बुधवार, 31 जुलाई 2024

बरेली में हिन्दू युवक की पीट-पीटकर हत्या पर सेकुलर बिरादरी में खामोशी

साभार : पाञ्चजन्य / Panchjanya

भारत में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में अपने आप को सेकुलर एवं प्रगतिशील कहनेवाले वर्ग की प्रमुख भूमिका है। जिस प्रकार से एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर हिन्दू समाज के प्रति अभियान चलाए जाते हैं और मुस्लिम समाज को भड़काने एवं हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किए जाते हैं, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वास्तव में सेकुलर वर्ग ही सांप्रदायिक है। सेकुलर बिरादरी के कारण जिस प्रकार का नकारात्मक वातावरण बना है, उसके कारण से हिन्दुओं पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं। अभी हाल में उत्तरप्रदेश के बरेली जिले के गाँव गौसगंज में मुस्लिम समुदाय ने हिन्दू समुदाय पर पथराव कर दिया, लोगों को घेरकर पीटा गया और तोड़फोड़ की गई। असामाजिक तत्वों की यह भीड़ गाँव के युवक तेजराम को घसीटकर मस्जिद में ले गए और वहाँ उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि समूचा सेकुलर वर्ग तेजराम की मॉब लिंचिंग पर मुंह में दही जमाकर बैठा हुआ है। 

आखिर क्या कारण हैं कि मुस्लिम बंधुओं के साथ होनेवाली ऐसी ही घटना पर हो-हल्ला मचानेवाले हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं? जिस समय में मुस्लिम भीड़ मस्जिद में तेजराम की पीट-पीटकर हत्या कर रही थी, उसी वक्त यह सेकुलर वर्ग कांवड़ियों द्वारा तोड़-फोड़ की एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर समूचे कांवड़ियों और हिन्दुओं को बदनाम करने में लगे हुए हैं। यह किस तरह का चयनित दृष्टिकोण है? इसे सेकुलर बिरादरी के लेखकों एवं पत्रकारों का दोगला आचरण क्यों नहीं माना जाना चाहिए? इसे सांप्रदायिकता का पोषण करनेवाली प्रवृत्ति क्यों नहीं मानी जानी चाहिए?

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता

देशभर में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जनता की ओर से माँग उठ ही रही थी कि अब न्यायालय ने भी इस आशय की टिप्पणी की है। तीन तलाक से जुड़े मामले की सुनवाई करते समय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने समान नागरिक संहिता का पक्ष लेते हुए टिप्पणी की है कि “समय आ गया है कि अब देश समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को समझे। समाज में आज भी आस्था और विश्वास के नाम पर कई कट्टरपंथी, अंधविश्वासी और अति-रूढ़िवादी प्रथाएं प्रचलित हैं। इससे अंधविश्वास और बुरी प्रथा पर रोक लगेगी”। समान नागरिक संहिता पर इससे बड़ी टिप्पणी नहीं हो सकती। न्यायालय की ओर से कहा जा रहा है कि देश को यह बात समझनी चाहिए कि समान नागरिक संहिता की माँग किसी संप्रदाय विशेष के विरुद्ध नहीं है अपितु यह तो सच्चे अर्थों में ‘सेकुलर स्टेट’ की पहचान है।

सोमवार, 29 जुलाई 2024

‘सरकार की सनक’ का शिकार न हों देशभक्त संगठन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और शासकीय कर्मचारियों के संबंध में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने की महत्वपूर्ण टिप्पणियां, भविष्य में संघ के विरोध में इस प्रकार का कदम न उठाए कोई सरकार


RSS के कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं सरकारी कर्मचारी, मोदी सरकार ने हटाया प्रतिबंध

