मंगलवार, 7 मार्च 2017

लाल हिंसा के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश

केरल में राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध लोगों की हत्या और कम्युनिस्ट अत्याचार के विरुद्ध देशभर में आम समाज ने बुलंद की आवाज
 केरल  में पिछले 50 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेविका समिति सहित अन्य सभी राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध संगठनों के सामान्य स्वयंसेवकों की हत्या की जा रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नृशंसता से अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। दस माह पहले केरल में माकपा की सत्ता आने के बाद से लाल आतंक में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। मई, 2016 से अब तक 20 से अधिक स्वयंसेवकों की हत्याएं माकपा के गुण्डों ने की हैं। केरल राज्य के कन्नूर जिले मंअ स्थितियां और भी भयावह हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित माकपा पोलित ब्यूरो के अधिकतम सदस्य कन्नूर जिले से ही आते हैं। लेकिन, हैरानी की बात है कि देश का तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का बहुसंख्यक वर्ग इस आतंक पर खामोश है। दिल्ली से उठते अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता के नारे केरल क्यों नहीं पहुंचते? राष्ट्रभक्त लोगों के लहू से लाल हो रही देवभूमि क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रही है? तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग और मीडिया की चुप्पी के बीच केरल में भयंकर रूप धारण कर चुके लाल आतंक के खिलाफ अब देश खड़ा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आह्वान पर देशभर में नागरिक अधिकार, जनाधिकार और मानव अधिकार मंचों के तहत आम समाज एकजुट होकर लाल आतंक के खिलाफ जनाक्रोश व्यक्त कर रहा है। मार्च के पहले सप्ताह में एक, दो और तीन तारीख को देश के प्रमुख स्थानों पर समाज के संवेदनशील नागरिक बंधुओं ने 'संवेदना मार्च' निकाले और धरने आयोजित किए हैं।

बुधवार, 1 मार्च 2017

रामजस पर हल्ला, केरल पर चुप्पी क्यों?

 रामजस  महाविद्यालय प्रकरण से एक बार फिर साबित हो गया कि हमारा तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का एक वर्ग भयंकर दोगला है। एक तरफ ये कथित धमकियों पर भी देश में ऐसी बहस खड़ी कर देते हैं, मानो आपातकाल ही आ गया है, जबकि दूसरी ओर बेरहमी से की जा रही हत्याओं पर भी चुप्पी साध कर बैठे रहते हैं। वामपंथ के अनुगामी और भारत विरोधी ताकतें वर्षों से इस अभ्यास में लगी हुई हैं। अब तक उनका दोगलापन सामने नहीं आता था, लेकिन अब सोशल मीडिया और संचार के अन्य माध्यमों के विस्तार के कारण समूचा देश इनके पाखण्ड को देख पा रहा है। इस पाखण्ड के कारण आज पत्रकारिता जैसा पवित्र माध्यम भी संदेह के घेरे में आ गया है। पिछले ढाई साल में अपने संकीर्ण और स्वार्थी नजरिए के कारण इन्होंने असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी को मजाक बना कर रख दिया है। रामजस महाविद्यालय का प्रकरण भी इसकी ही एक बानगी है।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

हिंदू आबादी घटने पर विवाद नहीं चिंता करनी चाहिए

 अरुणाचल  प्रदेश में हिंदू जनसंख्या के सन्दर्भ में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बयान पर कुछ लोग विवाद खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि उनका बयान एक कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि उनके बयान पर वो लोग हायतौबा मचा रहे हैं, जो खुद को पंथनिरपेक्षता का झंडाबरदार बताते हैं। हिंदू आबादी घटने के सच पर विवाद क्यों हो रहा है, जबकि यह तो चिंता का विषय होना चाहिए। जनसंख्या असंतुलन आज कई देशों के सामने गंभीर समस्या है, लेकिन हमारे नेता इस गम्भीर चुनौती को भी क्षुद्र मानसिकता के साथ देख रहे हैं।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

हिन्दू सम्मलेन का सन्देश

 मध्यप्रदेश  के वनवासी समाज बाहुल्य जिले बैतूल में संपन्न हिन्दू सम्मलेन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संगठित हिन्दू से समर्थ भारत का सन्देश दिया है। अर्थात भारत के विकास और उसे विश्वगुरु बनाने के लिए उन्होंने हिन्दू समाज में समरसता एवं एकता को आवश्यक बताया। उनका मानना है कि दुनिया जब विविध प्रकार के संघर्षों के समाधान के लिए भारत की ओर देख रही है और भारत को विश्वगुरु की भूमिका में भी देख रही है, तब भारत को विश्वगुरु बनाने की जिम्मेदारी इस देश हिन्दू समाज की ही है। यह सही भी है इस देश की संतति ही संगठित नहीं होगी तो देश कैसे विश्व मंच पर ताकत के साथ खड़ा होगा।

