शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

विश्व बंधुत्व और शांति का संदेश देता है सांची


साँची स्थित मुख्य स्तूप (स्तूप क्रमांक-1) फोटो : लोकेन्द्र सिंह/Lokendra /Singh 
 जी वन में चलने वाले रोज-रोज के युद्धों से आपका मन अशांत है, आपकी आत्मा व्यथित है, आपका शरीर थका हुआ है तो बौद्ध तीर्थ सांची चले आइए आपके मन को असीम शांति मिलेगी। आत्मा अलौकिक आनंद की अनुभूति करेगी। शरीर सात्विक ऊर्जा से भर उठेगा। सांची के बौद्ध स्तूप प्रेम, शांति, विश्वास और बंधुत्व के प्रतीक हैं। मौर्य सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर एकान्त स्थल की तलाश थी। ताकि एकांत वातावरण में बौद्ध भिक्षु अध्ययन कर सकें। सांची में उनकी यह तलाश पूरी हुई। जिस पहाड़ी पर सांची के बौद्ध स्मारक मौजूद हैं उसे पुरातनकाल में बेदिसगिरि, चेतियागिरि और काकणाय सहित अन्य नामों से जाना जाता था। यह ध्यान, शोध और अध्ययन के लिए अनुकूल स्थल है। कहते हैं महान सम्राट अशोक की महारानी ने उन्हें सांची में बौद्ध स्मारक बनाने का सुझाव दिया था। महारानी सांची के निकट ही स्थित समृद्धशाली नगरी विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं। सम्राट अशोक के काल में ही बौद्ध धर्म के अध्ययन और प्रचार-प्रसार की दृष्टि से सांची कितना महत्वपूर्ण स्थल हो गया था, इसे यूं समझ सकते हैं कि सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने भी कुछ समय यहीं रहकर अध्ययन किया। दोनों भाई-बहन बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए सांची से ही बोधि वृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गए थे। सांची के स्तूप सिर्फ बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ही श्रद्धा के केन्द्र नहीं हैं बल्कि दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं। ये स्तूप आज भी भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को देश-दुनिया में पहुंचा रहे हैं। दुनिया को शांति, सह अस्तित्व और विश्व बंधुत्व की भावना के साथ रहने का संदेश दे रहे हैं।

