रविवार, 19 जुलाई 2020

लव जिहाद की सच्ची कहानियों का दस्तावेज है 'एक मुखौटा ऐसा भी'

डॉ. वंदना गांधी
समाजशास्त्र की शिक्षिका हैं। समाज में चल रही गतिविधियों और उनके पीछे के एजेंडे को वह बहुत बारीक से समझती हैं। जब उन्होंने प्रेम की आड़ में चल रहे 'लव जिहाद' की नब्ज टटोलने की कोशिश की तो उनका सामना ऐसे सच से पड़ा, जो बहुत डरावना है। अपने कहानी संग्रह 'एक मुखौटा ऐसा भी' में उन्होंने 15 सच्ची कहानियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि कैसे प्रेम का मुखौटा लगा कर हिंदू युवतियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका जीवन बर्बाद किया जा रहा है। इनमें छह कहानियां मध्यप्रदेश की हैं और शेष भारत के विभिन्न हिस्सों से ली गई हैं। लेखिका का कहना है कि वह कई परिवारों और पीडि़त युवतियों से प्रत्यक्ष मिली हैं और उनके दर्द को समझने का प्रयास किया है। 
          धरती पर सबसे अधिक पवित्र कुछ है तो वह प्रेम है। प्रेम के सभी रूप मनुष्य के जीवन को सुंदर बनाते हैं। यह शाश्वत सत्य है कि जिसको किसी प्रकार जीतना संभव न हो, उसे प्रेम जीता जा सकता है। प्रेम में एक-दूसरे पर अटूट भरोसा हो जाता है। इस अटूट भरोसे के कारण ही कई बार प्रेम के मुखौटे के पीछे छिपी घिनौनी सूरत को हम देख नहीं पाते हैं। जब यह मुखौटा हटता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कहानीकार डॉ. वंदना गांधी की पुस्तक निश्चित ही बहुत देर होने से पहले ऐसे घिनौने चेहरों से मुखौटे नौंचने का कार्य करेगी। उनकी यह पुस्तक हिंदू युवतियों को सावधान करती है कि उन्हें जरा एक बार अच्छे से पड़ताल करनी चाहिए कि वह जिसे प्रेम समझ रही हैं, वह वास्तव में प्रेम ही है या कुछ और। 
         डॉ. वंदना गांधी की यह कहानियां बताती है कि यह सिर्फ प्रेम में धोखे की दास्तां मात्र नहीं है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को छिन्न करने वाला पूरा एक षड्यंत्र है। अब यह कोई छिपा हुआ षड्यंत्र नहीं है कि हिंदू युवतियों का धर्मांतरण करने के लिए सुनियोजित ढंग से 'लव जिहाद' शुरू किया गया है। तथाकथित प्रगतिशील बंधु इसे भाजपा और आरएसएस का राजनीतिक एजेंडा कह कर खारिज कर सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा या आरएसएस से भी पहले 'लव जिहाद' शब्द का उपयोग वर्ष 2009 में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने किया था। केरल हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति केटी शंकरन ने मुस्लिम लड़के और