पिछले दिनों 9 जुलाई को केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ की गतिविधियों में शामिल होने से रोकने वाले 58 वर्ष पुराने प्रतिबंध को समाप्त कर किया। इसके बाद से देश में एक बहस प्रारंभ हो गई। कांग्रेस से लेकर कई विपक्षी दलों को यह बात चुभ रही है। इसी बीच, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं, जिन्हें सबको जानना चाहिए। उच्च न्यायालय की यह टिप्पणियां इसलिए भी सबके ध्यान में आनी चाहिए ताकि भविष्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके जैसे किसी भी देशभक्त संगठन को सरकारें अपनी सनक और नापसंदगी का शिकार न बनाएं। न्यायालय ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि सरकार को अपनी चूक का अहसास करने में पाँच दशक से अधिक का समय लग गया। यह गलती भी सरकार के ध्यान में तब आई, जब इस संबंध में एक याचिका न्यायालय में आई और न्यायालय ने सरकार से इस प्रतिबंध पर प्रश्न पूछे। चूँकि केंद्र में राष्ट्रीयता का पोषण करनेवाली विचारधारा की सरकार है, इसलिए जैसे ही उसके ध्यान में यह मामला आया तो उसने 9 जुलाई को तत्काल प्रभाव से कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए इस प्रतिबंध को समाप्त कर दिया।

बुधवार, 24 जुलाई 2024

न्यायालयों में पहले ही अपने घुटने छिलवा चुका था लोकतंत्र विरोधी प्रतिबंध

सरकारी कर्मचारियों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में शामिल होने पर लगे प्रतिबंध को मोदी सरकार ने हटाया, सरकार ने की सरकारी कर्मचारियों के मौलिक अधिकार की रक्षा

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में कर्मचारियों के शामिल होने पर लगे प्रतिबंध को हटाकर नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की है। अब कर्मचारी संघ की गतिविधियों में सामान्य नागरिकों की भाँति शामिल हो सकेंगे। नि:संदेह, सरकार का यह निर्णय लोकतंत्र और संविधान की भावना को मजबूत करनेवाला है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह विविध सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों में शामिल हो सके। एक सामान्य नागरिक की भाँति यह अधिकार कर्मचारियों को भी प्राप्त है कि अपने कार्यालयीन समय के बाद सामाजिक गतिविधियों का हिस्सा हो सकते हैं। परंतु, लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना को कमजोर करते हुए तत्कालीन सरकार ने 58 वर्ष पहले 1966 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों के भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इतना ही नहीं, सरकारी कर्मचारी के आरएसएस की गतिविधियों में शामिल होने पर उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई का विधान भी रखा गया था। यह एक प्रकार से राष्ट्रीय विचार के प्रति झुकाव रखनेवाले लोगों को हतोत्साहित करने का प्रयास ही था।

देखिए यह वीडियो- RSS के कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं सरकारी कर्मचारी, मोदी सरकार ने हटाया प्रतिबंध

इस तानाशाही एवं द्वेषपूर्ण निर्णय का उत्तर संघ ने तो कभी नहीं दिया लेकिन समाज ने अवश्य ही आईना दिखाने का कार्य किया। संघ को दबाने एवं समाप्त करने के लिए अनेक प्रयत्न किए हैं। इस आदेश के अतिरिक्त तीन बार पूर्ण प्रतिबंध भी लगाया। संघ की छवि खराब करने के लिए बड़े-बड़े नेताओं की ओर से मिथ्या प्रचार भी किया गया। अपने समर्थक बुद्धिजीवियों से पुस्तकें भी लिखवायी गईं। लेकिन संघ विरोधियों के ये सब प्रयास विफल ही रहे। निस्वार्थ भाव से देश और समाज के लिए कार्य करनेवाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कोई रोक नहीं सका। अपनी 99 वर्ष की यात्रा में संघ ने लगातार प्रगति एवं विस्तार ही किया है। अपने विचार, आचरण एवं सेवाकार्यों से संघ ने समाज का विश्वास जीता, जिसके कारण समाज सदैव संघ के साथ खड़ा रहा।

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

जनांदोलन बना प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान- ‘एक पेड़ माँ के नाम’

मध्यप्रदेश के इंदौर ने स्वच्छता के बाद अब पौधरोपण में बनाया विश्व कीर्तिमान, एक दिन में लगाए 12 लाख 65 हजार पौधे