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मीडिया में शिवसैनिक

 अ नूठी लेखन शैली, वाकपटुता, प्रतिबद्धता, गंभीर अध्ययन, बेबाक बयानी और धारदार तर्क प्रेम शुक्ल को निर्भीक पत्रकारों की श्रेणी में सबसे आगे खड़ा करते हैं। मंच से भाषण दे रहे हों, टीवी चैनल्स पर बहस में शामिल हों या फिर पत्रकार के रूप कलम चला रहे हों, प्रेम शुक्ल में दिल-दिमाग में कोई कन्फ्यूजन नहीं होता। उन्हें पता है कि कहां खड़ा होना है। सच्चाई का पक्ष लेना और सही बातों को बिना लाग-पलेट के कहना, यही उनको औरों से अलग करता है। तथाकथित सेकुलर पत्रकारों की जमात में उनकी राष्ट्रवादी लेखनी और वाणी सिंह गर्जना-सी प्रतीत होती है। खैर, प्रेम शुक्ल हिन्दी के लिए समर्पित उन चंद पत्रकारों में से हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उनकी रगों में खून के साथ-साथ अखबारी स्याही भी बहती है। देश के सबसे प्रभावशाली और चर्चित सांध्य दैनिक 'दोपहर का सामना' के कार्यकारी सम्पादक प्रेम शुक्ल बेहद सरल और मिलनसार स्वभाव के धनी हैं। प्रेम अपने नाम के अनुरूप सौम्य, निर्मल और नैसर्गिक हैं। 
       प्रेम शुक्ल मूलत: उत्तरप्रदेश के जिले सुल्तानपुर के छोटे-से गांव भोकार के हैं। यह दीगर बात है कि उनका जन्म मुम्बई के उपनगर बांद्रा में 1 अक्टूबर 1969 को हुआ। एक अरसा पहले उनके प्रपितामह रोजी-रोटी की तलाश में मुम्बई आए और फिर यह परिवार मायानगरी का होकर ही रह गया। तब किसने सोचा था, आज भी यह जानकार लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि एक उत्तर भारतीय नौजवान शिवसेना के मुखपत्र 'दोपहर का सामना' का सम्पादक है। वही शिवसेना, जिसे उत्तर भारतीयों की शत्रु की तरह दिखाया-बताया जाता है। उनके साप्ताहिक कॉलम 'टंकार' और 'दृष्टि' पढऩे के लिए लोग उतावले रहते हैं। इन दोनों विशिष्ट लेखमालाओं के जरिए श्री शुक्ल हिन्दुस्थान की गरिमा, हिन्दुत्ववादी अस्मिता और सभ्यता-संस्कृति को निरूपित करने का उपक्रम कर रहे हैं। प्रेम शुक्ल जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, मराठी साप्ताहिक विवेक, तरुण भारत सरीखे समाचार-पत्रों में भी काम कर चुके हैं। देश की पहली ऑडियो-वीडियो मैग्जीन 'लहरें' और ईटीसी न्यूज के कंसल्टिंग एडिटर के रूप में प्रेम शुक्ल ने कई सामाजिक, आर्थिक, आपराधिक और राजनैतिक घटनाओं-घोटालों से पर्दा उठाया है। 
      प्रेम शुक्ल महज पत्रकार ही नहीं बल्कि एक सक्रिय समाजसेवी, साहित्यकार और अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। उनके भीतर पुश्तैनी मिट्टी की सौंधी गंध बसी हुई है। मुंबई में वे उत्तर भारत के गौरव की तरह हैं। प्रेम शुक्ल बड़े स्तर पर भोजपुरी सम्मेलन, अवधी अधिवेशन और लाई-चना उत्सव मनाते हैं। मारीशस में रामकथा को जीवंत और लोकप्रिय बनाये रखने के लिए प्रयासरत् रामकथा वाचकों को सम्मानित-प्रोत्साहित करते हैं। प्रेम शुक्ल सूरीनाम और फिजी में भी हिन्दी भाषा और हिन्दी जनों के प्रिय हैं।  
---
"राष्ट्रवादी पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ हैं प्रेम शुक्ल। हिन्दी पट्टी के लोगों के लिए अनुकूल जगह नहीं होने बाद भी उन्होंने मुम्बई में हिन्दी पत्रकारिता को बहुत सम्मान दिलाया है।" 
- अनिल सौमित्र, मीडिया एक्टिविस्ट 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

