शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

भरोसेमंद नाम

 बा जार की होड़ के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबद्धता, पाठकों की रुचि और बेहतर मापदंडों के बीच कोई समाचार-पत्र कैसे संतुलन कायम रख सकता है, यह साबित करके दिखाया था हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर अभय छजलानी ने। पिछले 40-50 वर्षों में अखबार मालिक से लेकर संपादक तक उन्होंने नईदुनिया को भारतीय भाषायी पत्रकारिता में एक अलग पहचान दिलाई। उनके संपादकीय कार्यकाल में नईदुनिया हिन्दी का शब्दकोश बन गया था। हर आयु वर्ग के पाठक नईदुनिया के नशे में पागल थे। पाठक नईदुनिया को इतनी मोहब्बत करते थे कि इंदौर से मीलों दूर जाने के बाद भी नईदुनिया उनके जीवन का हिस्सा बना रहा, वे डाक से नईदुनिया के आने का एक दिन तक इंतजार करते थे। नईदुनिया के साथ सुबह की चाय की चुस्कियां कुछ ज्यादा ही मीठी जाया करती थीं। 
      सामाजिक सरोकारों को पत्रकारिता का धर्म मानने वाले अभय छजलानी का जन्म 4 अगस्त, 1934 को इंदौर में हुआ। उन्होंने वर्ष 1965 में दुनिया के श्रेष्ठ संस्थानों में शामिल थॉम्सन फाउंडेशन, कार्डिफ (यूके) से पत्रकारिता में प्रशिक्षण प्राप्त किया। हालांकि अभयजी 1955 में ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए थे। 1963 में नईदुनिया के कार्यकारी संपादक हो गए और बाद में लंबे अरसे तक नईदुनिया के प्रधान संपादक रहे। 
      पत्रकारिता से जुड़े उच्च आदर्शों और मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास करने वाले पत्रकारों की पहली पंक्ति में अभय छजलानी का नाम आता है। आजादी के बाद की हिन्दी पत्रकारिता के संरक्षण और संवर्धन में श्री छजलानी की अहम भूमिका रही है। हिन्दी पत्रकारिता में उनके योगदान को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। हिन्दी पत्रकारिता अपने हीरो अभय छजलानी के भारतीय भाषाई समाचार पत्रों के शीर्ष संगठन इलना के तीन बार अध्यक्ष रहने के लिए भी गौरव का अनुभव करती है। अभयजी 2004 में भारतीय प्रेस परिषद के लिए मनोनीत किए गए। इसके अलावा उन्हें 1986 का पहला श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। ऑर्गनाइजेशन ऑफ अंडरस्टैंडिंग एंड फ्रेटरनिटी की ओर से वर्ष 1984 में गणेश शंकर विद्यार्थी सद्भावना अवॉर्ड दिया गया। विशेष योगदान के लिए उन्हें 1997 में जायन्ट्स इंटरनेशनल पुरस्कार और इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी पुरस्कार से भी नवाजा गया। 
      पत्रकारिता बेहद जोखिमभरा कार्यक्षेत्र है। किसी भी पत्रकार को कभी यह भरोसा नहीं रहता कि कल नौकरी उसके हाथ रहेगी या नहीं। घोड़ा दौड़ रहा है तो मालिक बोली लगाएगा वरना तो नमस्ते लंदन तय है। लेकिन, सरल, सहज और सुलभ स्वभाव के धनी अभय छजलानी के अखबार में कर्मचारी स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करते रहे। पत्रकारों का यह भरोसा ही हिन्दी पत्रकारिता के हीरो अभय छजलानी की सबसे बड़ी पूंजी है। 
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"अभय जी का जीवन निरंतर संघर्ष की दास्तान है। संघर्ष- अपना स्थान पाने के लिए, मालिक-संपादक की छवि से, अपने लोगों से, अपने आप से और हालात से। सतत संघर्ष।" 
- जयदीप कर्णिक, संपादक, वेबदुनिया
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

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