अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर क्यों लगाई गई है? यह प्रश्न बहुत वाजिब है। यह आश्चर्य का विषय भी है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद तक भारत विभाजन के प्रमुख गुनहगारों में शामिल जिन्ना की तस्वीर एक शिक्षा संस्थान में सुशोभित हो रही है। मोहम्मद अली जिन्ना सिर्फ भारत विभाजन का ही गुनहगार नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की हत्या का भी दोषी है। भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय के उपकुलपति तारिक मंसूर को पत्र लिखकर उचित ही प्रश्न पूछा है कि क्या मजबूरी है कि जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय में लगाई गई है? उन्होंने पत्र में यह भी कहा है कि अगर वह विश्वविद्यालय में कोई तस्वीरें लगाना चाहते हैं तो उन्हें महेंद्र प्रताप सिंह जैसे महान लोगों की तस्वीर संस्थान में लगानी चाहिए, जिन्होंने विश्वविद्यालय बनाने के लिए अपनी जमीन दान में दी थी।
रविवार, 6 मई 2018
बुधवार, 2 मई 2018
पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन'
भारत में प्रत्येक विधा का कोई न कोई एक अधिष्ठाता है। प्रत्येक विधा का कल्याणकारी दर्शन है। पत्रकारिता या कहें संपूर्ण संचार विधा के संबंध में भी भारतीय दर्शन उपलब्ध है। देवर्षि नारद का संचार दर्शन हमारे आख्यानों में भरा पड़ा है। हाँ, यह और बात है कि वर्तमान में संचार के क्षेत्र में 'भारतीय दर्शन' की उपस्थिति दिखाई नहीं देती है। उसका एक कारण तो यह है कि लंबे समय तक संचार माध्यमों पर कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को दबदबा रहा है। यह उजागर तथ्य है कि कम्युनिस्टों को 'भारतीय दर्शन' स्वीकार नहीं, वह प्रत्येक विधा को कार्ल मार्क्स या फिर विदेशी विचारकों के चश्मे से देखते हैं। अब यह स्थिति बदल रही है। देशभर में विभिन्न विषयों को भारतीय दृष्टिकोण से देखने की एक परंपरा विकसित हो रही है। उन लोगों को प्रोत्साहन मिल रहा है, जो ज्ञान-विज्ञान एवं संचार विषयों में भारतीय पहलू की पड़ताल कर रहे हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के मालवीय पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने देवर्षि नारद को शोध का विषय बनाकर संचार के भारतीय दर्शन को सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। देवर्षि नारद पर गहन अध्ययन के बाद संचार के भारतीय पक्ष पुस्तक 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन' के रूप में हमारे सामने आया है। यह पुस्तक निश्चित तौर पर भारतीय पत्रकारिता को एक दिशा देने का कार्य कर सकती है।
गुरुवार, 26 अप्रैल 2018
महाभियोग की तुच्छ राजनीति
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग लाने का निर्णय कर कांग्रेस ने न्यायपालिका पर आखिरकार सीधा हमला कर ही दिया है। अपने इस निर्णय से कांग्रेस ने देश की जनता में ही नहीं, बल्कि अपने भीतर भी किरकिरी करा ली है। भले ही कांग्रेस ने भाजपा पर हमला करने के लिए महाभियोग को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया है, किंतु इस बार यह हथकंडा कांग्रेस को भारी पड़ सकता है। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले को खारिज करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि इस मामले की आड़ में न्यायपालिका की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता पर प्रहार करने का प्रयास किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का यह अंदेशा सत्य साबित हुआ।
मंगलवार, 24 अप्रैल 2018
न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा मत करो महाराज
देश में राजनीतिक विरोध का ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के बीच अपनी राजनीतिक लड़ाई हारे हुए समस्त विपक्षी दल अब भाजपा और केंद्र सरकार को घेरने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी निशाना बनाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले में जाँच की माँग को जब सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों एवं उनके समर्थक कथित बुद्धिजीवियों ने जिस प्रकार न्यायपालिका पर अविश्वास जताया है, वह घोर आश्चर्यजनक तो है ही, निंदनीय भी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर अन्य प्रमुख नेताओं ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं यह माना है कि इस प्रकरण के माध्यम से न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर हमला बोला गया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन कांग्रेस नेताओं के वक्तव्यों ने सही साबित कर दिया।