हिंदू युवती की शादी के मामले की सुनवाई करते समय कहा था कि देश में लव जिहाद चल रहा है। बाद में, केरल से चर्चा में आए लव जिहाद के मामले देश के कई हिस्सों से भी सामने आए, जो स्पष्टतौर पर न्यायमूर्ति केटी शंकरन के कहे को सत्य सिद्ध करते हैं। यह पुस्तक भी लव जिहाद की ऐसी कहानियां का संग्रह है। पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि यह किसी का राजनीतिक एजेंडा हो या न हो, किंतु यह एक सामाजिक संकट जरूर है। इस पर राजनीतिक बहस कम और सामाजिक दृष्टि से विमर्श अधिक होना चाहिए। 
          मुस्लिम समाज भी कोरी कल्पना कह कर 'लव जिहाद' नकार नहीं सकता। यथार्थ में क्या है? यह भी मुस्लिम समाज को देखना होगा। घटनाएं और मुस्लिम समाज का व्यवहार तो यही बयां करता है कि मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी धड़ा 'लव जिहाद' की अवधारणा पर काम तो कर रहा है। वरना क्या कारण है कि मुस्लिम युवक से विवाह करने वाली प्रत्येक लड़की को इस्लाम कबूल करना पड़ता है? मुस्लिम लड़का क्यों नहीं हिंदू धर्म अपनाता? यह कैसा प्रेम है कि हिंदू लड़की को ही अपने धर्म का त्याग करना पड़ता है? हिंदू लड़की के सामने इस्लाम अपनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं छोडऩा, लव जिहाद नहीं तो क्या है? यह तो स्पष्टतौर पर धर्मांतरण का तरीका है। ज्यादातर मामलों में यह भी देखने में आता है कि युवक अपनी मजहबी पहचान छिपा कर हिंदू लड़की से मुलाकात बढ़ाता है। झूठ की बुनियाद पर बनाया गया संबंध प्रेम कतई नहीं हो सकता। 
          पुस्तक 'एक मुखौटा ऐसा भी' निश्चित तौर पर अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल होगी। एक षड्यंत्र के विरुद्ध जागरूकता लाने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। डॉ. गांधी कहती हैं कि लव जिहाद की खौफनाक हकीकत सामने लाकर उन्हें बहुत संतोष है। यह किताब कॉलेज छात्राओं के लिए गीता साबित होगी। हर युवती को इस किताब को जरूर पढऩा चाहिए। अर्चना प्रकाशन को साधुवाद कि उसने ऐसे विषय पर पुस्तक प्रकाशित करने का साहस दिखाया, जिस पर दुर्भाग्यपूर्ण राजनीति हो रही है। इस संबंध में अर्चना प्रकाशन के ट्रस्टी ओमप्रकाश गुप्ता कहते हैं कि लव जेहाद की सच्ची घटनाओं पर देश में यह पहली किताब है। इस किताब में उन युवतियों की पीड़ा को उजागर किया गया है, जो गलत कदम उठाने के बाद अब पछता रहीं हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में विमोचित इस कृति ने पर्याप्त चर्चा प्राप्त की है।

