रविवार, 16 जून 2019

पिता का साथ

पिता का साथ
दम भर देता है
सीने में
पकड़कर उसका हाथ
कोई मुश्किल नहीं होती
जीने में।

पिता के कंधे चढ़कर
सूरज को भींच सकता हूं
मुट्ठी में
उसकी मौजूदगी संबल देती है
पहाड़ों से भी टकरा सकता हूं
रास्तों में।

पिता पेड़ है बरगद का
सुकून मिलता है उसकी
छांव में
मुसीबत की भले बारिश हो
कोई डर नहीं, वो छत है
घर में।
- लोकेन्द्र सिंह -
(काव्य संग्रह "मैं भारत हूँ" से)


वीडियो देखिये... 

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मर्मस्पर्शी और सच्ची कविता . बचपन में मिला पिता का स्नेहमय संरक्षण आजीवन ऊर्जा देता है

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 02/02/2019 की बुलेटिन, " डिप्रेशन में कौन !?“ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. पढ़ कर बेहद सुकून मिला. अपने पिता की याद आ गई.
    परसों ही उनकी पुण्य तिथि थी.

    बरगद कभी बूढा नहीं होता.

    अपने पंचू से मिल कर मन आनंदित हुआ.

    जवाब देंहटाएं
  4. उत्तर
    1. धन्यवाद जी, अब दिख रहा होगा... ब्लॉग पर जुड़िये
      ---
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      हटाएं
  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति पिता की महत्ता पर ।
    सार्थक अप्रतिम ।

    जवाब देंहटाएं

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