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018
हम आलोचना कर रहे हैं या दुष्प्रचार
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लंदन प्रवास के दौरान 'भारत की बात, सबके साथ' कार्यक्रम में बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा- 'आलोचनाएं लोकतंत्र की ब्यूटी होती है।' यह बात दरअसल, इसलिए महत्वूर्ण है, क्योंकि मोदी विरोधी जब-तब यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान सरकार ने उनकी अभिव्यक्ति की आजादी को समाप्त कर दिया है। अब कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं। आलोचनाओं के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। मोदी विरोधियों के इस प्रकार के प्रयासों के कारण ही यह प्रश्न लंदन में मोदी से पूछा गया। जबकि वास्तविकता क्या है, हम जानते हैं। जो लोग यह कह रहे हैं कि देश में आलोचना के लिए स्थान नहीं बचा है, वह लोग ही खुलकर वह सब कुछ भी बोल रहे हैं, जो आलोचना की श्रेणी में नहीं अपितु दुष्प्रचार की श्रेणी में आता है। यहाँ तक कि घृणा की श्रेणी में भी उसको शामिल किया जा सकता है।
बुधवार, 18 अप्रैल 2018
सामने आया 'भगवा आतंकवाद' का सच
'सत्य कभी पराजित नहीं होता।'
'कितने भी काले बादल हों, सूरज को अधिक समय तक ढंक नहीं सकते।'
'सच सामने आ ही जाता है।'
'न्याय में देर है, अंधेर नहीं।'
यह लोकोक्तियां बताती हैं कि सच को परास्त करने के लिए कोई कितने भी षड्यंत्र रच ले, किंतु एक दिन आता है जब सत्य की ही जीत होती है और झूठों का मुंह काला। मक्का मस्जिद बम धमाके मामले में स्वामी असीमानंद समेत सभी आरोपियों के बरी होने के बाद 'हिंदू आतंकवाद' पर रचा गया षड्यंत्र पूरी तरह उजागर हो गया है। यह देश का दुर्भाग्य है कि वोटों की खातिर एक पार्टी ने इस देश की पहचान को आतंकवाद से जोडऩे का भयंकर षड्यंत्र रचा था। विश्व में जिस 'हिंदू' की उदारता, मानवता और करुणा के उदाहरण दिए जाते हैं, उस हिंदू को सिर्फ इसलिए बदनाम करने का षड्यंत्र रचा गया ताकि अपनी राजनीतिक बिसात बची रहे, ताकि एक समुदाय का तुष्टीकरण किया जा सके। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' जैसे शब्द दिए हैं। इस पर विचार किया जाना चाहिए कि आतंकवाद को धर्म और रंग से न जोडऩे की वकालत करने वाली कांग्रेस ने ही आखिर क्यों हिंदू और भगवा आतंकवाद की अवधारणा रची?
मंगलवार, 10 अप्रैल 2018
जाएं तो जाएं कहाँ
पाकिस्तान में हिंदुओं का जबरन मतांतरण
पाकिस्तान के लोग आज भी यह सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे कि कि उन्होंने भारत के टुकड़े 'मुस्लिमों के लिए अलग देश' के नाम पर किए थे। पाकिस्तान की माँग के साथ यह कहा गया था कि हिंदू और मुसलमान, दो अलग मुल्क हैं, यह एकसाथ नहीं रह सकते। किंतु, भारत ने उस अवधारणा को झूठ सिद्ध किया। भारत में मुसलमान न केवल सुख से हैं, बल्कि तरक्की भी कर रहे हैं। उनकी आबादी भी बड़ी है। भारत में उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता है। वह अपने हक के लिए आवाज भी बुलंद कर लेते हैं। पाकिस्तान में स्थिति ठीक उलट है। इस्लाम के नाम पर बने 'पाकिस्तान' में गैर-मुस्लिमों के लिए कोई सम्मान एवं स्थान नहीं है। विभाजन के बाद से वहाँ हिंदुओं की जनसंख्या बढऩे की जगह लगातार खतरनाक ढंग से कम होती गई है। अपने अधिकारों की बात करना तो दूर की बात है, हिंदू वहाँ अपने जीवन के लिए ही संघर्ष कर रहा है। हिंदुओं के लिए तो पाकिस्तान एक तरह से नर्क हो गया है। उनके सामने तीन ही विकल्प हैं- एक, पाकिस्तान में रहना है तो अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल करना होगा। दो, मुस्लिम नहीं बने तब बलात् धर्मांतरण के लिए तैयार रहो या मर जाओ। दोयम दर्जे का जीवनयापन करो। तीन, अपने धर्म एवं स्वाभिमान को बचाने के लिए पाकिस्तान छोड़ दो।
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