पुस्तक : एक मुखौटा ऐसा भी (लव जिहाद पर केंद्रित कहानी संग्रह) 
लेखक : डॉ. वंदना गांधी
मूल्य : 80 रुपये (पेपरबैक)
पृष्ठ : 86
प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन, 
17, दीनदयाल परिसर, ई-2, महावीर नगर, भोपाल
दूरभाष – 0755-2420551

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

प्रोपोगंडा विशेषज्ञ कम्युनिस्ट ओली


कम्युनिस्ट नेता एवं नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत के संदर्भ में अपने विवादास्पद एवं हास्यास्पद बयानों के लिए अब हद पार चुके हैं। अपने बयानों एवं व्यवहार से वह लगातार भारत-नेपाल के संबंधों में खटास पैदा करने की की कोशिश कर रहे हैं। यह सब वे किसके इशारे पर कर रहे हैं, यह कोई अबूझ पहेली नहीं रह गई है। भगवान श्रीराम के जन्मस्थान के विषय में दिए गए अपने अतार्किक, अप्रमाणिक और हास्यास्पद बयान के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री ओली घर में ही घिर गए हैं। उनके अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म उत्तरप्रदेश स्थित अयोध्या में नहीं हुआ, बल्कि नेपाल के बीरगंज स्थित एक गाँव में हुआ। नेपाल का यह गाँव ही वास्तविक अयोध्या है। तीर्थनगरी अयोध्या और भगवान श्रीराम के बारे में नेपाल के प्रधानमंत्री ओली का बयान इस हद तक तथ्यहीन है कि उनकी सोच-समझ पर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। नेपाल के बुद्धिजीवी, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व उपप्रधानमंत्री तक ओली के इस बयान पर तंज कसा है और उनकी वास्तविक मंशा पर प्रश्न उठाए हैं। अपने इस बयान को लेकर वे हास्य के पात्र बन गए हैं। स्थिति यह बन गई कि नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ गई है।  
           ओली लगातार भारत-नेपाल के संबंधों को बिगाडऩे का प्रयत्न कर रहे हैं। कभी वे भारत पर कोरोना संक्रमण का आरोप लगाते हैं, तो कभी कहते हैं कि भारत सरकार उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की कोशिश कर रही है। कभी भारतीय क्षेत्रों पर नेपाल का दावा करते हैं। नेपाल का नया मानचित्र भी संसद में पारित कराते हैं, जिसको लेकर दोनों देशों के संबंध बिगड़ सकते हैं। उनका यह बयान भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भारत सरकार की सराहना की जानी चाहिए कि उसने ओली की ऊल-जलूल हरकतों के बाद भी संयम रखा हुआ है। यह धैर्य और संयम ही दोनों देशों के लिए आवश्यक है। 
          एक तथ्य यह भी है कि भगवान श्रीराम के संदर्भ में सर्वाधिक अपप्रचार कम्युनिस्टों ने ही किया है। श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के राष्ट्रव्यापी स्वरूप लेने के बाद से ही भारत के कम्युनिस्टों ने भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाने शुरू कर दिए थे। फर्जी तथ्यों के आधार पर पर्चे लिखे गए, किताबें लिखी गईं, विमर्श खड़े किए गए। श्रीराम को काल्पनिक सिद्ध करने की पुरजोर कोशिशें हुईं। लेकिन, अब तो सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबी बहस और तथ्यों-तर्कों के आधार पर सिद्ध हो गया कि उत्तरप्रदेश की अयोध्या ही भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। वहाँ अब भव्य श्रीराम मंदिर बनेगा। मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आते ही मंदिर निर्माण की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। 
          नेपाल के प्रधानमंत्री ओली भूल गए कि भारत-नेपाल की सांस्कृतिक विरासत एक ही है। श्रीराम का मान-सम्मान एवं उनके प्रति आस्था नेपाल में भी उतनी ही है, जितनी भारत में। नेपाल की जनता उन्हीं श्रीराम को पूजती है जिनका जन्म सरयू किनारे बसी प्राचीन नगरी अयोध्या में हुआ और विवाह जनकपुर की सीता से हुआ। इसलिए नेपाल में भी उनकी इस हास्यास्पद खोज का विरोध सामान्य जनमानस ने किया है।

वीडियो देखें : भगवान श्रीराम के जन्म पर नेपाल के कम्युनिस्ट नेता और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के बयान का विश्लेषण