बुधवार, 26 नवंबर 2014

कवि पत्रकार

 प त्रकार की चेतावनी को नजरअंदाज करना कितना घातक साबित हो सकता है, दुनिया में इसका सबसे बड़ा उदाहरण है भोपाल गैस त्रासदी। राजकुमार केसवानी उस पत्रकार का नाम है, जो वर्ष 1984 में हुई भीषणतम गैस त्रासदी की ढाई साल पहले से चेतावनी देते आ रहे थे। हुक्मरानों ने अगर उनकी चेतावनी को संजीदगी से लिया होता तो संभवत: 3 दिसम्बर को वह काली रात न आई होती है, जिसके गाल में हजारों लोगों का जीवन चला गया और अब भी उसकी मार से हजारों लोग पीडि़त हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी गंभीर और संवेदनशील पत्रकारिता की सराहना हुई है। श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए पत्रकारिता का प्रतिष्ठित पुरस्कार 'बीडी गोयनका अवॉर्ड' उन्हें मिल चुका है।  
      26 नवंबर, 1950 को भोपाल की बाजेवाली गली में जन्मे राजकुमार केसवानी ने एलएलबी की पढ़ाई की है लेकिन उनका मन तो लिखत-पढ़त के काम की ओर हिलोरे मार रहा था। इसीलिए वकालात के पेशे में न जाकर, 1968 में कॉलेज के पहले साल से ही स्पोर्ट्स टाइम्स में सह संपादक का बिना वेतन का पद पाकर पत्रकारिता की दुनिया में चले आए। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स, इलस्ट्रेटेड वीकली, संडे आब्जर्वर, इंडिया टुडे, इंडियन एक्सप्रेस, द एशियन एज, ट्रिब्यून, आउटलुक, द इंडिपेंडेट, द वीक, न्यूज टाइम, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स और दिनमान जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों में काम किया है। वर्ष 1998 से 2003 तक एनडीटीवी के मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख रहे। 2003 में दैनिक भास्कर इन्दौर के सम्पादक बने। दैनिक भास्कर समूह में ही सम्पादक (मैग्जीन्स) की जिम्मेदारी संभालते हुए रविवारीय रसरंग को अलग ही पहचान दी। कंटेन्ट और भाषा (खासकर उर्दू) की शुद्धता के लिए इस शिद्दत से काम किया कि लोग रसरंग के दीवाने हो गए। रसरंग में ही 'आपस की बात' शीर्षक से लाजवाब स्तंभ लिखकर राजकुमार केसवानी रुपहले पर्दे के सुनहरे कल की याद दिलाते हैं। उनके पास विश्व-सिनेमा की बेस्ट क्लासिक फिल्मों के वीएचएस कैसेट्स, दुर्लभ हिन्दी फिल्मी और गैर फिल्मी रेकॉर्ड्स का अनूठा खजाना है। कैनेडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (सीबीसी) और व्हाइट पाइन पिक्चर्स, टोरंटो ने पत्रकारिता में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए एक वृत्तचित्र का निर्माण भी किया है। 
      जितना पैनापन राजकुमार केसवानी की पत्रकारिता में रहा है, उतनी ही मुलायमियत उनकी कविताओं में है। वे पेशेवर नहीं बल्कि मन के कवि हैं। कविता संग्रह 'बाकी बचें जो' में बच्चों के प्रति उनकी मोहब्बत, उनके अंदर बैठे बेहतरीन इंसान को सबके सामने लाती है। कवि लीलाधर मंडलोई उनकी कविताओं के बारे में कहते हैं- 'मितकथन राजकुमार केसवानी का गुण है। स्थानीयता उनकी पूँजी। कहन में सादगी। भाषा में गहरी लय और संगीत। वे तफसीलों में कम जाते हैं कविता में व्याख्यान की जगह वे भाव को तरजीह देते हैं।'
---
"राजकुमार केसवानी पत्रकार के साथ-साथ बेहद संवेदनशील कवि भी हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर उनकी ख़बरों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई हैं।" 
- डॉ. विजय बहादुर सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

