शनिवार, 16 जून 2018

असहिष्णुता के सुनियोजित प्रोपेगंडा के बरक्स

- डॉ. आशीष द्विवेदी ( निदेशक, इंक मीडिया इंस्टीट्यूट, सागर) 
आज के जमाने में लिखा और कहा तो बहुत कुछ जा रहा है पर उसमें उतना असर दिखता नहीं है। कारण अंतस से मन, वचन और कर्म को एकाकार कर लिखने वाले गिनती के हैं। शायद इसीलिए वह लेखन शाम ढलते ही किसी अंधेरे कोने में दुबक जाता है। लेखन में मारक क्षमता तभी आती है, जब आपने उस लिखे को जिया हो या महसूस किया हो। अपनी बात को कैसे दस्तावेज बनाकर, तथ्य और तर्क के साथ संप्रेषणीय अंदाज से प्रमाणित तरीके से कहा जाता है, वह कला सिखाती है होनहार लेखक लोकेद्र सिंह की ‘हम असहिष्णु लोग’ यह पुस्तक उस वक्त के घटनाक्रमों का चित्रण है, जिसने अमूमन एक साजिश के तहत इस देश की महान समरस एवं अतिउदारवादी छवि को विकृत करने का कुत्सित किंतु असफल प्रयास किया। इसमें लोकेन्द्र सिंह ने दौ सौ पृष्ठों में 73 घटनाक्रमों की जिस सटीक ढंग से व्याख्या की है, वह हर उस भारतीय को पढ़ना चाहिए जो इस राष्ट्र से प्रेम करता है। मानस के अंर्तद्वंद को खत्म कर ये लेख आपके ज्ञानचक्षु खोल देंगे।

मंगलवार, 12 जून 2018

'राष्ट्रवाद, भारतीयता और पत्रकारिता' पर विमर्श को दिशा देती एक पुस्तक

- लोकेन्द्र सिंह
देश में राष्ट्रवाद पर चर्चा चरम पर है। राष्ट्रवाद की स्वीकार्यता बढ़ी है। उसके प्रति लोगों की समझ बढ़ी है। राष्ट्रवाद के प्रति बनाई गई नकारात्मक धारणा टूट रही है। भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा है, जो हर विषय को पश्चिम के चश्मे से देखते है और वहीं की कसौटियों पर कस कर उसका परीक्षण करता है। राष्ट्रवाद के साथ भी उन्होंने यही किया। राष्ट्रवाद को भी उन्होंने पश्चिम के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया। जबकि भारत का राष्ट्रवाद पश्चिम के राष्ट्रवाद से सर्वथा भिन्न है। पश्चिम का राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। चूँकि वहाँ राजनीति ने राष्ट्रों का निर्माण किया है, इसलिए वहाँ राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। उसका दायरा बहुत बड़ा नहीं है। उसमें कट्टरवाद है। हिंसा के साथ भी उसका गहरा संबंध रहा है। किंतु, हमारा राष्ट्र संस्कृति केंद्रित रहा है। भारत के राष्ट्रवाद की बात करते हैं तब 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की तस्वीर उभर कर आती है। विभिन्नता में एकात्म। एकात्मता का स्वर है- 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'। इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की समझ को और स्पष्ट करने का प्रयास लेखक प्रो. संजय द्विवेदी ने अपनी पुस्तक 'राष्ट्रवाद, भारतीयता और पत्रकारिता' के माध्यम से किया है। उन्होंने न केवल राष्ट्रवाद पर चर्चा को विस्तार दिया है, अपितु पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' के भाव की स्थापना को आवश्यक बताया है। 

सोमवार, 11 जून 2018

प्रधानमंत्री की हत्या का षड्यंत्र और हमारी राजनीति का स्तर


- लोकेन्द्र सिंह 
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या का षड्यंत्र रचे जाने की बात सामने आई है। माओवादी कम्युनिस्ट पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते हैं। भारत सरकार को तत्काल गंभीरता से इस मामले की जाँच करनी चाहिए और इस षड्यंत्र में शामिल लोगों को गिरफ्तार करना चाहिए। यह बहुत चिंताजनक और गंभीर मामला है। किंतु, इस मामले पर विपक्षी दलों की टिप्पणियां दुर्भाग्यपूर्ण हैं। हमारे नेता प्रधानमंत्री की हत्या के षड्यंत्र की बात पर व्यग्ंय और गैर-जिम्मेदार टिप्पणियां कर रहे हैं, जबकि हमने अपने दो प्रधानमंत्री और कई राजनेता इसी प्रकार की राजनीतिक हिंसा में खो दिए हैं। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी से लेकर कांग्रेस के बड़बोले नेता संजय निरूपम ने बहुत ही हल्की टिप्पणी इस मुद्दे पर की हैं। उन्होंने इसे लोकप्रियता पाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हथकंडा बताया है।