बुधवार, 15 जुलाई 2020

मंदिर तोड़ने की जेहादी मानसिकता

पाकिस्तान हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यकों के लिए नरक बन गया है। वहाँ हिंदू समाज, उनके व्यावसायिक संस्थान एवं धार्मिक स्थलों पर कट्टरपंथियों के हमले जारी हैं। सरकार आतंकी एवं कट्टरपपंथी गुटों के सामने पूरी तरह घुटने टेक चुकी है। इमरान खान की सरकार ने राजधानी इस्लामाबाद में जिस बहुप्रतीक्षित पहले श्रीकृष्ण मंदिर को बनने के लिए आर्थिक सहायता देने की स्वीकृति दी थी, उसे इस्लामिक कट्टरपंथियों ने बनने से पहले ही ढहा दिया है। मंदिर की नींव को तोडऩे वालों पर कार्रवाई करने की जगह सरकार चुप्पी साधकर बैठक गई है। बल्कि इमरान सरकार ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के फतवे के आगे घुटने टेकते हुए मंदिर के निर्माण पर ही रोक लगा दी। पाकिस्तान सरकार ने अब मंदिर के संबंध में इस्लामिक ऑइडियॉलजी काउंसिल से सलाह लेने का फैसला किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान में सरकार कट्टरपंथियों के हाथ की कठपुतली बन चुकी है। वह अल्पसंख्यकों के हित में स्व-विवेक से कोई निर्णय नहीं ले सकती है। सरकार के निर्णयों पर आतंकी गिरोहों एवं कट्टरपंथी गुटों की पहरेदारी है। 
          कट्टरपंथियों ने श्रीकृष्ण मंदिर की नींव को ढहाने के साथ यह भी चेतावनी और संकेत दिए हैं कि पाकिस्तान में हिंदुओं के मंदिर स्वीकार नहीं हैं। यदि मंदिर बनाने के प्रयास किए तो उसके परिणाम भुगतने के लिए हिंदुओं को तैयार रहना चाहिए। सामने आ रही जानकारियों के अनुसार मंदिर की नींव को ध्वस्त कर कट्टरपंथियों ने वहाँ नमाज पढऩा भी शुरू कर दिया है। उनका यह कृत्य मुगलकाल में भारत आए उन आक्रांताओं एवं धर्मांध कट्टरपंथियों की याद दिलाता है, जिन्होंने संपूर्ण भारत (आज का पाकिस्तान भी शामिल) में न केवल मंदिरों को ध्वस्त किया, बल्कि वहाँ तथाकथित मस्जिदें भी तामीर करा दीं। भारत में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में बाबर मस्जिद, मथुरा में श्रीकृष्ण मंदिर परिसर की तथाकथित मस्जिद और भगवान शिव की भूमि काशी में तथाकथित ज्ञानवापी मस्जिद इसके सबसे बड़े और जीवंत उदाहरण हैं। संपूर्ण भारत में इस्लामिक धर्मांधता के चलते आक्रांताओं एवं कट्टरपंथियों की भीड़ ने अनेक मंदिर ध्वस्त किये थे, जिनकी चर्चा भी आज नहीं होती है। 90 के दशक में जम्मू-कश्मीर राज्य की कश्मीर घाटी को हिंदू विहीन करने के बाद वहाँ भी यह कृत्य दोहराए गए। आज जम्मू-कश्मीर के अनेक प्रसिद्ध मंदिर जर्जर अवस्था में हैं, वहीं अनेक मंदिरों के तो अवशेष भी नहीं बचे हैं। 
          बँटवारे के बाद से ही पाकिस्तान में भी हिंदू समाज और मंदिरों पर हमले प्रारंभ हो गए थे। पाकिस्तान में ज्यादातर मंदिर बंद हैं। वहाँ किसी प्रकार की धार्मिक पूजा-अर्चना करना संभव नहीं है। इस मंदिर की आधारशिला रखने वाले पाकिस्तान के मानवाधिकारों के संसदीय सचिव लाल चंद्र माल्ही ने बताया कि वर्ष 1947 से पहले इस्लामाबाद और उससे सटे हुए इलाकों में कई हिंदू मंदिर थे। लेकिन, कट्टरपंथियों के कारण अब यह उपयोग में नहीं है। कई मंदिरों पर ताले लगा दिए गए हैं और कई मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया है। पाकिस्तान में घटा यह घटनाक्रम इस्लामिक कट्टरता का उदाहरण है। यह इस बात का भी उदाहरण है कि वहाँ हिंदुओं एवं अल्पसंख्यकों की स्थिति ठीक नहीं। हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों पर होने वाले धार्मिक अत्याचारों को संज्ञान में लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए। 

गुरुवार, 18 जून 2020

ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई के समाधि स्थल पर स्वातंत्र्यवीर सावरकर


यह ऐतिहासिक चित्र उस समय का है जब स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर 1937 में ग्वालियर में आयोजित लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस समारोह में आए थे।

हमें यह याद रखना चाहिए...
भारत के जिस स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व भारत की बेटी रानी लक्ष्मीबाई ने किया था, उसे अंग्रेज और उनके दरबारी लेखक एक साजिश के तहत 'सिपाही विद्रोह' लिख रहे थे।

जब अंग्रेज भारत की स्वतंत्रता के लिए 1857 की क्रांति से उठी चिंगारी को दबाने का प्रयास कर रहे थे। एक सुनियोजित आंदोलन को मात्र 'सिपाही विद्रोह' साबित करने में लगे थे, तब स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने तथ्यों के आधार पर 1857 की क्रांति को 'भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम' सिद्ध किया।

ऐसा लिखने वाले, कहने वाले और उसे सिद्ध करने वाले वे पहले लेखक हैं।

इस संबंध में उन्होंने प्रेरक पुस्तक भी लिखी, जो क्रांतिकारियों की गीता बन गई। यह दुनिया की इकलौती पुस्तक है, जिसे किसी सरकार ने प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया था।