सोमवार, 24 नवंबर 2014

भूत भगाने वाला

 क रीब तीन साल पहले तक प्राइम टाइम में भूत-प्रेत की कहानियां, रियलिटी शो और मनोरंजन के नाम पर फूहड़ सामग्री दिखा रहे टीवी चैनल्स की स्क्रीन अब कुछ बदली-बदली सी नजर आती है। प्राइम टाइम में न्यूज चैनल्स पर सार्थक बहस और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर शुद्ध खबरें अब दिखने लगी हैं। युवा हो रही टीवी पत्रकारिता के चरित्र में यह सकारात्मक बदलाव कुछ लोगों की स्पष्ट सोच और संकल्प का नतीजा है। अलबत्ता, इस बदलाव में ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के लगातार तीसरी बार महासचिव चुने गए नवलकिशोर सिंह (एनके सिंह) की महती भूमिका है। टीआरपी की होड़ में दीवाने हुए न्यूज चैनल्स के प्रबंधकों-संपादकों को चैनल्स पर दिखाई जा रही सामग्री और उसके प्रभाव के प्रति चेताने में एनके सिंह को काफी मशक्कत करनी पड़ी। खैर, पत्रकारिता में सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध एनके सिंह काफी हद तक अपने प्रयत्नों में सफल हुए। वे एक संकल्प के साथ निरंतर टीवी पत्रकारिता और उसके कंटेन्ट को अधिक गंभीर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। 
      स्वभाव से मृदुभाषी और मिलनसार एनके सिंह फिलहाल देशभर के हिन्दी और अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं के लिए सामाजिक और राजनीतिक सरोकारों पर लेख लिख रहे हैं। वे न्यूज चैनल्स पर होने वाली बहसों में भी राजनीतिक और मीडिया विश्लेषक की हैसियत से शिरकत करते हैं। हाल ही में उन्होंने लाइव इंडिया न्यूज चैनल को राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स के बीच री-लॉन्च करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली है। वे लाइव इंडिया से ग्रुप एडिटर और एडिटर इन चीफ के तौर पर जुड़े हैं। अपने 33 साल के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने नेशनल हेराल्ड, द पायोनियर और न्यूज टाइम/ईनाडू में रिपोर्टर से लेकर विभिन्न भूमिकाओं में काम किया। करीब एक दशक पहले उन्होंने ईटीवी न्यूज से टीवी पत्रकारिता में कदम रखा और बाद में साधना न्यूज चैनल में राजनीति संपादक के रूप में काम किया। श्री सिंह ने द पायोनियर और ईनाडू/ईटीवी के कई एडिशन भी सफलतापूर्वक लॉन्च कराए। एनके सिंह ने देश-दुनिया से जुड़े कई गंभीर मसलों का कवरेज किया है। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी विध्वंस की घटना के तत्काल बाद श्री सिंह की खोजपरक खबर प्रकाशित हुई, जिसकी चर्चा देशभर में हुई। उनकी कुछ स्टोरी के कारण तो भारत सरकार को कई नियमों में भी संशोधन करने पड़े हैं। 
      व्यावसायिकता के इस दौर में भी एनके सिंह के लिए पत्रकारिता प्रोफेशन नहीं बल्कि पैशन है। पत्रकारिता उनको आध्यात्मिक अनुभव और संतुष्टी देती है। वे कहते हैं कि पत्रकारिता के लिए तड़प होनी चाहिए और यह तड़प गरीबी के अनुभव से आती है। आम भारतीय के दर्द से जुडऩे के लिए एनके सिंह बेहद साधारण जीवन जीते हैं। ट्रेन के स्लीपर क्लास में सफर करने का एक प्रयोग वे कर रहे हैं।
---
"पत्रकारिता में निष्पक्षता एवं खरी-खरी अभिव्यक्ति के पक्षधर एनके सिंह की कथनी और करनी में मामूली अंतर भी नहीं दिखता है। प्रखर राजनीतिक चिंतन और निष्पक्ष विश्लेषण, आपकी पत्रकारिता की विशेषता है।" 
- श्रीकान्त सिंह, संपादक, मीडिया विमर्श 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