शुक्रवार, 8 जून 2018

प्रणब दा के उद्गार, संघ के ही विचार


- लोकेन्द्र सिंह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय वर्ष के समापन समारोह में दिए गए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बहुप्रतीक्षित उद्बोधन का विद्वान लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से विश्लेषण कर रहे हैं। विद्वानों का एक वर्ग यह सिद्ध करने का भरसक प्रयास कर रहा है कि प्रणब दा ने संघ को उसके घर में घुसकर राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा दिया है। पूर्व में यह वर्ग प्रणब दा का विरोध सिर्फ इसलिए कर रहा था, क्योंकि उन्होंने सहर्ष संघ का न्यौता स्वीकार कर लिया था। वैसे, यह विश्लेषण करने वालों ने संभवत: भिन्न विचार के प्रति अपनी गहरी असहिष्णुता के कारण सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का उद्बोधन नहीं सुना होगा। यदि हम दोनों महानुभावों के उद्बोधन सुनेंगे तो सार और तत्व एक जैसा ही पाएंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मंच से पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जो कुछ कहा, वह सब संघ का ही विचार है।

बुधवार, 6 जून 2018

प्रणब दा और संघ का सर्वसमावेशी स्वरूप


- लोकेन्द्र सिंह
भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं वर्तमान समय के सर्वाधिक सम्मानित राजनेता प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जाने की बात से ही कांग्रेस और तथाकथित सेकुलर बिरादरी में खलबली मच गई है। स्वयं को लोकतांत्रिक, सेकुलर और सहिष्णु कहने वाली इस जमात की प्रतिक्रियाएं आश्चर्य तो कतई उत्पन्न नहीं करती, बल्कि उसके अलोकतांत्रिक, संकुचित और असहिष्णु चरित्र को जरूर उजागर करती हैं। अलगाववादी समूहों, नक्सलियों और आतंकियों तक से संवाद की पक्षधर यह जमात संघ से संवाद पर अकसर बिदक जाती है। इसके उलट संघ सबसे संवाद का पक्षधर दिखाई देता है। संघ इन सेकुलर समूहों से अधिक सर्वसमावेशी दिखाई देता है। संघ ने सदैव इस परंपरा का पालन किया है कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों के ज्ञान एवं अनुभव का लाभ समाज तक पहुँचाए।

मंगलवार, 5 जून 2018

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र और मानवता की हत्या


- लोकेन्द्र सिंह
पश्चिम बंगाल में खूनी राजनीति के शिकंजे में फंसे लोकतंत्र का दम घुंट रहा है और वह सिसकियां ले रहा है। पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जिस प्रकार हिंसा का नंगा नाच किया था, उससे ही साफ जाहिर हो गया था कि बंगाल की राजनीति के मुंह खून लग गया है। पुरुलिया जिले में तीन दिन के भीतर दो दलित युवकों की जिस प्रकार हत्या की गई है, उसने बंगाल की भयावह तस्वीर को देश के सामने प्रस्तुत किया है। जिसने भी भाजपा के दलित कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो और दुलाल कुमार की हत्या की है, उसने लोकतंत्र के साथ-साथ मानवता को भी फांसी पर लटकाया है। यह जंगलराज ही है, जहाँ एक युवक की बर्बरता से सिर्फ इसलिए हत्या कर दी जाती है, क्योंकि वह भारतीय जनता पार्टी के लिए काम करता था। यह जंगलराज ही है, जहाँ त्रिलोचन महतो के शव को पेड़ से लटका कर प्रदेश की जनता को एक संदेश दिया कि भाजपा के लिए काम करोगे तो यही अंजाम होगा। त्रिलोचन की पीठ पर हत्यारों ने बांग्ला भाषा में यह संदेश लिया था। उसकी जेब में पत्र भी रखा, जिसमें लिखा था- 'यह शख्स पिछले 18 सालों से भाजपा के लिए काम कर रहा है, पंचायत चुनाव के बाद से ही तुमको मारने की योजना बनाई जा रही थी लेकिन बार-बार बच कर निकल रहे थे। अब तुम मर चुके हो, भाजपा के लिए काम करने वालों का यही अंजाम होगा।' सोचिए, हम कहाँ जा रहे हैं? इस खूनी राजनीति से हमें क्या हासिल होगा? इस संबंध में भी विचार कीजिए कि बंगाल की राजनीति को यह रूप कब और कैसे मिला? इसका समाधान क्या है, इस संबंध में भी चिंतन की आवश्यकता है।

शनिवार, 2 जून 2018

शिवराज की 'किसान पुत्र' की छवि को चोट पहुँचाने की रणनीति


- लोकेन्द्र सिंह
 मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की 'यूएसपी' है- किसान पुत्र की छवि। यह छवि सिर्फ राजनैतिक ही नहीं, अपितु वास्तविक है। शिवराज सिंह चौहान किसान परिवार से आते हैं। उन्होंने खेतों में अपना जीवन बिताया है। इसलिए उनके संबंध में कहा जाता है कि वह खेती-किसानी के दर्द-मर्म और कठिनाइयों को भली प्रकार समझते हैं। किसानों के प्रति उनकी संवेदनाएं ही हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही किसानों की खुशहाली के लिए नीति बनाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। वह पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने किसानों की आय दोगुनी करने का विचार दिया और उस पर नीतिगत प्रस्ताव बनाने की पहल भी प्रारंभ की। उनके इस प्रयास को वर्ष 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी आगे बढ़ाया है। कृषि के क्षेत्र में मध्यप्रदेश में हुए कामों को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के मध्यप्रदेश सरकार के रोड-मेप को विस्तार और साकार करने की जिम्मेदारी दी है।