रविवार, 14 अगस्त 2022

आरएसएस में तिरंगे के प्रति पूर्ण निष्ठा, श्रद्धा और सम्मान

आरएसएस और तिरंगा : भाग-2

#HarGharTiranga हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत नागपुर की जिलाधिकारी आर. विमला जी ने सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत से भेंटकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा प्रदान किया।

राष्ट्रीय विचारधारा का विरोधी बुद्धिजीवी वर्ग अक्सर एक झूठ को समवेत स्वर में दोहराता रहता है– आरएसएस ने राष्ट्रध्वज तिरंगा का विरोध किया। संघ भगवा झंडे को तिरंगे से ऊपर मानता है। आरएसएस ने कभी अपने कार्यालयों पर तिरंगा नहीं फहराया। इस तरह के और भी मिथ्यारोप यह समूह लगाता है। हालांकि, इस संदर्भ में उनके पास कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं है। वे एक–दो बयानों और घटनाओं के आधार पर अपने झूठ को सच के रंग से रंगने की कोशिशें करते हैं। जबकि जो भी व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से परिचित है, वह जानता है कि इन खोखले झूठों का कोई आधार नहीं। संघ के लिए राष्ट्रध्वज तिरंगा ही नहीं अपितु सभी राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सर्वोपरि है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण’ शीर्षक से दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला में पहले ही दिन यानी 17 सितम्बर, 2018 को कहा- “स्वतंत्रता के जितने सारे प्रतीक हैं, उन सबके प्रति संघ का स्वयंसेवक अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ समर्पित रहा है। इससे दूसरी बात संघ में नहीं चल सकती”। इस अवसर पर उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी सुनाया। फैजपुर के कांग्रेस अधिवेशन में 80 फीट ऊँचा ध्वज स्तंभ पर कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा झंडा (चरखा युक्त) फहराया। जब उन्होंने झंडा फहराया तो यह बीच में अटक गया। ऊंचे पोल पर चढ़कर उसे सुलझाने का साहस किसी का नहीं था। किशन सिंह राजपूत नाम का तरुण स्वयंसेवक भीड़ में से दौड़ा, वह सर-सर उस खंभे पर चढ़ गया, उसने रस्सियों की गुत्थी सुलझाई। ध्वज को ऊपर पहुंचाकर नीचे आ गया। स्वाभाविक ही लोगों ने उसको कंधे पर लिया और नेहरू जी के पास ले गये। नेहरू जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा कि तुम आओ शाम को खुले अधिवेशन में तुम्हारा अभिनंदन करेंगे। लेकिन फिर कुछ नेता आए और कहा कि उसको मत बुलाओ वह शाखा में जाता है। बाद में जब संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी को पता चला तो उन्होंने उस स्वयंसेवक का अभिनंदन किया। यह एक घटनाक्रम बताता है कि तिरंगे के जन्म के साथ ही संघ का स्वयंसेवक उसके सम्मान के साथ जुड़ गया था।

‘संघ और तिरंगे’ के सन्दर्भ में जो भी मिथ्याप्रचार किया गया है, उसके मूल में वे कम्युनिस्ट हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद सात दशक बाद तक अपने पार्टी कार्यालयों पर राष्ट्रध्वज नहीं फहराया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 2021 में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाने और पार्टी कार्यालय में तिरंगा फहराने का निर्णय लिया। कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत की स्वतंत्रता को अस्वीकार करते हुए नारा दिया था- ‘ये आजादी झूठी है’। जरा सोचिये, किन लोगों ने अपनी सच्चाई छिपाने के लिए राष्ट्रभक्त संगठन के सन्दर्भ में दुष्प्रचार किया?