पीड़ितों की आवाज

 प्र ख्यात गांधीवादी चिंतक मणिमाला, सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता में एक जाना-पहचाना नाम हैं। पत्रकारिता उनके लिए फैशन नहीं पैशन है। पत्रकारिता उन्हें समाज में सार्थक बदलाव लाने का एक प्रभावी जरिया लगा। इसीलिए पढ़ाई के दौरान ही वे लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हो गईं। आज जब पत्रकारिता पर बाजार हावी है तब मणिमाला यशस्वी पत्रकार राजेन्द्र माथुर, बाबूराव विष्णु पराडक़र और प्रभाष जोशी की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। अपने 30 साल के पत्रकारिता के सफर में कभी उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनकी कलम न तो कभी रुकी और न ही कभी झुकी। महिलाओं, बच्चों और सामाजिक व्यवस्थाओं से जुड़े मसलों पर उन्होंने निर्भीक होकर लेखन किया है। 
      गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नईदिल्ली की निदेशक मणिमाला महात्मा के विचारों और जीवन सूत्रों को समाज तक पहुंचाने की महती जिम्मेदारी निभा रही हैं। शब्दों का चयन, विषय की प्रस्तुति का अनूठा अंदाज और भाषा का सहज प्रवाह उनके लेखन की सबसे बड़ी खूबसूरती है। अपने पत्रकारीय जीवन की विधिवत शुरुआत उन्होंने 1984 में प्रभात खबर जैसे मजबूत अखबार से की। नवभारत टाइम्स में बतौर संवाददाता काम करते हुए उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र पत्रकारिता में अपने लिए एक अलग मुकाम बनाया। वे अपनी तेजतर्रार छवि और धारधार लेखनी के लिए देशभर में पहचानी जाने लगीं। यही नहीं उन्हें बिहार की पहली महिला पत्रकार होने का श्रेय भी हासिल है। वे मलयालम मनोरमा समूह की मासिक पत्रिका वनिता की संपादक भी रहीं। दिल्ली में रहकर अन्य संस्थानों के साथ काम का भी अनुभव उन्हें हैं। फिलहाल वे गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पत्रिका 'अंतिम जन' की संपादक हैं। अंतिम जन में प्रकाशित होने वाले उनके सम्पादकीय पत्रकारिता, साहित्य और अन्य क्षेत्रों में खासे चर्चित होते हैं। इसके अलावा बाल विवाह पर धारावाहिक, दिवराला सती पर धारावाहिक, अपराध का त्रिकोण, स्त्री के बिना समाज और सीता के बिना राम, उनके चर्चित आलेख हैं। जीत लेंगे अंधेरे को (दलित महिला नेतृत्व एक सफर), गलत हो गया तो (कविता संग्रह), वजूद (कविता संग्रह) इराक : या इलाही कोई और न लूटे ऐसे, धर्मान्तरण : जरा सी जिन्दगी के लिए और हिन्दी पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार उनकी बेहद चर्चित किताबे हैं।
      उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए मणिमाला जी को वर्ष 2006 में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब के हाथों गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से नवाजा गया। वर्ष 2011 में संसद के सेन्ट्रल हॉल में राष्ट्रभाषा सेवा सम्मान प्रदान किया गया। 2003 में इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट अवार्ड दिया गया। 1998 में आउटस्टैंडिंग साउथ एशियन वुमन जर्नलिस्ट सम्मान दिया गया। जबकि सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 2013 में अन्ना साहेब पटवर्धन सामाजिक कार्य सम्मान, 2012 में गांधी-विनोबा स्मृति सम्मान, 1986 जनजागरण पत्रकारिता पुरस्कार और सोशल जर्नलिज्म अवार्ड से मणिमाला जी को सम्मानित किया गया।
---
"पत्रकारिता में जुझारू और जुनूनी नाम तलाशना हो तो मणिमाला पहली पंक्ति में खड़ी नजर आएंगी। वे महज लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेतीं, बल्कि मैदान में उतरकर पीड़ितों के पक्ष में सीधे संघर्ष का माद्दा रखती हैं।" 
- सन्त समीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

मध्यप्रदेश की धड़कन है माण्डू

जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
 जि सने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश में देखा क्या? इसलिए भारत का दिल देखने निकलो तो माण्डव जाना न भूलिएगा। बादशाह अकबर हो या जहांगीर, सबको यह ठिया पसंद आया है। अबुल फजल तो सम्मोहित होकर कह गया था कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू प्रकृति की गोद में खूब दुलार पा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु तो माण्डू का सोलह श्रंगार करने के लिए ही यहां आती है। बारिश में तो यह अल्हड़ नवयौवन की तरह अंगड़ाई लेता नजर आता है। यहां आकर आपका दिल भी आशिक मिजाज हो ही जाएगा। रानी रूपमति के महल से दिखने वाला नैसर्गिक सौंदर्य आपको प्रेम सिखा ही देगा। जहाज महल पर खड़े होकर आप असीम सुकून की अनुभूति करेंगे। हिन्डोला महल में आपका मन डोले बिना नहीं रहेगा। होशंगशाह का मकबरा मन को मोह लेगा और ताजमहल की याद दिलाएगा। आल्हा-ऊदल की कथाएं रोमांच बढ़ा देंगी, आपकी भुजाओं की मछलियां बाहर आने को मचल उठेंगी। ईको प्वाइंट पर खड़े होकर जब आप जोर से अपना नाम पुकारेंगे तो लगेगा कि दुनिया आपको सुन रही है। अद्भुत है माण्डू। रानी रूपमति और बाज बहादुर की खूबसूरत मोहब्बत की तरह माण्डू भी बेहद हसीन है।