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के आवासीय परिसर 'माखनपुरम' में हमने भी 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान के अंतर्गत पौधरोपण किया

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह ताकत है कि जब भी वे नागरिकों से किसी प्रकार का आह्वान करते हैं तो वह जनांदोलन में परिवर्तित हो जाता है। एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी के ‘एक पेड़ माँ के नाम’ का आह्वान करते ही देशभर में लोग उत्साहित होकर पौधरोपण कर रहे हैं। पौधरोपण के मामले में मध्यप्रदेश ने एक बार फिर सर्वाधिक पौधे रोपने का कीर्तिमान रचा है। स्वच्छता के मामले में देश में प्रथम स्थान पर रहकर मध्यप्रदेश का मान बढ़ानेवाले इंदौर ने 12 लाख 65 हजार पौधे रोपकर बड़ा संदेश अन्य शहरों को दिया है। इंदौर में जनसंख्या घनत्व अत्यधिक शहर है। इसे व्यावसायिक दृष्टि से ‘मिनी मुम्बई’ भी कहा जाता है। इसलिए जब यह प्रश्न आया कि इंदौर जैसे शहर में 51 लाख पौधे कहाँ लगाए जा सकेंगे, तब प्रदेश सरकार में मंत्री एवं इंदौर के लोकप्रिय राजनेता कैलाश विजयवर्गीय ने शहरवासियों के नाम एक सार्वजनिक पत्र लिखा और आग्रह किया कि संकल्प में शक्ति हो तो कुछ भी संभव है। इंदौरवासियों ने अपने संकल्प को सिद्ध करने के लिए गृहमंत्री अमित शाह की उपस्थिति में 24 घंटे में 12 लाख 65 हजार पौधे रोपकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में कीर्तिमान दर्ज करा दिया। इससे पहले एक दिन में सबसे अधिक पेड़ लगाने की उपलब्धि असम के पास थी। असम में एक दिन में 9 लाख 21 हजार पौधे एक दिन में रोपे थे।

गुरुवार, 11 जुलाई 2024

कन्वर्जन पर उच्च न्यायालय की चिंता

“उत्तरप्रदेश में भोले-भाले गरीबों को गुमराह कर ईसाई बनाया जा रहा। अगर ऐसे ही धर्मांतरण (कन्वर्जन) जारी रहा तो एक दिन भारत की बहुसंख्यक जनसंख्या अल्पसंख्यक हो जाएगी”। - इलाहाबाद उच्च न्यायालय

भारत में अभारतीय ताकतें हिन्दू समाज को लक्षित करके कन्वर्जन का बड़ा रैकेट चला रही हैं। ईसाई मिशनरीज हों या फिर कट्टरपंथी इस्लामिक संस्थाएं, अपने-अपने मत का प्रसार करने के लिए कन्वर्जन की प्रक्रिया को अपनाती हैं। इनके निशाने पर हिन्दू समाज के भोले-भाले समुदाय रहते हैं। ये संस्थाएं हिन्दुओं को विभिन्न प्रकार के बरगलाकर या धोखे में रखकर कन्वर्जन को अंजाम देते हैं। लंबे समय से राष्ट्रीय विचार के संगठन कन्वर्जन के गंभीर खतरे की ओर समाज और सरकार का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते आए हैं। अभी तक उनकी चिंता का उपहास उड़ाया जाता था। यह भी सुनियोजित ढंग से किया जाता है ताकि कन्वर्जन के मुद्दे पर समाज में गंभीर विमर्श खड़ा न हो जाए। लेकिन अब तो कन्वर्जन के गंभीर खतरे को लेकर न्यायालय ने भी अपनी चिंता जाहिर कर दी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कन्वर्जन पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है- “उत्तरप्रदेश में भोले-भाले गरीबों को गुमराह कर ईसाई बनाया जा रहा। अगर ऐसे ही धर्मांतरण (कन्वर्जन) जारी रहा तो एक दिन भारत की बहुसंख्यक जनसंख्या अल्पसंख्यक हो जाएगी”।