बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा को सरकार का मौन समर्थन

 बंगाल  में सांप्रदायिक हिंसा विकराल होती जा रही है। बंगाल की स्थितियाँ देश और समाज के लिए खतरनाक होती जा रही हैं। हालात यह हैं कि मुस्लिम समाज से जुड़े अतिवादियों की दंगई से आजिज आकर कई क्षेत्रों से हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बंगाल में हिंदुओं को रहना, व्यापार करना और यहाँ तक की अपनी आस्थाओं का पालन करना भी कठिन हो गया है। मंदिरों में पथराव, मूर्तियों का खंडित किया जाना, हिंदू बस्तियों में आगजनी, हिंदुओं की दुकानों को लूटने जैसी घटनाओं की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। दंगइयों के हौसले इतने बुलंद हैं कि पुलिस थानों को भी खाक करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता है। देश को अच्छे से याद है कि मालदा में ढाई लाख लोगों की भीड़ ने किस कदर आतंक फैलाया था। अब फिर से मालदा की पुनरावृत्ति की खबरें सामने आ रही हैं।
 
          बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा के खतरनाक फैलाव के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति जिम्मेदार है। मुख्यमंत्री आँख बंद करके एक संप्रदाय पर विशेष 'ममता' लुटा रही हैं। उनकी तुष्टीकरण की नीति इतनी खतरनाक है कि माननीय न्यायालय ने भी चेतावनी दी है। दुर्गा मूर्ति विसर्जन को लेकर ममता सरकार के आदेश को न्यायालय ने सीधे तौर पर तुष्टीकरण करार दिया है। सरकार को फटकार लगाते हुए न्यायालय ने अपने एक फैसले में स्पष्ट कहा कि बंगाल सरकार अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण कर रही है। बहुसंख्यकों के हितों की अनदेखी कर अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण किसी भी प्रकार उचित नहीं है। दरअसल, पश्चिम बंगाल में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ हिंदुओं को दुर्गा पूजा करने में कठिनाई आती है। वीरभूमि के कांगलापहाड़ी में तो मुसलमानों की आपत्ति के कारण हिंदु समाज चार साल से दुर्गा पूजा नहीं कर पा रहा है। इस साल बंगाल के अनेक स्थानों पर हिन्दुओं पर अभूतपूर्व अत्याचार हुए हैं। मालदा जिले के कालिग्राम, खराबा, रिशिपारा, चांचल; मुर्शिदाबाद के तालतली, घोसपारा, जालंगी; हुगली के उर्दि पारा, चंदन नगर, तेलानि पारा, उर्दि बाजार; नार्थ 24 परगना के हाजीनगर, नैहाटी, पश्चिम मिदनापुर गोलाबाजार, खरकपुर; पूर्व मिदनापुर के कालाबेरिया, भगवानपुर; बर्दवान के हथखोला, बल्लव्पुर्घाट, कतोआ; हावड़ा के सकरैल, अन्दुलन, आरगोरी, मानिकपुर, वीरभूम के कान्करताला तथा नादिया के हाजीनगर सहित अनेक स्थानों पर हिंदुओं पर अमानवीय अत्याचार किए गए। 
           इस वर्ष मुहर्रम को ध्यान में रखकर ममता सरकार ने हिंदुओं के लिए एक तुगलकी फरमान जारी कर दिया कि हिंदू दशहरे पर मूर्ति विसर्जन नहीं करें, बल्कि दो दिन बाद विसर्जन करें। सरकार के इसी आदेश के खिलाफ हिंदू समाज न्यायालय पहुँचा था, जहाँ उसे न्याय मिला। न्यायालय पीडि़त हिंदू समाज के साथ खड़ा है, लेकिन सरकार अब भी हिंदुओं के विरुद्ध खड़ी है। न्यायालय की फटकार के बाद न तो तुष्टीकरण की राजनीति में कोई कमी आई है और न ही दंगइयों के हौसले ठंडे पड़ हैं। यह एक बानगी है कि सरकार किस प्रकार एक समुदाय को खुश करने में लगी हुर्ई है। सरकार सामाजिक न्याय, पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत, सामाजिक एकता-सौहार्द सबकुछ भूलकर तुष्टीकरण की नीति पर आगे बढ़ रही है। यदि हम पिछले समय में हुईं एक-एक घटना का अध्ययन करें, तब पाएंगे कि एक भी घटना में सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों के प्रति प्रशासन ने कठोर कार्रवाई नहीं की। पुलिस को भी अलिखित आदेश है कि एक संप्रदाय विशेष के गुंडों के खिलाफ नरमी बरती जाए, संभव हो तो उनके खिलाफ किसी प्रकार का मामला ही दर्ज न किया जाए। सरकार के इस एजेंडा का नतीजा यह है कि राज्य में कानून व्यवस्था नाम की चिडिय़ा मरणासन्न है। पुलिस पर सांप्रदायिक गुंडे हावी हैं। गजब बात है कि इस सांप्रदायिक हिंसा पर बंगाल सरकार से लेकर समस्त बुद्धिजीवी जगत में सन्नाटा पसरा है। मीडिया जगत में भी इस हिंसा की बात करने वाला कोई नहीं है। 
          बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को समझना चाहिए कि तुष्टीकरण यह आग आज हिंदू समाज को जला रही है, कल यह भड़ककर सबको राख कर देगी। सत्ता में बने रहने और भविष्य में मुसलमानों के वोट पाने के लिए सामाजिक सौहार्द को चोट पहुँचाना बंगाल और भारत के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। तुष्टीकरण एक प्रकार का भस्मासुर है। इस भस्मासुर का संरक्षण कर ममता सरकार बंगाल की पहचान को नष्ट कर रही हैं। बंगाल स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और सुभाषचंद्र बोस जैसी अनेक विभूतियों की भूमि है। लेकिन, ममता सरकार में यह सांप्रदायिक हिंसा की फैक्ट्र बनने की कगार पर है। बंगाल के वर्तमान हालात देखकर विश्व हिंदू परिषद का यह कहना सच के नजदीक ही प्रतीत होता है- ममता के राज में 'सोनार बांग्ला, बर्बाद बांग्ला' बन गया है। 

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