'1857 का स्वातंत्र्य समर' पुस्तक को यशस्वी क्रांतिकारी भगत सिंह ने ब्रिटिश सरकार को धता बताते हुए प्रकाशित करा कर क्रांतिकारी साथियों में वितरित कराया। अन्य क्रांतिकारियों ने भी इस पुस्तक को योजनापूर्वक प्रकाशित कराया।

यह चित्र समाचार पत्र 'स्वदेश' में प्रकाशित हुआ है।



मंगलवार, 16 जून 2020

कश्मीर में अजय पंडित की हत्या जेहादी मानसिकता


बार-बार आप एक नारा सुनते होंगे 'कश्मीरियत को बचाना जरूरी है'। हालांकि, कश्मीरियत की हत्या तो उसी दिन हो गयी थी जब वहां से लक्षित करके कश्मीरी हिंदुओं-कश्मीरी पंडितों को लूट-पीट कर, मार-काट कर भगा दिया गया था। 

चौराहे पर झुंड बना कर हिंदुओं की हत्या की, महिलाओं-लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार किये, छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ा, संपत्ति पर कब्जा कर लिया गया था।

यह सब आज भी बदस्तूर जारी है... आज भी जो कोई कश्मीरियत को बचाने या ज़िंदा रखने की कोशिश कर रहा है, उसे बेरहमी से खत्म कर दिया जाता है।

कभी सोचा है, ऐसा क्यों है???

क्योंकि, इस देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर न केवल चुप रहा, बल्कि गाहे-बगाहे उस खरतनाक सोच पर पर्दा ही डालता रहा, जो आज भी कश्मीर में हिंदुओं को रहने नहीं देना चाहती।

अनंतनाग जिले में सरपंच अजय पंडित की हत्या इस बात की गवाह है। 

उस कायर सोच ने अजय पंडित को पीछे से गोली मारी। मदद के बहाने से घर से बुलाकर।

परंतु, बात-बात पर हाथ में प्लेकार्ड और मोमबत्ती लेकर सड़कों पर उतरने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग ने अजय पंडित की हत्या पर वैसी ही बेशर्म चुप्पी साध रखी है, जैसी अब से लगभग 30 साल पहले कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर साध रखी थी। 

इन बेशर्मों को बॉलीवुड की तेजतर्रार अभिनेत्री कंगना रनौत ने आड़े हाथ लिया है। सोशल मीडिया पर जारे किये गए वीडियो सन्देश में कंगना के दर्द और पीड़ा को सुनिये और महसूस कीजिये।

मैंने अनुभव किया है कि हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार के विरोध में बोलने वाले लोग बॉलीवुड में बहुत कम हैं। पिछले 5-6 वर्षों में कुछ लोग आगे आये हैं। हालाँकि अब भी बॉलीवुड में कश्मीरी पंडितों की त्रासदी पर भी वे ही बोलते हैं, जिन्होंने स्वयं या उनके परिवार ने जेहाद झेला है। अशोक पंडित और अनुपम खेर प्रमुख नाम हैं, जो प्रमुखता से कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े दिखते हैं। अनुपम खेर और अशोक पंडित ने भी अजय पंडित की हत्या पर दुःख और पीड़ा व्यक्त की है।


कश्मीर में हिंदुओं की हत्या का यह चक्र अब रुकना चाहिए। सरपंच अजय पंडित का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।

कश्मीरियत को फिर से जिंदा करने का समय आ गया है। हम केंद्र सरकार से अपील करते हैं कि कश्मीर में हिंदुओं को बसाने के काम में तेजी लाये। उन्हें पर्याप्त सुरक्षा और योजना के साथ वापिस कश्मीर में बसाया जाए। उनके घर, दुकान और खेत-खलियान लौटाये जाएं।

हम लोकतंत्र के सिपाही अजय पंडित के बलिदान, उनके सपने और हौसले को नमन करते हुए उनकी उस शेरनी बेटी को भी प्रणाम करते हैं, जिसने कह दिया है कि वह अजय पंडित की बेटी है, किसी से डरती नहीं। यहीं रहेगी कश्मीर में और हत्यारी मानसिकता का डटकर सामना करेगी...


जय हिंद जय भारत...