शनिवार, 13 अगस्त 2022

ध्वज समिति की अनुशंसा, भगवा रंग का हो राष्ट्र ध्वज

आरएसएस और तिरंगा : भाग-1

#HarGharTiranga #LokendraSingh

ध्वज किसी भी राष्ट्र के चिंतन और ध्येय का प्रतीक तथा स्फूर्ति का केंद्र होता है। ध्वज, आक्रमण के समय में पराक्रम का, संघर्ष के समय में धैर्य का और अनुकूल समय में उद्यम की प्रेरणा देता है। इसलिए सदियों से ध्वज हमारे साथ रहा है। इतिहास में जाकर देखते हैं तो हमें ध्यान आता है कि लोगों को गौरव की अनुभूति कराने के लिए कोई न कोई ध्वज हमेशा रहा है। भारत के सन्दर्भ में देखें तो यहाँ की सांस्कृतिक पहचान ‘भगवा’ रंग का ध्वज रहा है। आज भी दुनिया में भगवा रंग भारत की संस्कृति का प्रतीक है। अर्थात सांस्कृतिक पताका भगवा ध्वज है। वहीं, राजनीतिक रूप से विश्व पटल पर राष्ट्र ध्वज ‘तिरंगा’ भारत की पहचान है।

भारत के ‘स्व’ से कटे हुए कुछ लोगों एवं विचार समूहों को ‘भगवा’ से दिक्कत होती है। इसलिए वे भगवा ध्वज को नकारते हैं। परन्तु उनके नकारने से भारत की सांस्कृतिक पहचान को भुलाया तो नहीं जा सकता है। राष्ट्रध्वज के रूप में ‘तिरंगा’ को संविधान द्वारा 22 जुलाई, 1947 को स्वीकार किया गया। उससे पहले विश्व में भारत की पहचान का प्रतीक ‘भगवा’ ही था। स्वहतंत्रता संग्राम के बीच एक राजनैतिक ध्व ज की आवश्यकता अनुभव होने लगी। क्रांतिकारियों से लेकर अन्य स्वतंत्रतासेनानियों एवं राजनेताओं ने 1906 से 1929 तक अपनी-अपनी कल्पना एवं दृष्टि के अनुसार समय-समय पर अनेक झंडों को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन्हीं में वर्तमान राष्ट्र ध्वज तिरंगे आविर्भाव हुआ। स्वतंत्रता आन्दोलन का साझा मंच बन चुकी कांग्रेस ने 2 अप्रैल, 1931 को करांची में आयोजित कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय ध्वज के विषय में समग्र रूप से विचार करने, तीन रंग के ध्वज को लेकर की गईं आपत्तियों पर विचार करने और सर्वस्वीकार्य ध्वज के सम्बन्ध में सुझाव देने के लिए सात सदस्यों की एक समिति बनाई। समिति के सदस्य थे- सरदार वल्लभ भाई पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरू, डा. पट्टाभि सीतारमैया, डा. ना.सु. हर्डीकर, आचार्य काका कालेलकर, मास्टर तारा सिंह और मौलाना आजाद।

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

गोवा मुक्ति आन्दोलन में तिरंगा थामे बलिदान हुए आरएसएस के प्रचारक राजाभाऊ महाकाल

इस वर्ष शहडोल में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग ‘द्वितीय वर्ष’ में स्वतंत्रता आंदोलन के बलिदानी राजाभाऊ महाकाल को केंद्रीय पात्र बनाकर गोवा मुक्ति आंदोलन पर एक लघु नाटिका लिखी और उसका निर्देशन भी किया। यह छोटी-सी नाटिका सबको खूब पसंद आई। 

आज सुबह स्वदेश में राजाभाऊ महाकाल पर भूपेन्द्र भारतीय जी का आलेख पढ़ा। मन प्रसन्न हो गया। कुछ नई जानकारी भी हाथ लगी। मैं कितने दिन से लिखने की सोच रहा था। अब उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाऊंगा। 

एक गांधीवादी सज्जन मिले थे कुछ समय पूर्व। कम्युनिस्टों की संगत का थोड़ा बहुत असर था। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का निधन हुआ था। उनकी श्रद्धांजलि सभा में जा रहे थे तो मैंने कहा कि बाबूलाल गौर स्वतंत्रता सेनानी थे, गोवा मुक्ति आंदोलन में शामिल हुए थे। आरएसएस के लोगों ने गोवा मुक्ति आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 

