राष्ट्रगीत को मिला उसका सम्मान, गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम्’ के सम्मान के संबंध में जारी किए दिशा-निर्देश
मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कभी कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के मंत्र और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ के सम्मान के साथ समझौता कर लिया था। राष्ट्रगान को जो सम्मान दिया गया, राष्ट्रगीत को उससे वंचित कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 51ए में राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करने को मौलिक कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है लेकिन इसमें राष्ट्रगीत के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिलता है। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन को रोकता है या गा रहे लोगों के बीच अशांति पैदा करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस अधिनियम में भी राष्ट्रगीत का अपमान करने पर सजा का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। राष्ट्रगीत के सम्मान के प्रति यह उदासीनता क्यों रखी गई? इसका उत्तर सब जानते हैं। इसलिए सभी राष्ट्रभक्त देशवासियों के मन में कसक थी कि आखिर वह दिन कब आएगा जब हम अपने राष्ट्रगीत को वह सम्मान देंगे, जिसका वह प्रारंभ से अधिकारी है। याद रखें कि जिनके मन में भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं था, वे लोग तो पाकिस्तान चले गए थे। आज जिन्हें भारत में रहकर वंदेमातरम गाने और उसके सम्मान में खड़े होने में दिक्कत है, उन्हें अपने बारे में विचार करना चाहिए। भारत में रहना है तो फिर वंदेमातरम तो गाना पड़ेगा। मोदी सरकार को साधुवाद कि उसने राष्ट्रीय गीत को उसका खोया हुआ स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा लौटाई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदेमातरम’ के गायन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करके अच्छा कदम उठाया है। इस आदेश के तहत अब जब भी राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान, दोनों एक साथ बजाए जाएंगे, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ (राष्ट्रगीत) के सभी छह छंद गाए जाएंगे और उसके बाद ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) होगा। यह बदलाव केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक और संवैधानिक निहितार्थ भी हैं। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि वंदेमातरम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय स्थान रहा है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित इस गीत ने क्रांतिकारियों में जो ऊर्जा भरी, वह इतिहास में दर्ज है।
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भारत के इतिहास में वह एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन था जब कांग्रेस के अधिवेशन में मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए वंदेमातरम के गायन को सीमित किया गया। कांग्रेस की यह सोच स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही। इसलिए संविधान सभा में इसके केवल पहले दो छंदों को ही आधिकारिक मान्यता दी गई थी। मुस्लिम तुष्टीकरण का प्रभाव ही रहा होगा कि राष्ट्रगान की भाँति राष्ट्रगीत के सम्मान के संबंध में किसी प्रकार के दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए थे। इसका दुरुपयोग सांप्रदायिक ताकतों ने खूब किया। स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं होने के कारण भारत विरोधी समूहों ने राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम’ की अनेक अवसरों पर अवमानना की। भारत की स्वतंत्रता के क्रांतिगीत ‘वंदेमातरम’ की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के सुअवसर पर मोदी सरकार ने अपने राजधर्म का पालन करते हुए राष्ट्रगीत की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने का सराहनीय कार्य किया है।
गृह मंत्रालय का नया आदेश अब आधिकारिक कार्यक्रमों में सभी छह छंदों (कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड) के गायन की व्यवस्था देता है। साथ ही, इसके सम्मान में ‘सावधान’ की मुद्रा में खड़े होने का निर्देश भी दिया गया है। अकसर मुसलमान अपनी धार्मिक आस्थाओं का हवाला देकर राष्ट्रगीत की अवमानना करते थे। याद रखें कि यह सोच केवल वंदेमातरम तक नहीं रुकती है अपितु अनेक अवसरों पर राष्ट्रगान का विरोध भी इसी कुतर्क के साथ मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी तत्वों की ओर से किया गया है। क्योंकि भारत की वंदना तो राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ में भी है। उसमें भी भारत को भाग्यविधाता माना गया है और उसकी जय-जयकार की गई है। इसलिए जब कोई वंदेमातरम का विरोध करता है, तब उसके पीछे तर्क कम अपितु सांप्रदायिक एवं विभाजनकारी मानसिकता का प्रभाव अधिक दिखायी देता है।
वंदेमातरम के गायन एवं उसके प्रति सम्मान प्रकट करने से जो भी इनकार करता है, भारत के प्रति उसकी निष्ठा पर संदेह होना स्वाभाविक है। इसी देश में ऐसे भी मुसलमान हुए हैं, जिन्होंने रामकथा का गायन भी किया है और वंदेमातरम का जयघोष भी लेकिन इसके बाद भी उनकी अपनी धार्मिक निष्ठा में कोई कमी नहीं आई। हम सबको याद रखना चाहिए कि अपना विचार एवं संप्रदाय, भारत के स्वाभिमान से बढ़कर नहीं हो सकता है। भारत सरकार ने वंदेमातरम के सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करते समय संतुलित दृष्टिकोण दिखाया है। गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में वंदेमातरम के सम्मान से जुड़े दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान नहीं रखा है। इसका संदेश यही है कि लोग मनपूर्वक राष्ट्रगीत का सम्मान करें। राष्ट्रगीत को पूरा सम्मान देने और उसके गायन को व्यवस्थित करने की सरकार की इस पहल का उद्देश्य राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाना है। ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन-गण-मन’ दोनों ही हमारी साझा विरासत हैं, और इनका सम्मान किसी नियम से अधिक हमारी अंतरात्मा की आवाज होनी चाहिए। यही सरकार और देशभक्त नागरिकों की आकांक्षा है।
मातृभूमि के प्रति सम्मान, श्रद्धा और समर्पण की भावना का प्रतीक है- #वंदेमातरम pic.twitter.com/r8G8RZ6MBY
— लोकेन्द्र सिंह (Lokendra Singh) (@lokendra_777) February 11, 2026
राष्ट्रगीत को लेकर सरकार के दिशा-निर्देश :
• यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगान (जन-गण-मन) और राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) दोनों का गायन होना है, तो प्रोटोकॉल के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ को पहले गाया/बजाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान होगा।
• सरकारी समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण (सभी 6 अंतरे) गाया या बजाया जाएगा। इससे पहले अक्सर केवल पहले दो अंतरों का ही गायन होता था, लेकिन अब आधिकारिक आयोजनों के लिए पूर्ण संस्करण को अनिवार्य कर दिया गया है।
• राष्ट्रगीत के सभी 6 छंदों की कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित है।
• जब भी राष्ट्रगीत का आधिकारिक संस्करण गाया या बजाया जा रहा हो, तो उपस्थित सभी लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य है।
• अपवाद: यदि यह किसी फिल्म, न्यूज़रील या डॉक्यूमेंट्री के हिस्से के रूप में बज रहा हो, तो दर्शकों का खड़ा होना अपेक्षित नहीं है, ताकि प्रदर्शन में बाधा न आए।
• यदि राष्ट्रगीत को पुलिस या मिलिट्री बैंड द्वारा बजाया जा रहा है, तो इसकी शुरुआत से पहले ड्रम रोल होना चाहिए।
सरकारी आयोजनों में अनिवार्य होगा ‘वंदे मातरम्’ :
• पद्म पुरस्कार जैसे नागरिक सम्मान समारोहों में।
• राष्ट्रपति के किसी भी कार्यक्रम में, उनके आगमन और प्रस्थान के समय।
• राष्ट्रपति या राज्यपालों के आगमन, प्रस्थान तथा उनके भाषण से पहले और बाद में।
• तिरंगा फहराने के अवसर पर।
• स्कूलों को सलाह दी गई है कि वे अपने दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत के सामूहिक गायन से करें ताकि छात्रों में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बढ़े।

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