस अंग्रेजी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसके पास यह सामर्थ्य नहीं है। इस मामले में अंग्रेजी हमारी हिन्दी के पासंग भी नहीं ठहरती है। 

एक सामान्य उदाहरण हम सब देते ही हैं कि हिन्दी में आत्मीय रिश्तों को अभिव्यक्त/संबोधित करने के लिए अनेक शब्द हैं, जो संबंधित व्यक्ति के साथ हमारे रिश्ते को स्पष्ट रूप से बताते हैं। जैसे:- चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मौसा-मौसी, मामा-मामी इत्यादि रिश्तों की अपनी विशिष्टता है, जो इन शब्दों से पता चलती है। अंग्रेजी में इन सबके लिए एक ही संबोधन है- अंकल और आंटी। अंग्रेजी में अंकल-आंटी कहने से पता नहीं चलता कि सामने वाले चाचा-चाची हैं या मामा-मामी। अंग्रेजी तो ढंग से गुरु और शिक्षक में भी अंतर नहीं कर सकती।

रविवार, 28 दिसंबर 2025

राष्ट्र प्रेरणा स्थल : वैचारिक विरासत को लेकर आगे बढ़ रहे मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना पर आधारित 'राष्ट्र प्रेरणा स्थल'

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी वैचारिक विरासत को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इसका नवीनतम उदाहरण ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती प्रसंग पर प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ का लोकार्पण किया। यह स्थान भारतीय राजनीति और समाज के लिए सामान्य नहीं है, अपितु यह उस लंबी वैचारिक यात्रा का गौरवपूर्ण पड़ाव है, जिसने आधुनिक भारत की नियति को बदलने का कार्य किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी है कि “राष्ट्र प्रेरणा स्थल, उस सोच का प्रतीक है जिसने भारत को आत्मसम्मान, एकता और सेवा का मार्ग दिखाया है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जी की विशाल प्रतिमाएं जितनी ऊंची हैं इनसे मिलनी वाली प्रेरणाएं उससे भी बुलंद है”। कहना होगा कि भारतीय राजनीति को राष्ट्रीय दिशा देने में तीनों ही विभूतियों का उल्लेखनीय योगदान है।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर चुप्पी

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार पर वैसी मुखरता दिखायी नहीं दे रही, जैसी अन्य मामलों में दिखायी देती है। हालिया उदाहरण गाजा का लिया जा सकता है, जहाँ दो देशों की आपसी संघर्ष में सैन्य हमलों का शिकार बने मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए भारत में प्रदर्शन किए गए। हालांकि, यहाँ भी चयनित पाखंड देखा गया था। इस्लामिक चरमपंथियों की ओर से यहूदी महिलाओं एवं लोगों के साथ किए गए घिनौने कृत्यों पर यहाँ भी चुप्पी साध ली गई थी। बांग्लादेश के प्रकरण में केवल भाजपा और राष्ट्रीय विचार के लोग ही हिन्दुओं के हितों की चिंता करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसी चयनात्मक चुप्पी को कठघरे में खड़ा किया है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और उस पर विपक्ष की चुप्पी को मुद्दा बनाया। उनका यह सवाल वाजिब है कि जो राजनीतिक दल गाजा की घटनाओं पर कैंडल मार्च निकालते हैं, वे पड़ोसी देशों (पाकिस्तान और बांग्लादेश) में हिंदुओं और सिखों के नरसंहार पर मौन क्यों साध लेते हैं?

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

बांग्लादेश में कट्टरपंथ का आतंक

बांग्लादेश आज एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ मानवता और कानून का शासन कट्टरपंथ एवं भीड़ तंत्र के सामने आत्मसमर्पण कर चुका है। अल्पसंख्यक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की जघन्य हत्या ने न केवल पड़ोसी देश की अंतरिम सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भारत के धैर्य की भी परीक्षा ली है। दीपू दास को उग्र भीड़ द्वारा जिंदा जला दिया जाना सभ्य समाज के माथे पर कलंक है, लेकिन इससे भी अधिक भयावह वे वीडियो साक्ष्य हैं जो बताते हैं कि मारे जाने से पहले दास स्थानीय पुलिस की हिरासत में था। यह संदेह गहराना स्वाभाविक है कि क्या रक्षकों ने ही उसे कट्टरपंथियों के हवाले कर दिया? दीपू चंद्र दास की नृशंस हत्या करते समय भीड़ ने जिस प्रकार की नारेबाजी की, उससे साफ पता चलता है कि इस्लामिक चरमपंथी, मुस्लिम बाहुल्य राज्य या देश में गैर-मुस्लिमों को स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं। सबसे अधिक खतरनाक और डराने वाली बात यह है कि दीपू की सुनियोजित हत्या में उसके मुस्लिम मित्र भी शामिल रहे हैं। यह जेहादी सोच या तो गैर-मुस्लिमों को इस्लाम में कन्वर्ट कर लेना चाहती है या फिर उन्हें वहाँ से खदेड़ देती है।