शुक्रवार, 29 मई 2020

महात्मा गांधी की दृष्टि में स्वातंत्र्यवीर सावरकर



“सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए। अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र सदा के लिए हाथ से चले जाएंगे। एक सावरकर भाई को मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला था। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रांतिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं। मौजूदा शासन प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले, देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को, दिलोजान से प्यार करने के अपराध में वे कालापानी भोग रहे हैं।” आपको किसी प्रकार का भ्रम न हो इसलिए बता देते हैं कि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश सावरकर के लिए ये विचार किसी हिंदू महासभा के नेता के नहीं हैं, बल्कि उनके लिए यह सब अपने समाचार-पत्र ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी ने 18 मई, 1921 को लिखा था। महात्मा गांधीजी ने यह सब उस समय लिखा था, जब स्वातंत्र्यवीर सावरकर अपने बड़े भाई गणेश सावरकर के साथ अंडमान में कालापानी की कठोरतम सजा काट रहे थे। (हार्निमैन और सावरकर बंधु, पृष्ठ-102, सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय)

          भारत माता के वीर सपूत सावरकर के बारे में आज अनाप-शनाप बोलने वाले कम्युनिस्टों और महात्मा गांधी के ‘नकली उत्तराधिकारियों’ को शायद यह पता ही नहीं होगा कि सावरकर बंधुओं के प्रति महात्मा कितना पवित्र और सम्मान का भाव रखते थे। गांधीजी की उपरोक्त टिप्पणी में इस बात पर गौर कीजिए, जिसमें वे कह रहे हैं कि- “मौजूदा शासन प्रणाली (ब्रिटिश सरकार) की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने (वीर सावरकर) ने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले (गांधीजी से भी काफी पहले), देख लिया था।” इस पंक्ति में महात्मा वीर सावरकर की दृष्टि और उनकी निष्ठा को स्पष्ट रेखांकित कर रहे हैं। लेकिन, वीर सावरकर के विरुद्ध विषवमन करने वालों ने न तो महात्मा गांधी को ही पढ़ा है और न ही उन्हें सावरकर परिवार के बलिदान का सामान्य ज्ञान है। नकली लोग बात तो गांधीजी की करते हैं, उनकी विचारधारा के अनुयायी होने का दावा करते हैं, लेकिन उनके विचार का पालन नहीं करते हैं। जुबान पर गांधीजी का नाम है, लेकिन मन में घृणा-नफरत और हिंसा भरी हुई है। इसी घृणा और हिंसा के प्रभाव में ये लोग उस युगद्रष्ट महापुरुष की छवि को बिगाडऩे के लिए षड्यंत्र रचते हैं, जिसकी प्रशंसा स्वयं महात्मा गांधी ने की है। 
          महात्मा गांधी और विनायक दामोदर सावरकर की मुलाकात लंदन में 1909 में विजयदशमी के एक आयोजन में हुई थी। लगभग 12 वर्ष बाद भी महात्मा गांधी की स्मृति में यह मुलाकात रहती है और जब वे अपने समाचार-पत्र यंग इंडिया में सावरकर के कारावास और उनकी रिहाई के संबंध में लिखते हैं, तो पहली मुलाकात का उल्लेख करना नहीं भूलते। इसका एक ही अर्थ है कि क्रांतिवीर सावरकर और भारत की स्वतंत्रता के लिए उनके प्रयासों ने महात्मा गांधी के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी। 