जेएनयू की बीमारी, 'देशद्रोह' के प्रोफेसर

 जवाहरलाल  नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अपने विद्यार्थियों और शिक्षकों के रचनात्मक कार्यों से कम बल्कि उनकी देश विरोधी गतिविधियों से अधिक चर्चा में रहता है। पिछले वर्ष जेएनयू परिसर देश विरोधी नारेबाजी के कारण बदनाम हुआ था, तब जेएनयू की शिक्षा व्यवस्था पर अनेक सवाल उठे थे। यह सवाल भी बार-बार पूछा गया था कि जेएनयू के विद्यार्थियों समाज और देश विरोधी शिक्षा कहाँ से प्राप्त कर रहे हैं? शिक्षा और बौद्धिक जगत से यह भी कहा गया था कि जेएनयू के शिक्षक हार रहे हैं। वह विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में असफल हो रहे हैं। लेकिन, पिछले एक साल में यह स्पष्ट हो गया है कि जेएनयू के शिक्षक हारे नहीं है और न ही विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में असफल रहे हैं, बल्कि वह अब तक जीतते रहे हैं और अपनी शिक्षा को विद्यार्थियों में हस्थातंरित करने में सफल रहे हैं। 

कांग्रेस से लोकतंत्र है या लोकतंत्र से कांग्रेस

 संसद  में कांग्रेस की ओर से दावा किया गया है कि उसके कारण भारत में लोकतंत्र बचा हुआ है। कांग्रेस की ओर से संसद में उसके नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने कहा कि कांग्रेस को देश में लोकतंत्र बनाए रखने का श्रेय मिलना चाहिए, जिसके कारण एक गरीब परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी भी भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा पाए। संसद में यह भाषण करते वक्त खडग़े भूल गए कि कांग्रेस ने १९७५ में लोकतंत्र का गला घोंटने की पूरी कोशिश की थी। आजादी के आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाली कलम पर पहरा बैठा दिया गया था। विरोधी विचारधारा के लोगों को पकड़-पकड़ कर जेलों में ठूंसा गया और उनको यातनाएं दी गईं। लेकिन, जनशक्ति के सामने कांग्रेस की तानाशाही टिक नहीं सकी और इस देश में लोकतंत्र को खत्म करने के षड्यंत्र में कांग्रेस कामयाब नहीं हो सकी। आजादी के बाद से अब तक ७० साल में कांग्रेस ने जितने घोटाले किए हैं, उनके आधार पर उसे सत्ता मिलनी ही नहीं चाहिए, लेकिन यह लोकतंत्र है कि देश में भ्रष्टाचार का नाला बहाने के बाद भी कांग्रेस आज न केवल अस्तित्व में है, बल्कि कुछेक राज्यों में सत्तासीन भी है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को समझना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र उनके कारण नहीं बचा है, बल्कि लोकतंत्र के कारण वह बची हुई है। 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

'भगवान के घर' में वामपंथ का आतंक

 'ईश्वर  का अपना घर' कहा जाने वाला प्राकृतिक संपदा से सम्पन्न प्रदेश केरल लाल आतंक की चपेट में है। प्रदेश में लगातार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। केरल वामपंथी हिंसा के लिए बदनाम है, लेकिन पिछले कुछ समय में हिंसक घटनाओं में चिंतित करने वाली वृद्धि हुई है। खासकर जब से केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) सरकार आई है, तब से राष्ट्रीय विचार से जुड़े निर्दोष लोगों और उनके परिवारों को सुनियोजित ढंग से निशाना बनाया जा रहा है। संघ और भाजपा का कहना है कि प्रदेश में मार्क्सवादी हिंसा को मुख्यमंत्री पी. विजयन का संरक्षण प्राप्त है। अब तक की घटनाओं में स्पष्टतौर पर माकपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं की संलिप्तता उजागर हुई है। लेकिन, राज्य सरकार ने हिंसा को रोकने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए हैं, बल्कि घटनाओं की लीपापोती करने का प्रयास जरूर किया है। इसलिए मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित समूची माकपा सरकार संदेह के घेरे में है।