बुधवार, 20 दिसंबर 2017

गुजरात में ईवीएम भी जीती

 गुजरात  चुनाव के परिणाम देश के सामने आ गए हैं। परिणाम में भाजपा-कांग्रेस की जीत-हार के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन एवं चुनाव आयोग को भी विजय प्राप्त हुई है। मतगणना से पूर्व चुनाव परिणाम को लेकर आशंकित कांग्रेस एवं उसके सहयोगी ईवीएम पर अतार्किक एवं बचकाने सवाल खड़े कर रहे थे। एक-दो अब भी अपने कुतर्कों पर अड़े हुए हैं। जबकि गुजरात के प्रदर्शन पर कांग्रेस भी प्रसन्न है। कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन में सराहनीय सुधार किया है। गुजरात विधानसभा में अब उसकी सीटें 61 से बढ़ कर 77 हो गई हैं। अर्थात् पिछले जनादेश से 16 सीट अधिक। कुछ सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम रहा है। वहीं, जिस भारतीय जनता पार्टी पर ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगता है, उसकी सीटें घट कर 115 से 99 पर आ गई हैं। जबकि भाजपा ने 150 सीट जीतने का लक्ष्य तय किया था। गुजरात विजय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर है, परंतु भाजपा मोदी के गृहनगर में हारी है। यदि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव होती, तब क्या मोदी के घर में भाजपा को हारने दिया जाता?
         चुनाव आयोग ने भी यह खुलासा कर दिया है कि राज्य मेंं जहां भी मतदाता पर्चियों का ईवीएम की वोटिंग से मिलान किया गया, हर जगह सौ फीसदी नतीजे एक से पाए गए। यानी जिस माँग को लेकर कांग्रेस मतगणना से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय गई थी और सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया था, उस माँग पर चुनाव आयोग ने अमल किया। चुनाव आयोग के मुताबिक गुजरात चुनाव की मतगणना के दौरान सभी 182 विधानसभा सीटों पर अनिवार्य रूप से कम से कम एक मतदान केंद्र की मतदाता पर्चियों का ईवीएम की वोटिंग से मिलान किया गया है। इसके लिए मतदान केंद्र का चयन सभी पार्टियों के प्रतिनिधियों के सामने ही 'ड्रॉ' के जरिए किया गया। इसके नतीजे भी सबके सामने जाहिर किए गए जो कि सौ फीसदी एक जैसे थे। यानी मतदाता पर्चियों की गणना से जिस प्रत्याशी को जितने वोट मिले पाए गए, उसे उतने ही वोट ईवीएम के वोटों की गिनती में भी मिले। इसका स्पष्ट आशय यह ही है कि हमारे राजनेताओं का दिल बहुत छोटा है। उनमें अपनी हार स्वीकार करने की जगह ईवीएम को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति घर कर गई है। 
          बहरहाल, अब जबकि ईवीएम सही पाई गईं हैं, तब क्या कांग्रेस सहित उसके सहयोगी एवं अन्य राजनीतिक दल ईवीएम में कथित छेड़छाड़ का रोना बंद करेंगे? भारत में संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग एवं निर्वाचन की वैज्ञानिक पद्धति की विश्वसनीयता के लिए यह जरूरी है कि ईवीएम पर अतार्किक बहस अब बंद होनी चाहिए। निर्वाचन आयोग के इस ख़ुलासे के बाद देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी कहा है- 'इस कवायद से ईवीएम को लेकर अनिश्चितता खत्म हो गई है। फिर भी अगर किसी को संदेह है तो वह अदालत जा सकता है।' कहने का आशय यह है कि गुजरात चुनाव जिस प्रकार भाजपा एवं नरेन्द्र मोदी के लिए अग्निपरीक्षा था, उसी प्रकार की अग्निपरीक्षा ईवीएम के सामने भी थी। गुजरात चुनाव में ईवीएम को भी विजय प्राप्त हुई है। यूँ तो सब जानते हैं कि राजनेता अपनी शर्मनाक पराजय को स्वीकार करने की बजाय ईवीएम को दोष दे रहे थे या हैं। इसके बाद भी यदि किसी को किंचित भी संदेह है तो उसे बेकार का बतंगड़ बनाने की बजाय तर्कों, तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ सर्वोच्च न्यायालय जाना चाहिए। बाकि, राजनेता कितना भी प्रोपोगंडा फैलाएं, जनता तो सब जानती है। देश के लोग जानते हैं कि बहानेबाज नेता, उनके मन को नहीं पढ़ पा रहे हैं और जनादेश को स्वीकार करने से बच रहे हैं। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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