          इससे पूर्व भी महात्मा गांधी ने 26 मई, 1920 को यंग इंडिया में ‘सावरकर बंधु’ शीर्षक से एक विस्तृत टिप्पणी लिखी है। यह टिप्पणी उन सब लोगों को पढऩी चाहिए, जो क्रांतिवीर सावरकर पर तथाकथित ‘क्षमादान याचना’ का आरोप लगाते हैं। इस टिप्पणी में हम तथाकथित ‘माफीनामे’ प्रसंग को विस्तार से समझ पाएंगे और यह भी जान पाएंगे कि स्वयं महात्मा गांधीजी सावरकर बंधुओं की मुक्ति के लिए कितने आग्रही थे? सावरकर बंधुओं के साथ हो रहे अन्याय पर भी महात्माजी ने प्रश्न उठाया है। इस टिप्पणी में महात्मा गांधी ने उस ‘शाही घोषणा’ को भी उद्धृत किया है, जिसके अंतर्गत उस समय अनेक राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जा रहा था। वे लिखते हैं कि – “भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों ने इस संबंध में जो कार्रवाई की उसके परिणामस्वरूप उस समय कारावास भोग रहे बहुत लोगों को राजानुकम्पा का लाभ प्राप्त हुआ है। लेकिन कुछ प्रमुख ‘राजनीतिक अपराधी’ अब भी नहीं छोड़े गए हैं। इन्हीं लोगों में मैं सावरकर बंधुओं की गणना करता हूँ। वे उसी माने में राजनीतिक अपराधी हैं, जिस माने में वे लोग हैं, जिन्हें पंजाब सरकार ने मुक्त कर दिया है। किंतु इस घोषणा (शाही घोषणा) के प्रकाशन के आज पाँच महीने बाद भी इन दोनों भाइयों को छोड़ा नहीं गया है।” 
          इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि महात्मा गांधी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अंग्रेज सरकार जल्द से जल्द सावरकर बंधुओं को स्वतंत्र करे। सावरकर बंधुओं के प्रकरण में अपनायी जा रही दोहरी नीति को उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से जनता के बीच उजागर कर दिया। महात्मा गांधी अपने इस आलेख में अनेक तर्कों से यह इस सिद्ध कर रहे थे कि ब्रिटिश सरकार के पास ऐसा कोई कारण नहीं कि वह अब सावरकर बंधुओं को कैद में रखे, उन्हें तुरंत मुक्त करना चाहिए। हम जानते हैं कि महात्मा गांधी अधिवक्ता (बैरिस्टर) थे। सावरकर बंधुओं पर लगाई गईं सभी कानूनी धाराओं का उल्लेख और अन्य मामलों के साथ तुलना करते हुए गांधीजी ने इस लेख में स्वातंत्र्यवीर सावरकर बंधुओं का पक्ष मजबूती के साथ रखा है। 
          उस समय वाइसराय की काउंसिल में भी सावरकर बंधुओं की मुक्ति का प्रश्न उठाया गया था, जिसका जिक्र भी गांधीजी ने किया है। काउंसिल में जवाब में कहा गया था कि ब्रिटिश सरकार के विचार से दोनों भाइयों को छोड़ा नहीं जा सकता। इसका उल्लेख करते हुए गांधीजी ने अपने इसी आलेख के आखिर में लिखा है- “इस मामले को इतनी आसानी से ताक पर नहीं रख दिया जा सकता। जनता को यह जानने का अधिकार है कि ठीक-ठीक वे कौन-से कारण हैं जिनके आधार पर राज-घोषणा के बावजूद इन दोनों भाइयों की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही है, क्योंकि यह घोषणा तो जनता के लिए राजा की ओर से दिए गए ऐसे अधिकार पत्र के समान है जो कानून का जोर रखता है।” 
          आज जो दुष्ट बुद्धि के लोग वीर सावरकर की अप्रतिम छवि को मलिन करने का दुष्प्रयास करते हैं, उन्हें महात्मा गांधी की यह टिप्पणी इसलिए भी पढऩी चाहिए क्योंकि इसमें गांधीजी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए दोनों भाइयों के योगदान को भी रेखांकित किया है। यह पढऩे के बाद शायद उन्हें लज्जा आ जाए और वे हुतात्मा का अपमान करने से बाज आएं। हालाँकि, संकीर्ण मानसिकता के इन लोगों की बुद्धि न भी सुधरे तो भी कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि जो भी सूरज की ओर गंदगी उछालता है, उससे उनका ही मुंह मैला होता है। क्रांतिवीर सावरकर तो भारतीय इतिहास के चमकते सूरज हैं, उनका व्यक्तित्व मलिन करना किसी के बस की बात नहीं। स्वातंत्र्यवीर सावरकर तो लोगों के दिलों में बसते हैं। युगद्रष्टा सावरकर भारत के ऐसे नायकों में शामिल हैं, जो यशस्वी क्रांतिकारी हैं, समाज उद्धारक हैं, उच्च कोटि के साहित्यकार हैं, राजनीतिक विचारक एवं प्रख्यात चिंतक भी हैं। भारत के निर्माण में उनका योगदान कृतज्ञता का भाव पैदा करता है। उनका नाम कानों में पड़ते ही मन में एक रोमांच जाग जाता है। गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है। श्रद्धा से शीश झुक जाता है।