मेरा इतना कहते ही अचानक से भड़क गए– "अरे तुम लोग जबरदस्ती करते हो। गोवा मुक्ति आंदोलन तो पूरी तरह से समाजवादियों का आंदोलन था"। 

मैंने मुस्कुराते हुए कहा– "हां, समाजवादियों की प्रमुख भूमिका थी। हम कहां इनकार करते हैं। हमारी आदत नहीं किसी के योगदान को अनदेखा करने और अस्वीकार करने की। परंतु संघवालों ने गोवा मुक्ति आंदोलन में हिस्सा भी लिया और बलिदान भी दिया है। इसी कारण राम मनोहर लोहिया सहित अनेक समाजवादी नेता आरएसएस के प्रति अच्छा भाव रखने लगे थे"। 

तथ्य सामने रखे तो वे और चिढ़ गए– "अरे यार तुम रहने दो"। उन्होंने वही घिसा–पिटा डायलॉग मारा– "कोई एक नाम बता दो, जो शामिल हुआ हो"। 

मैंने थोड़ा और मुस्कुराते हुए कहा– "एक तो यही (बाबूलाल गौर) दिवंगत हो गए, जिनकी श्रद्धांजलि सभा में हम बैठे हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें इसके लिए सम्मानित भी किया था। दूसरे, यहाँ (भोपाल) से लगभग 200 किलोमीटर दूर उज्जैन के राजाभाऊ महाकाल थे, जिनका बलिदान वहीं गोवा में हुआ। तिरंगा लेकर चल रहे थे। पुर्तगालियों ने गोली मार दी"। 

"कुछ भी कहानी सुना रहे हो"। उनको अभी भी विश्वास नहीं हुआ। होता भी कैसे, क्योंकि उनकी पढ़ा–लिखी ही अलग ढंग से हुई थी। और फिर जरूरी थोड़े है कि कोई दुनियाभर की जानकारी प्राप्त कर लिया हो। 

"अच्छा एक काम करो। आप स्वयं उज्जैन जाकर पड़ताल कर लो। महाकाल जी के परिवार से मिल आना। शहर में भी अनेक लोग बता देंगे। यह भी पता कर लेना कि आरएसएस में उनके पास क्या जिम्मेदारी थी? वे संघ के प्रचारक थे"। मैंने उन्हें आत्मसंतुष्टि करने का पूरा अवसर दिया। वे अब बिल्कुल चुप हो गए। परंतु माने अभी भी नहीं थे। 

मैंने थोड़ा और आनंद लेने के लिए कह दिए– "आप कहो तो मैं चार्टर्ड बस के टिकट करा देता हूं। सुबह जाकर शाम तक वापस आ जाइएगा"।



गुरुवार, 4 अगस्त 2022

देशाभिमान जगायेगा ‘हर घर तिरंगा’

भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर देश में ‘स्वाधीनता का अमृत महोत्सव’ का वातावरण है। सभी देशवासी इस अवसर पर स्वाधीनता के अपने नायकों को याद कर रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को गौरव की अनुभूति कराने और राष्ट्रभक्ति से जोड़ने के लिए ‘हर घर तिरंगा’ अभियान का आह्वान कर दिया है। अमृत महोत्सव के तहत 11 अगस्त से ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरुआत की जा रही है, जिसमें सभी लोग अपने घर पर तिरंगा लगाएंगे। निश्चित ही यह अभियान हमारे मन में देशाभिमान जगायेगा। इस तरह के आह्वान और अभियान का परिणाम यह होता है कि लोग अपने इतिहास, गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ते हैं। जैसे अमृत महोत्सव के कारण बहुत से गुमनाम नायकों की कीर्ति गाथाएं हमारे सामने आयीं, ऐसे ही हर घर तिरंगा के कारण हम राष्ट्रध्वज के इतिहास से जुड़ रहे हैं।

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का प्रेरक उद्बोधन

 “देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर मेरा निर्वाचन इस बात का सबूत है कि भारत का गरीब सपने देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है"


