शनिवार, 10 जून 2017

शांति और संवाद की राह पर लौटें किसान

थाना जलाने के लिए उकसाती कांग्रेस विधायक
 मध्यप्रदेश  में किसान आंदोलन ने जिस तरह हिंसक एवं अराजक रूप धारण कर लिया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि उसे भड़काया जा रहा है। पिछले दो दिन में इस प्रकार के वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें स्पष्ट दिखाई देता है कि कुछ लोग और नेता अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर उन लोगों की टिप्पणियाँ भी साझा की गई हैं, जिन्होंने किसानों के पीछे खड़े होकर शांतिपूर्ण आंदोलन को भड़काया। सरकार द्वारा किसानों की माँग मान लेने के बाद जो आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो जाना चाहिए था, उसके अचानक उग्र होने के पीछे राजनीतिक ताकतें नहीं हैं, यह नहीं माना जा सकता। आग पर पानी डालने की जगह नेताओं द्वारा आग को हवा दी जा रही है। आज जिन नेताओं को किसानों के हित याद आ रहें, वह नेता उस दिन कहाँ थे, जब किसानों को उनकी सबसे अधिक जरूरत थी। तब न तो सरकार के विधायक मंत्री किसानों से मिलने आए थे और न ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता आंदोलन की अगुवाई करने खड़े हुए थे। लेकिन, अब कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी प्रशासन के मना करने के बाद भी तिकड़म भिड़ा कर वहाँ पहुँच गए। किसानों के बीच आकर किया भी तो क्या? क्या राहुल गाँधी ने किसानों से अंहिसा की राह चुनने की अपील की?
            आंदोलन जिस स्थिति में पहुँच गया है, वहाँ किसानों को ही अपने विवेक से निर्णय लेना होगा। उन्हें यह देखना होगा कि राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग न कर लें। निश्चित ही किसानों की माँगें जायज हैं। यह उनके हक की लड़ाई है। किसान अन्नदाता हैं। शेष समाज उनके परिश्रम का सम्मान करता है। यही कारण है जब किसान अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे, तब सम्पूर्ण समाज का समर्थन उन्हें और उनके आंदोलन को था। लेकिन, अब स्थिति में अंतर आ रहा है। दो दिन में जिस प्रकार के वीडिया सामने आए हैं, वह विचलित करने वाले हैं। जिस प्रकार से महिलाओं और बच्चों से भरी बस पर पथराव किया गया, उसका समर्थन कोई भी नहीं कर सकता। वाहनों को जलाना, लोगों को प्रताडि़त करना किस प्रकार उचित ठहराया जा सकता है? निर्दोष लोगों को कष्ट पहुँचाकर हम उनका समर्थन और उनकी संवेदनाएं हासिल कर पाएंगे क्या? आंदोलन कर रहे किसान भी इस बात को देख और समझ पा रहे होंगे कि उनके साथ खड़ा समाज अब धीरे-धीरे उनसे दूर हो रहा है। उनको जो नैतिक समर्थन मिला था, उसमें कमी आ रही है। 
          किसी भी सामान्य व्यक्ति कि लिए यह समझना कठिन है कि आखिर बड़े पैमाने पर वाहनों को जलाने के साथ सड़क और रेल यातायात बाधित करके किसानों को क्या हासिल हो रहा है? क्या इससे उनके प्रति आम लोगों की सहानुभूति उमड़ पड़ेगी अथवा उनकी मांगें अधिक न्यायसंगत नजर आने लगेंगी? यदि कोई आंदोलन इस तरह अराजकता के रास्ते पर जाता है तो वह न केवल अपने उद्देश्य को पराजित करता है, बल्कि जनता की हमदर्दी भी खो देता है। यही मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन के साथ भी होता दिखाई दे रहा है। जिस हथियार से महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन की चूलें हिला दी थीं, अहिंसक धरना-प्रदर्शन से अन्ना हजारे ने कांग्रेस की सरकार को घुटनों ला दिया था, उस रास्ते पर किसानों को आना चाहिए। इस देश में हजारों उदाहरण उपलब्ध हैं, जो हमें बताते हैं कि हिंसा से कभी समाधान नहीं निकला है, लेकिन हिंसा के बिना कई जंग जीती गई हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार अडिय़ल रूख अपना रही हो, सरकार एक बार फिर किसानों से बात करने के लिए तैयार है। जो भी समस्या है, उसका समाधान बातचीत से निकल सकता है, हिंसा से नहीं। इसलिए किसानों को शांति और संवाद की राह पर लौटना चाहिए।
दैनिक जागरण में प्रकाशित यह समाचार बहुत कुछ कहता है- आखिर कैसे शांति से चल रहा किसान आन्दोलन भड़का. इस प्रकार की जानकारी अन्य मीडिया के माध्यम से भी सामने आ रही है.

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