स्वदेश, भोपाल समूह में 28 मई, 2020 को प्रकाशित

गुरुवार, 21 मई 2020

'की-बोर्ड का सिपाही' प्रो. संजय द्विवेदी बने पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति


देश के जाने-माने पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक प्रो. संजय द्विवेदी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे विश्वविद्यालय के कुलसचिव की जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे थे। प्रो. द्विवेदी 10 वर्ष से अधिक समय तक विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष भी रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि कुलपति प्रो. संजय द्विवेदी लंबे समय तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे हैं। उन्हें प्रिंट, बेव और इलेक्ट्रॉनिक, तीनों ही मीडिया में कार्य करने का वृहद अनुभव है। उन्होंने दैनिक भास्कर, हरिभूमि, नवभारत, स्वदेश, इंफो इंडिया डाट काम और छत्तीसगढ़ के पहले सेटलाइट चैनल जी-24 छत्तीसगढ़ जैसे मीडिया संगठनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली। मुंबई, रायपुर, बिलासपुर और भोपाल में लगभग 14 साल सक्रिय पत्रकारिता में रहने के बाद प्रो. द्विवेदी शिक्षा क्षेत्र से जुड़े।

प्रो. द्विवेदी 12 वर्षों से नियमित जनसंचार के सरोकारों को केंद्रित पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ के कार्यकारी संपादक भी हैं। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों की अकादमिक समितियों एवं मीडिया से संबंधित संगठनों में सदस्य एवं पदाधिकारी भी हैं।

निश्चित ही उनके सुदीर्घ अनुभव का लाभ विश्वविद्यालय को मिलेगा। यह विश्वविद्यालय के लिए भी सुखद है कि यहीं के विद्यार्थी को विश्वविद्यालय का नेतृत्व करने का अवसर मिला है। फरवरी-2009 में वे विश्वविद्यालय से जुड़े थे। विश्वविद्यालय में उन्होंने विभागाध्यक्ष एवं कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों कार्य किया।

मेरे उनका पहला परिचय ब्लॉगिंग के माध्यम से हुआ। सर 'की-बोर्ड के सिपाही' के नाम से ब्लॉग लिखते हैं। वर्ष 2007 में जब अपन ने ब्लॉग लिखना शुरू किया तब से सर का ब्लॉग पढ़ते आ रहे हैं। वे नियमित तौर पर राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर लेखन करते हैं। उनका लिखा विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी नियमित प्रकाशित होता है। उनकी सक्रियता सदैव प्रेरणा देती है। उन्होंने अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन भी किया है।

उनके साथ काम करने का पहला अवसर 2013 में मिला। विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में वे विभागाध्यक्ष थे और मैंने प्रोडक्शन सहायक के तौर पर ज्वाइन किया था। विश्वविद्यालय जैसे संस्था में काम करने का यह मेरा पहला अवसर था, लेकिन संजय सर की उपस्थिति ने हौसला दिया। वे लगातार प्रोत्साहित करते रहते हैं।
जनसंचार के विभागाध्यक्ष रहते हुए और कुलसचिव के रूप में भी उन्होंने सदैव विद्यार्थियों के हित में अच्छे निर्णय लिए हैं। जनसंचार विभाग में एक समृद्ध विभागीय पुस्तकालय की स्थापना उन्होंने की। विद्यार्थियों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देने के लिए प्रायोगिक समाचार-पत्र का प्रकाशन हमने उनके मार्गदर्शन में किया। न्यूज़ बुलेटिन निकलना और अन्य गतिविधियाँ वे लगातार विद्यार्थियों के लिए आयोजित करते रहे। सार्थक शनिवार जैसी अनूठी परम्पर उन्होंने शुरू की। यह विद्यार्थियों का सांस्कृतिक मंच था।