देश की पहली अनुसूचित जनजाति महिला राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मु ने शपथ ली तो संसद भवन का केंद्रीय कक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस अवसर पर उनकी सरलता-सहजता के दर्शन समूचे देश ने किये। बहुत ही सहजता के साथ उन्होंने अपना वक्तव्य हिन्दी में दिया। राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मु का यह पहला उद्बोधन लम्बे समय तक याद रखा जायेगा। प्रेरणा से भरे हुए इस उद्बोधन को बार-बार पढ़ा और सुना जाना चाहिए। उनका यह उद्बोधन भारत के प्रत्येक सामान्य नागरिक के मन में सपनों के दीप जलाता है। राष्ट्रपति ने अपने पहले उद्बोधन में महत्वपूर्ण सन्देश दिया है- “देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर मेरा निर्वाचन इस बात का सबूत है कि भारत का गरीब सपने देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है। मैंने अपनी जीवन यात्रा ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से शुरू की थी। मैं जिस पृष्ठभूमि से आती हूं, वहां मेरे लिए प्रारंभिक शिक्षा हासिल करना भी सपने जैसा था लेकिन अनेक बाधाओं के बावजूद मेरा संकल्प दृढ़ रहा और मैं कॉलेज जाने वाली अपने गांव की पहली व्यक्ति थी”।

गुरुवार, 14 जुलाई 2022

अशोक स्तम्भ के सिंहों की ‘मुख मुद्रा’ पर बेतुके विरोध के बीच नयी संसद की ओर

केंद्र सरकार ने वर्तमान और भविष्य को देखते हुए ‘नये संसद भवन’ की योजना बनायी थी, जिसका निर्माण कार्य अब अपने अंतिम चरण में है। विश्वास है कि इस वर्ष के अंत तक समूचा कार्य पूरा हो जायेगा। नये संसद परिसर के लोकार्पण का क्षण ऐतिहासिक होगा। यह बात संसद भवन के निर्माण में लगे श्रमिकों को भी भली प्रकार पता है। सोमवार को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नये संसद भवन में राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तम्भ’ का अनावरण किया, तब वहां उन्होंने श्रमिकों से भी बातचीत की। उन्होंने जब श्रमिकों से पूछा, “आपको क्या लगता है कि आप भवन बना रहे हैं या इतिहास?” तब सभी श्रमिकों ने सामूहिक स्वर में उत्तर दिया- “इतिहास”। यकीनन नये संसद भवन के निर्माण के साथ एक इतिहास रचा जा रहा है, जिस पर हम सबको गौरव होना चाहिए। कितना सुखद संयोग है कि देश जब अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है तब उसे अपना नया संसद भवन मिल रहा है।

सोमवार, 4 जुलाई 2022

पत्रकारिता की शक्ति को बताने वाली दस्तावेजी पुस्तक है ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’

 

- डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या

भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास है। समाज जागरण से लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की चेतना जगाने में पत्रकारों एवं समाचारपत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। भारत में पत्रकारिता के विजयी प्रसंगों में से एक है-‘रतौना आन्दोलन’। गो-संरक्षण के जुड़ा यह आन्दोलन वर्ष 1920 में मध्यप्रदेश के सागर जिले के समीप रतौना नामक स्थान से शुरू हुआ, जिसे प्रखर संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के कलम ने शीघ्र ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया। पत्रकारिता के सशक्त भूमिका के कारण यह आन्दोलन अपने परिणाम को प्राप्त कर सका। तत्कालीन मध्यभारत प्रान्त में अंग्रेजों को पहले बार पराजय का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश सरकार को अपने निर्णय को वापस लेना पड़ा। जिस जगह प्रतिमाह ढाई लाख गोवंश के क़त्ल की योजना थी, आज वहां गोवंश की नस्ल सुधार का बड़ा केंद्र है। जहाँ गोवंश के खून की नदी बहनी थी, वहां आज इतना दुग्ध उत्पादन हो रहा है कि आस-पास के लोग शुद्ध दूध पी रहे हैं। इस सम्पूर्ण विवरण को हमारे सामने लेकर आती है, पुस्तक ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’।