सोमवार, 17 नवंबर 2014

दर्द का बयान

 उ नका बचपन गरीबी में बीता। वे मेरठ में रहते थे। मिट्टी का कच्चा घर था। एक बरसात में उनका मकान गिर गया। उनके पास इतने भी पैसे न थे कि उनकी मुरम्मत करा पाते। समाज के वंचित वर्ग का हिस्सा होने के कारण उन्हें हर कदम पर समूची मानवता को लजाने वाला अपमान भी झेलना पड़ता था। उनके हौसले को सलाम है कि इस गरीबी और संघर्ष के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। चप्पल-जूते भी नहीं थे, उनके पास। स्कूल के लिए नंगे पैर ही आना-जाना पड़ता था। अच्छे कपड़े तो बहुत दूर की बात है, उनके पास स्कूल की गणवेश सिलवाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। दो-दो साल पुराने, फटे और छोटे हो गए कपड़े पहनकर वे स्कूल जाते थे। यहां पर भी संघर्ष ही उनका स्वागत करता था। शिक्षा के मंदिर में उन्हें शिक्षक ही अपमानित करते थे। उन्हें कहा जाता था कि क्या करोगे पढ़-लिखकर जूते-चप्पल ही तो बनाना है। लेकिन, धुन के पक्के मोहनदास नैमिशराय ने हार नहीं मानी। आग से तपकर निकले मोहनदास नैमिशराय आज दलित पत्रकारिता और साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।  
      उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर में 5 सितंबर 1949 को जन्मे बेहद मृदुभाषी, सहज और सरल व्यक्ति के धनी मोहनदास नैमिशराय सामाजिक सरोकारों और वंचित समूह के लिए समर्पित चर्चित पत्रिका 'बयान' के सम्पादक हैं। उन्होंने पांच वर्ष तक भारत सरकार के डॉ. आम्बेडकर प्रतिष्ठा, नई दिल्ली को बतौर सम्पादक और मुख्य सम्पादक अपनी सेवाएं दीं। प्रिंट पत्रकारिता, रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म और नाटक आदि में भी उन्होंने अपने लेखन कार्य से अमिट छाप छोड़ी है। संघर्षशील जीवन में भोगा गया यथार्थ, गरीबी का दंश और तिरस्कार से उपजी वेदना को श्री नैमिशराय ने अपने लेखन में उतारा है। उनका यह दर्द सम्पूर्ण दलित समाज का है। उनका चर्चित उपन्यास 'जख्म हमारे' इसकी बानगी है। उनके लेखन की विशेषता है कि समाज के दु:ख के साथ अपने दु:ख को जोड़ते हैं। वे सार्थक बदलाव की बात करते हैं, भविष्य की बात करते हैं, अतीत को पकडक़र रोते नहीं है, अमानवीय व्यवहार के लिए सवर्णों की भूल पर उन्हें कोसते भी नहीं हैं। 
      महानायक बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर पर पहला ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले मोहनदास नैमिशराय की करीब पचास कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कहानी संग्रह, कविता संग्रह, विचार-सार, अनुवाद, आत्मकथा, उपन्यास सहित अन्य विद्याओं की कृतियां शामिल हैं। उन्होंने भारतीय दलित आंदोलन का इतिहास चार भागों में लिखा है। 
     हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के गौरव मोहनदास नैमिशराय को कास्ट एण्ड रेस पुस्तक के लिए डॉ. आम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन पुरस्कार, कनाडा से सम्मानित किया जा चुका है। हिन्दी साहित्य के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्री नैमिशराय को पत्रकारिता के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी नवाजा गया है।
---
"मोहनदास नैमिशराय आम्बेडकरवादी धारा के ऐसे लेखक हैं जिनके समूचे लेखन से सामाजिक समरसता की भावना को शक्ति मिलती है।"  
- संजय द्विवेदी, कार्यकारी संपादक, मीडिया विमर्श
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख